गुरुवार, 17 जनवरी 2013

फड़ापेन शक्ति उपासना

          कोया वंशीय गोंड सगा समाज के लोग फड़ापेन शक्ति
सल्लां गांगरा (फड़ापेन) का प्रतीक
की उपासना करते हैं. गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण संसार की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन को ही माना गया है. फड़ापेन शब्द का अर्थ है- परम शक्ति या सर्वोच्च शक्ति. फड़ा याने परम/सर्वोच्च तथा पेन याने शक्ति होता है. इस प्रकार फड़ापेन याने संसार की सर्वोच्च शक्ति जिसे सल्लां और गांगरा यह दो पूना-ऊना (धन-ऋण) गुणतत्व कहा जाता है. सल्लां आस तत्व का और गांगरा चक्र तत्व का, सल्लां नर सत्व का और गांगरा मादा सत्व का ध्योतक है. यही दो गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से सम्पूर्ण संसार चक्र चलता है.


    गोंड समाज के लोग फड़ापेन के रूप में जिन सल्लां और गांगरा प्रतीकों की उपासना करते हैं, उनमे सल्लां का प्रतीक लम्बाकार और गांगरा का प्रतीक चक्राकार होता है. चक्र में १२  गांगरा होते हैं. बारह गांगरा सम्पूर्ण विश्व मंडलीय ग्रहों के और गोंड सगा समाज के १२ सगाओं के ध्योतक है. उसी प्रकार सल्लां तत्व का लम्बाकार प्रतीक आस तत्व का द्योतक है. जिस प्रकार पुकराल का हर ग्रह अपनी अपनी कक्ष में अपने अपने सल्लां रूपी आस तत्व के आधार से परिक्रमा करते हैं और एक दूसरे से अपनी गुरुत्वाकर्षण सल्लां शक्ति के बल पर जुड़ा करते हैं, ठीक उसी प्रकार गोंड समाज के बारह सगाओं के लोग अपने सगा कक्ष में बंधू भाव से रहते हैं और विषम सगाओं के लोगों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं. गोंडी तत्वज्ञान के अनुसार फड़ापेन शक्ति की उपासना याने सम्पूर्ण सगा समाज की उपासना माना जाता है.

       फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा यह दो परस्पर विरोधी परन्तु एक दूसरे के पूरक पूना-ऊना (धन-ऋण) गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से ही प्रकृति में एकरूपता और नियमबद्धता बनी रहती है. गोंडी धर्म तत्वज्ञान की मान्यता के अनुसार जिस जगत में हम रहते हैं, अनेक प्रकार के व्यवहार करते हैं, जिनका पञ्चज्ञानेन्द्रियों से अनुभव लेते हैं, वह जगत सत्य है. यह जड़ जगत मायाभास नहीं है. मनुष्य को जैसा अनुभव होता है, वैसा ही उसका स्वरुप है. प्रकृति का व्यवहार सूत्रबद्ध, नियमबद्ध रूप से चलता है. इसका कारण फड़ापेन शक्ति की सल्ला और गांगरा परस्पर विरोधी परन्तु एक दुसरे के पूरक पूना-ऊना गुण तत्वों की आपसी क्रिया प्रतिक्रया और उनका कार्यकारण सम्बन्ध है. यह घटना घटित करना या रोकना किसी के भी हाथ में नहीं है. नीयति या प्राकृतिक शक्ति जिसे हम फड़ापेन मानते हैं, सभी प्राकृतिक व्यवहारों का नियंत्रण करती है. उसी को ही धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने संसार की सर्वोच्च प्रजनन शक्ति माना है.

          गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार प्रकृति सत्य है. वह पहले भी थी और आगे भी रहेगी. सत्य का स्वरूप स्वयं सिद्ध है. भौतिक जगत का ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव पर ही होता है. ज्ञानेन्द्रियाँ ही यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं. अपने पञ्चज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्रत्यक्ष जगत का ज्ञान प्राप्त करके अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर उसका अर्थ लगाकर उस प्रकार वर्ताव या व्यवहार करना बुद्धीमान का कर्तव्य है. बौद्धिक ज्ञान शक्ति से ही प्रकृति के तत्वों का और नियमों का ज्ञान मनुष्य को होता है. प्रकृति के तत्वों का ज्ञान, उपासना याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत, पशु-पक्षी और पनास्पति की उपासना करना है. अर्थात प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति की उपासना करना है. प्रकृति की सर्वोच्च ज्ञान शक्ति की उपासना करना याने मनुष्य के दिल में सभी जीव सत्वों के प्रति सेवा भाव जागृत करना है. यही सेवा भाव ज्ञान अनुभव को गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने "सुर्वय पेंतोल" (सर्वोच्च आनंद) की अवस्था माना है. इस अवस्था में मनुष्य के दिल में सगाजन सेवा भाव, प्राणी सेवा भाव और निर्जीव सत्वों का सेवा भाव जागृत होता है. उसी से उसको सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि सगाजन सेवा भाव में ही स्वयं का कल्याण साध्य होता है. वह जय सेवा गोंडी धर्म मन्त्र का अधिष्ठाता बन जाता है. यही फड़ापेन शक्ति उपासना का तात्विक स्वरुप है.

         इस प्रकार की जो उच्च कोटि की फड़ापेन ज्ञान उपासना है, वही प्रकृति के सत्वों से अर्थात गुण सत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत के प्रति सेवा भावना है. एक ही फड़ापेन अधिष्ठान शक्ति के सल्लां-गांगरा, पूना-ऊना, माता-पिता, नर-मादा, दांया-बांया, आस-चक्र, समनी-उन्मनी यह दोनों प्रकार की विभिन्न भाव शक्तियां फड़ापेन शक्ति के तत्व हैं. जब इन दोनों परस्पर विरोधी गुण तत्वों की आपस में क्रिया प्रतिक्रया नहीं होती, तब तक नवीन गुण सत्व का निर्माण नहीं हो सकता. इसी फड़ापेन शक्ति का ज्ञानानुभव होना याने मानव की जीव जगत का यथार्थ ज्ञानानुभव होना है. फड़ापेन शक्ति रूपी सल्लां और गांगरा गुण तत्वों का ज्ञान होना याने मनुष्य को बौद्धिक ज्ञान का साक्षात्कार होना है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने तत्व ज्ञान की ज्ञान दृष्टि से यथार्थ ज्ञान प्रकाश की अनुभूति होती है, ऐसा अपने कोया पेन शिष्यों को बताया है. कुपार लिंगो का गोंडी धर्म तत्व ज्ञान प्रकृति और जीव जगत को मिथ्या नहीं मानता. अर्थात फड़ापेन शक्ति का स्थूल और व्यक्त रूप में जो जीव जगत हमें दिखाई देता है, वह सत्य है. उसके परे इस विश्व में और कुछ भी नहीं.

          गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो के मातानुसार हर एक मनुष्य का ध्येय याने "सुर्वय पेंतोल" अर्थात परम आनंद की प्राप्ति है और व्यक्ति स्वयंपूर्ण सत्व नहीं होने के कारण वह अकेला जी नहीं सकता. उसे अपने मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक सुख शान्ति के लिए प्रकृति के अन्य जीव, निर्जीव सत्वों पर अवलंबित रहना पड़ता है. प्रकृति के अन्य सत्वों की सेवा उसे तभी प्राप्त होती है, जब वह उनकी स्वयं सेवा करता है. इस प्रकार परम आनंद की प्राप्ति सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति है. सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति तब तक नहीं होती जब तक मनुष्य की मुक्ति जीवन के क्लेशों से नहीं हो जाती. सुर्वय पेंतोल अवस्था याने जीव जगत के क्लेशों का अंत और चिरकालिक आनंद की प्राप्ति है. मनुष्य के सभी अन्य ध्येय इस अंतिम सेवाभाव के ध्येय से बहुत ही गौण है.

          मनुष्य जीवन दुखमय होने का कारण उसका अज्ञान और तमपेनी (आशक्ति) है. अज्ञान मनुष्य के तमपेनियों से आता है. मनुष्य ने अपनी तमपेनियों की भावनाओं पर विजय पाकर बौद्धिक ज्ञान विकास का मार्ग स्वीकार किया तो उसे फड़ापेन रूपी सल्लां-गांगरा गुणतत्वों का बौद्धिक ज्ञान प्रकाश प्राप्त होता है. उसके मन में जन कल्याण की भावना जागृत होती है और जन कल्याण करते हुए वह स्वकल्याण साध्य करता है. वह क्लेशों के बंधन से मुक्त होकर सुख-शान्ति और आनंद के सागर में तैरता है. उसके दिल में सगा जन सेवा भाव जागृत होता है और उसे जन सेवा यह गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करके सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है.

          इसलिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने अपने शिष्यों को बताया कि अज्ञान दूर करने के लिए हर एक मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए. यही बुद्धियुक्त मानव का परम कर्तव्य है. इसके लिए लिंगो ने गाँव-गाँव में गोटूल नामक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने की सलाह अपने कोयापेन शिष्यों को दी और वहाँ पर सगा नेंग, सगाचार, सगा तय, सगा कयोम और सगा मोद अर्थात सगा नियम, सगा निर्णय, सगा कर्तव्य और सगा ज्ञान सम्बन्धी शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज को देने का मार्गदर्शन किया. सगा समाज नीतिमूल्यों के अनुसार वर्ताव या व्यवहार करने से मनुष्य का मन तृप्त होता है. सगा कक्ष में रहकर सगा समाज को पोषक कर्तव्य करने से मनुष्य का मन सगा समाज जीवन में केंद्रीभूत होता है. मन को केन्द्रित करके सगा सामाजिक तत्वज्ञान किस तत्व पर आधारित है, यह जानकारी अपनी बौद्धिक शक्ति से प्राप्त करने से मनुष्य को प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों के ज्ञान प्रकाश का साक्षात्कार होता है. अर्थात इस ज्ञान से परम ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे मानव जाति के दुखों का समूल अंत करने के लिए मनुष्य के दिल में सेवा भाव की जागृति होती है. इससे व्यष्टि मन समष्टिमन रूप बनता है. अज्ञानी जीव ज्ञान स्वरुप होता है. उसे पेंतीलावस्था अर्थात परम सुख की अनुभूति होती है और वह "जय सेवा" इस गोंडी धर्म मन्त्र का परिपालनकर्ता बन जाता है.

          इसी कारण पारी कुपार लिंगो ने सम्पूर्ण मानव समाज को सगा सामाजिक नीतिमूल्यों का परिपालन करके सगा ज्ञान की शरण में जाने के लिए कहा है. सगा समाज का सगा ज्ञान के शरण में जाना याने जिस प्राकृतिक शक्ति फड़ापेन के सल्लां-गांगरा परस्पर विरोधी गुण तत्वों के आधार पर गोंड समाज की सम-विषम सगाओं की संरचना की गई है, उस नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना है. फड़ापेन रूपी नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना याने सम्पूर्ण विश्व मंडल के जीव जगत का यथार्थ ज्ञान का विकास करना है. बौद्धिक ज्ञान का विकास करना याने अज्ञान का समूल अंत करना है. अज्ञान का समूल अंत करना याने क्लेशपूर्ण जीवन को आनंद स्वरुप बनाना है. जीवन को आनंद स्वरुप बनाना याने सगा जन कल्याण साध्य करना है. सगा जन कल्याण साध्य करना याने जय सेवा मन्त्र का परिपालन करके जन कल्याण के साथ स्वयं का कल्याण साध्य करना है.

          इसके लिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने श्रेष्ठ उपासनीय शक्ति फड़ापेन को ही माना है. उस शक्ति के सल्लां-गांगरा तत्व याने नर-मादा तत्व हैं, जो माता पिता के प्रजनन शक्ति के रूप में हैं. इसलिए लिंगो ने माता-पिता की सेवा को फड़ापेन शक्ति की उपासना के बराबर बताया है, क्योंकि वे फड़ापेन शक्ति के ही साक्षात रूप हैं.

          पहांदी पारी कुपार लिंगो को अपनी बौद्धिक ज्ञान शक्ति से सम्पूर्ण विश्व का साक्षात अंतर्ज्ञान प्राप्त हुआ था. उसी के आधार पर उसने सगा समाज की स्थापना की और सम्पूर्ण कोया वंशीय मानव समाज को सगायुक्त सामाजिक संरचना के ढाँचे में विभाजित किया. भौतिक शास्त्र ने भी यह सिद्ध कर दिखाया है कि प्रकृति के खगोलीय अणुओं से कोई भी तत्व स्थिर न होकर सूक्ष्म से सूक्ष्म घटक स्वयं शक्तिरूप क्रियाशील और परिवर्तनीय है. इन अणुओं के पूना-ऊना (धन-ऋण) परस्पर विरोधी गुण तत्वों के कारण उनमे क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है. इन अणुओं का पूना-ऊना शक्ति याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्व हैं. इसके अतिरिक्त इस पुकराल (सृष्टि) में कुछ भी नहीं है. अणुओं में हरदम क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है और प्रकृति का चक्र भी नियमबद्ध चलता रहता है.

          अणु की क्रिया प्रतिक्रया से ही उनके कर्मात्मक संस्कार याने नवनिर्मित गुणयुक्त सूक्ष्म भाग बाहर फेंके जाते हैं और वे अन्य सत्वों में जाकर चिपकते हैं या उनको अपनी और खींच लेते. वे कर्मात्मक संस्कार मूल जिस वास्तु के होंगे, उन्ही के गुण संस्कार वे नित्य दर्शाते रहते हैं और परस्पर विरोधी गुणतत्वों में जाकर चिपकते हैं या स्वयं खींच लेते हैं. ठीक उसी तरह पारी कुपार लिंगो द्वारा सगा संरचना का निर्माण किया गया. गोंड सगा समाज के सगा शाखाओं में क्रिया प्रतिक्रियाएं होती रहती है. एक सगा घटक के स्त्री-पुरुष एक ही गुण संस्कार वाले होते हैं और विषम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं.  सम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से वे कभी भी पारी सम्बन्ध स्थापित नहीं करते. सम सगाओं के लड़के-लड़कियों का रिश्ता भाई बहनों का होता है. उनमे कभी भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता. बल्कि दो परस्पर विरोधी गुण संस्कार वाले तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रया से ही नवीनतम शक्तिशाली गुणतत्व का निर्माण होता है. विभिन्न सगाओं के विभिन्न आनुवांशिक गुण संस्कार वाले लड़के लड़कियों का पारी अर्थात वैवाहिक सम्बन्ध में शक्तिशाली और बुद्धिमान नव तत्वों का पैदावार हो सके, इसलिए पारी कुपार लिंगो ने सम-विषम सगाओं में पारी सम्बन्ध प्रस्थापित करने के सामाजिक सम्बन्ध बनाए हैं, जो आज भी गोंड सगा समाज में प्रचलित हैं. इन पर से गोंड सगा समाज की सामाजिक संरचना प्राकृतिक नियमों पर किस प्रकार आधारित है, यह सिद्ध होता है.

          इसलिए पारी कुपार लिंगो ने बताया है कि सगा सामाजिक संरचना जिस प्राकृतिक शक्ति के गुणतत्वों पर आधारित है, उस फड़ापेन शक्ति की उपासना करने से, उसके सल्लां-गांगरा तत्वों का ज्ञान प्रकाश अपनी बौद्धिक ज्ञान से समझने से प्रत्येक मनुष्य अपने सगा कक्ष के मार्ग से ही अपना वर्ताव और व्यवहार सुनिश्चित करता है, जिससे किसी को किसी भी प्रकार का दुःख नहीं पहुंचता. सभी लोग सगानीति, सगाचार, सगाकर्म, सगाकर्तव्य और सगा सेवा करते रहते हैं, जिससे सम्पूर्ण मानव समाज सुखी और समृद्ध होकर "सुर्वय पेंतोल" अवस्था का अनुभव करता है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने फड़ापेन को ही उपास्य शक्ति माना है.
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1 टिप्पणी:

  1. अमरावती जिलामे दो तहसिल है,धारणी और चिखलदरा,ये पुरा ईलाखा पहाडी और जंगली है,ईस पुरे ईलाकेको प्राचिन कालमे गांगरा कहा जाता था, इस शब्दके बारेमे और मालूमात हो तो बताए. ०९४२२९१४९७६ ज्ञानेश्वर दमाहे अमरावती

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