रविवार, 5 मई 2019

ईसाई धर्मांतरण : एक विश्लेषण

ईसाई समाज शिक्षित समाज रहा है इसलिए वह कोई भी कार्य रणनीति के बिना नहीं करता बड़ी सोच एवं अनुभव के आधार पर ईसाईयों ने अपनी प्रचार नीति अपनाई है ईसाईयों के धर्मांतरण करने की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है-

प्रथम चरण- संस्कृतिकरण (Inculturation)
द्वितीय चरण- विस्तार (Expansion)
तृतीय चरण- प्रभुत्व (Domination)

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है- Inculturation अर्थात संस्कृतिकरण इस शब्द का प्रयोग ईसाई समाज में अनेक शताब्दियों से होता आया है। सदियों पहले ईसाई पादरियों ने ईसाईयत को बढ़ावा देने के लिए 'संस्कृतिकरण' रूपी योजना का प्रयोग करना आरम्भ किया था इसे हम साधारण भाषा में आगे समझने का प्रयास करते हैं-

1.  प्रथम चरण में एक बाग़ में पहले एक बरगद का छोटा पौधा लगाया जाता है। वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता हुआ किसी प्रकार से अपना पोषण और रक्षा कर वृद्धि करने का प्रयास करता है उस समय वह छोटा होने के कारण अन्य पौधों के मध्य अलग सलग सा नहीं दिखता

2.  अगले चरण में वह पौधा एक छोटा वृक्ष बन जाता है अब वह न केवल अन्य पौधों से अधिक मजबूत दिखता है, अपितु अपने हक से अपना स्थान घेरने की क्षमता भी अर्जित कर लेता है वह अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक खाद, सूर्य का प्रकाश, पानी ग्रहण करते हुए वर्ष-प्रतिवर्ष उसके पेड़ व जड़ स्थान घेरने की प्रतियोगिता में भाग लेकर विजय पाने की चेष्टा करता हुआ प्रतीत होता है

3.  अंतिम चरण में वह एक विशाल वृक्ष बन जाता है उसकी शाखाओं के छाँव के नीचे आने वाले सभी पौधे धूप, पानी, खाद जैसे संसाधनों की कमी के चलते या तो उबर नही पाते अथवा मर जाते हैं उसका वहाँ एक क्षत्र राज कायम हो जाता है अब वह उस बाग़ का बेताज बादशाह होता है

ईसाई समाज में भी धर्मांतरण इन्ही तीन चरणों में होता है एक गैर ईसाई समाज, देश में इसका बीजारोपण संस्कृतिकरण से ही शुरू किया जाता है।ईसाई मत की मान्यताएं, प्रतीक, सिद्धांत, पूजाविधि आदि को छुपाकर उसके स्थान पर स्थानीय धर्म की मान्यताओं को ग्रहण करने जैसा स्वरुप धारण किया जाता है इस देश में दिखे उदाहरणों से इसे समझने का प्रयास करते हैं-

1.  वेशभूषा परिवर्तन- ईसाई पादरी पंजाब क्षेत्र में सिक्ख वेशभूषा में पगड़ी बांधकर, गले में क्रोस लटका कर प्रचार करते हैं हिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दू साधू का रूप धारण कर, गले में रूद्राक्ष माला में क्रोस डालकर प्रचार करते हैं दक्षिण भाषी क्षेत्र में दक्षिण भारत जैसे परिधान पहनकर प्रचार करते हैं

2.  प्रार्थना के स्वरुप में परिवर्तन-  पहले ॐ क्रिस्ताय नमः, ॐ माता मरियमाय नमः जैसे मनगढ़ंत मन्त्रों का अविष्कार किया जाता है फिर प्रार्थनागीत आदि लिखे जाते हैं, जिनमे संस्कृत, हिंदी, अथवा स्थानीय भाषा का उपयोग कर ईसामसीह की स्तुति की जाती है जिसे गाने पर एक धार्मिक विधि लगे

3.  त्यौहार विधि में परिवर्तन- स्थानीय त्यौहार के सामान ईसाई त्योहारों जैसे- गुड फ्राइडे, क्रिसमस आदि का स्वरुप बदल दिया जाता है जिससे वह स्थानीय त्योहारों के सामान दिखे कोई गैर ईसाई इन त्योहारों में शामिल हो तो उन्हें अपनापन न लगे

4.  चर्च की संरचना में परिवर्तन- पंजाब में अगर चर्च बनाया जाता है तो गुरुद्वारा जैसा दिखे, हिंदी भाषी क्षेत्र में किसी  हिन्दू मंदिर के समान दिखे, दक्षिण भारत में किसी दक्षिण भारतीय शैली में दिखे चर्च के बाहरी रूप को देखकर हर कोई यह समझे कि यह कोई स्थानीय मंदिर है, ऐसा प्रयास किया जाता है

5.  साहित्य निर्माण- क्रिस्चियन योग, ईसाई ध्यान पद्धति, ईसाई पूजा विधि, ईसाई संस्कार आदि साहित्य के शीर्षकों को प्रथम चरण में प्रकाशित करता है यह स्थानीय मान्यताओं के साथ अपने आपको मिलाने का प्रयास करता है अगले चरण ने चर्च स्थानीय भाषा में दया, करुणा, एकता, समानता, ईसा मसीह के चमत्कार, प्रार्थना का फल, दीन दुखियों की सेवा करने वाला साहित्य प्रकाशित करता है इस चरण का प्रयास अपनी मान्यताओं को पिछले दरवाजे से स्वीकृत करवाने की चेष्टा करता है। यीशु मसीह को किसी हिन्दू देवता एवं मरियम को किसी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित करना चर्च के लिए आम बात है भोले भाले लोगों को भ्रमित करने की यह कला चर्च के संचालकों से अच्छा कोई नहीं जानता

इस चरण में गैर ईसाई क्षेत्रों में बाकायदा मासिक वेतन के आधार पर पादरियों की नियुक्ति की जाती है उनका काम दीन दुखियों की सेवा करना, बीमारों के लिए प्रार्थना करना, चंगाई सभा करना, रविवार को प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों को प्रेरित करना होता है इस समय बेहद मीठी भाषा में ईसा मसीह के लिए भेड़ों को एकत्र करना एकमात्र लक्ष्य होता है यह कार्य स्थानीय लोगों के माध्यम से घुलमिलकर किया जाता है, जिससे आपको उनके ऊपर शक न हो जितने अधिक धर्म परिवर्तन का लक्ष्य पूर्ण होता है, उतना अधिक अनुदान ऊपर से मिलता है। यह कार्य शांतिपूर्वक, चुपचाप बिना शोर मचाए किया जाता है इस प्रकार से प्रथम चरण में स्थानीय संस्कृति के समान अपने को ढालना होता है। इसलिए इसे संस्कृतिकरण कहते हैं हमारे देश में दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, जम्मू कश्मीर, बंगाल आदि राज्य इस चरण के अंतर्गत आते हैं जहां पर चर्च बिना शोर मचाए विशेष रूप से गरीब बस्तियों में विशेष रूप से  आदिवासियों, दलितों को आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्रलोभन आदि देकर उनका धर्म परिवर्तन करने में लगा हुआ है।

द्वितीय चरण में विस्तार होता है छोटा चर्च अब बड़ा स्वरुप लेने लगता हैउसका विस्तार हो जाता है अब वह छुप छुप कर नही अपितु आत्मविश्वास से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है

1.  स्थानीय सभा के स्वरुप में परिवर्तन- अब वह हर रविवार को आम सभा में लाउडस्पीकर लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है अनेक लोग सालाना ईसाई बनने लगते हैं अब उसके पादरी ईसाई मत क्यों श्रेष्ठ है और स्थानीय देवी देवता क्यों श्रेष्ठ नहीं हैं, यह बताई जाती है. ऐसी बातें चर्च के दीवारों के भीतर खुलेआम बिना रुकावट के बोलने लगते हैं। ऐसे स्थिति में न केवल पादरी बल्कि उनके अनुयायियों में भी आत्मविश्वास बढ़ जाता है। अपितु वे धीरे धीरे आक्रामक भी होने लगते हैं कुछ अंतराल में बड़ी बड़ी चंगाई सभाओं का आयोजन चर्च करता है पूरे शहर में पोस्टर लगाए जाते हैं स्थानीय टेलीविजन पर उसका विज्ञापन भी दिया जाता है दूर दूर से ईसाईयों को बुलाया जाता है विदेशी मिशनरी भी अनेक बार अपनी गोरी चमड़ी का प्रभाव दिखाने के लिए आते हैं।

2.  चर्च के साथ मिशनरी स्कूल/कालेज का खुलना- अब चर्च के साथ ईसाई मिशनरी स्कूल खुल जाता है उस स्कूल में आदिवासियों, दलितों, हिन्दुओं के बच्चे मोटी मोटी फीस देकर अंग्रेज बनने आते हैं उन बच्चों को रोज अंग्रेजी में बाइबिल की प्रार्थना करवाई जाती है ईसा मसीह के चमत्कार की कहानियाँ सुनाई जाती है देश में ईसाई समाज की गतिविधियों के लिए दान कहकर धन एकत्र किया जाता है जो आदिवासी, दलित, हिन्दू बच्चे सबसे अधिक धन अपने माँ बाप से खोस कर लाते हैं, उन्हें और अधिक प्रेरित किया जाता है जो नहीं लाता उसे नजरअंदाज अथवा तिरस्कृत किया जाता है कुल मिलाकर अब इन ईसाई कान्वेंट स्कूल से निकले बच्चे या तो नास्तिक अथवा ईसाई अथवा हिन्दू अथवा आदिवासी, सरना धर्म की मान्यताओं से घृणा करने वाले अवश्य बन जाते हैं इसे 'आपका जूता आप ही के सर' बोलें तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी

3.  बिजनेस मॉडल- चर्च अब धर्म परिवर्तित आदिवासियों, दलितों, हिन्दुओं को अपने यहाँ रोजगार देने लगता है चर्च शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालय, वृद्धाश्रम, एन.जी.ओ. आदि के माध्यम से समाज सेवा के नाम पर विभिन्न उपक्रम आरम्भ करता है चपरासी, वाहन चालक से लेकर अध्यापक नर्स, अस्पताल कर्मचारी, डॉक्टर, पादरी, प्रचारक की नौकरियों में उनकी नियुक्ति होती है कुल मिलाकर यहाँ एक बिजनेस मॉडल के जैसा खेल होता है धर्म परिवर्तित व्यक्ति को यहाँ इस प्रकार से चर्च पर निर्भर कर दिया जाता है कि अब वह न चाहते हुए भी उसे चर्च की नौकरी करनी पड़ती है चर्च की नौकरी नहीं करेगा तो वह भूखे मरेगा, जिससे परिवर्तित धर्म से वापस जाने के लिए सोच भी न सके यह मॉडल विश्व में अनेक स्थानों पर आजमाया जा चुका है

4.  बाइबिल कॉलेज- चर्च अपने यहाँ पर धर्म परिवर्तित ईसाईयों के बच्चों को चर्च द्वारा स्थापित धार्मिक शिक्षा (Theology) देने वाले विद्यालयों में भर्ती करवाने के लिए प्रेरित करता है यह उद्देश्य दूसरी पीढ़ी को उनके पूर्वजों की जड़ों से पूरी तरह से अलग करना होता है इन विद्यालयों में वे बच्चे पढ़ने जाते हैं, जिनके माता पिता में सरना धर्म के संस्कार होते हैं उनके बच्चे एक सच्चे ईसाई के समान सोचें और बरतें सरना देवी देवताओं और मान्यताओं पर कठोर प्रहार करे और ईसाई मत का सदा गुणगान करे ऐसे उनकी मानसिक अवस्था को तैयार किया जाता है इन Theology कॉलेजों से निकले बच्चे ईसाईयत का प्रचार प्रसार रात दिन करते हैं

5.  पारिवारिक कलह-  ईसाई चर्च इस कला में माहिर हैं कि जिस परिवार का कोई सदस्य ईसाई बन जाता है तथा अन्य सदस्य सरना आदिवासी बने रहते हैं, वह घर झगड़ों का घर बन जाता है शुरू में वह ईसाई सदस्य अन्य सभी सदस्यों को ईसाई बनने का दबाव बनाता है घर के कार्यों में सहयोग करने से मना करना, सरना परम्परा के त्योहारों का विरोध करना, पैतृक पूजा में शामिल न होना, पत्नी और बच्चों को ईसाई न बनने पर संसाधनों से वंचित करना और यहाँ तक कि अपने माता पिता को ईसाई न बनने के विरोध में सुख सुविधा जैसे- भोजन, कपडे, चिकित्सा सुविधा दिलवाना बंद करना आदि के कई उदाहरण हैं

एक मित्र का अनुभव सांझा कर रहा हूँ, जो वर्ष 2003 का है मैं (मित्र) कोयंबटूर, तमिलनाडू में एम.बी.बी.एस. का छात्र था मेरे समक्ष एक परिवार जो ईसाईयों के पेंटाकोस्टल सम्प्रदाय से था, जो मरीज का इलाज करवाने लाया था इस ईसाई सम्प्रदाय में दवा के स्थान पर रोगी का ईसा मसीह की प्रार्थना से चंगा होने को अधिक मान्यता दी जाती है उस परिवार का मुखिया अन्य सदस्यों के न चाहते हुए भी अस्पताल से एक गंभीर रोगी की छुट्टी करवाकर चंगाई प्रार्थना करवाने के लिए चर्च ले गया रोगी का क्या हुआ होगा, सभी समझ सकते हैं जो ईसाई यह लेख पढ़ रहे हैं, वे कृपया आत्मचिंतन करें क्या परिवारों को उजाड़ना यीशु मसीह का कार्य है ?

इस दूसरे चरण में तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पंजाब आदि राज्य आते हैं इन राज्यों में सरकारें चर्च के गतिविधियों की अनदेखी करती हैं, क्योंकि वे चर्च के कार्यों में फ़ालतू हस्तक्षेप करने से बचती हैं सरकार के नाक के नीचे यह सब होता है मगर वह कुंभकरणी नींद में सोती रहती है

तीसरे चरण में चर्च एक विशाल बरगद बन जाता है इस चरण को "प्रभुत्व" का चरण कह सकते हैं। इस चरण में ईसाई मत का गैर ईसाईयों के प्रति वास्तविक सोच के दर्शन होते हैं चर्च के इस चरण में जायज और नाजायज के कोई अंतर नही रहता वह उसका साम दाम दंड भेद से अपने उद्देश्य को लागू कराने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है-

1.  हिंसा का प्रयोग- हिंसा पूर्व में उड़ीसा में ईसाई धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले स्वामी लक्षमणानन्द जी की हत्या करना भी इसी नीति के अंदर आता है उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा में रियांग जनजाति बस्ती थी उस जनजाति ने ईसाई बनने से इंकार कर दिया। उनके गांवों पर आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया उन्हें हर प्रकार से आतंकित किया गया, ताकि वे ईसाई बन जाएं। मगर रियांग स्वाभिमानी थे वे अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर आसाम में आकर अप्रवासी के समान रहने लगे, मगर धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया। खेद है कि कोई भी मानवाधिकार संगठन ईसाईयों के इस अत्याचार की सार्वजनिक मंच से कभी निंदा नहीं की

2.  सरकार पर दबाव- अपनी संख्या बढ़ने पर ईसाई समाज एकमुश्त वोटबैंक बन जाता है चुनाव के दौर में राजनीतिक पार्टियों के नेता ईसाई बिशप के चक्कर लगाते हैं बहुत कम लोग यह जानते हैं कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो मिजोरम में भारतीय संविधान के स्थान पर बाइबिल के अनुसार राज्य चलाने की सहमति प्रदान की थी पंजाब जैसे राज्य में सरकार द्वारा धर्म परिवर्तित ईसाईयों के एक प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। मदर टेरेसा दलित दलित ईसाईयों के आरक्षण के समर्थन में दिल्ली में धरने पर बैठ चुकी है फिर भी कमाल है धर्म परिवर्तन करने के पश्चात भी दलित दलित ही रहते हैं ! केरल और उत्तर पूर्व में राजनीतिक पार्टियों के टिकट वितरण में ईसाई बाहूल्य इलाकों में चर्च की भूमिका सार्वजनिक है गोवा जैसे राज्य में कैथोलिक चर्च के समक्ष बीजेपी जैसी पार्टियां भी बीफ जैसे मुद्दों पर चुप्पी धारण कर लेती है

तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा पहले धर्म परिवर्तन के विरोध में कानून बनाने, फिर ईसाई चर्च के दबाव में हटाने की कहानी अभी ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है। नियोगी कमेटी द्वारा प्रलोभन देकर जनजातियों/आदिवासियों को इसाई बनाने के विरोध में सरकार को जागरूक करने का कार्य किया गया था। उस रिपोर्ट पर सभी सरकारें बिना किसी कार्यवाही के चुप रहना अधिक श्रेयस्कर समझती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देशाई के कार्यकाल में धर्म परिवर्तन के विरोध में एक विधेयक पेश होना था। उस विधेयक के विरोध में मदर टेरेसा ने हमारे देश के प्रधानमंत्री को यह धमकी दी थी कि अगर इसाई संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, तो वे अपने सभी सेवा कार्य स्थगित कर देंगे। इस पर देसाई जी ने प्रतिउत्तर दिया कि इसका अर्थ तो यह हुआ कि ईसाई समाज सेवा की आड़ में धर्मांतरण करने का अधिक इच्छुक है। सेवा तो केवल बहाना मात्र है। खेद है कि मोरारजी देसाई की सरकार जल्दी ही गिर गई और यह विधेयक पास नहीं हुआ। इस प्रकार से ईसाई चर्च अनेक प्रकार से सरकार पर दबाव बनाते हैं। 


3. गैर इसाईयों के घरों में प्र्भुत्व के लिए संघर्ष- ईसाई समाज से संबन्धित नौजवान लड़के-लड़कियों को ईसाईयत के प्रति समर्पण भाव बचपन से सिखाया जाता है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने के कारण उनका आपस में वार्तालाप चर्च के परिसर में, यूथ प्रोग्राम में, बाइबिल के कक्षाओं में, गर्मियों के कैंप में, गिटार/संगीत सिखाने की कक्षाओं में आरंभ हो जाता है। इस कारण से अनेक युवक युवती बहुधा आपस मे विवाह भी कर लेते हैं। इस अंतर धार्मिक विवाह को कुछ लोग सेक्युलर समाज का अभिनव प्रयोग चाहे कहना चाहे, मगर इस संबंध का एक अन्य पहलु भी है। वह है प्र्भुत्व। इसाई युवती अगर आदिवासी युवक से विवाह करती है तो इसाई रीति-रिवाजों, चर्च जाने, बाइबिल आदि पढ़ने का त्याग कभी नहीं करती। उस विवाह से उत्पन्न हुई संतान को भी यही संस्कार देने का पूरा प्रयत्न करती है। वहीं अगर ईसाई युवक किसी आदिवासी लड़की से विवाह करता है, तो वह अपनी धार्मिक मान्यताओं को उस पर लागू करने के लिए पूरा जोर लगाता है। जबकि गैर ईसाई युवक-युवतियाँ अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर न प्रबल होते और न ही कट्टर होते हैं। इस प्रभुत्व की लड़ाई में गैर ईसाई सदस्य बहुधा आत्मसमर्पण कर देते हैं। अन्यथा उनका घर कुरुछेत्र न बन जाये। धीरे-धीरे वे खुद इसाई बनने की ओर चल पड़ते हैं। ईसाई समाज के लड़के-लड़कियां आदिवासी समाज के प्रबुद्ध वर्ग जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, बहुराष्ट्रीय कंपनी मे कार्यरत युवक-युवतियों से ऐसा संबंध अधिकतर बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम पर बहुत कम लोगों की दृष्टि जाती है। कम शब्दो में कहें तो आदिवासी समाज की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे उसी के विरूद्ध कार्य करने लगती है। पाठक स्वयं विचार करे। यह कितना चिंतनीय विषय है। 


4. व्यापार नीति- बहुत कम लोग जानते हैं कि संसार के प्रमुख ईसाई देशों के चर्च व्यापार मे भारी भरकम धन का निवेश करते हैं। चर्च आफ़ इंग्लैंड ने बहुत बड़ी धनराशि इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय कंपनीयों में लगाई हुई है। यह विशुद्ध व्यापार है। यह एक प्रकार का चर्च और व्यापारियों का गठजोड़ है। इन कंपीनियों से हुए लाभ को चर्च/ईसाई धर्मनांतरण के कार्यों में व्यय करता है। जबकि व्यापारी वर्ग के लिए चर्च धर्मांतरित नए उपभोक्ता  तैयार करता है। एक उदाहरण लीजिए- चर्च के प्रभाव से एक आदिवासी, दलित, हिन्दू धोती-कुर्ता छोड़कर पैंट-शर्ट-कोट-टाई पहनने लगता है। व्यापारी कंपनी यह सब उत्पाद बनाती है। चर्च नए उपभोक्ता तैयार करता है। उसे बेचकर मिले लाभ को दोनों मिलकर प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग अनेक शताब्दियों से संसार के अनेक देशों में होता आया है। प्रभुत्व के इस चरण में अनेक छोटे देशों की आर्थिक व्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और परोक्ष रूप से चर्च के हाथों में आ चुकी हैं। यह प्रक्रिया हमारे देश में भी शुरू हो चुकी है। इसका एकमात्र समाधान स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक प्रयोग है। 


5. सांस्कृतिक अतिक्रमण- विस्तार चरण में चर्च सांस्कृतिक अतिक्रमण करने से भी पीछे नहीं हटता। वह उस देश की सभी प्राचीन संस्कृतियों को समूल से नष्ट करने का संकल्प लेकर यह कार्य करता है। आपको कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं- झारखंड, उड़ीसा, बिहार, बंगाल में करम महोत्सव में करम डाल के साथ या करम डाल के जगह पर "क्रॉस" लगाकर करम पूजा करना, यीसु से संबन्धित गीत भी होता है। केरल मे कथकली नृत्य के माध्यम से रामायण के प्रसंगों का नाटक रूपी नृत्य किया जाता था। ईसाई चर्च ने कथकली को अपना लिया, मगर रामायण के स्थान पर ईसा मसीह के जीवन को प्रदर्शित किया जाने लगा। तमिलनाडू में भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से नटराज/शिव की पूजा करने का प्रचलन है। चर्च ने भरतनाट्यम के मध्यम से माता मरियम को सम्मान देना आरंभ कर दिया। हिन्दू त्योहारों जैसे- होली, दीपावली को प्रदूषण बताया और 14 फरवरी जैसे फूहड़ दिन को प्रेम का प्रतीक बताकर मानसिक प्रदूषण फैलाया। हर ईसाई स्कूल में 25 दिसंबर को सांता के लाल कपड़े पहन कर केक काटा जाने लगा। देखा देखी सभी हिन्दुओं द्वारा संचालित विद्यालय भी ऐसा ही करने लगे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वे लोग किसका अंधानुसरण कर रहे हैं। इसे ही तो सांस्कृतिक अतिक्रमण कहते हैं। 

तृतीय चरण मे हमारे देश के केरल, उत्तर पूर्वी राज्य नागालैंड, गोवा आदि आते हैं, जहाँ की सरकार तक ईसाई चर्च की कृपा के बिना नहीं चल सकती। असली आदिवासी तो यहाँ खत्म ही हो चुके हैं। समीप जाकर देखेने से ही आपको पूरी तरह मालूम चल जायगा। अगर तीसरा प्रभुत्व का चरण भारत के अन्य राज्यों में भी आरंभ हो गया तो भविष्य मे क्या होगा? यह यक्ष प्रश्न पाठकों के लिए है। आदिवासी समाज को अपनी रक्षा एवं बिछुड़ चुके अपने भाइयों को वापिस लाने के लिए दूरगामी वृहद नीति बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। अन्यथा बहुत देर न हो जाये !!


दीपक हंसदा (झारखंड)
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शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

महिषासुर-एक महान उदार द्रविड़ शासक


मैसूर, कर्नाटक में स्थापित महिषासुर
की शिलाकृति
महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है। उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है। यद्यपि कि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इसके बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं। यहां तक कि बी. आर. आंबेडकर और ज्योति राव फूले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविडियन शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की।

इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि माहीशब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में शांति कायम करे। अधिकांश देशो के राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे। उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था। उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों  के लिए कोई जगह नहीं थी। कोई भी अपने भोजन, आनंद या धार्मिक अनुष्ठान के लिए मनमाने तरीके से अंधाधुंध जानवरों को मार नहीं सकता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके राज्य में किसी को भी निकम्मे तरीके से जीवन काटने की इजाजत नहीं थी। उनके राज्य में मनमाने तरीके से कोई पेड़ नहीं काट सकता था। पेडों को काटने से रोकने के लिए उन्होंने बहुत सारे लोगों को नियुक्त कर रखा था।

विजय दावा करते हैं कि महिषासुर के लोग धातु की ढलाई की तकनीक के विशेषज्ञ थे। इसी तरह की राय एक अन्य इतिहासकार एम.एल. शेंदज प्रकट करती हैं, उनका कहना है कि इतिहासकार विंसेन्ट ए स्मिथ अपने इतिहास ग्रंथ में कहते हैं कि भारत में ताम्र-युग और प्राग ऐतिहासिक कांस्य युग में औजारों का प्रयोग होता था। महिषासुर के समय में  पूरे देश से लोग, उनके राज्य में हथियार खरीदने आते थे। ये हथियार बहुत उच्च गुणवत्ता की धातुओं से बने होते थे। *लोककथाओं के अनुसार महिषासुर विभिन्न वनस्पतियों और पेड़ों के औषधि गुणों को जानते थे और वे व्यक्तिगत तौर पर इसका इस्तेमाल अपने लोगों की स्वास्थ्य के लिए करते थे।

क्यों और कैसे इतने अच्छे और शानदार राजा को खलनायक बना दिया गया?इस संदर्भ में सबल्टर्न संस्कृति के लेखक और शोधकर्ता योगेश मास्टर कहते हैं कि इस बात को समझने के लिए सुरों और असुरों की संस्कृतियों के बीच के संघर्ष को समझना पडेगा। वे कहते हैं कि जैसा कि हर कोई जानता है कि असुरों के महिषा राज्य में बहुत भारी संख्या में भैंसे थीं। आर्यों की चामुंडी का संबंध उस संस्कृति से था, जिसका मूल धन गाएं थीं। जब इन दो संस्कृतियों में संघर्ष हुआ, तो महिषासुर की पराजय हुई और उनके लोगों को इस क्षेत्र से भगा दिया गया

कर्नाटक में न केवल महिषासुर का शासन था, बल्कि इस राज्य में अन्य अनेक असुर शासक भी थे। इसकी व्याख्या करते हुए विजय कहते हैं कि “1926 में मैसूर विश्वविद्यालय ने इंडियन इकोनामिक कांफ्रेंस के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक राज्य में असुर मुखिया लोगों के बहुत सारे गढ़ थे। उदाहरण के लिए गुहासुर अपनी राजधानी हरिहर पर राज्य करते थे। हिडिम्बासुर चित्रदुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन करते थे। बकासुर रामानगर के राजा थे। यह तो सबको पता है कि महिषासुर मैसूर के राजा थे। यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि आर्यों के आगमन से पहले इस परे क्षेत्र पर देशज असुरों का राज था। आर्यों ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया

आंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी मिथकों के इस चित्रण का पुरजोर खण्डन किया है कि असुर दैत्य थे। आंबेडकर ने अपने एक निबंध में इस बात पर जोर देते हैं कि महाभारत और रामायण में असुरों को इस प्रकार चित्रित करना पूरी तरह गलत है कि वे मानव-समाज के सदस्य नहीं थे। असुर मानव समाज के ही सदस्य थेआंबेडकर ब्राह्मणों का इस बात के लिए उपहास उड़ाते हैं कि उन्होंने अपने देवताओं को दयनीय कायरों के एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि हिंदुओं के सारे मिथक यही बताते हैं कि असुरों की हत्या विष्णु या शिव द्वारा नहीं की गई है, बल्कि देवियों ने किया है। यदि दुर्गा (या कर्नाटक के संदर्भ में चामुंडी) ने महिषासुर की हत्या की, तो काली ने नरकासुर को मारा। जबकि शुंब और निशुंब असुर भाईयों की हत्या दुर्गा के हाथों हुई। वाणासुर को कन्याकुमारी ने मारा। एक अन्य असुर रक्तबीज की हत्या देवी शक्ति ने की। आंबेडकर तिरस्कार के साथ कहते हैं कि ऐसा लगता है कि भगवान लोग असुरों के हाथों से अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को, अपने आप को बचाने के लिए भेज दिया

आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा।* इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है। अपने शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई। नाटक-नौटंकी के लिए अच्छी, लेकिन अंसभव सी लगने वाली इन कहानियों, से हट कर हम इस सच्चाई को देख सकते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी वर्ग ने देशज लोगों के इतिहास को तोड़ा मरोड़ा। इतिहास को इस प्रकार तोड़ने मरोड़ने का उनका उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना था।

केवल बंगाल या झारखण्ड में ही नहीं, बल्कि मैसूर के आस-पास भी कुछ ऐसे समुदाय रहते हैं, जो चामुंडी को उनके महान उदार राजा की हत्या के लिए दोषी ठहराते हैं। उनमें से कुछ दशहरे के दौरान महिषासुर की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं।

पिछले दो वर्षों से असुर पूरे देश में आक्रोश का मुद्दा बन रहे हैं। यदि पश्चिम बंगाल के आदिवासी लोग असुर संस्कृति पर विचार-विमर्श के लिए विशाल बैठकें कर रहे हैं, तो देश के विभिन्न विश्विद्यालयों के कैम्पसों में असुर विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। बीते साल उस्मानिया विश्विद्यालय और काकाटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने नरकासुर दिवसमनाया था। चूंकि जेएनयू के छात्रों के महिषासुर उत्सव को मानव संसाधन मंत्री (तत्कालीन) ने इतनी देशव्यापी लोकप्रियता प्रदान कर दी थी कि, मैं उसके विस्तार में नहीं जा रही हूँ।

महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण की क्या व्याख्या की जाएक्या केवल इतना कह करके पिंड छुडा लिया जाए कि, मिथक इतिहास नहीं होता, लोकगाथाएं भी हमारे अतीत का दस्तावेज नहीं हो सकती हैं। विजय इसकी सटीक व्याख्या करते हुए कहते हैं  कि मनुवादियों ने बहुजनों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। हमें इस इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड़ को झाडंना पडेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पडेगी। यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं। महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों का बढता आकर्षण बताता है कि वास्तव में यही काम हो रहा है।

(गौरी लंकेश ने यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, जो वेब पोर्टल बैंगलोर मिरर में 29 फरवरी, 2016 को प्रकाशित हुई थी)
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

बोली से भाषा बनी गोंडी

गोंडी अब तक बहुत सारी बोलियों का समुच्चय थी. बहुत सी बोलियाँ, जिन सभी को गोंडी कहते थे पर उनको बोलने वाले आपस में एक दूसरे को समझ नहीं पाते थे.

भारत में राज्यों का गठन भाषाई आधार पर हुआ था पर गोंडी भाषियों के साथ एक ऐतिहासिक अन्याय हुआ था, जब गोंडी बोलने वाले आदिवासी कम से कम 6 प्रदेशों में बंट गए.

इन सभी प्रदेशों की अपनी भाषा है, जिसने उस प्रदेश में बोले जाने वाली गोंडी पर प्रभाव डाला. वैसे भी हर भाषा  हर कुछ सौ किलोमीटर में थोड़ा रूप बदलती है पर इन विभिन्न राज्यों के कारण गोंडी के विभिन्न रूप जैसे तेलगु गोंडी, हिंदी गोंडी और मराठी गोंडी सामने आए. यद्यपि इन सभी को इसको बोलने वाले गोंडी कहकर की पुकारते रहे पर वे एक दूसरे को समझ नहीं पा रहे थे तो एक दूसरे से और दूर होते गए.

मध्य भारत में 1.2 करोड़ गोंड आदिवासी रहते हैं. मध्य भारत पिछले लगभग 40 सालों से एक सशस्त्र आंदोलन के परिणामों से जूझ रहा है. आज इस आंदोलन का जिसे हम माओवादी या नक्सल आंदोलन भी कहते हैं, एक बहुत बड़ा हिस्सा गोंड आदिवासियों से बना है.

जैसे भारत देश का अंग्रेजी नाम बाहर से आए लोगों ने दिया, वैसा ही गोंड स्वयं को कोया, कोयतूर आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं और उन सभी समूहों को हम सरलता के लिए भी आज गोंड ही कहते हैं.

माओवादी आंदोलन की प्रमुख भाषा गोंडी है. उसके लगभग सभी लड़ाके गोंडी भाषी हैं. उनमे से बहुतों को गोंडी के सिवाय और कोई अन्य भाषा नहीं आती. उनके सेक्रेटरी या संचालक यद्यपि अधिकतर तेलगु, हिंदी, ओड़िया या मराठी जैसी भाषाओं में भी बात कर लेते हैं.

पिछले हफ्ते के पहले गोंडी का एक संवाद माध्यम बनाया जाना संभव नहीं था, जिसे हर गोंडी भाषी समझ सके. उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ में बेमन से ही सही प्राथमिक कक्षाओं के लिए गोंडी के कुछ पाठ्यपुस्तकें बनाई गई हैं पर उत्तर और दक्षिण बस्तर के लिए दो अलग अलग पाठ्यपुस्तकें बनाई  गई हैं.

गोंडी में अब तक किसी सरकारी आदेश का अनुवाद करना भी संभव नहीं था, जिसे हर गोंड समझ सके. जंगल के क़ानून का आज 12 साल बाद भी गोंडी में अनुवाद नहीं हुआ है, जबकि उस क़ानून का निर्माण गोंडी भाषी जैसे जंगल में रहने वाले आदिवासियों के लिए ही हुआ है.

पिछले 4 वर्षो से मध्य भारत के गोंड आदिवासी के कुछ दर्जन प्रतिनिधि हर कुछ महीने किसी न किसी जगह मिलते रहे हैं और पिछले हफ्ते उन्होंने अपना पहला मानक शब्दकोष तैयार किया है. आम तौर पर इस तरह के काम सरकार करती है.

यह संभवतः पहली बार हुआ है जब एक समुदाय ने साथ आकर अपना मानक शब्दकोष बनाया है और सरकार से भी उनको मदद मिली है. अब गोंडी में पत्रकारिता, एक जैसा शिक्षण और प्रशासन का काम किया जा सकेगा. अब उत्तर बस्तर के शिक्षक दक्षिण बस्तर भी जा सकेंगे जो अब तक नहीं हो पा रहा था.

पिछले हफ्ते दिल्ली के इंदिरा गांधी कला केंद्र में मध्य भारत के 7 प्रदेशों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक से 80 गोंड आदिवासी एक हफ्ते के लिए जुटे और उन्होंने 4 साल से चल रहे अपने काम को आखिरी रूप दिया.

इस बैठक में समापन समारोह में आंध्र के अर्का माणिक राव ने धाराप्रवाह गोंडी में भाषण दिया और मध्यप्रदेश के गुलजार सिंह मरकाम ने उसका तुरंत फुरंत हिंदी में अनुवाद कर दिया. इस प्रक्रिया की शुरुआत के पहले ये दोनों गोंडी भाषा एक दूसरे का समझ नहीं पाते थे.

गोंडी इलाकों में यदि अब मातृभाषा में शिक्षण शुरू होता है तो बहुत से गोंडी भाषी युवाओं को नौकरी मिलेगी और स्कूलों से ड्रॉप आउट की संख्या घटेगी. माओवादी आंदोलन के अधिकतर लड़ाके स्कूल ड्रॉप आउट हैं. वे स्कूल इसलिए पूरा नहीं कर पाए थे, क्योंकि उनका शिक्षक हिंदी, मराठी, ओड़िसा और तेलगु बोलता था और वे गोंडी समझते थे.

गोंडी के शिक्षक भर्ती करने के लिए हो सकता है कि शुरू में हमें योग्यता में छूट देनी पड़ेगी, क्योंकि आज गोंडी जानने वाले पढ़े लिखों की तादाद कम है. ये अधिकतर गोंडी भाषी इसलिए माओवादियों के साथ जुटे हैं, क्योंकि उनके जीवन की छोटी छोटी दिखने वाली समस्याएं हल नहीं होती, क्योंकि अक्सर अधिकारी और पत्रकार गोंडी नहीं समझता है.

कुछ तकनीकी कंपनियां अब मानक गोंडी का बोलता शब्दकोष और हिंदी से गोंडी और उलटा की मशीन विकसित करने की बात कर रहे हैं. अगर अब गोंडी भाषा में मोबाईल रेडियो जैसे प्रयोग होंगे जहां दूर रहने वाले गोंडी भाषी अपनी समस्याओं की बात कर सकेंगे तो मशीन ट्रांसलेशन के बाद अधिकारी भी उसे समझ सकेंगे.

गोंडी के भाषा बनने को सरकारी मुहर लगनी अभी बाकी है, जिसके लिए उसे भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना होगा. आशा है सरकार इस दिशा में जल्द कदम उठाकर एक ऐतिहासिक चूक को सही करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लेगी.

इससे मध्य भारत में शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.
                                                                                                              शुभ्रांशु  चौधरी
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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

विकासवाद का मुखौटा

अपने संवैधानिक हक और अधिकारों के लिए
तीर धनुष तानते शांतिप्रिय आदिवासी
आज शहरों में विकास की रफ़्तार चरम की ओर हैं. विकास करने के लिए जल, जमीन, संसाधन और धन की आवश्यकता होती है. शहरों में धन प्रचुर है. लोग धन से धन पैदा करते हैं और धनवान बनते हैं. धन कमाने का तरीका चाहे अनैतिक हो या गलत. इससे धन कमाने वाले को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता ! चोरी, डकैती, लूटमारी, झूट, फरेब से धन कमाने की ललक शहरी जमीन की सत्यता है. धन कमाने की लालसा में भाई, बहन, माता पिता, परिवार, समाज, संस्कृति, धर्म, सभ्यता, मानवता कोई मायना नहीं रखती है. धन कमाने, समृद्धि प्राप्त करने, एशोआराम का जीवन प्राप्त करने के लिए यहाँ लोग जमीन को आसमान और आसमान को जमीन कहते हैं ! कहा कही में ही अपने माता पिता, भाई बहन, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और आमजनों का आसानी से क़त्ल कर देते हैं. इन शहरों में धन कमाने की गलाकाट प्रतियोगिता बनी हुई है. इसी प्रतियोगिता में शामिल होकर आधुनिक मानव समाज देश की प्रगति में भागीदार हो रहे हैं !!

सरकारें राज्य और देश की प्रशासन व्यवस्था संभाल रहे हैं तथा पुलिस और न्यायवादी संस्थाएं शान्ति, सुरक्षा और न्याय दिलाने में व्यस्त हैं. देश और राज्यों के प्रशासन में टांग खिचाई, संसद और विधान सभा में गाली गलौच, मारपीट, तोड़ फोड़ के होते हुए भी शान्ति, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था कायम हैं. सरकार के मुखियाओं के भाषणों के माध्यम से विकास और जीवन की मूलभूत योजनाएं और सुविधाएं जन जन, गाँव गाँव तक पहुँच रही है, किन्तु वास्तविकता की पुष्टि तो गाँवों में जाकर ही की जा सकती है.

इस देश के प्रगतिशील शहरों से दूर कस्बों, अंचलों में विभिन्न वर्ग समूहों के मानव समाज निवास करते हैं. उसी तरह दूरस्थ मैदानी वनों, पर्वतों, पहाड़ों में इस देश के लगभग सम्पूर्ण आदिवासी समाज की जनसंख्या निवास करती है. उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिवेश सशक्त किन्तु, शिक्षा, स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल आदि मूलभूत सुविधाओं से दूर हैं तथा आर्थिक परिस्थितियां अत्यंत कमजोर होने के बावजूद भी धैर्य के साथ, संतोष, शान्तिपूर्ण एवं प्रकृति संगत जीवन यापन कर रहे हैं.

स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद विकास की रफ़्तार शहरों से गांवों, कस्बों, जंगलों, पहाड़ों की ओर बढ़ रही है. सुकून मिलता है यह सुनकर और जानकर कि सरकार अपने विकास के मिशन को लेकर जन जन तक पहुंचने का प्रयास कर रही है तथा पूरा प्रशासन तंत्र योजना व कार्यों को लेकर सरकार के साथ कदमताल कर रही है.

अभावों में जीने वालों के मन में "मन की बात" सुनकर आशा जगी है. अब वे गाँव की गली, टूटते घर, खेत की बंधियों (मेंड़) को श्रमदान से ठीक करने की मानसिकता छोड़ चुके हैं. वे सुन चुके हैं कि अब मुफ्त में मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना से सड़क बनने वाले हैं. मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री आवास योजना से उनका पक्की घर बनने वाला है. मेंड़ बंधान योजना से उनके खेत का मेंड़ सुधरना है. नल जल योजना से झिरिया के गंदले पानी से मुक्ति मिलेगी. खाद्यान्न योजना से मिलने वाले एक दो रूपये किलो चांवल, गेहूँ, चना, तेल और नमक से उनका पेट भर जाएगा. जंगल पहाड़ों के काँटों, कंकर पत्थरों से बचने के लिए चरणपादुका, पहनने के लिए लुगड़ा, पोल्का, ओढ़ने बिछाने के लिए चादर, कम्बल, बरसात के लिए छतरी, पढने जाने वाले बच्चों के लिए साइकल, कापी, पुस्तक, बस्ता, मोबाईल, लेपटॉप आदि. खेती के लिए मरहा बैला जोड़ी, दूध के लिए खरटी टाली गाय, इन सबका पांच साल के पांच साल जुगाड़ होते रहेंगे. क्या इसी तरह जंगल के साथ साथ जीवन साधनों का जुगाड़ होते रहेगा और वे विकास की धारा में जुड़ते रहेंगे ?

इन भोले भाले लोगों की सोच एकदम सटीक और सीधा है. अटल विश्वासी हैं. बाहरी परिस्थितियों से जूझे नहीं. धैर्य और संतोष इनका सबसे बड़ा जीवन का अस्त्र शस्त्र रहा. जल, जंगल और जमीन इनके जीवन के पुरखौती साधन रहे. अपने पुरखों की गौरवपूर्ण प्रकृति संगत संस्कृति के साथ, जीवन का अंधियारा उजियारा तलासते, संवारते और अंत में अपने इन्ही धर्म धरा की मिट्टी में विलीन हो जाते हैं. 

शहरों से गांवों की ओर बढ़ता हुआ वर्तमान विकास रुपी सुनहरा दानव, आज उन्ही की छाती पर मूंग दल रहा है. इस विकासवादी स्वप्नों के चेहरे का स्वरुप देखकर उनके पैरों के नीचे का जमीन खिसकने लगा है. इस विकास रुपी चेहरे का स्वरुप इतना विकराल और जीवन विनाशक होगा, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था. आज पूरे देश में ही नहीं दुनिया के आधुनिक विकास रुपी चक्र की चक्की में इन भोले भाले लोगों का जीवन पिस रहा है. विकास के स्वप्नदृष्टा सरकारों से इस आदिम जीवन विनाशकारी चक्की को ऊर्जा मिल रही है. देश का विकास पथ उनके जीवन को रौंदते हुए आगे बढ़ रहा है. ज़माना और जमाने के लोग इस विकास के जीवन विनाशकारी स्वरुप को देखकर भी अनजान बन रहे हैं, तालियाँ बजा रहे हैं, खुश हैं ! अखबारों के काले, पीले, हरे, नीले रंगीन शब्द सरकार की दृष्टि और द्रष्टिकोण सिद्ध कर रहे हैं. ऐसी स्थितियों में हमारी अनपढ़, अल्पबुद्धि में भी अनेक सवाल उभरते हैं, कि इस मानव विनाशकारी विकास से मानव प्रजाति का ही दूसरा संपन्न वर्ग खुश क्यों है ? उनकी इस ख़ुशी का राज क्या है ? विकास के इस विनाशकारी तांडव को देखकर भी मौन क्यों हैं ?

इस देश में पढ़े लिखे, समाज शास्त्री, न्याय शास्त्री, संविधान की व्याख्या करने वाले बहुए हैं. अभी भी देश के आदिवासियों के लिए इन शास्त्रों के शब्द काले अक्षर भैंस बराबर हैं. इनके सामने कितना ही विकास का शास्त्रीय सुर से गायन किया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता. संकल्प के लोहे पर दौड़ता विकास का एक्सप्रेस अपनी पटरी पर भैंसों की भीड़ देखकर रुकने वाला नहीं है. बिना ब्रेक वाला विकास का एक्सप्रेस रेल अंधी रफ्तार से ऊबड़ खाबड़ तबेलों की ओर बढ़ रही है. लोग हैं कि अपना उजड़ा हुआ तबेला भी छोड़ने को तैयार ही नहीं. कारण साफ़ है कि इन तबेलों में भी रूखी सूखी जिन्दगी के अरमान फल फूल रहे हैं. वही छिन जाएगा तो भटकती आत्मा बनके रह जाएंगे, जैसे आज तक देशी विकास के थपेड़े खाकर करोड़ों लोग. आत्माएं भटकते हैं, ऐसा हमने सूना है, किन्तु यहाँ तो ज़िंदा इंसान और लाशें दोनों भटक रहे हैं !!

क्यों भटक रहे हैं ? इसका समाधानकारक उत्तर तक पहुँचने के लिए आदिवासियों को अपने पुरखों के धरातल के इतिहास को झांकना जरूरी है. सामाजिक जीवन, स्वाभाव, संस्कृति, धर्म, जीवन दर्शन के आईने में भी झांकर देखना होगा. अपने पुरखों से मिला ज्ञान, गुलामी मानसिकता से हटकर, अपनी बुद्धि का विवेकपूर्ण स्तेमाल और तर्क करना होगा. स्वर्गवासियों के ग्रंथों की कथा से हटकर अपने धरातल की खोज करने का प्रयास करना होगा. तभी आदिवासी समाज इनके मीठे बोल के पीछे छिपे ऐतिहासिक कातिलाना रहस्यों को समझ पाने में समर्थ हो पाएंगे.

प्राचीन इतिहास में आर्यों और अनार्यों के बीच जितने भी संघर्ष हुए वे सब धन, धर्म और धरा पर अधिसत्ता के लिए ही थे. उनके वंशज अभी भी इनको प्राप्त करने के लिए शाम, दाम, दंड, भेद, छल और बल से किसी भी हद तक जा सकते हैं और जा ही रहे हैं. इतिहास गवाह है, यहाँ आर्यों का कोई जन, धन, धरती और धर्म नहीं था. इस धरा के माता बहनों से ही अपना वंश वृद्धि किए. प्राचीन काल से लेकर अब तक भी अनार्यों के प्रति आर्यों के मन की घृणा गई नहीं है. द्वेष और बदले की भावना अभी भी प्रबल है. वर्तमान में यदि अनार्यों के प्रति उनमें कोई बदलाव आया है तो केवल घृणा, लड़ाई और संघर्ष के तौर तरीकों पर. भगवान, धर्म और राजनीतिक मीठे बोल के पीछे छिपे कातीलाना चेहरे को पढना सीधे साधे लोगों की बस की बात नहीं होती है. आज धर्म और धन उनके पास है. धर्म की वृद्धि की लालसा अभी भी बनी हुई है. मंदिरों के भगवान और धर्म इनके सपनों के उड़ान भरने के माध्यम हैं. धन और धरती की लालसा उनके मन से कभी ख़त्म होने वाला नहीं है. आदिम जनों के जल, जंगल और जमीन में अकूत नैसर्गिक धन संपदा है. इसके लिए आज भी वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और जा ही रहे हैं !!

वर्तमान परिवेश में विकासवाद का चेहरा वोट और नोट के राजनीतिक गठबंधन से धरातल पर उतरता है. इस विकासवाद के धरातल पर केवल उन्ही की वोट और नोट के सफ़ेद पोशी, परिवारवाद, समाजवाद, धर्मवाद और जातिवाद की पूरी श्रंखला खड़ी है. छल बल से भरे आदर सम्मान के दो मीठे बोल से प्रभावित अनार्यों के दो चार सिपाही, गिड़ते पड़ते दौड़ लगाकर, इन सफ़ेद नाकाब पाशों की श्रंखला में जाकर खड़े होने के लिए लालायित रहते हैं. उन्हें अनादर और अपमान के वही मीठे जहर पीने पड़ते हैं, जो उनके ऐतिहासिक पूर्वजों को पिलाया जाता रहा. इस ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और असमानता को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी भूल है. आज भी मूल जनों के जीवन की विकट परिस्थितियाँ सबके सामने है. यह विकट परिस्थितियाँ केवल और केवल उनकी ऐतिहासिक दुर्भावना का प्रतीक है. इस धरा के ही मूल जनों के प्रति सदियों से दुर्भावना का जहर भरने वाले नकली नाकाबपोश समाज के हत्यारों से सावधान रहकर, उस दुर्भावना के प्रति संघर्ष के लिए सामाजिक बल पैदा करने की जरूरत है. अपने आत्मसम्मान के प्रति समाज को जागृत करने की जरूरत है. आत्मसम्मान को बचाने के लिए उनकी श्रंखला में गिड़ते पड़ते, दौड़ लगाकर जाकर खड़े होने की आवश्यकता ही नहीं है.

देश और राज्यों के शासन में, सत्ता में, राजनीति में, धन में, धर्म में आर्यों का ही कब्ज़ा है. इसलिए प्रशासनिक संस्थाओं से निकलने वाले आधुनिक विकासवाद की हवा में भी आदिम जन विनाशक छल और बल का मीठा जहर घुला हुआ है. यह विकासवाद की नहीं विनाशवाद की हवा है. 

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा आज तक नहीं देखा गया कि आदिम जनों के विकासोन्मुखी सामाजिक, सांस्कारिक सरोकारों के अनुरूप उनके विकास की नीतियाँ बनाकर संचालित किया गया हो. जिन्हें विकास की जरूरत है, उन्हें ही विनाश के गर्त पर पहुंचाया जा रहा है. विकास के नाम पर क्रियान्वित होने वाले इन जन विनाशक परिस्थितियों को देश के हर आदिवासी राज्यों में देखा जा सकता है. वर्तमान में इन आदिवासी राज्यों में विकास के नाम पर क्रियान्वित किए जाने वाले कार्यों के स्वरुप और जिनके लिए विकास की अवधारणा रची जा रही है, उन्ही के विरोध के स्वरुप को देखकर एक अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति भी इन विकास योजनाओं के पीछे छिपे भयंकर विनाशकारी चेहरे को पहचान सकता है.

केंद्र की सत्ता से विकासवाद की हवा तेजी से चलती है. राज्यों तक पहुँचती है और राज्य की सरकारें विकास की आधार रचना उद्योग लगाने के लिए सहमती ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर करते हैं. प्रचार प्रसार होता है और क्षेत्र की पचान बनने लगती है कि यहाँ उद्योग लगने वाला है. यहाँ के लोगों की नौकरी लगने वाली है. लोगों के आय के साधन बढ़ेंगे तो क्षेत्र के लोगों का विकास होगा. क्षेत्र के लोग गुब्बारे सा फूल जाते हैं. एक अनपढ़ से अनपढ़ और मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी सोचता है कि उसे नियमित मजदूरी मिल जाएगा, जिससे वे परिवार का भलीभांति गुजारा कर सकेंगे. इससे ज्यादा वह सोच नहीं पाता, किन्तु जब उद्योग की स्थापना की बारी आती है तो पता चलता है कि यह उद्योग जिनके विकास के लिए लगना है उन्ही के जीवन के आधार जमीन को ही छीन लेती है. जीवन का गुजारा, विकास का सपने देखने वाले लोग ही अपने जमीन से सदा के लिए विस्थापित कर दिए जाते  हैं. जमीन का सही मुवावजा भी नहीं मिल पाता है. लोग अपने ही जमीन और घर से बेघर होकर हमेशा हमेशा के लिए ठगे के ठगे रह जाते हैं. यह सरकारी और कारपोरेटिया परिवेश में आमजनों का लूट नहीं तो और क्या है ?

देश और राज्य सरकारों के द्वारा आदिवासियों के विकास के लिए पढ़ाए जाने वाले सिलेबस को समझने में देश के आदिवासी नाकाम रहे हैं. देश के आदिवासियों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास का सिलेबस संविधान में अंकित हैं. सरकारें अनुच्छेद 244(1) एवं (2) के तहत पांचवी एवं छटवी अनुसूची को लागू क्यों नहीं करना चाहती ? वर्तमान में 10 राज्यों अर्थात आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और तेलंगाना पांचवी अनुसूची के राज्य हैं. इन्ही राज्यों में आदिवासियों के विकास की बदतर स्थिति है. उनको मिलने वाली संवैधानिक मूलभूत सुविधाएं जमीदोह पड़े हैं ! अशिक्षा, खराब पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आदि उनकी जिन्दगी निगलने आतुर है ! वहीँ विकास का दानव उनका जल, जंगल, जमीन निगल रहा है ! बचे खुचे नक्सलवाद के गरल गाल में समा रहे हैं. क्या ऐसे विकासवाद का विनाशकारी मुखौटा आदिवासी समाज के लिए ही पहन रखे हैं भारत के लोक नायक ?

आदिवादियों के हित में इन अनुसूचित राज्यों के एक भी राज्यपाल के द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों और गरिमा का उपयोग आज तक नहीं किया गया ! देश के अनुसूचित क्षेत्रों की ऐसी दुर्दशा के बाद भी महामहिम राज्यपालों की गरिमा को सम्मानपूर्वक चाटेंगे आदिवासी ? क्या सरकारें संविधान में दिए गए उनके अधिकारों से वंचित रखकर उनका विकास करना चाहती है ? क्या कारण है कि सरकारें उनको संवैधानिक हक़ और अधिकारों से परे रखकर उनके समक्ष अपना राजनैतिक मुखौटे में छिपे शैतानी दिल रखने का प्रयास करती है ?

राजनेताओं का एक चलन बना हुआ है. चुनाव जीतकर राजनेता पांच साल तक बेफिक्र, तनखा पाऊ, कमाऊ, ठाठ बाट, मार झोर, उठापटक, तोड़ फोड़, मुफ्त का भोजन, मुफ्त की गाडी, जनता के लिए पिछवाड़ा उघाड़ी की राजनीति चलती रहती है. अगला चुनाव सामने आता है, फिर नेताओं की तंद्रा टूटती है. गाँव गाँव जाकर वोटों की भीख मांगते फिरते है, अपने पाच शाल का एशोआराम एकत्रित करने के लिए ! फिर भोले भाले लोगों को अपने राजनीतिक चाल में फांसने के लिए उनके साथ नकली हमदर्दी बांटने का  कार्य किया जाता है. क्या उनकी टूटी-फूटी झोपडी में जाकर उनसे हाथ मिलाना, उनके टूटे खाट में बैठना, उनके हाथ से बने चाय पीना, उनके रूखे-सूखे भोजन चखना, तेंदू, चार, भेलवा खाना, उनके साथ नाच-गान करना, ही आत्मीयता और विकास की सीढ़ी है ? क्या अब ऐसे आत्मीय सम्मान भी आदिवासियों को सरकार और उनके नुमाइंदों से सीखने की जरूरत है ? यदि नहीं तो उन अनपढ़, भोले भाले लोगों के बीच जाकर सरकारों और सरकारी नुमाइंदों का इस तरह से झूठी आत्मीयता दिखाने का नाटक क्यों ??

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

कोया पुनेम, गोंडी गण व्यवस्था, प्रजातंत्र के कुछ प्रमुख शब्द

कोया- गुफा, खोह, गर्भ, महुआ का फूल, आधार, मूल बीज.

पुनेम- यह दो अक्षरों से मिलकर बना है- पुय याने सत्य, प्रकृति, सृष्टि (पुकराल). नेम याने मार्ग, रास्ता, पथ, जीवन पथ. इस तरह पुनेम अर्थात सत्य का मार्ग, सत्य का रास्ता, सतमार्ग, जीवन मार्ग, सतपथ. सत्य के मार्ग पर चलना, प्रकृति दर्शन को ग्रहण करना, सत्य के पथ पर चलना, प्राकृतिक गुणों का अनुसरण करना, सत्य को जीवन में उतारना. सत्य, प्रकृति संतुलन के गुणों को धारण कर जीवन यापन करना. 

पुनेमी- प्राकृतिक, सत्य को धारण कर चलने वाले लोग, सतमार्गी लोग, सत पथिक, प्रकृति के वाहक, प्रकृति के ज्ञान से प्रकाशित लोग, सृष्टि संतुलन के जनक, पारिस्थिति तंत्र (इकोसिस्टम) के पालन करता, धारक, प्रकृति संरक्षक वंश. प्रकृति, सृष्टि संतुलन के सत्य गुणों को धारण कर जीवन यापन करने वाले लोग, वंश. 

तूर- उत्पत्तित, भ्रूण, जीव, संतान, वंश, लोग.

कोयतूर- आधार वंश, मूल वंश, गर्भ से उत्पत्तित, मूल बीज.

कोया पुनेम- आधार सत्य मार्ग या सत्य मार्ग का आधार, आधारिक जीवन.

संय्युंग- पांच की सख्या.

गण्ड या गंड- लोगों का समूह, गण, जन, प्रजा, लोक.

गोंड- गो + अण्ड = गोंड या गोण्ड.  गो अर्थात गोंगो- विवेक, ज्ञान, धरती, शक्ति, प्रज्ञ. अण्ड अर्थात जीव, संतान. गोंड या गोण्ड अर्थात विवेकी जीव, धरती जीव, प्रज्ञ जीव, शक्ति युक्त, मानव, मनुष्य का पर्याय.

लेंग- बोली, भाषा.


नार- ग्राम, गाँव, कस्बा.

कोट- राज्य इकाई, राज्य का छोटा भाग.

शंभू- संय्युंग + भू =शंभू. संय्युग याने पांच, भू याने धरती, धरती का भाग, खंड. 

शेक- मालिक, राजा, प्रशासक.

शंभूशेक- पांच खंड धरती के मालिक, पांच खण्डों वाली धरती के राजा, पांच खण्डों वाली धरती के अधिपति, पांच खण्डों वाली धरती 'गोंडवाना' के प्रशासक.

गोटूल- गो + टूल =गोटूल. गो अर्थात गोंगो याने शक्ति, प्रकाश, ज्ञान, विवेक. टूल याने स्थान, केंद्र, ठीया, घर. अर्थात ज्ञान का स्थान, ज्ञान प्राप्ति केंद्र, ज्ञान शक्ति स्थल, ज्ञान प्रकाश स्थल, ज्ञान का ठीया, ज्ञान का घर.

पारी- व्यवस्था, रीति, नीति.

कुपार- मष्तिष्क, दिमाग, कपार, मस्तक.

लिंगो- ज्ञानी, ज्ञानवान, ज्ञान का भण्डार, सर्वोच्च, निराकार, शून्य.

पारी कुपार लिंगो- व्यवस्था में दिमाग लगाने वाला ज्ञानी. कोया पुनेम/ गोंडी पुनेम के अद्वितीय प्रणेता. कोया जीवन पद्धिति के निर्धारक. मानव जीवन संस्कार पद्धति के जनक. (1)

पुकराल- सृष्टि, प्रकृति, निसर्ग.


अंडोद्वीप- अंगारा लैंड, धरती का  उत्तरी भाग, प्राचीन 4 द्वीपों का समुह भू भाग.


गंडोद्वीप- गोंडवाना लैंड, धरती का दक्षिणी भाग, प्राचीन 5 द्वीपों का समुह भू भाग.
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          ऊपर लिखे गोंडी शब्द आदिम जनों के कोया पुनेम, गोंडी गण व्यवस्था, प्रजातंत्र के मूल आधार हैं. गोंडवाना की धरा पर विकसित "गोंड" नाम का विशाल आदिम सामाज रुपी पेड़, आधुनिक धरा पर उगे हुए किसी अन्य प्रजातीय समाज रुपी वृक्ष से कहीं अधिक आध्यात्मिक, वैचारिक, समता, समानता, बंधुत्व, भाईचारा के गुणों से संपन्न है. गोंडों की जितनी सामुदायिक शाखाएं हैं, उतनी उनकी भाषाएं. उनकी पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक रीति-नीति के अनुरूप जीवन संतुलन के आधार उनकी अपनी सामुदायिक भाषाओं में नीहित हैं तथा उसी आधार पर अभिव्यक्त होते हैं. इन आदिम प्राकृतिक भाषाओं की विविधता में एकता को समझ पाना किसी समाज शास्त्री, भाषाशास्त्री के लिए अत्यंत कठिन है. इन्ही कठिनाइयों के चलते आधुनिक समाज के बुद्धीजीवी साहित्यकार आदिवासियों के भाषाई तथ्यगत विचारों को मूलतः समझने और प्रस्तुत करने में हमेशा असमर्थ रहे.

         इसी के प्रतीक स्वरुप कई अंग्रेजी साहित्यकारों ने आदिम जीवन दर्शन को अज्ञानतावश उसके मूल दर्शन व सैद्धांतिक पक्ष को प्रस्तुत करने में लगभग असफल रहे. इस असफलता के कारण आदिम जनों के साहित्य में अधिकतर चारित्रिक व रूढ़िवादिता के विकृत अध्यायों के अभिलिखित स्वरूप प्रदर्शित हुआ. इस तरह आधुनिक जन मानस के बुद्धि और दृष्टि में आदिम जन हीनता के शिकार होते चले गए.


          इस दशा और दिशा के शिकार लोगों पर आज भी प्रबल दावेदारी होती है कि आदिम जन अपनी रूढ़िवादिता के शिकार होकर वह देश की मुख्य धारा से स्वतः दूर होता जा रहा है ! आधुनिता के प्रतियोगी दौड़ में धरातल से शिखर तक डूबे जन मानस के लिए यह समझना कठिन ही नहीं असंभव है, कि जिस बाबा साहब ने संविधान में समता, समानता, बंधुता, भाईचारा, एकता का उल्लेख किया है, वह आदिम मूल जनों के तन, मन और बुद्धि में जन्म जन्मांतर से रेखांकित है. बाबा साहब ने इन्हें भविष्य को देखते हुए शब्दों में पिरोया. संविधान में इन शब्दों से आदिम जनों को नहीं, बल्कि देश के ऐतिहासिक भविष्य को स्वर्ग की सत्ता में स्थापित करने वालों की स्वप्न तन्द्रीय जड़ता को प्रकृति के साथ विलीन करने के लिए संबोधन किया.


          भारत वर्ष ही नहीं दुनिया में विकास के स्वप्नदृष्टाओं ने आदिम जनों तथा उनके सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन पद्धति को रूढ़िवादी, अंधविश्वासी, गरीबी, लाचरी और पशुता के घ्रणित चरित्र के आईने में ही देखा, दुत्कारा ! दुत्कारा ही नहीं बल्कि उनके मूल प्रकृति दार्शनिक परिवेश में स्वर्ग-नरक, पाप-पुन्य, चमत्कार की परिगाथा थोपने के साथ ही आधुनिक विकास के लिए बलि का बकरा बनाते आया. न्यूनतम निर्वाह की भूमि, प्यास के लिए जल, भोजन के लिए जंगल और नंगा बदन होते हुए भी काफिरों द्वारा जीवन जिर्वाही साधन ही उनसे छीनते गए, फिर भी समाज है कि बिना कोई प्रतिक्रया के जंगलों के अंधेरे में गुमनामी जीवन जीते रहे. मूल वंश में आज भी उनके जीवन निर्वाह की पद्धति, आध्यात्म और सांस्कृतिक जीवन दर्शन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है. 


          अब समाज में धीरे-धीरे जागृति का संदेश प्रसारण हो रहा है. अनेक स्वभाषी साहित्यकार सामाजिक रीति-नीति, संस्कृति, आध्यात्म, दर्शन पर योग्य साहित्यों की रचना कर रहे हैं, जिसमे आदिम सामाजिक पारदर्शी संरचना को भली भांति प्रस्तुत किया जा रहा है. इनमे कई अति उत्साही भी हैं !  गोंडी आरती, महा आरती, गोंडी रामायण, गोंडी महापुराण, गोंडी गीता आदि की रचना भी कर चुके हैं !  उत्साहपूर्ण साहित्य लिखने का यह अत्यंत संवेदनशील और संक्रमण का दौर प्रतीत हो रहा है.

संदर्भ : (1) डॉ. नारवेन कासव टेकाम के शब्द विलेख