शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

बोली से भाषा बनी गोंडी

गोंडी अब तक बहुत सारी बोलियों का समुच्चय थी. बहुत सी बोलियाँ, जिन सभी को गोंडी कहते थे पर उनको बोलने वाले आपस में एक दूसरे को समझ नहीं पाते थे.

भारत में राज्यों का गठन भाषाई आधार पर हुआ था पर गोंडी भाषियों के साथ एक ऐतिहासिक अन्याय हुआ था, जब गोंडी बोलने वाले आदिवासी कम से कम 6 प्रदेशों में बंट गए.

इन सभी प्रदेशों की अपनी भाषा है, जिसने उस प्रदेश में बोले जाने वाली गोंडी पर प्रभाव डाला. वैसे भी हर भाषा  हर कुछ सौ किलोमीटर में थोड़ा रूप बदलती है पर इन विभिन्न राज्यों के कारण गोंडी के विभिन्न रूप जैसे तेलगु गोंडी, हिंदी गोंडी और मराठी गोंडी सामने आए. यद्यपि इन सभी को इसको बोलने वाले गोंडी कहकर की पुकारते रहे पर वे एक दूसरे को समझ नहीं पा रहे थे तो एक दूसरे से और दूर होते गए.

मध्य भारत में 1.2 करोड़ गोंड आदिवासी रहते हैं. मध्य भारत पिछले लगभग 40 सालों से एक सशस्त्र आंदोलन के परिणामों से जूझ रहा है. आज इस आंदोलन का जिसे हम माओवादी या नक्सल आंदोलन भी कहते हैं, एक बहुत बड़ा हिस्सा गोंड आदिवासियों से बना है.

जैसे भारत देश का अंग्रेजी नाम बाहर से आए लोगों ने दिया, वैसा ही गोंड स्वयं को कोया, कोयतूर आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं और उन सभी समूहों को हम सरलता के लिए भी आज गोंड ही कहते हैं.

माओवादी आंदोलन की प्रमुख भाषा गोंडी है. उसके लगभग सभी लड़ाके गोंडी भाषी हैं. उनमे से बहुतों को गोंडी के सिवाय और कोई अन्य भाषा नहीं आती. उनके सेक्रेटरी या संचालक यद्यपि अधिकतर तेलगु, हिंदी, ओड़िया या मराठी जैसी भाषाओं में भी बात कर लेते हैं.

पिछले हफ्ते के पहले गोंडी का एक संवाद माध्यम बनाया जाना संभव नहीं था, जिसे हर गोंडी भाषी समझ सके. उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ में बेमन से ही सही प्राथमिक कक्षाओं के लिए गोंडी के कुछ पाठ्यपुस्तकें बनाई गई हैं पर उत्तर और दक्षिण बस्तर के लिए दो अलग अलग पाठ्यपुस्तकें बनाई  गई हैं.

गोंडी में अब तक किसी सरकारी आदेश का अनुवाद करना भी संभव नहीं था, जिसे हर गोंड समझ सके. जंगल के क़ानून का आज 12 साल बाद भी गोंडी में अनुवाद नहीं हुआ है, जबकि उस क़ानून का निर्माण गोंडी भाषी जैसे जंगल में रहने वाले आदिवासियों के लिए ही हुआ है.

पिछले 4 वर्षो से मध्य भारत के गोंड आदिवासी के कुछ दर्जन प्रतिनिधि हर कुछ महीने किसी न किसी जगह मिलते रहे हैं और पिछले हफ्ते उन्होंने अपना पहला मानक शब्दकोष तैयार किया है. आम तौर पर इस तरह के काम सरकार करती है.

यह संभवतः पहली बार हुआ है जब एक समुदाय ने साथ आकर अपना मानक शब्दकोष बनाया है और सरकार से भी उनको मदद मिली है. अब गोंडी में पत्रकारिता, एक जैसा शिक्षण और प्रशासन का काम किया जा सकेगा. अब उत्तर बस्तर के शिक्षक दक्षिण बस्तर भी जा सकेंगे जो अब तक नहीं हो पा रहा था.

पिछले हफ्ते दिल्ली के इंदिरा गांधी कला केंद्र में मध्य भारत के 7 प्रदेशों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक से 80 गोंड आदिवासी एक हफ्ते के लिए जुटे और उन्होंने 4 साल से चल रहे अपने काम को आखिरी रूप दिया.

इस बैठक में समापन समारोह में आंध्र के अर्का माणिक राव ने धाराप्रवाह गोंडी में भाषण दिया और मध्यप्रदेश के गुलजार सिंह मरकाम ने उसका तुरंत फुरंत हिंदी में अनुवाद कर दिया. इस प्रक्रिया की शुरुआत के पहले ये दोनों गोंडी भाषा एक दूसरे का समझ नहीं पाते थे.

गोंडी इलाकों में यदि अब मातृभाषा में शिक्षण शुरू होता है तो बहुत से गोंडी भाषी युवाओं को नौकरी मिलेगी और स्कूलों से ड्रॉप आउट की संख्या घटेगी. माओवादी आंदोलन के अधिकतर लड़ाके स्कूल ड्रॉप आउट हैं. वे स्कूल इसलिए पूरा नहीं कर पाए थे, क्योंकि उनका शिक्षक हिंदी, मराठी, ओड़िसा और तेलगु बोलता था और वे गोंडी समझते थे.

गोंडी के शिक्षक भर्ती करने के लिए हो सकता है कि शुरू में हमें योग्यता में छूट देनी पड़ेगी, क्योंकि आज गोंडी जानने वाले पढ़े लिखों की तादाद कम है. ये अधिकतर गोंडी भाषी इसलिए माओवादियों के साथ जुटे हैं, क्योंकि उनके जीवन की छोटी छोटी दिखने वाली समस्याएं हल नहीं होती, क्योंकि अक्सर अधिकारी और पत्रकार गोंडी नहीं समझता है.

कुछ तकनीकी कंपनियां अब मानक गोंडी का बोलता शब्दकोष और हिंदी से गोंडी और उलटा की मशीन विकसित करने की बात कर रहे हैं. अगर अब गोंडी भाषा में मोबाईल रेडियो जैसे प्रयोग होंगे जहां दूर रहने वाले गोंडी भाषी अपनी समस्याओं की बात कर सकेंगे तो मशीन ट्रांसलेशन के बाद अधिकारी भी उसे समझ सकेंगे.

गोंडी के भाषा बनने को सरकारी मुहर लगनी अभी बाकी है, जिसके लिए उसे भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना होगा. आशा है सरकार इस दिशा में जल्द कदम उठाकर एक ऐतिहासिक चूक को सही करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लेगी.

इससे मध्य भारत में शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.
                                                                                                              शुभ्रांशु  चौधरी
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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

विकासवाद का मुखौटा

अपने संवैधानिक हक और अधिकारों के लिए
तीर धनुष तानते शांतिप्रिय आदिवासी
आज शहरों में विकास की रफ़्तार चरम की ओर हैं. विकास करने के लिए जल, जमीन, संसाधन और धन की आवश्यकता होती है. शहरों में धन प्रचुर है. लोग धन से धन पैदा करते हैं और धनवान बनते हैं. धन कमाने का तरीका चाहे अनैतिक हो या गलत. इससे धन कमाने वाले को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता ! चोरी, डकैती, लूटमारी, झूट, फरेब से धन कमाने की ललक शहरी जमीन की सत्यता है. धन कमाने की लालसा में भाई, बहन, माता पिता, परिवार, समाज, संस्कृति, धर्म, सभ्यता, मानवता कोई मायना नहीं रखती है. धन कमाने, समृद्धि प्राप्त करने, एशोआराम का जीवन प्राप्त करने के लिए यहाँ लोग जमीन को आसमान और आसमान को जमीन कहते हैं ! कहा कही में ही अपने माता पिता, भाई बहन, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और आमजनों का आसानी से क़त्ल कर देते हैं. इन शहरों में धन कमाने की गलाकाट प्रतियोगिता बनी हुई है. इसी प्रतियोगिता में शामिल होकर आधुनिक मानव समाज देश की प्रगति में भागीदार हो रहे हैं !!

सरकारें राज्य और देश की प्रशासन व्यवस्था संभाल रहे हैं तथा पुलिस और न्यायवादी संस्थाएं शान्ति, सुरक्षा और न्याय दिलाने में व्यस्त हैं. देश और राज्यों के प्रशासन में टांग खिचाई, संसद और विधान सभा में गाली गलौच, मारपीट, तोड़ फोड़ के होते हुए भी शान्ति, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था कायम हैं. सरकार के मुखियाओं के भाषणों के माध्यम से विकास और जीवन की मूलभूत योजनाएं और सुविधाएं जन जन, गाँव गाँव तक पहुँच रही है, किन्तु वास्तविकता की पुष्टि तो गाँवों में जाकर ही की जा सकती है.

इस देश के प्रगतिशील शहरों से दूर कस्बों, अंचलों में विभिन्न वर्ग समूहों के मानव समाज निवास करते हैं. उसी तरह दूरस्थ मैदानी वनों, पर्वतों, पहाड़ों में इस देश के लगभग सम्पूर्ण आदिवासी समाज की जनसंख्या निवास करती है. उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिवेश सशक्त किन्तु, शिक्षा, स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल आदि मूलभूत सुविधाओं से दूर हैं तथा आर्थिक परिस्थितियां अत्यंत कमजोर होने के बावजूद भी धैर्य के साथ, संतोष, शान्तिपूर्ण एवं प्रकृति संगत जीवन यापन कर रहे हैं.

स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद विकास की रफ़्तार शहरों से गांवों, कस्बों, जंगलों, पहाड़ों की ओर बढ़ रही है. सुकून मिलता है यह सुनकर और जानकर कि सरकार अपने विकास के मिशन को लेकर जन जन तक पहुंचने का प्रयास कर रही है तथा पूरा प्रशासन तंत्र योजना व कार्यों को लेकर सरकार के साथ कदमताल कर रही है.

अभावों में जीने वालों के मन में "मन की बात" सुनकर आशा जगी है. अब वे गाँव की गली, टूटते घर, खेत की बंधियों (मेंड़) को श्रमदान से ठीक करने की मानसिकता छोड़ चुके हैं. वे सुन चुके हैं कि अब मुफ्त में मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना से सड़क बनने वाले हैं. मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री आवास योजना से उनका पक्की घर बनने वाला है. मेंड़ बंधान योजना से उनके खेत का मेंड़ सुधरना है. नल जल योजना से झिरिया के गंदले पानी से मुक्ति मिलेगी. खाद्यान्न योजना से मिलने वाले एक दो रूपये किलो चांवल, गेहूँ, चना, तेल और नमक से उनका पेट भर जाएगा. जंगल पहाड़ों के काँटों, कंकर पत्थरों से बचने के लिए चरणपादुका, पहनने के लिए लुगड़ा, पोल्का, ओढ़ने बिछाने के लिए चादर, कम्बल, बरसात के लिए छतरी, पढने जाने वाले बच्चों के लिए साइकल, कापी, पुस्तक, बस्ता, मोबाईल, लेपटॉप आदि. खेती के लिए मरहा बैला जोड़ी, दूध के लिए खरटी टाली गाय, इन सबका पांच साल के पांच साल जुगाड़ होते रहेंगे. क्या इसी तरह जंगल के साथ साथ जीवन साधनों का जुगाड़ होते रहेगा और वे विकास की धारा में जुड़ते रहेंगे ?

इन भोले भाले लोगों की सोच एकदम सटीक और सीधा है. अटल विश्वासी हैं. बाहरी परिस्थितियों से जूझे नहीं. धैर्य और संतोष इनका सबसे बड़ा जीवन का अस्त्र शस्त्र रहा. जल, जंगल और जमीन इनके जीवन के पुरखौती साधन रहे. अपने पुरखों की गौरवपूर्ण प्रकृति संगत संस्कृति के साथ, जीवन का अंधियारा उजियारा तलासते, संवारते और अंत में अपने इन्ही धर्म धरा की मिट्टी में विलीन हो जाते हैं. 

शहरों से गांवों की ओर बढ़ता हुआ वर्तमान विकास रुपी सुनहरा दानव, आज उन्ही की छाती पर मूंग दल रहा है. इस विकासवादी स्वप्नों के चेहरे का स्वरुप देखकर उनके पैरों के नीचे का जमीन खिसकने लगा है. इस विकास रुपी चेहरे का स्वरुप इतना विकराल और जीवन विनाशक होगा, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था. आज पूरे देश में ही नहीं दुनिया के आधुनिक विकास रुपी चक्र की चक्की में इन भोले भाले लोगों का जीवन पिस रहा है. विकास के स्वप्नदृष्टा सरकारों से इस आदिम जीवन विनाशकारी चक्की को ऊर्जा मिल रही है. देश का विकास पथ उनके जीवन को रौंदते हुए आगे बढ़ रहा है. ज़माना और जमाने के लोग इस विकास के जीवन विनाशकारी स्वरुप को देखकर भी अनजान बन रहे हैं, तालियाँ बजा रहे हैं, खुश हैं ! अखबारों के काले, पीले, हरे, नीले रंगीन शब्द सरकार की दृष्टि और द्रष्टिकोण सिद्ध कर रहे हैं. ऐसी स्थितियों में हमारी अनपढ़, अल्पबुद्धि में भी अनेक सवाल उभरते हैं, कि इस मानव विनाशकारी विकास से मानव प्रजाति का ही दूसरा संपन्न वर्ग खुश क्यों है ? उनकी इस ख़ुशी का राज क्या है ? विकास के इस विनाशकारी तांडव को देखकर भी मौन क्यों हैं ?

इस देश में पढ़े लिखे, समाज शास्त्री, न्याय शास्त्री, संविधान की व्याख्या करने वाले बहुए हैं. अभी भी देश के आदिवासियों के लिए इन शास्त्रों के शब्द काले अक्षर भैंस बराबर हैं. इनके सामने कितना ही विकास का शास्त्रीय सुर से गायन किया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता. संकल्प के लोहे पर दौड़ता विकास का एक्सप्रेस अपनी पटरी पर भैंसों की भीड़ देखकर रुकने वाला नहीं है. बिना ब्रेक वाला विकास का एक्सप्रेस रेल अंधी रफ्तार से ऊबड़ खाबड़ तबेलों की ओर बढ़ रही है. लोग हैं कि अपना उजड़ा हुआ तबेला भी छोड़ने को तैयार ही नहीं. कारण साफ़ है कि इन तबेलों में भी रूखी सूखी जिन्दगी के अरमान फल फूल रहे हैं. वही छिन जाएगा तो भटकती आत्मा बनके रह जाएंगे, जैसे आज तक देशी विकास के थपेड़े खाकर करोड़ों लोग. आत्माएं भटकते हैं, ऐसा हमने सूना है, किन्तु यहाँ तो ज़िंदा इंसान और लाशें दोनों भटक रहे हैं !!

क्यों भटक रहे हैं ? इसका समाधानकारक उत्तर तक पहुँचने के लिए आदिवासियों को अपने पुरखों के धरातल के इतिहास को झांकना जरूरी है. सामाजिक जीवन, स्वाभाव, संस्कृति, धर्म, जीवन दर्शन के आईने में भी झांकर देखना होगा. अपने पुरखों से मिला ज्ञान, गुलामी मानसिकता से हटकर, अपनी बुद्धि का विवेकपूर्ण स्तेमाल और तर्क करना होगा. स्वर्गवासियों के ग्रंथों की कथा से हटकर अपने धरातल की खोज करने का प्रयास करना होगा. तभी आदिवासी समाज इनके मीठे बोल के पीछे छिपे ऐतिहासिक कातिलाना रहस्यों को समझ पाने में समर्थ हो पाएंगे.

प्राचीन इतिहास में आर्यों और अनार्यों के बीच जितने भी संघर्ष हुए वे सब धन, धर्म और धरा पर अधिसत्ता के लिए ही थे. उनके वंशज अभी भी इनको प्राप्त करने के लिए शाम, दाम, दंड, भेद, छल और बल से किसी भी हद तक जा सकते हैं और जा ही रहे हैं. इतिहास गवाह है, यहाँ आर्यों का कोई जन, धन, धरती और धर्म नहीं था. इस धरा के माता बहनों से ही अपना वंश वृद्धि किए. प्राचीन काल से लेकर अब तक भी अनार्यों के प्रति आर्यों के मन की घृणा गई नहीं है. द्वेष और बदले की भावना अभी भी प्रबल है. वर्तमान में यदि अनार्यों के प्रति उनमें कोई बदलाव आया है तो केवल घृणा, लड़ाई और संघर्ष के तौर तरीकों पर. भगवान, धर्म और राजनीतिक मीठे बोल के पीछे छिपे कातीलाना चेहरे को पढना सीधे साधे लोगों की बस की बात नहीं होती है. आज धर्म और धन उनके पास है. धर्म की वृद्धि की लालसा अभी भी बनी हुई है. मंदिरों के भगवान और धर्म इनके सपनों के उड़ान भरने के माध्यम हैं. धन और धरती की लालसा उनके मन से कभी ख़त्म होने वाला नहीं है. आदिम जनों के जल, जंगल और जमीन में अकूत नैसर्गिक धन संपदा है. इसके लिए आज भी वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और जा ही रहे हैं !!

वर्तमान परिवेश में विकासवाद का चेहरा वोट और नोट के राजनीतिक गठबंधन से धरातल पर उतरता है. इस विकासवाद के धरातल पर केवल उन्ही की वोट और नोट के सफ़ेद पोशी, परिवारवाद, समाजवाद, धर्मवाद और जातिवाद की पूरी श्रंखला खड़ी है. छल बल से भरे आदर सम्मान के दो मीठे बोल से प्रभावित अनार्यों के दो चार सिपाही, गिड़ते पड़ते दौड़ लगाकर, इन सफ़ेद नाकाब पाशों की श्रंखला में जाकर खड़े होने के लिए लालायित रहते हैं. उन्हें अनादर और अपमान के वही मीठे जहर पीने पड़ते हैं, जो उनके ऐतिहासिक पूर्वजों को पिलाया जाता रहा. इस ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और असमानता को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी भूल है. आज भी मूल जनों के जीवन की विकट परिस्थितियाँ सबके सामने है. यह विकट परिस्थितियाँ केवल और केवल उनकी ऐतिहासिक दुर्भावना का प्रतीक है. इस धरा के ही मूल जनों के प्रति सदियों से दुर्भावना का जहर भरने वाले नकली नाकाबपोश समाज के हत्यारों से सावधान रहकर, उस दुर्भावना के प्रति संघर्ष के लिए सामाजिक बल पैदा करने की जरूरत है. अपने आत्मसम्मान के प्रति समाज को जागृत करने की जरूरत है. आत्मसम्मान को बचाने के लिए उनकी श्रंखला में गिड़ते पड़ते, दौड़ लगाकर जाकर खड़े होने की आवश्यकता ही नहीं है.

देश और राज्यों के शासन में, सत्ता में, राजनीति में, धन में, धर्म में आर्यों का ही कब्ज़ा है. इसलिए प्रशासनिक संस्थाओं से निकलने वाले आधुनिक विकासवाद की हवा में भी आदिम जन विनाशक छल और बल का मीठा जहर घुला हुआ है. यह विकासवाद की नहीं विनाशवाद की हवा है. 

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा आज तक नहीं देखा गया कि आदिम जनों के विकासोन्मुखी सामाजिक, सांस्कारिक सरोकारों के अनुरूप उनके विकास की नीतियाँ बनाकर संचालित किया गया हो. जिन्हें विकास की जरूरत है, उन्हें ही विनाश के गर्त पर पहुंचाया जा रहा है. विकास के नाम पर क्रियान्वित होने वाले इन जन विनाशक परिस्थितियों को देश के हर आदिवासी राज्यों में देखा जा सकता है. वर्तमान में इन आदिवासी राज्यों में विकास के नाम पर क्रियान्वित किए जाने वाले कार्यों के स्वरुप और जिनके लिए विकास की अवधारणा रची जा रही है, उन्ही के विरोध के स्वरुप को देखकर एक अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति भी इन विकास योजनाओं के पीछे छिपे भयंकर विनाशकारी चेहरे को पहचान सकता है.

केंद्र की सत्ता से विकासवाद की हवा तेजी से चलती है. राज्यों तक पहुँचती है और राज्य की सरकारें विकास की आधार रचना उद्योग लगाने के लिए सहमती ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर करते हैं. प्रचार प्रसार होता है और क्षेत्र की पचान बनने लगती है कि यहाँ उद्योग लगने वाला है. यहाँ के लोगों की नौकरी लगने वाली है. लोगों के आय के साधन बढ़ेंगे तो क्षेत्र के लोगों का विकास होगा. क्षेत्र के लोग गुब्बारे सा फूल जाते हैं. एक अनपढ़ से अनपढ़ और मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी सोचता है कि उसे नियमित मजदूरी मिल जाएगा, जिससे वे परिवार का भलीभांति गुजारा कर सकेंगे. इससे ज्यादा वह सोच नहीं पाता, किन्तु जब उद्योग की स्थापना की बारी आती है तो पता चलता है कि यह उद्योग जिनके विकास के लिए लगना है उन्ही के जीवन के आधार जमीन को ही छीन लेती है. जीवन का गुजारा, विकास का सपने देखने वाले लोग ही अपने जमीन से सदा के लिए विस्थापित कर दिए जाते  हैं. जमीन का सही मुवावजा भी नहीं मिल पाता है. लोग अपने ही जमीन और घर से बेघर होकर हमेशा हमेशा के लिए ठगे के ठगे रह जाते हैं. यह सरकारी और कारपोरेटिया परिवेश में आमजनों का लूट नहीं तो और क्या है ?

देश और राज्य सरकारों के द्वारा आदिवासियों के विकास के लिए पढ़ाए जाने वाले सिलेबस को समझने में देश के आदिवासी नाकाम रहे हैं. देश के आदिवासियों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास का सिलेबस संविधान में अंकित हैं. सरकारें अनुच्छेद 244(1) एवं (2) के तहत पांचवी एवं छटवी अनुसूची को लागू क्यों नहीं करना चाहती ? वर्तमान में 10 राज्यों अर्थात आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और तेलंगाना पांचवी अनुसूची के राज्य हैं. इन्ही राज्यों में आदिवासियों के विकास की बदतर स्थिति है. उनको मिलने वाली संवैधानिक मूलभूत सुविधाएं जमीदोह पड़े हैं ! अशिक्षा, खराब पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आदि उनकी जिन्दगी निगलने आतुर है ! वहीँ विकास का दानव उनका जल, जंगल, जमीन निगल रहा है ! बचे खुचे नक्सलवाद के गरल गाल में समा रहे हैं. क्या ऐसे विकासवाद का विनाशकारी मुखौटा आदिवासी समाज के लिए ही पहन रखे हैं भारत के लोक नायक ?

आदिवादियों के हित में इन अनुसूचित राज्यों के एक भी राज्यपाल के द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों और गरिमा का उपयोग आज तक नहीं किया गया ! देश के अनुसूचित क्षेत्रों की ऐसी दुर्दशा के बाद भी महामहिम राज्यपालों की गरिमा को सम्मानपूर्वक चाटेंगे आदिवासी ? क्या सरकारें संविधान में दिए गए उनके अधिकारों से वंचित रखकर उनका विकास करना चाहती है ? क्या कारण है कि सरकारें उनको संवैधानिक हक़ और अधिकारों से परे रखकर उनके समक्ष अपना राजनैतिक मुखौटे में छिपे शैतानी दिल रखने का प्रयास करती है ?

राजनेताओं का एक चलन बना हुआ है. चुनाव जीतकर राजनेता पांच साल तक बेफिक्र, तनखा पाऊ, कमाऊ, ठाठ बाट, मार झोर, उठापटक, तोड़ फोड़, मुफ्त का भोजन, मुफ्त की गाडी, जनता के लिए पिछवाड़ा उघाड़ी की राजनीति चलती रहती है. अगला चुनाव सामने आता है, फिर नेताओं की तंद्रा टूटती है. गाँव गाँव जाकर वोटों की भीख मांगते फिरते है, अपने पाच शाल का एशोआराम एकत्रित करने के लिए ! फिर भोले भाले लोगों को अपने राजनीतिक चाल में फांसने के लिए उनके साथ नकली हमदर्दी बांटने का  कार्य किया जाता है. क्या उनकी टूटी-फूटी झोपडी में जाकर उनसे हाथ मिलाना, उनके टूटे खाट में बैठना, उनके हाथ से बने चाय पीना, उनके रूखे-सूखे भोजन चखना, तेंदू, चार, भेलवा खाना, उनके साथ नाच-गान करना, ही आत्मीयता और विकास की सीढ़ी है ? क्या अब ऐसे आत्मीय सम्मान भी आदिवासियों को सरकार और उनके नुमाइंदों से सीखने की जरूरत है ? यदि नहीं तो उन अनपढ़, भोले भाले लोगों के बीच जाकर सरकारों और सरकारी नुमाइंदों का इस तरह से झूठी आत्मीयता दिखाने का नाटक क्यों ??

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

कोया पुनेम, गोंडी गण व्यवस्था, प्रजातंत्र के कुछ प्रमुख शब्द

कोया- गुफा, खोह, गर्भ, महुआ का फूल, आधार, मूल बीज.

पुनेम- यह दो अक्षरों से मिलकर बना है- पुय याने सत्य, प्रकृति, सृष्टि (पुकराल). नेम याने मार्ग, रास्ता, पथ, जीवन पथ. इस तरह पुनेम अर्थात सत्य का मार्ग, सत्य का रास्ता, सतमार्ग, जीवन मार्ग, सतपथ. सत्य के मार्ग पर चलना, प्रकृति दर्शन को ग्रहण करना, सत्य के पथ पर चलना, प्राकृतिक गुणों का अनुसरण करना, सत्य को जीवन में उतारना. सत्य, प्रकृति संतुलन के गुणों को धारण कर जीवन यापन करना. 

पुनेमी- प्राकृतिक, सत्य को धारण कर चलने वाले लोग, सतमार्गी लोग, सत पथिक, प्रकृति के वाहक, प्रकृति के ज्ञान से प्रकाशित लोग, सृष्टि संतुलन के जनक, पारिस्थिति तंत्र (इकोसिस्टम) के पालन करता, धारक, प्रकृति संरक्षक वंश. प्रकृति, सृष्टि संतुलन के सत्य गुणों को धारण कर जीवन यापन करने वाले लोग, वंश. 

तूर- उत्पत्तित, भ्रूण, जीव, संतान, वंश, लोग.

कोयतूर- आधार वंश, मूल वंश, गर्भ से उत्पत्तित, मूल बीज.

कोया पुनेम- आधार सत्य मार्ग या सत्य मार्ग का आधार, आधारिक जीवन.

संय्युंग- पांच की सख्या.

गण्ड या गंड- लोगों का समूह, गण, जन, प्रजा, लोक.

गोंड- गो + अण्ड = गोंड या गोण्ड.  गो अर्थात गोंगो- विवेक, ज्ञान, धरती, शक्ति, प्रज्ञ. अण्ड अर्थात जीव, संतान. गोंड या गोण्ड अर्थात विवेकी जीव, धरती जीव, प्रज्ञ जीव, शक्ति युक्त, मानव, मनुष्य का पर्याय.

लेंग- बोली, भाषा.


नार- ग्राम, गाँव, कस्बा.

कोट- राज्य इकाई, राज्य का छोटा भाग.

शंभू- संय्युंग + भू =शंभू. संय्युग याने पांच, भू याने धरती, धरती का भाग, खंड. 

शेक- मालिक, राजा, प्रशासक.

शंभूशेक- पांच खंड धरती के मालिक, पांच खण्डों वाली धरती के राजा, पांच खण्डों वाली धरती के अधिपति, पांच खण्डों वाली धरती 'गोंडवाना' के प्रशासक.

गोटूल- गो + टूल =गोटूल. गो अर्थात गोंगो याने शक्ति, प्रकाश, ज्ञान, विवेक. टूल याने स्थान, केंद्र, ठीया, घर. अर्थात ज्ञान का स्थान, ज्ञान प्राप्ति केंद्र, ज्ञान शक्ति स्थल, ज्ञान प्रकाश स्थल, ज्ञान का ठीया, ज्ञान का घर.

पारी- व्यवस्था, रीति, नीति.

कुपार- मष्तिष्क, दिमाग, कपार, मस्तक.

लिंगो- ज्ञानी, ज्ञानवान, ज्ञान का भण्डार, सर्वोच्च, निराकार, शून्य.

पारी कुपार लिंगो- व्यवस्था में दिमाग लगाने वाला ज्ञानी. कोया पुनेम/ गोंडी पुनेम के अद्वितीय प्रणेता. कोया जीवन पद्धिति के निर्धारक. मानव जीवन संस्कार पद्धति के जनक. (1)

पुकराल- सृष्टि, प्रकृति, निसर्ग.


अंडोद्वीप- अंगारा लैंड, धरती का  उत्तरी भाग, प्राचीन 4 द्वीपों का समुह भू भाग.


गंडोद्वीप- गोंडवाना लैंड, धरती का दक्षिणी भाग, प्राचीन 5 द्वीपों का समुह भू भाग.
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          ऊपर लिखे गोंडी शब्द आदिम जनों के कोया पुनेम, गोंडी गण व्यवस्था, प्रजातंत्र के मूल आधार हैं. गोंडवाना की धरा पर विकसित "गोंड" नाम का विशाल आदिम सामाज रुपी पेड़, आधुनिक धरा पर उगे हुए किसी अन्य प्रजातीय समाज रुपी वृक्ष से कहीं अधिक आध्यात्मिक, वैचारिक, समता, समानता, बंधुत्व, भाईचारा के गुणों से संपन्न है. गोंडों की जितनी सामुदायिक शाखाएं हैं, उतनी उनकी भाषाएं. उनकी पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक रीति-नीति के अनुरूप जीवन संतुलन के आधार उनकी अपनी सामुदायिक भाषाओं में नीहित हैं तथा उसी आधार पर अभिव्यक्त होते हैं. इन आदिम प्राकृतिक भाषाओं की विविधता में एकता को समझ पाना किसी समाज शास्त्री, भाषाशास्त्री के लिए अत्यंत कठिन है. इन्ही कठिनाइयों के चलते आधुनिक समाज के बुद्धीजीवी साहित्यकार आदिवासियों के भाषाई तथ्यगत विचारों को मूलतः समझने और प्रस्तुत करने में हमेशा असमर्थ रहे.

         इसी के प्रतीक स्वरुप कई अंग्रेजी साहित्यकारों ने आदिम जीवन दर्शन को अज्ञानतावश उसके मूल दर्शन व सैद्धांतिक पक्ष को प्रस्तुत करने में लगभग असफल रहे. इस असफलता के कारण आदिम जनों के साहित्य में अधिकतर चारित्रिक व रूढ़िवादिता के विकृत अध्यायों के अभिलिखित स्वरूप प्रदर्शित हुआ. इस तरह आधुनिक जन मानस के बुद्धि और दृष्टि में आदिम जन हीनता के शिकार होते चले गए.


          इस दशा और दिशा के शिकार लोगों पर आज भी प्रबल दावेदारी होती है कि आदिम जन अपनी रूढ़िवादिता के शिकार होकर वह देश की मुख्य धारा से स्वतः दूर होता जा रहा है ! आधुनिता के प्रतियोगी दौड़ में धरातल से शिखर तक डूबे जन मानस के लिए यह समझना कठिन ही नहीं असंभव है, कि जिस बाबा साहब ने संविधान में समता, समानता, बंधुता, भाईचारा, एकता का उल्लेख किया है, वह आदिम मूल जनों के तन, मन और बुद्धि में जन्म जन्मांतर से रेखांकित है. बाबा साहब ने इन्हें भविष्य को देखते हुए शब्दों में पिरोया. संविधान में इन शब्दों से आदिम जनों को नहीं, बल्कि देश के ऐतिहासिक भविष्य को स्वर्ग की सत्ता में स्थापित करने वालों की स्वप्न तन्द्रीय जड़ता को प्रकृति के साथ विलीन करने के लिए संबोधन किया.


          भारत वर्ष ही नहीं दुनिया में विकास के स्वप्नदृष्टाओं ने आदिम जनों तथा उनके सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन पद्धति को रूढ़िवादी, अंधविश्वासी, गरीबी, लाचरी और पशुता के घ्रणित चरित्र के आईने में ही देखा, दुत्कारा ! दुत्कारा ही नहीं बल्कि उनके मूल प्रकृति दार्शनिक परिवेश में स्वर्ग-नरक, पाप-पुन्य, चमत्कार की परिगाथा थोपने के साथ ही आधुनिक विकास के लिए बलि का बकरा बनाते आया. न्यूनतम निर्वाह की भूमि, प्यास के लिए जल, भोजन के लिए जंगल और नंगा बदन होते हुए भी काफिरों द्वारा जीवन जिर्वाही साधन ही उनसे छीनते गए, फिर भी समाज है कि बिना कोई प्रतिक्रया के जंगलों के अंधेरे में गुमनामी जीवन जीते रहे. मूल वंश में आज भी उनके जीवन निर्वाह की पद्धति, आध्यात्म और सांस्कृतिक जीवन दर्शन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है. 


          अब समाज में धीरे-धीरे जागृति का संदेश प्रसारण हो रहा है. अनेक स्वभाषी साहित्यकार सामाजिक रीति-नीति, संस्कृति, आध्यात्म, दर्शन पर योग्य साहित्यों की रचना कर रहे हैं, जिसमे आदिम सामाजिक पारदर्शी संरचना को भली भांति प्रस्तुत किया जा रहा है. इनमे कई अति उत्साही भी हैं !  गोंडी आरती, महा आरती, गोंडी रामायण, गोंडी महापुराण, गोंडी गीता आदि की रचना भी कर चुके हैं !  उत्साहपूर्ण साहित्य लिखने का यह अत्यंत संवेदनशील और संक्रमण का दौर प्रतीत हो रहा है.

संदर्भ : (1) डॉ. नारवेन कासव टेकाम के शब्द विलेख

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

राजनीतिक मंच और नेताओं के स्वागत आदि के लिए नाचना बन्द करे जनजातीय समाज

राजनीतिक मंचों और नेताओं के स्वागत में देश के जनजातीय समाज अपने नृत्यकला का प्रदर्शन बन्द करे! राजनीति के लालची लोग समाज को मनोरंजनस्वागत के साधन और नचकार बना लिए हैं ! वैसे भी नेता देश के आदिम समाज के लोगों को इंसान और अपने पैर का धूल भी नहीं समझते !

जनजातीय सांस्कृतिक दलों के मुखिया लोगों को रतिभर लाभ और नेताओं की खुशी की चिंता है ! हमें पता है एक अधमरा सा पार्टी का नेता किसी शहर में पहुंचने की खबर क्या मिलती है, समाज के छुटभैये उनके स्वागत और मनोरंजन के लिए नृतक दलों का पिछवाड़ा पोंछने लगते है ! बखत परै बाक़ा त गधा ला कहै काका !!

समाज की प्राचीन गोंगो विधि, पुरखों की नृत्य कला उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक अमानत है। थोड़े से रुपये पैसे, लुगड़ा, पोल्का, टिकली, बिंदिया, चूरी, खिनवा, झुमका, फुँदरा के लालच में समाज के नृतक दल दौड़े चले जाते हैं ! समाज के पुरखों ने भूखे रहकर भी इस अमानत को अपनी जान से भी ज्यादा सुरक्षित रखा, तब आज इस पीढ़ी को अमानत के तौर पर प्राप्त हुआ है ! वे हैं कि गली गली, मंच मंच नेताओं के सामने अपनी सामाजिक गोंगो विधि, पुरखौती सांस्कृतिक, धार्मिक कला, अमानत का इज्जत उघाड़ने में लगे हैं !!

आधुनिक समाज के जिन सभ्य और सुंदर चेहरों ने अपने नंगा बदन दिखाकर व हाथ पैर झड़ाकर जिस कमाऊ, नोटदार संस्कृति और कला का विकास किया है, नेताओं और उनके दलालों में कूवत है तो उन्हें अपने भारी और सरकारी जेब दिखाकर हर बार, हर मंच में खुद के स्वागत करवाने के लिए बुलवा लें !!

आदिम जनजातीय पुरखों ने अपनी गोंगो विधि, धार्मिक व सांस्कृतिक कला को कभी नहीं बेचा ! इसे गोंगो (पूजा) का माध्यम बनाया। परन्तु आज उनकी संतानो के हाथों उनकी अमानत, पार्टी नेताओं के स्वागत और शौकीन बाजार में बिक रही है ! इसके प्रमुख दलाल समाज के ही पार्टिवाईरस ग्रसित, चापलूसरोगी छुटभैये नेता हैं !!

देश की राजनीति और आधुनिक समाज "आदिम जनजातियों की निजसंस्कृति" को विदेशियों के सामने सम्पूर्ण देश का सामाजिक, सांस्कृतिक आईना बनाकर सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करता है ! अपने शानदार बंगलों में उनकी कला संस्कृति का सुंदर मनोहारी चित्र टंगवाते हैं, यह बताने के लिए कि यही हमारी और हमारे देश की महान संस्कृति है ! वहीं उनकी ही धरा पर, संस्कृति के मालिकों को राजनीति के ताकत का नंगा पिछवाड़ा दिखाकर अपमान करता है ! देश की राजनीति उन गरीबों की जल, जंगल, जमीन और संवैधानिक अधिकार बलपूर्वक छीनकर अपने सहयोगी कारपोरेट लुटेरों को मुफ्त में बाटता है ! नक्सलवादी कहता है, गोली मरवाता है, उनकी बहू बेटियों का बलात्कार करवाता है, घर जलवाता है ! वहीं समाज के कुछ अधकचरे लोगों में इस राजनीतिक नंगाई के सामने अपने समाज के बेटे, बहु, बेटियों को नचवाने का भूत सवार रहता है !!

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

सल्ले गांगरे पेन (सृष्टि सृजक शक्ति/बड़ादेव) की नैसर्गिक अवधारणा



सम्पूर्ण गोंडवाना के आदिम वंश, समुदाय "वेन" और "पेन" संस्कृति/ दर्शन का वाहक है. गोंड आदिम समुदाय की निज भाषा "गोंडी" में पढ़े जाने वाले शब्द "वेन" और "पेन" केवल दो अक्षरों से मिलकर बने सबसे छोटे शब्द हैं, किन्तु इनके ज्ञान गर्भ में छुपे सामाजिक, सांस्कृतिक, आस्था और आध्यात्मिक दर्शन की सीमाएं सृष्टि की तरह विशाल और अटल है. "वेन" और "पेन" के सम्बन्ध में समाज के अनेक दार्शनिक, भाषाविद, विज्ञानियों ने विस्तारपूर्वक सार्थक उपदेश दिए हैं, देते हैं, जो अनमोल हैं.

हम यह मानते हैं कि "गोंडी" के बगैर "गोंड" और "गोंडवाना" को समझना आसान नहीं है. समय की निरंतरता के साथ मानव पीढ़ियों के आने और बीत जाने तथा नयी पीढ़ी की अभिरुचि में कमी के कारण पीढ़ीगत चली आ रही प्राचीन भाषाओं के नैसर्गिक हस्तांतरण के पैतृक विधा का तेजी से विलोपन हो रहा है. इस प्राचीन भाषा के विलोपन के लिए हमारी हर पिछली पीढ़ियाँ जिम्मेदार हैं, ऐसा कहकर हम अपने जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते. एक विशेष विषय की तरह हम अपने भाषा गुरुओं से सीखने का प्रयास करें, जिससे गोंडी को समाज में पुनर्स्थापित कर सकें और यही समय की मांग है.

दूसरी ओर समय के साथ साथ मानव समाज, संस्कृति, दर्शन, भाषा और ज्ञान आदि का विज्ञान के माध्यम से विस्तार और विकास हो रहा है. विज्ञान ने किसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए भाषाओं के बंधन को तोड़ दिया है. अतः समाज के वर्तमान गोंडी भाषी लोगों का प्रमुख उत्तरदायित्व है कि समाज के निज भाषा गोंडी के शब्दों में छुपे ज्ञान को गोंडी और वर्तमान प्रमुख भाषाओं में तथा विभिन्न माध्यमों में स्थाई रूप से सहेजने के लिए एक अभियान के तौर पर प्रयास करें, ताकि समाज के वर्तमान और आनेवाली पीढ़ियों को वैज्ञानिक तौर तरीकों से ज्ञान का संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षित हस्तांतरण कर सकें.

इसी परिप्रेक्ष्य में हम यहाँ संक्षेप में केवल "पेन" (निराकार/ अदृश्य/ ईश्वर) से जुड़े मान्यताओं के नैसर्गिक तथ्यों पर विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे.

सृष्टि के पंचतत्वों में आदिम वंशों के पेन और उनके पेनों का मुखिया सल्ले गांगरे पेन/ परसापेन/ सजोरपेन/ हजोरपेन (बड़ादेव) की नैसर्गिक और वैज्ञानिक अवधारणा नीहित है. वह सृष्टि रचयिता है. वह सर्वोच्च शक्ति है. वह तत्वों के उत्पत्तिकर्ता है. वह कण-कण में विराजमान है. पेनों का पेन सल्ले गांगरे पेन है. वह निराकार एवं अजन्मा है. उसका साक्षात्कार पेनों से होता है. वह प्रकृति के सभी संसाधन, शरीर के अन्दर तथा बाहर वातावरण में सामान रूप से विद्दमान है. इस पुकराल/ सृष्टि में सल्ले गांगरे पेन/ परसापेन/ सजोरपेन/ हजोरपेन से बड़ा कोई पेन/शक्ति नहीं हैं.

गोंड आदिम वंश में "सल्ले गांगरे/ परसापेन/ सजोरपेन/ हजोरपेन शक्ति के संबंध में धारणा है कि सृष्टि की सृजन प्रक्रिया "नर" और "मादा" गुणधर्मी तत्वों के नौसर्गिक संयोजन से पूरा हुआ. इस नर और मादा गुणधर्म धारक तत्व को गोंडी में क्रमशः "सल्ले" और "गांगरे" कहा गया है.

दूसरे शब्दों में "सल्ले" अर्थात धनात्मक (+) या पितृ गुण एवं "गांगरे" अर्थात ऋणात्मक (-) या मातृत्व गुण शक्ति से है. धनात्मक और ऋणात्मक गुण सृष्टि के सृजन एवं विखंडनकारी शक्तियां हैं. इन असमान गुणों (+) एवं (-) के प्रबल नैसर्गिक आकर्षण और संयोजन से सृजन/ निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है. उसी तरह समान गुण (+) एवं (+) तथा (-) एवं (-) के संयोजन से विखंडन/ नष्ट होने की प्रक्रिया आरम्भ होती है. इन्ही धनात्मक एवं ऋणात्मक शक्ति के जागृत संयोग के कारण सृष्टि के स्वरुप का निर्माण हुआ तथा इसी शक्ति के कारण ही सृष्टि के समस्त संसाधनों का निर्माण, ग्रह-नक्षत्रों के सञ्चलन की गति निर्धारित हुई. उदाहरण स्वरुप चुंबक में समाहित धन एवं ऋण को मान सकते हैं. चुंबक में आकर्षण और प्रतिकर्षण होता है. यही आकर्षण एवं प्रतिकर्षण शक्ति निरर्ग/ सृष्टि में भी विद्दमान है, जो सम्पूर्ण पुकराल में नैसर्गिक ऊर्जा के रूप में व्याप्त है. इन्ही ऊर्जा शक्तियों के संयोजन से सृजन/ उत्पत्ति/ निर्माण और वियोजन से विघटन/ विनाश/ नष्ट होने की प्रक्रिया को क्रमशः जन्म और मृत्यु भी कह सकते हैं.

पुकराल के समस्त भौतिक-अभौतिक, चर-अचर, जीव-निर्जीव, ठोस-तरल सभी संसाधनों की उत्पत्ति, विकास और विघटन की गणन पद्धति, पैरामीटर्स में व्यापक रूप से यह नैसर्गिक सिद्धांत विद्दमान है. सल्ले गांगरे शक्ति अर्थात "धन एवं ऋण" शक्ति ही वह "नर एवं मादा" शक्तियां हैं, जिनके मातृत्व एवं पितृत्व गुणों से संतति उत्पन्न होते हैं. संसाधनों की उत्पत्ति एवं अंत तथा जीवों का जन्म एवं मृत्यु प्रकृति के चक्रण का नियम है, जिसे हम जीवन चक्र या विज्ञान की भाषा में पारिस्थितिकी अथवा पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं. अतः सृष्टि की उत्पत्ति एवं विनाश का स्वरुप तथा सम्पूर्ण पुकराल की अनंत "धन" एवं "ऋण" शक्ति या पितृत्व एवं मातृत्व शक्ति का द्योतक सल्ले गांगरे/ परसापेन/ सजोरपेन/ हजोरपेन (बड़ादेव) है.



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