शनिवार, 19 जनवरी 2013

गोंडी धर्म और विश्व शान्ति

                 मानव जीवन को सौम्य और सुसंस्कृत बनाने वाले जीवन मार्ग को ही धर्म कहते हैं. आज विश्व में अनगिनत धर्म, पंथ विकसित हो गए हैं जो अपने आप को अलग और श्रेष्ठ धर्म की संज्ञा से विभूषित करते हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, यहूदी आदि धर्म अपने आप को श्रेष्ठ बताकर वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं. इन धर्मों के अपने अपने ग्रन्थ हैं और ये ग्रन्थ मानव रचित हैं. इन ग्रंथों में मनुष्य के विचार और कल्पनाओं के संग्रह हैं. अलग-अलग धर्मग्रंथ अलग-अलग मनुष्यों के विचार और उनकी कल्पनाओं को व्यक्त करते हैं. प्रत्येक मनुष्यों के विचार और कल्पनाएँ अलग-अलग होती हैं. एक व्यक्ति की कल्पनाएँ अन्य व्यक्तियों को पसंद नहीं आती. इसलिए धर्मावलंबियों में मतभेद है. विश्व के जितने भी धर्म कल्पना पर आधारित हैं वे सभी बल पूर्वक या छलपूर्वक लादे गए हैं. ये  धर्मावलम्बी यह जानते हुए भी कि अमुक मान्यता कपोल कल्पित है, फिर भी भयवश अंधानुकरण करते चले जाते हैं. इन धर्मों के ठेकेदारों ने स्वर्ग-नरक का भय बताकर धर्म के पक्ष-विपक्ष में तर्क करने की योजना को ही निरस्त कर दिया है और उन खोखले धर्मों के पक्ष में आँख बंद करके गुणगान करने का ही मार्ग प्रशस्त किया है. आखिर वे अपने धर्म की आलोचना से इतने घबराते क्यों हैं कि आलोचना करने वालों के लिए तलवार लेकर उठ खड़े हो जाते हैं ! जबकि शाश्वत सत्य पर तो आलोचना का प्रभाव ही नहीं पड़ता. शाश्वत सत्य धर्म वही है, जो निर्विवाद हो और निर्विवाद केवल प्रकृति ही है.


          प्राचीन काल के अनार्यों ने आर्यों के यज्ञविधान (अन्न जारण प्रथा) का विरोध किया सो आर्यों ने अनार्यों के संस्कृति और वैभव को मिटा देने का संकल्प लिया. इसी तारतम्य में बौद्धों की भी बड़ी तादात में हत्या किये. इसी प्रकार ईसाई और इस्लाम में भी धर्म को लेकर मारकाट, हत्याएं होती रहती है. जिस धर्म के नाम पर एक मानव दूसरे मानव के रक्त का प्यासा हो वह धर्म नहीं है. ऐसी धर्म की उपस्थिति में विश्व शान्ति स्थिति नहीं बन सकती. संकीर्ण विचारधारा को धर्म का नाम देकर विश्व शान्ति की दुहाई देना निरा मूर्खता है. आज सभी सुसंस्कृत कहे जाने वाले अधिकांश विधर्मी कुत्ते, बिल्लियों को तो बिस्तर में सुलाते हैं. अपनी थाली में खाना खिलते हैं और अन्य वर्गों के मनुष्यों की छाया को स्पर्श करने से भी परहेज करते हैं. उनका स्पर्श किया हुआ भोजन त्याज्य है, परन्तु उन्ही का कमाया हुआ अनाज त्याज्य नहीं है. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जिस वर्ग के मनुष्य को छूना पाप समझते हैं, उसी वर्ग की महिलाओं से बलात्कार करना त्याज्य नहीं है.


          हिन्दू धर्म ग्रंथों में लिखा है कि उनके धर्म के विषय में सन्देश करना पाप है. ऐसा करने वाला अंत में नरक में जाता है. वहाँ उन्हें अनेक यातनाएं दी जाती है. इस धर्म को मानने वाला स्वर्ग जाता है. वहाँ उसे देवी देवताओं के सामान सुख मिलता है. सच तो यह है कि हिन्दू ग्रंथों में जो स्वर्ग नरक की बात लिखी गई है, वह कोरी कल्पना है. वर्तमान युग में अन्तरिक्ष के विभिन्न ग्रह-उपग्रहों की जानकारी प्राप्त कर ली गई है परन्तु स्वर्ग और नरक नामक ग्रहों का कहीं भी पता नहीं है. हिन्दू ग्रंथों में आर्यों और अनार्यों के युद्ध का वर्णन अनार्य राजाओं की हत्या, उनकी संस्कृति का विध्वंश, यज्ञ विधान (अन्न जारण प्रथा) का प्रचार, नायक नाईकाओं का मिलन एवं विरह आदि का ही वर्णन है, इनके सिवा कुछ भी नहीं है. फिर भी बहकावे में आकर भयवश लोग उन्ही को धर्मग्रंथ समझकर पूजते हैं. आज तक लोगों को उस धर्म से क्या मिला है ? भेदभाव, तिरस्कार, साम्प्रदाईकता, गरीबी बस.


          आज विश्व स्तर पर सर्वत्र अशांति है. सभी जगह युद्ध की आशंकाएं  हर समय बनी रहती है. अधिकांश युद्ध, मार-काट और मतभेद धर्म के नाम पर ही होते हैं. धार्मिक मतभेद और युद्ध संकीर्ण मान्यताओं के कारण होते हैं. आज विश्व में जितने छोटे-बड़े सम्प्रदाय हैं, उनकी मान्यताएं एक-दूसरे  से नहीं मिलती. इसलिए वे सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक नहीं हो सकते. जब तक एक सर्वमान्य और सार्वभौमिक धर्म अस्तित्व में नहीं होगा और उससे सब लोग परिचित होकर उसकी मान्यताओं को आत्मसात नहीं करेंगे तब तक विश्व शान्ति स्थापित नहीं हो सकती. एक सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक धर्म का निर्माण करना आज मनुष्य के बूते की बाहर की बात है, क्योंकि सभी मनुष्यों के विचार अलग-अलग होते हैं. इस प्रकार का धर्म विश्व में एक ही है जो सर्वमान्य एवं सार्वभौम को कायम रख सकता है. वह है "कोया पूनम". इस धर्म के सभी नीति नियम और मान्यताएं मानव निर्मित नहीं हैं, वरण प्रकृति पर आधारित है. प्रकृति के नियम क्षेत्रीयता, जातीयता, साम्प्रदायिकता आदि संकीर्णताओं से मुक्त एक सार्वभौमिक नियम है. वर्षा, ठण्ड, धूप सभी मनुष्यों पर सामान रूप से प्रभाव डालते हैं. वे किसी धर्म या जाति के लिए नहीं होते. इसी प्रकार प्रकृति के समस्त गतिविधियों का प्रभाव समस्त चर-अचर, जड़-चेतन प्राणियों पर पड़ता है. हम सब उसी प्रकृति के अवयव हैं. प्राकृतिक तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है. इसलिए हम इस प्रकृति के एक ही नियम से संचालित हो सकते हैं.


          यदि प्रकृति के इन नियमों को विश्व में सर्वत्र अनुकरण करें तो राष्ट्रों को सुरक्षा सम्बन्धी हथियारों का बजट समाप्त कर देना पड़ेगा, क्योंकि सभी सत्य ज्ञान संपन्न होकर एक दूसरे का सहयोग और सेवा करेंगे तथा वैमनष्यता समाप्त हो जाएगी. ईर्ष्या, द्वेष, युद्ध विध्वंश, साम्प्रदायिकता आदि शब्द लुप्त हो जायेंगे. जिस प्रकार आकाशीय पिंड अपने अपने परिपथ में घुमते हुए आपस में नहीं टकराते. इसी प्रकार हम भी सही रास्ते पर चलते हुए आपस में नहीं टकरायेंगे तब विश्व में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित हो सकती है. यदि विश्व के सभी देश अपने अपने संकीर्ण साम्प्रदायिकता के दायरे में रहकर विश्व शान्ति की बातें करते हैं तो वे अरण्य रोदन के शिवा कुछ नहीं कर रहे हैं. कोया पूनम की मान्यताओं से विश्व में झगड़े फसाद आपसी टकराव समाप्त हो सकते हैं और एक सौहाद्रपूर्ण वातावरण का निर्माण हो सकता है.

           आज कोयाजनों के प्राकृतिक शक्तियों का अमूल्य धरोहर है जिसका वे उपयोग करना नहीं जानते. यदि वे इनका उपयोग शुरू कर दें तो विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय उनके सामने घुटने टेक देंगें. कुछ आर्य धर्मियों का विचार है कि वे यज्ञ हवन इसलिए करते हैं क्योंकि इसके द्वारा वे विश्व शांति की कमाना करते हैं. पर्यावरण में सुधार होगा, परन्तु गौर कीजिये कि एक गरीब जो रात दिन लंगोटी लगाकर ठण्ड और धूप को  सहन करके पसीने बहाकर मेहनत से अन्न पैदा करता है, उस गाढ़ी कमाई को आग के हवाले कर देने से क्या विश्व में शांति आ सकती है ? कदापि नही. उन अन्न जलाने वालों को क्या मालूम कि भूख की तड़फ क्या होती है. भूख से हमारे गरीब  भाइयों का किस तरह विकास अवरुद्ध होता है. देश में गरीबी का सबसे मुख्य कारण आर्यों का यज्ञ प्रथा ही है. हिंदु धर्म के लोग गरीबी से वाकिफ नही हैं, क्योंकि इन्हें तो मुप्त में खाने को मिल जाता है. वे भीख मांग लेने का धंधा भी कर लेते हैं. हमारे समाज में इस प्रकार की घृणित प्रथा नहीं है. हम तो बिना मेहनत के खाना सीखा ही नहीं हैं. यह अधर्म का काम है. जो लोग जीवन संघर्ष में टिक नही पाते वे या तो साधू सन्यासी बनने का ढोंग रचाते हैं या भीख मांगने का कायराना हरकत करते फिरते हैं. गोंड कभी भीख नहीं मांगता क्योंकि वह कायर नहीं है. वह तो जीवन संघर्ष में मरते दम तक पसीने बहाकर अन्न पैदा करता है और सभी जीवों का उदर पोषण करता है. यदि देश को समृद्ध और विकसित बनाना है तो गोंडी धर्म के सिद्धांतों का आत्मसात करना होगा. देश धन धान्य से सम्पन्न होगा. कोई भूखा नहीं रहेगा तो चोरी डकेती लड़ाई-झगड़ा सब शांत हो जायेंगें. यदि हमे विश्व में वर्ग विहीन, जाति विहीन स्वस्थ्य समाज की स्थापना करनी है तो हमें "कोया पुनेम" (गोंडी धर्म) के आदर्शों का अनुकरण करना पड़ेगा. हमें विधर्मियों के लच्छेदार बातों में कदापि नहीं आना है. स्वविवेक का सहारा लीजिए. सत्य ज्ञान और सत्यमार्ग का अनुसरण कीजिये. निश्चित ही निकट भविष्य में इसके लाभ आपके जीवन में परिलक्षित होंगें. गोंडी धर्म के पवित्र आदर्शों का प्रचार प्रसार कीजिये और विश्व शांति के निर्माण में अपना अपूर्व योगदान दीजिये.
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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

फड़ापेन शक्ति उपासना

          कोया वंशीय गोंड सगा समाज के लोग फड़ापेन शक्ति
सल्लां गांगरा (फड़ापेन) का प्रतीक
की उपासना करते हैं. गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण संसार की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन को ही माना गया है. फड़ापेन शब्द का अर्थ है- परम शक्ति या सर्वोच्च शक्ति. फड़ा याने परम/सर्वोच्च तथा पेन याने शक्ति होता है. इस प्रकार फड़ापेन याने संसार की सर्वोच्च शक्ति जिसे सल्लां और गांगरा यह दो पूना-ऊना (धन-ऋण) गुणतत्व कहा जाता है. सल्लां आस तत्व का और गांगरा चक्र तत्व का, सल्लां नर सत्व का और गांगरा मादा सत्व का ध्योतक है. यही दो गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से सम्पूर्ण संसार चक्र चलता है.


    गोंड समाज के लोग फड़ापेन के रूप में जिन सल्लां और गांगरा प्रतीकों की उपासना करते हैं, उनमे सल्लां का प्रतीक लम्बाकार और गांगरा का प्रतीक चक्राकार होता है. चक्र में १२  गांगरा होते हैं. बारह गांगरा सम्पूर्ण विश्व मंडलीय ग्रहों के और गोंड सगा समाज के १२ सगाओं के ध्योतक है. उसी प्रकार सल्लां तत्व का लम्बाकार प्रतीक आस तत्व का द्योतक है. जिस प्रकार पुकराल का हर ग्रह अपनी अपनी कक्ष में अपने अपने सल्लां रूपी आस तत्व के आधार से परिक्रमा करते हैं और एक दूसरे से अपनी गुरुत्वाकर्षण सल्लां शक्ति के बल पर जुड़ा करते हैं, ठीक उसी प्रकार गोंड समाज के बारह सगाओं के लोग अपने सगा कक्ष में बंधू भाव से रहते हैं और विषम सगाओं के लोगों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं. गोंडी तत्वज्ञान के अनुसार फड़ापेन शक्ति की उपासना याने सम्पूर्ण सगा समाज की उपासना माना जाता है.

       फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा यह दो परस्पर विरोधी परन्तु एक दूसरे के पूरक पूना-ऊना (धन-ऋण) गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से ही प्रकृति में एकरूपता और नियमबद्धता बनी रहती है. गोंडी धर्म तत्वज्ञान की मान्यता के अनुसार जिस जगत में हम रहते हैं, अनेक प्रकार के व्यवहार करते हैं, जिनका पञ्चज्ञानेन्द्रियों से अनुभव लेते हैं, वह जगत सत्य है. यह जड़ जगत मायाभास नहीं है. मनुष्य को जैसा अनुभव होता है, वैसा ही उसका स्वरुप है. प्रकृति का व्यवहार सूत्रबद्ध, नियमबद्ध रूप से चलता है. इसका कारण फड़ापेन शक्ति की सल्ला और गांगरा परस्पर विरोधी परन्तु एक दुसरे के पूरक पूना-ऊना गुण तत्वों की आपसी क्रिया प्रतिक्रया और उनका कार्यकारण सम्बन्ध है. यह घटना घटित करना या रोकना किसी के भी हाथ में नहीं है. नीयति या प्राकृतिक शक्ति जिसे हम फड़ापेन मानते हैं, सभी प्राकृतिक व्यवहारों का नियंत्रण करती है. उसी को ही धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने संसार की सर्वोच्च प्रजनन शक्ति माना है.

          गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार प्रकृति सत्य है. वह पहले भी थी और आगे भी रहेगी. सत्य का स्वरूप स्वयं सिद्ध है. भौतिक जगत का ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव पर ही होता है. ज्ञानेन्द्रियाँ ही यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं. अपने पञ्चज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्रत्यक्ष जगत का ज्ञान प्राप्त करके अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर उसका अर्थ लगाकर उस प्रकार वर्ताव या व्यवहार करना बुद्धीमान का कर्तव्य है. बौद्धिक ज्ञान शक्ति से ही प्रकृति के तत्वों का और नियमों का ज्ञान मनुष्य को होता है. प्रकृति के तत्वों का ज्ञान, उपासना याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत, पशु-पक्षी और पनास्पति की उपासना करना है. अर्थात प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति की उपासना करना है. प्रकृति की सर्वोच्च ज्ञान शक्ति की उपासना करना याने मनुष्य के दिल में सभी जीव सत्वों के प्रति सेवा भाव जागृत करना है. यही सेवा भाव ज्ञान अनुभव को गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने "सुर्वय पेंतोल" (सर्वोच्च आनंद) की अवस्था माना है. इस अवस्था में मनुष्य के दिल में सगाजन सेवा भाव, प्राणी सेवा भाव और निर्जीव सत्वों का सेवा भाव जागृत होता है. उसी से उसको सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि सगाजन सेवा भाव में ही स्वयं का कल्याण साध्य होता है. वह जय सेवा गोंडी धर्म मन्त्र का अधिष्ठाता बन जाता है. यही फड़ापेन शक्ति उपासना का तात्विक स्वरुप है.

         इस प्रकार की जो उच्च कोटि की फड़ापेन ज्ञान उपासना है, वही प्रकृति के सत्वों से अर्थात गुण सत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत के प्रति सेवा भावना है. एक ही फड़ापेन अधिष्ठान शक्ति के सल्लां-गांगरा, पूना-ऊना, माता-पिता, नर-मादा, दांया-बांया, आस-चक्र, समनी-उन्मनी यह दोनों प्रकार की विभिन्न भाव शक्तियां फड़ापेन शक्ति के तत्व हैं. जब इन दोनों परस्पर विरोधी गुण तत्वों की आपस में क्रिया प्रतिक्रया नहीं होती, तब तक नवीन गुण सत्व का निर्माण नहीं हो सकता. इसी फड़ापेन शक्ति का ज्ञानानुभव होना याने मानव की जीव जगत का यथार्थ ज्ञानानुभव होना है. फड़ापेन शक्ति रूपी सल्लां और गांगरा गुण तत्वों का ज्ञान होना याने मनुष्य को बौद्धिक ज्ञान का साक्षात्कार होना है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने तत्व ज्ञान की ज्ञान दृष्टि से यथार्थ ज्ञान प्रकाश की अनुभूति होती है, ऐसा अपने कोया पेन शिष्यों को बताया है. कुपार लिंगो का गोंडी धर्म तत्व ज्ञान प्रकृति और जीव जगत को मिथ्या नहीं मानता. अर्थात फड़ापेन शक्ति का स्थूल और व्यक्त रूप में जो जीव जगत हमें दिखाई देता है, वह सत्य है. उसके परे इस विश्व में और कुछ भी नहीं.

          गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो के मातानुसार हर एक मनुष्य का ध्येय याने "सुर्वय पेंतोल" अर्थात परम आनंद की प्राप्ति है और व्यक्ति स्वयंपूर्ण सत्व नहीं होने के कारण वह अकेला जी नहीं सकता. उसे अपने मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक सुख शान्ति के लिए प्रकृति के अन्य जीव, निर्जीव सत्वों पर अवलंबित रहना पड़ता है. प्रकृति के अन्य सत्वों की सेवा उसे तभी प्राप्त होती है, जब वह उनकी स्वयं सेवा करता है. इस प्रकार परम आनंद की प्राप्ति सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति है. सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति तब तक नहीं होती जब तक मनुष्य की मुक्ति जीवन के क्लेशों से नहीं हो जाती. सुर्वय पेंतोल अवस्था याने जीव जगत के क्लेशों का अंत और चिरकालिक आनंद की प्राप्ति है. मनुष्य के सभी अन्य ध्येय इस अंतिम सेवाभाव के ध्येय से बहुत ही गौण है.

          मनुष्य जीवन दुखमय होने का कारण उसका अज्ञान और तमपेनी (आशक्ति) है. अज्ञान मनुष्य के तमपेनियों से आता है. मनुष्य ने अपनी तमपेनियों की भावनाओं पर विजय पाकर बौद्धिक ज्ञान विकास का मार्ग स्वीकार किया तो उसे फड़ापेन रूपी सल्लां-गांगरा गुणतत्वों का बौद्धिक ज्ञान प्रकाश प्राप्त होता है. उसके मन में जन कल्याण की भावना जागृत होती है और जन कल्याण करते हुए वह स्वकल्याण साध्य करता है. वह क्लेशों के बंधन से मुक्त होकर सुख-शान्ति और आनंद के सागर में तैरता है. उसके दिल में सगा जन सेवा भाव जागृत होता है और उसे जन सेवा यह गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करके सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है.

          इसलिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने अपने शिष्यों को बताया कि अज्ञान दूर करने के लिए हर एक मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए. यही बुद्धियुक्त मानव का परम कर्तव्य है. इसके लिए लिंगो ने गाँव-गाँव में गोटूल नामक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने की सलाह अपने कोयापेन शिष्यों को दी और वहाँ पर सगा नेंग, सगाचार, सगा तय, सगा कयोम और सगा मोद अर्थात सगा नियम, सगा निर्णय, सगा कर्तव्य और सगा ज्ञान सम्बन्धी शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज को देने का मार्गदर्शन किया. सगा समाज नीतिमूल्यों के अनुसार वर्ताव या व्यवहार करने से मनुष्य का मन तृप्त होता है. सगा कक्ष में रहकर सगा समाज को पोषक कर्तव्य करने से मनुष्य का मन सगा समाज जीवन में केंद्रीभूत होता है. मन को केन्द्रित करके सगा सामाजिक तत्वज्ञान किस तत्व पर आधारित है, यह जानकारी अपनी बौद्धिक शक्ति से प्राप्त करने से मनुष्य को प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों के ज्ञान प्रकाश का साक्षात्कार होता है. अर्थात इस ज्ञान से परम ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे मानव जाति के दुखों का समूल अंत करने के लिए मनुष्य के दिल में सेवा भाव की जागृति होती है. इससे व्यष्टि मन समष्टिमन रूप बनता है. अज्ञानी जीव ज्ञान स्वरुप होता है. उसे पेंतीलावस्था अर्थात परम सुख की अनुभूति होती है और वह "जय सेवा" इस गोंडी धर्म मन्त्र का परिपालनकर्ता बन जाता है.

          इसी कारण पारी कुपार लिंगो ने सम्पूर्ण मानव समाज को सगा सामाजिक नीतिमूल्यों का परिपालन करके सगा ज्ञान की शरण में जाने के लिए कहा है. सगा समाज का सगा ज्ञान के शरण में जाना याने जिस प्राकृतिक शक्ति फड़ापेन के सल्लां-गांगरा परस्पर विरोधी गुण तत्वों के आधार पर गोंड समाज की सम-विषम सगाओं की संरचना की गई है, उस नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना है. फड़ापेन रूपी नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना याने सम्पूर्ण विश्व मंडल के जीव जगत का यथार्थ ज्ञान का विकास करना है. बौद्धिक ज्ञान का विकास करना याने अज्ञान का समूल अंत करना है. अज्ञान का समूल अंत करना याने क्लेशपूर्ण जीवन को आनंद स्वरुप बनाना है. जीवन को आनंद स्वरुप बनाना याने सगा जन कल्याण साध्य करना है. सगा जन कल्याण साध्य करना याने जय सेवा मन्त्र का परिपालन करके जन कल्याण के साथ स्वयं का कल्याण साध्य करना है.

          इसके लिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने श्रेष्ठ उपासनीय शक्ति फड़ापेन को ही माना है. उस शक्ति के सल्लां-गांगरा तत्व याने नर-मादा तत्व हैं, जो माता पिता के प्रजनन शक्ति के रूप में हैं. इसलिए लिंगो ने माता-पिता की सेवा को फड़ापेन शक्ति की उपासना के बराबर बताया है, क्योंकि वे फड़ापेन शक्ति के ही साक्षात रूप हैं.

          पहांदी पारी कुपार लिंगो को अपनी बौद्धिक ज्ञान शक्ति से सम्पूर्ण विश्व का साक्षात अंतर्ज्ञान प्राप्त हुआ था. उसी के आधार पर उसने सगा समाज की स्थापना की और सम्पूर्ण कोया वंशीय मानव समाज को सगायुक्त सामाजिक संरचना के ढाँचे में विभाजित किया. भौतिक शास्त्र ने भी यह सिद्ध कर दिखाया है कि प्रकृति के खगोलीय अणुओं से कोई भी तत्व स्थिर न होकर सूक्ष्म से सूक्ष्म घटक स्वयं शक्तिरूप क्रियाशील और परिवर्तनीय है. इन अणुओं के पूना-ऊना (धन-ऋण) परस्पर विरोधी गुण तत्वों के कारण उनमे क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है. इन अणुओं का पूना-ऊना शक्ति याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्व हैं. इसके अतिरिक्त इस पुकराल (सृष्टि) में कुछ भी नहीं है. अणुओं में हरदम क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है और प्रकृति का चक्र भी नियमबद्ध चलता रहता है.

          अणु की क्रिया प्रतिक्रया से ही उनके कर्मात्मक संस्कार याने नवनिर्मित गुणयुक्त सूक्ष्म भाग बाहर फेंके जाते हैं और वे अन्य सत्वों में जाकर चिपकते हैं या उनको अपनी और खींच लेते. वे कर्मात्मक संस्कार मूल जिस वास्तु के होंगे, उन्ही के गुण संस्कार वे नित्य दर्शाते रहते हैं और परस्पर विरोधी गुणतत्वों में जाकर चिपकते हैं या स्वयं खींच लेते हैं. ठीक उसी तरह पारी कुपार लिंगो द्वारा सगा संरचना का निर्माण किया गया. गोंड सगा समाज के सगा शाखाओं में क्रिया प्रतिक्रियाएं होती रहती है. एक सगा घटक के स्त्री-पुरुष एक ही गुण संस्कार वाले होते हैं और विषम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं.  सम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से वे कभी भी पारी सम्बन्ध स्थापित नहीं करते. सम सगाओं के लड़के-लड़कियों का रिश्ता भाई बहनों का होता है. उनमे कभी भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता. बल्कि दो परस्पर विरोधी गुण संस्कार वाले तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रया से ही नवीनतम शक्तिशाली गुणतत्व का निर्माण होता है. विभिन्न सगाओं के विभिन्न आनुवांशिक गुण संस्कार वाले लड़के लड़कियों का पारी अर्थात वैवाहिक सम्बन्ध में शक्तिशाली और बुद्धिमान नव तत्वों का पैदावार हो सके, इसलिए पारी कुपार लिंगो ने सम-विषम सगाओं में पारी सम्बन्ध प्रस्थापित करने के सामाजिक सम्बन्ध बनाए हैं, जो आज भी गोंड सगा समाज में प्रचलित हैं. इन पर से गोंड सगा समाज की सामाजिक संरचना प्राकृतिक नियमों पर किस प्रकार आधारित है, यह सिद्ध होता है.

          इसलिए पारी कुपार लिंगो ने बताया है कि सगा सामाजिक संरचना जिस प्राकृतिक शक्ति के गुणतत्वों पर आधारित है, उस फड़ापेन शक्ति की उपासना करने से, उसके सल्लां-गांगरा तत्वों का ज्ञान प्रकाश अपनी बौद्धिक ज्ञान से समझने से प्रत्येक मनुष्य अपने सगा कक्ष के मार्ग से ही अपना वर्ताव और व्यवहार सुनिश्चित करता है, जिससे किसी को किसी भी प्रकार का दुःख नहीं पहुंचता. सभी लोग सगानीति, सगाचार, सगाकर्म, सगाकर्तव्य और सगा सेवा करते रहते हैं, जिससे सम्पूर्ण मानव समाज सुखी और समृद्ध होकर "सुर्वय पेंतोल" अवस्था का अनुभव करता है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने फड़ापेन को ही उपास्य शक्ति माना है.
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शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

आदिवासी कुल का महाबली रावण की पूजा

        भारत व दक्षिण गोलार्ध में अनार्य संस्कृति के अधिष्ठाता महान ज्ञानी रावण की पूजा होती है- मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाड़ू, कर्नाटक, केरल, श्रीलंका, मिनिकाय व्दीप, लक्ष्यव्दीप, अंडमान निकोबार, आफ्रिका, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, दक्षिण अमेरिका, और ब्रम्हदेश, थाईलेंड आदि देशों में महान दार्शनिक धर्मवेता वैज्ञानिक तंत्र-मंत्र के प्रकांड ज्ञाता अनार्य संस्कृति के प्रवर्तक गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो के अन्यन भक्त विश्व विजेता महाबली रावण की पूजा बड़े उत्साह और श्रद्धा से करते हैं.
        
        मध्यप्रदेश के राजपूत नगर से कोई ७० कि.मी दूर भाटखेड़ी नमक गांव पूरे देश में रावण मेघनाथ के गांव के नाम से जाना जाता है. इस गांव में रावण और मेघनाथ की दो विशालकाय मूर्तियाँ हैं. जिनकी पूजा की जाती है.


        गाँव वालों को रावण और मेघनाथ की मूर्तियों की स्थापना की पूरी जानकारी तो नहीं लेकिन वे कहते हैं कि हमारे बाप दादा बताते थे कि त्रेता युग में अवंतिका क्षेत्र से पुरी में संगम स्थान पर जाने के पश्चात रावण और मेघनाथ का यहाँ पड़ाव रहा है, तभी से यहाँ के लोगों ने रावण और मेघनाथ की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा शुरू की. आज से छह दशक पूर्व कारीगरों को बुलाकर गांव वालों ने पैसा इकट्टा कर सीमेंट कांक्रेट की दो मूर्तियाँ बनवा दी.


        गाँव के बुजुर्ग रामलाल यादव, दयाराम, बद्रीलाल ने गोंडवाना दर्शन के  सम्पादक को बातचीत के दौरान जानकारी दी कि रामायण ग्रंथों में कुछ इसका उल्लेख है. सात आठ सौ की आबादी वाले गाँव में घर-घर में इनका जीवन बदल दिया है.


        आगरा-बंबई राजमार्ग से गुजरने वाले राहगीरों के मन में इन विशाल मूर्तियों को देखकर एक जिज्ञासा होती है. कि आखिर ये किसकी है. देश-विदेश के पर्यटकों को यह स्थान बहुत अच्छा लगता है. वे यहाँ रुककर विभिन्न मुद्राओं में इन मूर्तियों के साथ फोटो खीचकर संतुष्ट होते है. यह क्रम आज भी जारी है. लोग यहाँ मन्नतें भी मांगने लगे हैं. जिसकी मनोकामना पूरी हो जाती है. वे यहाँ आकर नारियल चढ़ाकर अगरबत्ती जलाकर इन मूर्तियों को प्रसन्न करते हैं और संतोष का अनुभव करतें हैं.


        विशालकाय मूर्तियों की ऊंचाई आठ फिट और चौड़ाई चार फिट है. अन्जाने में बस, ट्रक, कार, आदि वाहनों से गुजरने वाले यात्री इन्हें देखकर चकित हो जाते हैं. कुछ पैसे फेकते हैं तो कोई हाथ जोड़कर नमन करते हैं.


        इन मूर्तियों से कुछ दूरी पर उज्जैन-गुना रेल्वे लाइन है. रेलयात्री भी इनको देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं. कुछ दूरी पर प्रचीन बावड़ी तथा समाधि स्थल का प्रतीक स्वरूप एक चबूतरा बना हुआ है. गाँव वालों को इनके संबंध में भी कोई जानकारी नहीं है.


        दशहरा यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. रावण और मेघनाथ के लिए दो अलग-अलग रथ सजाकर जुलुस निकाला जाता है और सम्मान के साथ विसर्जन किया जाता है.


        रायपुर के शैलेन्द्र नगर में भी लगभग १२ फीट की महाबली रावन की मूर्ती बनाई गई है. शैलेंद्र नगर वासियों ने बताया की वे लोग १९८२ में रावन की मूर्ती सीमेंट और कांक्रीट से बनवाया है और स्थापित किया. मूर्ती के पास में रहने वाले एक बुजुर्ग बताते हैं कि लोग इस आदिवासी कुल के रावन को बुराई के प्रतीक में मानते हैं और हर वर्ष दशहरा के दिन इस महाबली का दहन करते हैं, किन्तु हमारे पूर्वजों नें इसकी पूजा करने के लिए इसे बनवाया है. हमारे पूर्वज इस महाबली की पूजा कबसे करते आ रहे हैं हमें नहीं मालूम, किन्तु उन्हें देखकर हम भी इनकी पूजा करते हैं. सच्चे मन से इनकी पूजा करने से जीवन फलित होता है, ऐसा हमारे पूर्वज कहते हैं. इसलिए हम भी इनकी पूजा करते हैं, सम्मान करते हैं. हम भी महाबली रावन के आशीर्वाद से फलित होते रहे हैं. इन्हें हम नहीं जलाते. इन्हें जलाने वाले उत्सवों और त्योहारों में हम शामिल भी नहीं होते.


        लोगों ने इसे बुराई के प्रतीक में क्यों माना हमें पता नहीं है, किन्तु लोग अपने मन की बुराई को मन से निकालने के बजाय इस देवता का दहन करते हैं. यह बात हमें समझ में नहीं आता कि लोग अपनी बुराई को जलाने के बजाय इसकी मूर्ती बनाकर क्यों उसे जलाते हैं ? जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाएं.


        शैलेन्द्र नगर वासी दशहरा के दिन महाबली रावन की धूमधाम से पूजा करते हैं और मोहल्ले भर प्रसाद बांटकर अपनी मनोकामना फलित करने हेतु खुशियाँ मनाते हैं.

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

देश में जनजातियों का उभरता आक्रोश

        देश के बुद्धिजीवी मनीषियों नें शासन व्यवस्था और प्रजातंत्र को अक्षुण कायम रखने के लिए सभी धर्म, सभी जाति, सभी वर्ग के हितों का ख्याल व मौलिक अधिकारों का आदर करते हुए मूल्यवान संविधान बनाया, लेकिन संविधान अभी भी देश में लागू नहीं है. उसकी जगह मनुस्मृति की नीतियां कार्य कर रही है. जिसमें भेदभाव तथा शीर्ष स्थानों में एक ही कुलीन अभिजात्य वर्ग का आधिपत्य कायम है. आजादी के ६५ वर्ष बीतने के बाद भी देश में संवैधानिक प्रक्रिया में यह अंतर आक्रोश और विद्रोह को प्रेरणा देता है. मूलनिवासी वर्ग जिनकी आबादी कुल आबादी का तीसरा हिस्सा है, आजाद भारत में गरीबी, गुलामी के लिए अभिशिप्त है. आजाद भारत में जंगल, जल और जमीन का अधिकार मूलनिवासियों के हाथ से निकलता जा रहा है. वहीं कल कारखाने बांध और औद्योगीकर से इन बेजुबानों एवं सहनशील लोगों को उपेक्षा, घृणा और तिरस्कार के शिवाय क्या मिला ? विकास तो उन्हीं अभिजात्य वर्ग का हुआ जो ब्रितानियों के बाद सत्ता में आए.


        सच्ची इतिहास को देखें तो स्वाधीनता की लड़ाई में  सबसे अधिक योगदान जल, जमीन और जंगल की रक्षा करने में मूलनिवासियों नें हजारों लाखों कुर्बानियां दी. लेकिन इन जंगल, जल और भूमि की रक्षा करने वालों के पास सर छुपाने झोपड़ी भी नहीं हैं. जीने के लिए रोजगार भी नशीब नहीं है. राजनीतिज्ञ लोग आज उन्हें मात्र वोट बैंक से अधिक कुछ भी नहीं बनाया.


        आरक्षण से तो मात्र चतुर्थ श्रेणी को भी पूरा नहीं किया जा सका और आगे की श्रेणीयों का कहना व्यर्थ है. विकास के नाम पर सैकड़ों योजनाएं बने, जिनका वास्तविक क्रियान्वय फाइलों तक सिमित रह गए. संस्कृति, भाषा और सामाजिक घटकों को अक्षुण बनाएं रखने का ढोल पिटकर देश के नेता संवेदनशील और अहसान बटोरने का केवल परिचय देते हैं.


        देश के पठारों उच्चसम भूमि (जगल पहाड़) में आदि अनंतकाल से बसने वाले अपनी प्रकृति, परंपरा, प्रथाएँ, भाषा और संस्कृति की युगों से अलग सगल भिन्न पहचान बनाए रखे हैं, जो अपनी मूल सामाजिक संरचना का ढांचा है. प्रकृति के अधिक नजदीक रहने के कारण प्रकृति, प्रवृति और शोषण अत्याचार का विरोध एकाएक करने में संयमित है. किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि अन्याय सहने के लिए ही यह समाज पैदा हुआ हो. जुल्म, सहन शक्ति से परे होने पर व्यवस्था के विरोध करने में पीछे नहीं रहेंगें. इसका परिणाम आज भेदभाव रखने वाले और कुलीन वर्ग के नीतियों के विरूद्ध अपनी अस्मिता और गौरव को कायम रखने झारखंड, गोरखा लैंड, नागालैंड के गोंडवानालैण्ड लिए मूलनिवासी आवाज बुलंद कर रहे है. ये आन्दोलन गैर क़ानूनी नहीं है. यदि सबको समानता का हक है तो फिर ऐसा भेद भाव क्यों ? अपनी अपनी भाषा का प्रान्त बनाए. अपने समाज को उच्च स्थानों में धर्म भाषा को बढ़ावा देकर देश में दो तिहाई लोगो के साथ उनकी भाषा धर्म, संस्कृति की उपेक्षा क्यों ? योजनाओं और विकास का लाभ कुलीन वर्गों को उद्योग व्यापार में केवल उन्ही का अधिकार क्यों ? इन सब का प्रतिकार करने के लिए जन मानस का आक्रोश आंदोलन के रूप में दिनों दिन सामने आता जा रहा है.


        अपने हक, अपने सांस्कृतिक धरातल, सामाजिक संरचना को जीवित रखने के लिए संघर्ष के लिए तैयार होना गैर क़ानूनी नहीं है. एक वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए देश का बजट लगा दे और दूसरा मुह ताकता रहे ? यह कैसा प्रजातंत्र हैं ? यह सवाल खड़ा होता है ! अपना भला स्वतः के व्दारा होता है, अपनी आँखों से नींद आती है. यह आम बात है. अपना समाज, अपना विकास, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक प्रगति कि उपेक्षा करने एवं दिखावा  प्रदर्शित करने राजनीतिक रूप में छलने वालों के प्रति सचेत होकर चेतना का उबाल पैदा हो जाए और पृथक पहचान के लिए संगठित आंदोलन का उग्र रूप दिखाई दे तो ईसमे आश्चर्य क्या है ?  
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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

आदिवासी जनसत्याग्रह और देश की मीडिया का मौन वृत्त

देश की मीडिया को फुर्सत ही नहीं है आदिवासियों की  समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने के लिए ! इसलिए दिल्ली सरकार से पूछने आदिवासी पैदल चलकर खुद पहुँच रहे हैं कि हमारा कसूर क्या है ? क्या हम देश के नागरिक नहीं हैं ? जंगल, जल, जमीन, घर, द्वार छीनकर हमारा शोषण किया जा रहा है, फिर भी तुम मौन हो क्यों ? क्या तुम भी शामिल हो इस प्रपंच में ?


५०,००० से ज्यादा जनसत्याग्रही
आदिवासी दिल्ली कूच 
          जल, जंगल, जमीन से जुड़े आदिवासी समुदाय के सम्मुख अस्तित्व का संकट उन्हें मजबूर करता है कि वे अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़े. पिछले समय एक सनसनीखेज खबर रांची से आई. रांची रेलवे स्टेशन पर १००० आदिवासी युवक युवति और बच्चे रोजगार की तलाश में उत्तर पूर्वी राज्यों की ओर कूच करते हुए पकड़े गए. आखिर प्रश्न उठता है कि क्यों हजारों की संख्या में आदिवासी अपना गाँव, घर, द्वार छोड़कर भाग रहे हैं, जिन्हें हम पलायन कहकर पुकारते हैं. मै अक्सर इतिहास के पन्नों पर इस प्रश्न का उत्तर ढूंडा करता हूँ कि क्या कारण था कि झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा के हजारों हजार आदिवासी  एक साथ, कहीं पूरा परिवार तो कहीं पूरा गाँव असम या भूटान के चाय बागानों में जाकर बस गया. यही नहीं जिस अंडमान मिकोबार द्वीप समूह में भारतीयों को देशद्रोह जैसे भयंकर अपराधों के दंड स्वरुप काला पानी की सजा के रूप में प्रताड़ित करके निर्वासित जीवन गुजारने की सजा मिलती थी, वहाँ भी आदिवासी युवक युवति ख़ुशी-ख़ुशी जाकर बस   गए. उन्हें अब भी यह टापू, अपने देश की तरह सुन्दर और प्यारा लगता है. कारण ढूँढना कोई कठिन नही है, क्योंकि देश की आजादी के बाद विकास के विभिन्न योजनाओं के बावजूद आदिवासी समाज आज भी पलायन को मजबूर है. राजधानी दिल्ली गवाह है कि क्यों डेढ़ लाख से ज्यादा आदिवासी युवक युवतियां राजधानी के पोस इलाकों में घरेलु कामगार के रूप में जीविका अर्जित करने को मजबूर हैं.

          जिनका एक मात्र मूलधन जल, जंगल और जमीन ही लुट गया हो, वे भला पलायन न करें तो क्या करें ? मगर हम कब तक पलायन करते रहेंगे और कहाँ तक पलायन करंगे ? शायद इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए ग्वालियर से ५०,००० से ज्यादा आदिवासियों का दल सत्याग्रह के रूप में दिल्ली पहुंचकर दिल्ली की सरकार के समक्ष वह प्रश्न पूछना चाहता है कि हमारा कसूर क्या है ? गांधीवादी राजगोपाल पीवी के नेतृत्व में दिल्ली की ओर कूच कर रहे आदिवासियों की मांग है कि उनकी जल, जंगल और जमीन न छीनी जाए. संविधान बनाने वालों ने आदिवासियों की सुरक्षा हेतु पांचवी और छटवी अनुसूची का प्रावधान रखा, मगर संविधान के प्रावधानों का अनुपालन करने के लिए कोई सरकारी तंत्र कार्यशील नहीं दिखता.

          अपने अधिकारों की मांग के लिए आदिवासी सत्याग्रहियों का दल दिल्ली की ओर निरंतर बढ़ रहा है. दिन में तेज धुप की तपिस के साथ रात्री में आसमान के नीचे सोने की मजबूरी के बावजूद पदयात्रियों के इरादे बुलंद हैं. पदयात्री अपने पांवों के छाले की परवाह किये बगैर दिल्ली की ओर मुस्तैदी से बढ़ते चले आ रहे हैं. दिल्ली के राष्ट्रीय राजमार्ग पर हजारों की संख्या में कतार में पूरी तरह अनुशासित सत्याग्रहियों का १५ किलोमीटर लंबा जुलूस हर किसी को अभिभूत करता है. लोगों की आँख थक जाती है, पर उसके सामने से गुजर रहे जुलूस का अंत नहीं होता. रास्ते में इन आदिवासियों के विराट जुलूस को देखकर लोग उनके स्वागत में उमड़ पड़ते हैं. जहां वे पड़ाव डालते हैं, वही देखते ही देखते पूरा शहर बस जाता है. लोग पीने का पानी और भोजन का इंतजाम करते हैं. पचासों अलग अलग चूल्हे बन जाते हैं और हर एक सत्याग्रही के पास एक झोला और एक झंडा है, साथ ही एक एक प्लास्टिक सीट है, जिसे रात में सोते समय बिछा लेते हैं और धुप तथा बरसात में छाता बना लेते हैं. हर एक पड़ाव पर सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम द्वारा जोस और उत्साह बढ़ाई जाती है और जल, जमीन, जंगल पर अधिकार के लिए एकता मजबूत की जाती है. केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें समझा बुझाकर  वापस भेजने की कोशिश की जो बेकार साबित हुआ. आखिर ये वापस जाएँ तो कहाँ जाएँ, उनके घर और खेत तो पहले ही छीन चुके हैं. उनके पास पहचान, सुरक्षा और सम्मान नाम की कोई चीज नहीं रही. आजादी के ६६ साल बीत जाने के बावजूद उन्हें न्याय और सम्मान मिलना तो दूर अब उनके जीने के बुनियादि साधन भी छीन चुके हैं. इन पदयात्री आदिवासियों में काफी बड़ा हिस्सा उन आदिवासियों का है, जिनके इलाके मावोवादियों के चपेट में हैं, जहां उन्हें रात को मावोवादी धमकाते हैं तो दिन में राज्य की पुलिस प्रताड़ित करती है. सलवाजुडूम हो या ग्रीन हंट, आदिवासी अपने लाचार हालत में बदलाव के लिए गांधीवादी सत्याग्रह में कूद पड़े हैं.

          सत्याग्रहियों का काफिला जहां जहां से गुजर रहा है, वहाँ से हजारों लोग काफिला में जुड़ते जा रहे हैं. काफिले में बिहार से १५,००० दलित भी शामिल हैं, जो पिछले कई सालों से छत के लिए दस डिसमिल तो दूर मात्र ३ डिसमिल जमीन की मांग के लिए नीतीश सरकार के पास गुहार लगाते हुए निराश हो चुके हैं.

          कहना नहीं होगा कि भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी वर्तमान व्यवस्था में जहां एक ओर प्राकृतिक संपदा कोयला और लौह अयस्क के लुटेरों की नंगई की परतें एक एक तह खुलती जा रही है, वहीँ भूमिपुत्र आदिवासियों को किस कदर अन्यायपूर्वक अपनी मूल भूमि से खदेड़ा जा रहा है. इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए सत्याग्रही दिल्ली के दरबार में गुहार लगाने को आ रहे हैं.

          वाह री कारपोरेट मीडिया, प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रानिक मीडिया ज़रा बिगबोस या क्रिकेट से फुर्सत निकाल के देश के इन वंचित और पीड़ित आदिवासियों की ओर एक नजर देखिये. प्राकृतिक भू संपदा से जुड़े आदिवासी समुदाय न्याय के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं. इन्हें न्याय दिलाईए.


साभार दलित आदिवासी दुनिया
(सम्पादकीय)