शनिवार, 16 मार्च 2013

शिवमगवरा (शिवंगा)

          शिवमगवरा अर्थात शिवंगा याने होली का त्यौहार सम्पूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है. इस त्यौहार को मनाने के पीछे गोंड समाज का जो तत्वज्ञान है, वह अन्य समाज के लोगों के तत्वज्ञान से बिल्कुल निराला है. यह त्यौहार फागुन माह में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. कोया वंशीय गोंड समाज के लोग इस त्यौहार को अपने-अपने गांवों में सभी मिलकर मनाते हैं. गांव के सडकें पन्द्रह दिन पूर्व से ही हर दिन शाम को "गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया. किस कुंड मानता, निर मिटके किया !! ऐसा गीत गाते हुए घर-घर से लकड़ियाँ जमा करके गांव के बाहर पूर्व दिशा में जहाँ होली जलाई जाती है; ले जाकर जमा करते हैं. जो ढीग होता है उसे 'शिव-गवरा जो हार जो ! बणोंज्याल फ़ो-दाय-फ़ो ! बिणोंज्याल फ़ो-दाय-फ़ो ! ऐसे नारे लगाकर प्रदक्षिणा (परिक्रमा) डालते हैं. इस तरह लकड़ियाँ जमा करने के बाद पूर्णिमा के दिन की संध्या को गांव का भूमक सभी ग्रामवासियों के साथ सार्वजनिक आरती लेकर जाता है. वहां पर एक-दो फिट का गड्ढा खोदकर उसमे कुछ पैसे और लोहे का चुरा डालकर एक ऊँची लकड़ी खड़ी करते हैं. उसे सेंदुर, गुलाल कूं, कूं और चावल डालकर पूजा करते हैं. उस ऊँची लकड़ी के चारों ओर शेष सभी लकड़ियों को खड़ी करते हैं. बाद में चकमक की चिंगारी से उसे जलाया जाता है उस जलते लकड़ियों की होली में एक गुथे हुए आटे की गवारा की मूर्ति बनाकर डालते हैं. फिर सभी लोग "शिवमगवरा ! शिवमगवरा ! शिवमगवरा ! ऐसे जोर जोर से चिल्लाते हुए जलते होली का पांच चक्कर मारते हैं. ठीक उसी वक्त एक मनुष्य शिवाजी का वेशधारी त्रिशूल लेकर वहां आता है. और जलते होली को पांच चक्कर लगता है बाद में एक जलती लकड़ी को लेकर जलने वाली अन्य लकड़ियों के उपर क्रोधित होकर वार करता है बाद में सभी लोग "शिवगवरा जो हार जो ! बिणोंज्याल फ़ो-दाय-फ़ो ! बिणोंज्याल फ़ो-दाय-फ़ो ! ऐसे नारे लगाकर सात परिक्रमा करते हैं. उसके बाद रात भर शिवगवरा संबंधित गीतों की ताल पर नृत्य गान करके जागरण करते हैं.


          दूसरे दिन वे अपने अपने घर लौरते हैं फिर नहा धो कर वे फिर वहां जाकर गाय के गोबर के सूखे हुए गोबरियों को जलाकर उसकी राख अपने मस्तक पर लगाकर उसकी पूजा करते हैं. सभी गांववासी गोबरियों की राख अपने-अपने घर लाकर घर के सभी सदस्यों के मस्तक पर लगातें हैं. फिर बाद में गुलाल और पलास के फूलों से बनाया गया रंग एक दुसरे पर डालकर रंग खेलते हैं. इस तरह यह त्यौहार मनाया जाता है.

          शिवमगवरा अर्थात शिवंगा यह त्यौहार मनाने के पीछे गोंड समाज के लोगों का जो तत्वज्ञान है, वह अन्य समाज के लोगों के तत्वज्ञान से भिन्न है. शिवमगवरा यह गोंडी शब्द शिव+वोम+गवरा इन तीन शब्दों की मेल से बना है. शिव याने शम्भू अर्थात शंकर वोम याने ले जा और गवरा याने पार्वती को. ऐसा शब्द अभीप्रेत हैं. शिवमगवरा इस शब्द का अपभ्रंश रूप शिवंगा यह शब्द आज इस त्यौहार के लिए प्रचलित है. अब हमारे सामने यह सवाल उठता है कि शिवमगवरा ! शिवमगवरा !शिवमगवरा ! ऐसे नारे लगाते हुए गोंड समाज के लोग होली क्यों जलाते हैं. इस संबंध में जो लोक गाथा गोंड समाज में प्रचलित है, वह निम्न प्रकार है.

          गवरा यह दक्ष राजा की कन्या थी. दक्ष प्राचीन काल में एक आर्य राजा और अनार्य में जब अपने राज्य विस्तार के लिए युद्ध शुरू हुआ. अनार्य याने आज के गोंड समाज के पूर्वजों ने जो शिव शम्भू के उपासक थे आर्यों का शिरच्छेद करना आरम्भ कर दिया. वे बहुत ही शक्तिशाली और योद्धा थे. कोय वंशीयों का राजा शम्भू जोग और तंद्री विधा में इतना प्रबल था कि जब तक वह अपनी योग साधना में लीन रहता था तब तक जनता को कोई हरा नहीं पाता था, मार नहीं सकता था. इस बात की जानकारी गुप्तचरों व्दारा जब आर्य राजाओं को मिली, तब उन्होंने अपनी रूपवती कन्याओं को शिवाजी की योग साधना भंग करने के लिए, उसे अपनी मायाजाल में फसाने के लिए भेज दिया. दक्ष राजा की कन्या गवरा यह उन्हीं में से एक थी. परन्तु आर्य राजाओं को तब बहुत जबरदस्त धक्का बैठा जब गवरा शम्भू को अपनी मायाजाल में फसा नहीं पायी, बल्कि वह  स्वंय शिवोपासक बन गयी, जिससे दक्ष राजा को बहुत धक्का लगा. उसने अपने दिल में बदला लेने की ठान ली.

          एक दिन दक्ष राजा अपने घर में महायज्ञ का कार्यक्रम आयोजित किया. जिसमे सभी आर्य राजाओं को बुलाया गया. साथ ही शिवजी को निमंत्रण न देते हुए अपनी कन्या को निमंत्रण दिया. जो शिवजी के लिए अपमान की बात थी. इसलिए उन्होंने पार्वती के साथ जाने से इंकार कर दिया. गवरा अपने पिताजी के घर यज्ञ में भाग लेने के लिए गयी तब उसका सभी आर्य राजाओं के सामने बहुत अपमान किया गया. गवरा जी ने जब उनका विरोध किया तो कहतें हैं- उसके पिताजी ने उसे यज्ञ कुंड में धकेल दिया. यह खबर शिवजी के सेवकों को जो गवारा के साथ यहाँ आये थे, लगी तो वे शिवाजी की शिवमगवरा ! शिवमगवरा !शिवमगवरा ! ऐसा जोर-जोर से चिल्लाते हुए दौड़ पड़े. जब शिवजी को इस बात की खबर मिली तब वे क्रोधित होकर दौड़े चले आये. परन्तु तब तक गवरा जी जलकर राख हो चुकी थी. शिवजी को रहा नहीं गया. उन्होंने अपने तीसरे नेत्र से आर्य राजाओं के उपर अपनी चिंगारियों को बरसाकर भगा दिया और दक्ष राजा की राजमहल को जला डाला.

          इस तरह दक्ष राजा ने गवरा जी को यज्ञ कुंड में धकेल दिया. वह जलकर राख हो गयी. परन्तु शिवजी ने उसके राजमहल की होली जला दी. उस वक्त वहां राजा जो शिवजी के सेवक थे. उन्होंने "शिवमगवरा जो हार जो ! बिणोंज्याल फ़ो-दाय-फ़ो ! बिणोंज्याल फ़ो दाय फ़ो अर्थात शिव-गवरा का जयकार हो ब्रहमा का सत्यानास हो ! विष्णु का सत्यानास हो ! ऐसे नारे बाजी की थी. इसी घटना को लेकर आज भी गोंड समाज के लोग होली जलातें हैं. अर्थात हर वर्ष दक्ष राजा की महल को जलाते हैं. उसके लिए वे पन्द्रह दिन पहले से ही गवरा के नाम से लकड़ियाँ जमा करते हैं. लकड़ियाँ जमा करते वक्त जो गीत गाया जाता है. वह निम्न प्रकार से है :-

          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          किस कूंडा मानता, निर मिटके किया !!
          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          द्च्छीराज मायलोता, निर मिटके किया !!
          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          बरमा स्कसाता, निर मिटके किया !!
          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          बिसो नारयाना, निर मिटके किया !! 
          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          किसकुंढा मानता, निर मिटके किया !!
          गवराना कट्या, सिम्ट उंदी लटिया !
          शिवगवरा मायता, जो हार जो किया !!

          उपरोक्त गीत का जो सार है, वह याने गवरा के नाम से एक लकड़ी दो जिसमे यज्ञ को भंग करने की शक्ति हो, दक्ष राजा की महल को जलाने की क्षमता हो, बरमा बिसो नारया को मार भगाने की शक्ति हो और शिव-गवरा का जय जय कार करने की शक्ति हो.

          इसी तरह होली जलाते वक्त "शिवमगवरा, शिवमगवरा" ऐसे जो नारे लगाये जाते हैं उसका अर्थ है शिव ले जावो गवरा जी को. ऐसा है. क्योंकि जब दक्ष राजा जी के यहाँ गवरा जी का अपमान किया जा रहा था. तब उसके समर्थक शिवजी के ओर "शिवम गवरा सिवम गवरा" ऐसा चिल्लाते हुए दौड़ पड़े थे. होली जलाने के बाद जो "शिवम गवरा जो हार जो ! बणोंज्याल फ़ो दाय फ़ो ! बिणोंज्याल फ़ो दाय फ़ो !" अर्थात शिव गवरा का जय जयकार हो. ब्रहमा का सत्यानास हो विष्णु का सत्यानास हो. ऐसे नारे लगाते जाते हैं. क्योंकि उन्ही के कारण गवरा जी की हत्या की गयी थी. होली के अन्दर जो गवरा जी की मूर्ति डाली जाती है वह इस बात की घोतक है. कि गवरा जी को जबरदस्ती यज्ञकुंड में डाल दिया गया था. या धकेल दीया गया था. गोबरियों को जलाकर राख को मस्तक में लगाने का जो रिवाज है. वह इस बात का घोतक है कि गवरा जी की राख मस्तक में लगाकर वे अपने दुश्मनों को मार भगाने का प्रण करते हैं. होली जलाने के बाद जो त्रिशूलधारी मनुष्य वहां आकर जलते हुए लकड़ियों पर त्रिशुल से वार करता है. वह शिवजी की क्रोधित रूप का साक्षात् दर्शन है जो गवरा जी  के जल जाने के बाद आकर दक्ष राजा के राज महल का होली जलाते हैं. इस तरह होली का त्यौहार मनाने के पीछे गोंड समाज के लोगों का जो तत्वज्ञान है, वह अन्य धार्मिक लोगों से भिन्न है.

          दूसरे दिन रंग गुलाल खेल कर खुशियां इसलिए मनाते हैं कि उस दिन उन्होंने अपने दुश्मनों की राज महलों की होली जला कर उन्हें अपने राज्य के बाहर मार भगाने का कार्य किया था.                         

रविवार, 10 मार्च 2013

देवगढ़ का धुरवा राजघराना

          भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक जीवन की संरचना में यहाँ के मूलनिवासियों का विशेष योगदान रहा है. देश का अतीत गोंडवाना के महाराजाओं की रोचक इतिहास, जय और पराजय से संबंधित अनेक स्मृतियों से आलोकित है. इनकी परम्पराओं में पूर्वजों का अत्यंत विस्तृत इतिहास खोजने से मिलता है. मध्य भारत (Central India) में सैकड़ो साल तक महान प्रतापी गोंड राजाओं ने राज्य किये. उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक महलों, किलों, तालाबों और कुओं-बावलियों का निर्माण अपनी अदभुत कला-कृतियों के व्दारा किये परन्तु उनके वंशज अपने पूर्वजों का अमूल्य वैभव बचाकर नहीं रख सके तथा शासन ने उन्हें छीनकर मिटने के लिए छोड़ दिया.

          हरियागढ़ का किला :-  मध्यप्रदेश  के छिंदवाड़ा जिले में जुन्नारदेव से लगभग १०-१५ किलोमीटर की दूरी पर कान्हान नदी के किनारे एक पहाड़ पर स्थित हरियागढ़ धुरवा गोंड राजाओं की राजधानी कभी अपने  महकते सौन्दर्य, लहकते लावण्य और बहकते रूप के कारण प्रसिद्ध रहा है. अपना एक अलग आकर्षण था. गरिमा थी, किन्तु आज उजड़ा बिगडा टीला मात्र रह गया है. जिस पर वृक्षों के समूह दिखाई दे रहे हैं. इसी के पास हीरागढ़ स्टेशन है, जहाँ अभी भी गोंडी युग के बहुत कुछ स्मारक हैं. सम्भवतः हरियागढ़ और हिरदागढ़ एक ही है. लगभग १५०० फुट की ऊंचाई पर स्थित तथा लगभग २६ किलोमीटर के घेरे में फैले हरियागढ़ के इस किले में अभी भी सुरंगें बनी हुई है. किले के सुसज्जित व्दारों के अवशेष अभी भी विधमान है. किले के उपर चंडीमाई, खप्परमाई और काली कंकाली माई का स्थान खंडहर के रूप में अतीत की स्मृतियाँ गर्त में छिपाये खड़ा है. जहाँ पेंच और घाटामाली नदियों का संगम होता है. लोग इसे राजडोह कहते हैं. जहाँ नारयनदेव का पूजा किया जाता है. राजा रानी  के मूर्तियों के पास ही कुछ पुरातन कालीन नक्काशीयुक्त पत्थरों का समूह है, जो गांव के बाहर एक विशाल वट वृक्ष के नीचे पड़े अपने जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं. ये मूर्तियां हरियागढ़ ही नहीं बल्कि समस्त गोंडवाना पुरातत्व की महत्वपूर्ण अमूल्य निधि है. यहाँ के स्थानीय लोगों का विश्वास है कि राजा रानी की प्रतीक मूर्तियां प्रकृतिक विपदाओं से छुटकारा दिलाती है. इसलिए वे उनकी विधिवत हूम-धूप और पुजवन करते हैं. इस गोंडवाना के स्वर्णिम इतिहास को संजोये मौनभाव से व्यक्त करता हुआ हरियागढ़ का किला हमारी संस्कृति की उत्कृष्टता को आज भी मुखरित कर रहा है.

          देवगढ़ का किला :- हरियागढ़ से लगभग १० किलोमीटर एवं छिंदवाड़ा से दक्षिण पश्चिम दिशा में ४० किलोमीटर दूर पहाड़ी पर देवगढ़ बसा हुआ है. गढ़ के आस-पास पुरानी इमारतें कुंए और बावलियों के खंडहर   दूर-दूर तक आज भी दिखाई देते हैं, जो कमानियों के अतिरिक्त सभी ईंट और चुने से बनी है. बादलमहल, नगारखाना, बड़े-बड़े पत्थर के हौज, अष्टकोनी कमरा, और प्रवेश व्दार आज भी सुरक्षा की प्रतीक्षा में मौन आसू बहा रहे हैं. देवगढ़ के नीचे धुरवा राजाओं की समाधि है. यहीं पर सुप्रसिद्ध महान प्रतापी राजा जाटवा की समाधि है. धुरवा गोंडी शासनकाल में देवगढ़ एक बड़ा और सुंदर नगर था. देवगढ़ एक समय इतनी उन्नति पर था कि उसके समझ गढ़ा मंडला, खेरला और चांदा के निकटवर्ती पडौसी गोंडी राज्य दब गये थे. किन्तु आज देवगढ़ का टूटा किला, महलों के निशान और जाटवा (जटलाशाह) की समाधि का ध्वसावशेष वर्तमान है.

          नागपुर का किला :- देवगढ़ राज्य के टूट जाने पर यहाँ से लगभग ९६ किलोमीटर दूर नाग नदी के किनारे बख्तबुलंद एवं अन्य गोंड राजाओं व्दारा निर्मित नागपूर के किले आज भी अच्छी हालत में गोंडी कलाकृति के मौन व्याख्यान कर रहे हैं. जहाँ के परकोट, बावलियां, कुंए और राजापुर बरसा नाम के बारह मोहल्ले के खड़हरयुक्त अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं.

          हरियागढ़, देवगढ़ और नागपुर के धुरवा राजाओं ने अपने राज्य का संचालन साहस के साथ कुशलतापूर्वक किये हैं. इसमें देवगढ़ अधिक शक्ति सम्पन्न गढ़ था. अत: राज्य का संचालन अधिक समय तक यहीं से हुआ.

देवगढ़ राज्य की स्थापना :-  गढ़ामंडला के मरावी राजघराना कमजोर हो जाने के बाद देवगढ़ में धुरवा गोंड राज्य का उदय हुआ. पनहालगढ़ के निकट भूरदेव का जन्म हुआ. इसके ठीक पैंतीसवी पीढ़ी में शरमशाह हुआ. इस समय यहाँ गौली, ग्वाल (अहीर) लोगों का राज्य था. शरमशाह के पांचवी पीढ़ी के उपरान्त बीरभान शाह हुआ. हरियागढ़ के धनसूर और रनसूर नामक ग्वाल राजाओं ने वीरभान शाह से देवगढ़ छीनकर ७० वर्ष तक राज्य किये. वीरभानशाह के पुत्र जाटवा ने धनसूर और रनसूर को मारकर अपने पुरखों की राज्य छीन लिए. इस प्रकार देवगढ़ राज्य की पुनर्स्थापना हुई. जाटवा ने दशहरे के ही दिन देवगढ़ राज्य को जीता था. इसलिए हमारा समाज इस पर्व को अपनी देवी देवताओं के लिए बली देकर वीरता दिवस के रूप में बड़े उल्लास के साथ मनाता है. जाटवा के शासनकाल से ही देवगढ़ राज्य की ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं. जाटवा के शासनकाल में देवगढ़ की पर्याप्त प्रगति हुई.

          धुरवा राजा जाटवा :- प्रथम (१५७० ई. से १६३४ ई.) :- छिंदवाड़ा से लगभग १० किलोमीटर नरसिंहपुर रोड़ पर राजा खोह नामक गांव में जाटवा का जन्म हुआ था. उसके आठ पुत्र थे. दलशाह (गोरखदास), केशरीशाह, दिनकरशाह, कोकशाह, धीरशाह, पोलशाह, दुर्गशाह और वीरशाह. आपके विषय में आईने अखबारी में अबुलफजल ने लिखा है कि-"खेरला के पूर्व दिशा में एक जमीदार रहता है. जिसका नाम जाटवा है, जो २,००० अश्वारोही,५०,००० हजार पैदल सैनिक और १०० से अधिक हाथियों का स्वामी है. सभी सैनिक गोंड जाति के हैं. इस प्रकार से जाटवा निःसंदेह एक शक्तिशाली राजा है.

           अकबरनामा (अनु. बेवरीज) जिल्द ३ प्र. ६३७ में उल्लेख किया गया है कि- "१६ वी. शताब्दी के अंतिम वर्षों में हरियागढ़ देवगढ़ में जाटवा एक कुशल शासक था."  जबकि १६१६ ई. में जहांगीर की एक आत्मकथा में जाटवा को 'जानवा' कहकर एक बड़ा जमीदार बताया है.

          जाटवा के शासनकाल में देवगढ़ राज्य की सीमा पूर्व में बैनगंगा नदी पश्चिम में वर्धा नदी, उत्तर में छपारा (बैनगंगा) और दक्षिण में चांदा राज्य तक फैली हुई थी. देवगढ़ राज्य की वार्षिक आय लगभग ९,०९,००० (नौ लाख नौ हजार ) थी. निराशी संशोधन मुक्तावली संस्करण ३ पृष्ठ २१४ के अनुसार-जाटवा ने सिक्के भी प्रचलित किये. उसके सिक्कों में "महाराजा" की उपाधि मिलती है. इससे पता चलता है की वह शक्ति और प्रभुत्व सम्पन्न था. जाटवा के व्दारा जारी किये गये दो सिक्के नागपुर संग्रहालय में उपलब्ध है.

          जाटवा के समय देवगढ़ राज्य में १५ प्रमुख गोंड जमीदार थे. इन सब में हर्रई जमीदारी प्रमुख थी. यहाँ के राजवंश के पास ७० पीढ़ियों की वंशावली है. इसी क्षेत्र में "पाताल कोट" है. यह पर्वतों से ३२ किलोमीटर घिरा है. इसमें लगभग १२ गांव बसे हैं. यहाँ राजाखोह नाम की गुफा भी है. 

          सी. यू. विल्स ने जाटवा का शासनकाल १५८० ई. १६२० ई. तक माना है. किन्तु इसके शासन की निश्चित तिथि नहीं मिलती है. अत: उसके समकालीन शासकों की तिथि के आधार पर ही शासन अवधि निर्धारित की जा सकती है. वह गढ़ा के मधुकरशाह के उतराधिकारी प्रेमशाह (१५८६-१६३४) का समकालीन हो सकता है.

          कोकशाह-प्रथम (१६३४-१६४४)- बादशाहनामा जिन्द I, भाग २ पृष्ठ २३०-३३ के अनुसार जाटवा की मृत्यु के बाद पुत्र कोकशाह को कोकसिंह, कुकिया तथा कोकिया भी कहा गया है. इसके शासनकाल में मुगल सेनापति खानदौरान ने नागपुर के किले को उड़ा देने का आदेश दिया. देवगढ़ राज्य के नागपुर किले पर तोफें आग उगलने लगी. ३-४ बुर्ज सुरंग से उड़ा दी गई. अंत में नागपूर का किला मुगलों के अधीन हो गया. उस समय कोकशाह देवगढ़ में थे. यह समाचार सुनकर वह भी नागपुर पहुच गये. मुगल सेनापीति से बात करके उसने १७५ हाथी और डेढ़ लाख रूपया देना स्वीकार कर लिया. इस प्रकार कोकशाह और सेनापति के बीच समझौता हो गया. नागपुर का किला पुनः कोक शाह को मिल गया.

          देवगढ़ राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. यहाँ के राजा विलासिता और शराबखोरी में डूबे रहने के करण भी राज्य की आर्थिक स्थिती नहीं सुधार पाये. मद्द और बहुविवाहों के कारण धुरवा गोंडी शासन खोखला होता जा रहा था और राजमहल में आपसी स्पर्धा और षड्यंत्र तेजी से चल रहे थे.

          केशरी शाह या जाटवा :- व्दितीय (१६४४-१६६०) मासिर डल उमरा जिल्द २ पृष्ठ ५८७-८८ के अनुसार कोकशाह के बाद पुत्र केशरी शाह देवगढ़ राज्य का उतराधिकारी हुआ. वह मद्यपान और विलांसता में समय व्यतीत  किया. राज्यकार्य में ध्यान नहीं देता था न कोई विकाशील योजना बनाए. इस प्रकार धुरवा राजा केशरीशाह ने देवगढ़ राज्य की उन्नति पर कोई ध्यान नहीं दिया. इसलिए वह समय पर लगान नहीं चुका पाता था. इसके शासनकाल में शहजादा औरंगजेब देवगढ़ पर आक्रमण किया था.

          कोकशाह व्दितीय :- ९१६०-१६८०) राजा केशरीशाह (जाटवा  व्दितीय) के बाद उसका पुत्र कोकशाह देवगढ़ राज्य की गद्दी पर बैठा. उसने २० वर्ष तक राज्य किया. इस समय दिल्ली में औरंगजेब राज्य कर रहा था. अपने ९वे वर्ष के शासनकाल में औरंगजेब ने अपने सेनापति दिलेरखान को कोकशाह व्दितीय के पास लगान की बकाया राशि की  वसूली करने को भेजा था लगान न देने की स्थिति में कोकशाह व्दितीय ने आत्मसमर्पण करके मुगल शासन के प्रति अपनी निष्ठा का परिचय दिया. इस प्रकार दिलेरखान ने १५ लाख रु. वसूल करने में सफलता प्राप्त की.

          सरकार, हिस्ट्री आफ औरंगजेब जिल्द ५. पृष्ठ  न. ५ पादटिप्पणी २ में उल्लेख किया गया है. कि "१६६९ ई. में कोकशाह व्दितीय के व्दारा लगान नहीं चुकाने के कारण दिलेरखान ने पुन: देवगढ़ पर आक्रमण कर दिया. यहाँ का शासन अप्रत्यक्ष रूप से मुगलों व्दारा संचालन होने लगा. कोकशाह ने अपना धर्म छोड़कर स्लाम धर्म अपना लिया और नाम "इस्लाम यारखान" रख लिया. इस प्रकार यह एक कमजोर शासक शाबित हुआ. 

          दींदार या दीनदारशाह :- कोकशाह व्दितीय की १७८० ई. में मृत्यु हो जाने के बाद बख्तबुलंद का भाई दींदार ने देवगढ़ की सत्ता संभाली. यह ६ वर्ष की शासन कर पाया था. की मार्च १६८६ ई. में औरंगजेब ने बख्तबुलंद को देवगढ़ की सत्ता सौप दी. कुछ समय के बाद १६९१ ई. में पुन: दींदार सत्तासीन हुआ और १६९५ ई. तक राज्य किया. राजा बख्तबुलंद-(१६८६-१३९१ई.एवं १६९५-१७०६ ई.) 

          कोकशाह व्दितीय के मरने के बाद उसके पुत्रों में राजगद्दी के लिए झगड़े होने लगे थे. उसके पांच पुत्र और चार भतीजे थे. बख्तबुलंद का असली नाम बख्तशाह था. जब वह देवगढ़ की गद्दी पर बैठा तो उसे दींदार ने हटा दिया. तब बख्तबुलंद औरंगजेब से मदद मांगने दिल्ली गया. औरंगजेब ने मुसलमान धर्म मानने पर मदद का वचन दिया. ऐसी विषम परिस्तिथि में बख्तबुलंद ने खानपान व्यवहार तो मंजूर कर लिया परन्तु बेटी व्यवहार मंजूर नहीं किया.

          औरंगजेब ने उसका नाम बख्तबुलंद रखा और समझौते से अनुसार देवगढ़ का राजा (१६८६-१६९१) बना दिया.

          गढ़ा राज्य में नरेंद्रशाह (१६८७-१७३१ई.) राज्य कर रहा था. इस समय देवगढ़ में बख्तबुलंद का शासन था. बख्तबुलंद देवगढ़ राज्य के इतिहास का सबसे प्रबल शासक था. इसी समय नरेंद्रशाह ने अपनी बड़ी बहन मानकुंवरी का विवाह बख्तबुलंद से करके दोनों राज्यों के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध और भी सुदृढ़ कर दिए. 

          राजा बख्तबुलंद के शासन काल में कृषि व्यपार और कारीगरी में विशेष उनति हुई. योगेन्द्रनाथ शील मध्यप्रदेश और बरार के इतिहास पृष्ठ  ११७-१८ में लिखते हैं कि- इस गोंडवाने राज्य में बसने के लिए लोग लालायित हुए. इस राजा ने मराठों को शरण दिया.

          उसने चांदा और मंडला राज्य का बहुत सा भाग अपने राज्य में मिला लिया था. मंडला के राजा जिसकी राजधानी चौरागढ़ में थी सिवनी, कटंगी, छपरा और ड़ोंगताल छीन लिया था. इस पर रामसिंह जो मंडला के राजा के संबंधी थे को राज्य करने का अधिकार दे दिया. रामसिंह ने अपना सदर मुकाम छपरा को बनाया था. उन्होंने यहाँ एक दुर्ग बनवाया था जिसके खंडहर आज भी विधमान है.

          राजा बख्तबुलंद ने देवगढ़ राज्य का खूब विस्तार किया. उसके राज्य में नागपुर, सिवनी, (डोंगरताल) भंडारा (प्रतापगढ़), होशंगाबाद (सोहागपुर) और बालाघाट जिले के अधिकांश भाग एवं छिंदवाड़ा और बैतूल वर्तमान जिले सामिल थे.

          जून १६९१ ई. में औरंगजेब ने बख्तबुलंद को बंदी बनाकर दींदार को सत्ता सौप दिया. दींदार ने १६९५ ई. तक राज्य किया. इसके बाद पुन: (१६९५-१७०६ई. ) बख्तबुलंद ने राज्य किया. उसने देवगढ़ में कई सुंदर इमारतें बनवाई. भंडारा जिले के प्रतापगढ़, नागपुर जिले के भिवगढ़ भिवपुर, जलालखेड़ा, पार सिवनी, पाटन सावंगी, सावनेर, बालाघाट जिले के लांजी, सोनहार, हट्टा तथा देवगढ़ के समीप सौंसर में किले बनवाए नागपुर और पाटन सावंगी नगर बसाए.

          बख्तबुलंद के पांच पुत्र थे. चाँदसुल्तान, महिपतशाह और युशुफ शाह नाम के तीन पुत्रों ने विवाहित  गोंडरानी से जन्म लिया था. शेष दो पुत्र अली से बलीशाह मुसलमान स्त्रियों से पैदा हुए थे. इसके वंशज आज भी नागपुर में निवास कर रहें हैं.

          अपने पूर्ववर्ती शासकों की तुलना में बख्तबुलंद अधिक योग्य और श्रेष्ठ शासक था. उसने अपनी भुजाओं के बल पर देवगढ़ के राज्य का विस्तार किया, जिस तरह गढ़ा राज्य का विस्तार संग्रामशाह ने किया था.

          कड़ा नागपुर सेटलमेंट रिपोर्ट कडिका २० के अनुसार "उसके शासनकाल में प्रदेश की वास्तविक उन्नति हुई. बख्तबुलंद शाह का स्वर्गवास १७०६ में हुआ."

        चांदसुल्तान :- (१७०६-१७३९ई.) देवगढ़ राज्य के अधिक शक्तिशाली राजा बख्तबुलंद के बाद उसके पुत्र चाँदसुल्तान राज गद्दी पर बैठा. इसका संबंध दिल्ली से था. चाँदसुल्तान ने अपनी राज्य की अवनती को देखकर देवगढ़ राजधानी हटाकर नागपुर में स्थापित कर लिया. चाँदसुल्तान ने नागपुर के चारों ओर पांच किलोमीटर का परकोट बनवाया इसके शासनकाल के दस्तावेज नागपुर के राज्य परिवार के पास है. जिसमे आमनेर और मनसबदारी जागीरदारी का उल्लेख है.

          भण्डारा और नागपुर के भू-भाग पर चाँदसुल्तान का अधिपत्य था. इसी समय बरार में भोसले अपने पैर जमा चुके थे. बरार भी देवगढ़ के सीमा से लगा हुआ था. इसके शासन काल में राज्य की आय ११,३८,२३३ रूपये थे. राज्य अनेक भागों में बटा हुआ था. परगने के मुख्या ठाकुर कहलाता था. ठाकुर के अधीन गांवों में पटेल कार्य करते थे. इस राजा का स्वर्गवास १७३९ ई. में हुआ. इसके बाद भाई बलिशाह ने (१७३९-१७४६ई.) में देवगढ़ के तख्त पर अपना कब्जा कर लिया. बलिशाह चाँदसुल्तान का अवैध पुत्र था चाँदसुल्तान की विधवा रानी रतनकुंवर के दो पुत्र थे बुढानशाह और अकबरशाह. रानी ने नागपुर के रघु से अपने पुत्रों की अधिकार की रक्षा के लिए अनुरोध किया. छिंदवाड़ा जिला गजेटियर १९०७ पृष्ठ ३० के अनुसार विधवा रानी के अनुरोध स्वीकार करते हुए रघु ने बलीशाह को पद मुक्त कर दोनों पुत्र बुढानशाह और अकबरशाह की (१७४०-१७४३) संयुक्त शासन करने हेतु देवगढ़ राज्य की गद्दी सौप दी इस कार्य के लिए रघु को  बहुत सा धन इनाम के रूप में दिया गया. कुछ दिन बाद दोनों भाइयों में मतभेद हो गया. बुढानशाह ने रघु की और अकबरशाह ने निजाम की मदद ली. रघु के लोगों ने धोखे से अखबरशाह को विष देकर मार डाले. बुढानशाह नाम मात्र का उतराधिकारी घोषित किया गया. इसी ख़ुशी में बुढानशाह रघु को अपने राज्य का आधा हिस्सा दे दिया. इस प्रकार वास्तविक अधिकार रघुजी भोसले के हाथ में आ गया. बुढानशाह एक कटपुतली की तरह राज्य करते रहे जिसे रघू मनमानी ढंग से नचाता रहा. इस तरह १७४३ ई. में देवगढ़ रघुजी भोसला राज्य का एक अंग बन गया कुछ समय बाद राज्य के आधा भाग को भी रघु को सौपकर स्वयं किले में रहने लगा देवगढ़ के धुरवा राज घराना शासन सत्ता समाप्त हो गया.
                                                                                                              गोंडवाना दर्शन 

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

गोंडवाना जगत में विभाजक और एकात्मक तत्व एक विचार प्रवाह सत्य की ओर

          भावुक और जानकार व्यक्तियों का विश्वास है कि आज के विश्व के लिए किसी सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक पुनर्गठन से भी अधिक गहरी एवं मूलभूत आवश्यकताएं हैं. आत्मिक पुनर्जागरण की खोई हुई आस्था को पुनः प्राप्त करने की. जब सभ्यता में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तब वह विखंडित होने लगती है. इससे उत्पन्न होने वाली निराशा के मध्य मानवप्रजा वर्तमान समाज व्यवस्था की अपूर्णता को स्वीकार करने और नए सिरे से उसकी नीव डालने एअथा उसके आधार को बदलने की ओर उन्मुख होता है. इसके कारण आत्मान्वेषण के महान आंदोलनों का जन्म होता है. ऐसी ही एक अदभुत कड़ी के रूप में आज गोंडवाना जगत में पुनर्जागरण की दिव्य-शक्ति के खोजी यात्रा-पथ में विश्व प्रसिद्ध इतिहासज्ञ की तथ्यपूर्ण, तर्क संगत, ज्ञानवर्धक, सूत्रात्मक वाक्यांशों की ओर, सगा जगत का ध्यानाकर्षण करना ही हमारा मुख्य उद्देश्य होगा. ताकि हम हमारे वास्तविक माटी से जुड़े हुए उन महान व्यक्तियों के बलिदान को नजदीक से पहचान सकें, जिन्होंने जय-सेवा शक्ति से गोंडवाना-जगत की एक अलग पहचान बनाई थी और है. विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार सर मैक्समूलर महोदय ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सन १८८२ में अपने भाषण में कहा था कि- "हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं ? केवल यह जानने के लिए कि हमारे पूर्वज कौन थे ? उनके धार्मिक आचार विचार और विश्वास क्या थे ?" इस सूत्रात्मक वाक्यांश के पृष्ठभूमि में यदि हम आज गोंडवाना जगत के पुनर्जागरण के लिए बातें करें, तो सबसे पहले हमें अपने भूतकाल और वर्तमान काल को झांककर स्पष्ट देखना होगा और पुनर्विचार करने के लिए हमें चिंतन और मनन की आज अधिक आवश्यकता होगी और है.

          मैक्समूलर महोदय के इस मौलिक सूत्रात्मक वाक्यांश में समाहित कथावस्तु की एक सामान्य परिभाषा को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज भारत के प्राचीन कालातीत पर लिखा इतिहास आर्य, क्षत्रीय और ब्राम्हणों का इतिहास बनाकर लिखा गया है. उसके बाद राजपूतों का इतिहास, वह भी उच्च वर्ग का इतिहास ही कहा जा सकता है. तदोपरांत मुस्लिम सम्राटों, नवाबों और अंत में अंग्रेज लार्डों का इतिहास लिखा गया. परन्तु भारत के मूलनिवासियों का, जिनकी जनसंख्या का ८५% है, (१) का इतिहास लिखा गया ? इस प्रश्न-चिन्ह के साथ अत्यधिक महत्वपूर्ण बात “भारत के महापंजीयक के कार्यालय अनुसार ३१ दिसंबर १९८८ को देश की जनसंख्या ८० करोड़ से अधिक थी. (२) की जानकारी जिसमे दर्शाई गई है, जिसमे निसंदेह अब पहले से भी अधिक हमारी जनसंख्या आज देश में होगी.” के इस तथ्य को भी हमें याद रखना होगा. सगा-जगत के अंतः सूत्र में व्याप्त हमारी यह मूल भावना कि हम आज अपने इतिहास की एक निर्णायक घड़ी पर आ पहुंचे हैं. इसलिए हमें हमारी पोषक सोच तत्व में ऐसा चुनाव कर लेना होगा, जो सदियों की घटनाओं की गति एवं दिशा को निश्चित रूप से सत्य मार्ग का एक दिव्य दर्शन हमें प्रदान कर सके, जो हमारे युग के लिए कुछ नवीन नहीं होगा वरन प्राचीनतम और नवीनतम चिंतन प्रयासों के बीच से हमें एक ऐसी अटूट आस्था, अटल विश्वास, युग सत्य और दिव्य ज्ञान के साथ ही दिव्य ज्योति उपलब्ध हो सके, जो हमारी कमजोरियों और हींन भावनाओं की अंधकार को दूर कर हमें एक श्रेष्ठ व्यक्ति बना सके. अन्धकार को लाठी से कितना ही पीटें, अन्धकार दूर नहीं होगा, परन्तु हम एक छोटा सा दीपक जला दें तो अवश्य अन्धकार दूर होगा. इसी सोच की मूमि से प्रेरित यह एक विचार-प्रवाह होगा जो हमारा छोटा सा प्रयास होगा. ज्ञान दीप को हमें सदैव ही जलाये रखना होगा, तभी सगा-जगत में आज व्याप्त भयावहः विभाजक घटा छट सकेगा. छटने की गति हमारी पुनर्जागरण की गति पर निर्भर होगी और है.

          गोंडवाना वासी के इस खोजी इतिहास के लिये हमें आज गोंडवाना भूखण्ड में बिखरे हुए द्रविणी गोंडी भाषिक मूल निवसियों से संबंधित लोक-साहित्य में इतिहास के मौलिक सूत्रात्मक तथ्य कैसे और कब ? की प्रामाणिक दस्तावेज को, संकलित करना अधिक आवश्यक हो गया है. भारत में गोंडवाना-जगत का प्रादुर्भाव और हमारी सगा-समाजिक संरचना में समाहित प्रकृति सादृश्य दिव्य-शक्ति, गोंडी भाषा जगत, गोंडी दर्शन जगत, गोंडी संस्कृति जगत, गोंडी कला जगत, गोंडी लोकसाहित्य जगत, गोंडी भूखण्ड जगत इत्यादि मौलिक विषय वस्तुओं के तथ्यों से सृजनित हमारा यह खोजी गोंडवाना इतिहास अपने तथ्यात्मक कथावस्तु और दिव्य-शक्ति के सत्यज्ञान की चेतना-शक्ति को साकार रूप देने के लिये आज विभिन्न विषयों के विव्दानो की द्स्तावेजिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी, इसलिए भूगर्भ शास्त्रियों, मानव शास्त्रियों, समाज शास्त्रियों, भाषाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासविदों के विभिन्न तर्क कसौटी, के भट्टी में तपे तथ्यात्मक चेतना-शक्ति के सटीक प्रामाणिक कथ्य से दमकते निखरे प्रमाणों को, जो दिव्य सत्य की दमक से चढ़े आवरण को, ऐसी महत्वपूर्ण, तथ्यपूर्ण एवं प्रामाणित दस्तावेजों को ही उपयुक्त स्थानों में समावेस करने का हमे पूर्ण प्रयास करना होगा, तभी हम सत्य की उस दिव्य-शक्ति के ज्ञान-दीप से गोंडवाना-जगत में सोती-चेतना को झकझोरने के लिऐ निश्चित रूप से हम कुछ दृढ़-पग उठा सकेंगें. इसी सोच भूमि से प्रेरित होकर यह कृमिक संकलित की गई महत्वपूर्ण तथ्य है. यदि हमारी पुनर्जागरण के उद्देश्य-पथ में थोड़ा सा भी योगदान सगा-जगत को कर सका, तो यह हमारा विनम्र प्रयास कार्य सफलीभूत हो सकेगा, परन्तु हमें एक बात सदैव याद रखना होगा कि सत्य इतना कड़वा भी होता है कि वह उजागर करने की बहुत कम इजाजत देता है और जिन्हें दे देता है, वे उसी के घूंट पीकर मरण कर लेते हैं, लेकिन उनका मरना ही एक मृत-समाज की एक संजीवनी होती है.

          गोंडवाना-दर्शन समय चक्र है जो गोंडवाना जगत में व्याप्त आज की विसंगतियों और हमारी हीन भावनाओं अर्थात अज्ञानताओं का सर्वनाश करने के लिए चल पड़ा है. गोंडवाना  सगा जगत की अंतरात्मा में गुरु कृपा से प्रज्वलित यह पुरातन दिव्य ज्ञान शक्ति, जो मानवीय गुणों से भरपूर, तथ्यात्मक, पोषक यह सत्यज्ञान दीप की इस दिव्य चेतना शक्ति को सगा जगत पुनः जन मानस के मनो में आत्मीय पुनर्जागरण के शक्ति रूप में पुनरोत्थान करने के लिए, आज हमें अनवरत प्रयास करना होगा, तभी हम हमारे अतीत और वर्तमान के लिए जिन मूल्यों को हम अब तक स्वीकार करते रहे और हैं, उन्हीं सामाजिक मूल्यों को आज हम विवेक और तर्क की कसोटी पर निष्पक्ष होकर कसें, तभी हम हमारे समाजिक सगा-जगत के अधिक गहराई तक अर्थात मूल-भाव में पहुंच सकेंगे, जो सत्यज्ञान की ओर हमारे बढ़ते कदम का श्रीगणेश होगा. गोंडवाना दर्शन पत्रिका में प्रकाशित तथ्यपूर्ण सामग्री, न केवल वैज्ञानिक खोज प्रमाणों के तर्क-संगत संकलित तथ्यों की दस्तावेजी जानकारी है, वरन यह हमारे बिखरे लोकसाहित्य की अनवरत तलाश-पथ भी होगा. इसलिए सदैव चिर-परिचित अपनी समाजिक मूल्यों की अलग पहचान को पुनर्जीवित करके उसे अनवरत बनाए रखना ही हमारे लिये आवश्यक पोषक तत्व होगा. गोंडवाना के विभिन्न हिस्सा में लुके-छिपे, दबे-गड़े इतिहास की तलाश ..... हमारी अपनी वैज्ञानिक विरासत और वैज्ञानिक संस्कृति की तलाश .... कितना विशाल आयोजन है, इस तलाश के पीछे ...... और कितना सफल हो गया है, यह आयोजन हमारे सगा-जगत के लिए, यह हमारा अंतरंग आंकलन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न चिन्ह होगा, उस प्रश्नोत्तर की तलाश हमे होगी. गोंडवाना-दर्शन ऐसे ही युवा-मनों की तलाश में संलग्न है, जो गोंडवाना के विभिन्न हिस्सों और इतिहास के पृष्ठों में गोंडवाना की अपनी छाप को तलाशने में रोमांचक अभियान पर निकल सके, परन्तु उनका इरादा तो सत्य की सर्वोच्च ज्ञान-शक्ति, की प्राप्ति है. गोंडवाना जगत को अब जानने और समझने का अनुपम समयावसर के लिए आज योग चक्र बनता हुआ दृष्टिगोचर होता है, जिसके मिलन केन्द्र बिंदु में समाहित तत्वज्ञान, वैज्ञानिक सोच की परंपरा में कितनी पुरानी हैं ? ...... कि विज्ञान क्या मात्र पश्चिम की देन है .........? मूल तथ्यों को विवेचनात्मक विचारधारा, में चिंतन और मनन के माध्यम से सृजनित पुनर्विचार की शक्ति ही हमारी अज्ञानता को दूर कर हमे पुनर्जागरण के मूलमंत्र की एकात्मक शक्ति के रूप में सत्य मार्ग का दिव्य-दर्शन प्रदान करेगी ऐसी हमारी चिंतन प्रवाह है.

          यह वह महान भूखण्ड है, जहां जन्मे सिंह सपूतों ने अपने अदम्य साहस, शौर्य पराक्रम, तपस्या, बलिदानों के मानव-सेवा के साथ ही जंगम और स्थावर जीव-सेवा की अदभुत अलख जगाई और उसी सत्यज्ञान की जय सेवा पथ परम्परा में लौह-लाडली ललनाओं की हिस्सेदारी भी कहीं कम नहीं है. उनके जौहर और उत्सर्ग की अमर-गाथाएँ आज भी गोंडवाना जगत में, उनके बिखरे-उत्सर्ग की सोंधी मिट्टी से रचे सने, मन-मोहक, तथ्य, कथ्य के चंहुमुखी मानवीय सुगंध से सृजनित जय-सेवा दिव्य शक्ति जन मानस के मन को प्रेरित कर, उव्देलित करती रहती है और युग युगों तक करती रहेगी. हमारे इस चिर गौरवान्वित खोजी इतिहास की तलाश कड़ी में, यह हमारा विनम्र कार्य केवल संकलन में कृमिक कार्य में कथावस्तु को जोड़ने वाली एक कड़ी मात्र ही प्रयास होगा. गोंडवाना की समृद्धि, गोंडवाना की भौतिकी एवं भौमिकी इतिहास, गोंडवाना की समृद्ध पुरातत्व गोंडवाना जगत का महामानव, गोंडवाना धर्म जगत (कोया पुनेम जगत) गोंडवाना का गोइंदारी वाणी खोज वाली कुल देवताएं गोंडवाना की संगीतिक उपलब्धियां, गोंडवाना की गौरव गाथा इत्यादि हमारी मौलिक विचार प्रवाह है. गोंडवाना जगत को यदि खोजी विचार प्रवाह हमारे इतिहास सृजन में कुछ योगदान कर सका, या सत्य तथ्यों को उजागर करने के गौरव पथ में, कुछ शोभा वृद्धि कर सका, तो हमारा यह प्रयास सफल हो सकेगा. प्रमुख विषय वस्तुओं के बिभिन्न शीर्षकों पर लिखित और आज तक प्रकाशित महत्वपूर्ण तथ्यों पर हम पुनर्विचार करेंगें, तभी हमे सत्य मार्ग का पथ दृष्टि गोचर हो सकेगा. कहने का हमारा तात्पर्य है कि ज्ञान से ही हमे सत्यमार्ग मिल सकेगा और आत्मिक पुनर्जागरण से ही हमे सत्यज्ञान मिल सकेगा, तभी हम अपनी खोई हुई आस्था विश्वास, आत्मबल के दिव्यज्ञान को पुनः प्राप्त कर सकेगें. ऐसी हमारी सोच धारा है. इसलिए गोंडवाना जगत में हमारा विनम्र निवेदन होगा की अपना स्पष्ट दिशा निर्देश निसंकोच हमे सत्य पथ के लिये देने का कष्ट करेंगें. हम बहुत उत्सुकता से गोंडवाना जगत के खोजी सुझाव आशीर्वाद की बाट जोह रहे हैं, इस आस में कि आपके खोजी तलाश फल का अनुपम सहयोग प्रदान में अनुग्रहीत करेगा.

          गोंडवाना भूखण्ड में आदिकाल से गोंडवाना मानव जगत अर्थात कोया वंशीय सगा जगत के हमारे जन मानस के मनों में अर्थात हमारे मानवात्माओं में बिखरे लोक कथासरों, लोक गीतों, लोक जीवन में आज समाहित विभिन्न तथ्य और कथ्य सामग्री जो हमे आज उपलब्ध होगा, वह हमारा पुरातन समाजिक संरचना में लोकतंत्र व्यवस्था की देंन रही और है. उस महान शक्ति को हमे आज अनवरत बनाये रखना ही होगा. तभी हम हमारे गोंडवाना जगत के उपयुक्त और सही छबि की छाप सहित अलग पहचान के साथ हम आज जीवित रह सकेंगे. इसी मूल भावना से प्रेरित होकर, हम हमारे गुरु कृपा से प्राप्त गोंडवाना की दिव्य शक्ति स्थावर और जंगम जीव जगत के लिये लोंगो के अमर संदेश में निर्दिष्ट सेवाभाव जय सेवा प्रकृति सेवा मानव सेवा की महान सेवा शक्ति के संदेश के साथ भी हम न्याय कर सकेंगे. यही सोच प्रवाह हमे सबसे पहले हमारे धरती जगत (मात्र शक्ति के रूप में वनस्पति जगत (पितृ शक्ति के रूप में अर्थात जीवन शक्ति) और जीव जगत (फड़ापेन की शक्ति के रूप में) पुर्वांकित महान दिव्य शक्तियों के लये कृतज्ञता प्रगट करने के पुरातन पद्धति को हम आज भूलें नहीं, क्योंकि हमारे गोंडवाना जगत के धर्म प्रदर्शन में आदि धर्म गुरु पारी कुपार लिंगों ने कोया पुनेम दर्शन अर्थात गोंडवाना धर्म दर्शन में, प्रकृति सादृश्य क्रिया प्रक्रिया की सर्वोच्च दिव्य ज्ञान के अटूट विश्वास को कोया जगत अर्थात गोंडवाना जगत में आदि काल से हमारे आंतरिक मनों में एक आश्चर्य चकित दिव्य चेतना दीप को प्रज्वलित की है, जो चिरंतन सत्यज्ञान, सत्यमार्ग प्रकृति सादृश्य और विज्ञान सम्मत भी है. गोंडवाना जगत सदैव इसके उपर रहे और है, केवल आज हमे हमारे प्राचीन मूल्यों की सामाजिक मान्यताओं के मूल भाव को आज के वैज्ञानिक परिवेश में तुलनात्मक अध्ययन कर पुनर्विचार करना ही हमारे लिये बहुत आवश्यक और उपयुक्त तथ्य होगा. क्योंकि वही समन्वित निष्कर्ष तथ्य ही हमारी मानसिकता की सोच पथ की स्पष्ट दिशाबोध कर सकेगा. इसलिए गोंडवाना भूखण्ड की भौतिकी संरचना से संबंधित खोजी कथा वस्तु की इतिहास में सोभा वृद्धि के लिये सबसे पहले हमारी माटी से जुड़े धरती माता की वैज्ञानिक परिवेश में खोजी कथा से हम शुभारंभ करते हैं.

          धूल के बादल से महाद्वीपों और समुद्रों का ग्रह यह समझा जाता है कि पृथ्वी अपने अस्तित्व में सौर-प्रणाली के एक भाग के रूप में बनी. यह अपने अस्तित्व में किस प्रकार आई, निर्माण के समय इसका स्वरूप क्या था ? और इसकी उपरी पपड़ी आवरण और बीच के भाग के अपने वर्तमान स्वरूप में इसका विकास किस प्रकार हुआ इन बातों के बारे में वैज्ञानिक एक मत नहीं हैं. संभवतः पृथ्वी गैस और धूल के चक्कर लगाते हुए बादल से बनी है. अपनी प्रारंभिक आस्था में पृथ्वी सिलिकन यौगिकों, लोहे, मैग्नेशियम आक्साइडों तथा सभी प्राकृतिक रासायनिक तत्वों की थोड़ी थोड़ी मात्रा में एक पिंड के रूप में बनी. ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी आरंभ में ठंडी थी. निश्चित ही यह गरम नहीं रही होगी. इसके बहुत से उड़ जाने वाले तत्व, जैसे पारा वर्तमान में समान मात्रा में अधिक दिन नहीं टिक सके. अपने निर्माण के समय धरती गरम होना शुरू हुई. गर्मी तीन स्त्रोतों में प्राप्त हुई. पहला स्त्रोत वे परमाणु थे जो स्थिर स्थिति में आ गई थी. घूमते रहने की उनकी ऊर्जा ऊष्मा की ऊर्जा में बदल गई. इस गर्मी में से कुछ गर्मी पृथ्वी में ही बची रही. दूसरा स्त्रोत है इसका आंतरिक भाग पृथ्वी के विकसित होने से इसका अंदरूनी भाग सतह पर जमने वाली सामग्री के वजन से कड़ा हो गया. इस प्रकार कड़क होने से गर्मी पैदा हुई, जिसका अधिकांश भाग पृथ्वी के बाहर जमा होने वाली सामग्री के कारण अन्दर ही रह गया. इसके आलावा पृथ्वी में प्रवेश करने वाले यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम जैसे रेडियों धर्मी पदार्थों के पृथ्वी में प्रविष्ट होने से उनके नष्ट होंने पर गर्मी पैदा हुई गर्मी के पहले दो स्त्रोत पृथ्वी के पूर्णतः बन जाने के पश्चात समाप्त हो गये किन्तु रेडियो धर्मिता की गर्मी आज भी बराबर बन रही है, चूँकि चट्टानों में से गर्मी आसानी से बाहर नही निकल पाती इसलिए धरती की सतह के नीचे पैदा होने वाली गर्मी बहुत धीरे-धीरे बाहर निकलती है.

          प्रकृति में प्राप्त मूलतत्व हाइड्रोजन (परमाणु संख्या १) लेकर सबसे भारी मूल तत्व यूरेनियम (परमाणु संख्या ९२) तक. प्लूटोनियम नामक मूलतत्व (परमाणु संख्या ९४) यूरेनियम और थोरियम के अयस्कों में सूक्ष्म मात्रा में मिलता प्रकृति की इन्हीं बहुमूल्य ९२ मूलतत्वों की भौतिकी क्रिया प्रक्रिया से सृजनित, इस भौतिक धरती जगत के निर्माणावधि के काल चक्र में हमे खोजी महत्वपूर्ण तथ्यात्मक वैज्ञानिक कथावस्तु आज उपलब्ध हुआ है उसमें प्रकृति के मूलतत्व का धरती निर्माण के भौतिकी विकासावधि में योगदान किस स्थिति में, किस रूप में, किस प्रकार मिला यह प्रश्नोत्तर हमारे लिए अभी तक रहस्य बना रहा, उसी चिंतन प्रवाह में हमारे पुर्वांकित खोजी वैज्ञानिक कथावस्तु को गोंडवाना जगत के लिए आज प्रस्तुत किये हैं, यदि वह हमारे सगा जगत के चिंतन धारा में आज कुछ मदद कर सका, तो हमे बड़ी खुशी अनुभव होगी. गोंडवाना भूखण्ड में आदिकाल से गोंडवाना जगत में चिरपरिचित सामाजिक प्रथा या मान्यता के मूलभाव में हमारे कोया वंशीय मानव जगत अर्थात कोयतुर सगाजगत के अंतरात्मा में गोंडी कुल देवताओं ५ के प्रति अटूट विश्वास का सुदृढ़सेतु कैसे सृजनित हुआ यह प्रश्नोतर भी हमारे सामाजिक-जीवन में आज रहस्य बना हुआ है. उसकी पुष्टि के लिए आज हमे लोक जीवन में सदैव प्रवाहित हमारी मात्र-भाषा की शक्ति से सृजनित बिखरे लोक-साहित्य से निःसन्देह हो सकती है, इसलिए आज अधिक आवश्कता है इस चिंतन-प्रवाह से पुनर्विचार करने की. उसके तथ्यात्मक इतिहास कथावस्तु क्या है ? खोजना और मौलिक तथ्यों में विवेचनात्मक अध्ययन के लिए, आज हमे हमारे धर्म दर्शन के मूल तथ्यों का भी स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी आवश्यक है. गोंडवाना धर्म दर्शन के संस्थापक महामानव, आदि धर्मगुरु पहान्दी पारी कुपार लिंगों के मानव कर्तव्य संदेश में निर्दिष्ट दर्शन तथ्यों का कथावस्तु क्या है ? वह और न कुछ होकर मोटे तौर पर केवल प्रकृति की सर्वोच्च दिव्य-शक्ति से सृजनित, सत्यज्ञान के रहस्यात्मक तथ्यों की केवल महत्वपूर्ण दस्तावेजीक जानकारी है, का दिव्य ज्ञान शक्ति हमे कैसे मिला ? यह प्रश्न चिन्ह गोंडवाना जगत को अवश्य आज उठित होगा, क्योंकि विभिन्न धर्मों के भ्रमजाल से भ्रमित होकर, आज हम गोंडवाना धर्म जगत के सत्यज्ञान से अनभिज्ञ है, यही आज हमारी कमजोरी हीन भावना और अज्ञानता है, जो हमारे आत्मबल में गतिरोध उत्पन्न करती है. विवादास्पद तथ्यों के लिये शोध और स्पष्ट हमारा चिंतन-प्रवाह विवेचनात्मक प्रक्रिया का ही दिशा-बोध होगा. गोंडवाना-जगत की अंतरात्मा में दिव्य सत्यज्ञान की ज्योति की आदिकाल से ही गुरु की परंपरा ने प्रज्वलित किया और है, तभी तो इतिहास और धर्म के अनेक कठिनाइयों के बाद भी, आज हमारा गोंडवाना-दर्शन विद्दमान है. प्रकृति सादृश्य तत्वज्ञान पर आधारित गोंडी-दर्शन को स्थापना आदिकाल में धर्म गुरु लिंगों ने की और सगा सामाजिक संरचना में उसी दर्शन की मान्यताओं के मूल्यों को व्यवहारिक रूप से प्रदान कर सामाजीकरण किया, इसलिए आज भी हमे हमारे समाज में विधिवत विद्दमान दृष्टिगोचर होता है. वैज्ञानिक परिवेश और हमारे दर्शन परिवेश के मौलिक तथ्यों पर विवेचनात्मक अध्ययन ही, गोंडवाना-जगत को अपने दर्शन के वास्तविक महत्व से, आज पुनः परिचित करा सकेगा.

          दोनों तथ्यों में आज समन्वित चिंतन-प्रवाह की हम, अधिक आवश्यकता महसूस करते हैं, ताकि हम इसमें कितनी समानता है, इस पर आज सोचने समझने और बिचारने का प्रमुख दायित्व गोंडवाना-जगत पर होगी, क्योंकि आज हमे यह स्पष्ट जानना और समझना अधिक आवश्यक हो गया है, कि गोंडवाना-जगत में वैज्ञानिक-चिंतन की परंपरा कितनी पुरानी है ? कि विज्ञान क्या मात्र वर्तमान-युग की देन है ? संदर्भित कथावस्तु गोंडी विचारक, मूर्धन्य गोंडीविद, प्रसिद्ध गोंडी साहित्यकार को विज्ञान-सम्मत, तर्क-संगत, तथ्य पूर्ण और महत्वपूर्ण गद्यांशों का हम अग्रिम पृष्ठों में उल्लेख करेंगें. गोंडवाना-जगत को विवेक और तर्क की कसौटी पर कसेंगें, तभी हम स्पष्ट मूल्यांकन कर, समझ सकेंगें.

          कली कंकाली अर्थात जंगो रायतार माता के आश्रम के बारह पुत्र कालांतर में कोया पुनेम के आदि धर्म गुरु पहांदीपारी कुपार लिंगों के शिष्य बने. उनका देव सगा गोत्र विभाजन की प्रक्रिया ऐसा रहा- सावरी (सेमर) वृक्ष के पत्तियों के गुट समूहानुसार और सूर्य माला के ग्रहों की रचनाधार पर क्रमशः उन्दाम, चिन्दाम, कोन्दाम, नाल्वेन, सैवेन, सार्वेन, येर्वेन, अर्वेन, नर्वेन, पदवेन, पार्वूद और पार्र्ड  किया. प्रथम सात देव-सगा धारकों में सात सौ (७००) कुल गोत्र नाम है, कोआकाशी, शेंदरी, जामूनी, नीला, हरा, पीला, और लाल रंग का वस्त्र दिया और शेष पांच सगाओं (भूमक शाखा सगा) के केवल पचास (५०) कुल गोत्र नाम है, को सूर्य प्रकाशी (पुरवा तिरेपी) अर्थात सफेद रंग का वस्त्र दिया. अपने सभी शिष्यों को धर्म गुरु पारी कुपार लिंगों ने सगा-गोंगो बाना से सुसज्जित कर गोंएन्दाडी (गोंएंडी, गोंडी) भाषा में कोया पुनेम ज्ञान की दिव्य ज्योति दी. वे ही मूल मानव-समाज कालांतर में कोयावंशीय सगा-जगत के कुल-देवताएं अर्थात मूल पुरुष कहलाये. वंशोत्पत्ति के लिए स्त्री सत्व भी आवश्यक तत्व है, जो विज्ञान सम्मत महत्वपूर्ण ज्ञान तथ्य है, इसलिए कोयतूर-जगत में बारह कुल-देवियाँ अर्थात मूल स्त्री सत्व को भी कुल-देवता ही कहा गया, यही कुल देवी देवताएं ही आज कोयतूर-जगत में व्याप्त मूल चौबीस कुल-देवताओं की बहुप्रशंसित तथ्यपूर्ण संख्या रहा और है. कोयावंशीय मानव जगत में, जब कोया-पुनेमी प्रचार-प्रसार का कार्य सम्पन्न हो चुका, इसके अलावा सगा-संबंध प्रस्थापित प्रक्रिया में कठिनाईयां उत्पन्न होने लगी तब कोयतूर जगत में व्दितीय पुनेम मुठवाशय लिंगों (रावेण पोन्याल) ने कालांतर में बारह मूलसगा देवी (जंगो रायतार माता शाखा के एक, दो और तीन देव. आदि धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के चार, पांच, छ:, सात देव. इन सात सगा देवों के भुमक शाखा के आठ, नौ, दस, ग्यारह और बारह देव) को सामाजिक और धार्मिक दर्शन में सगा समायोजन की विलीनीकरण के महत्वपूर्ण प्रक्रिया को, आदि धर्म गुरु पहांदीपारी कुपार लिंगों से मूल-सिद्धांत सम और विषम देव-संख्या के भावना के अन्तर्गत संपन्न किया, जिसमे उन्होंने धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के मूल चार कुल सगा देवताओं को हरेक सगा देवता के साथ सगा समायोजन प्रक्रिया को सम्पन्न किये, जिसमे एक सगा देव भूमक शाखा से और दूसरा सगा देव जंगो रायतार माता शाखा से लिया गया जो मूल सात सौ पचास (७५०) कुल गोत्र नामों में सगा समायोजन की प्रक्रिया निम्नांकित है :-


१.   चार देव के साथ + दस देव शाखा + दो देव शाखा - १०० + १० + १०० = २१०
२.   पांच देव से साथ + नव देव शाखा + एक देव शाखा -  १०० + १० + १०० = २१०
३.   छ: देव के साथ + आठ देव शाखा + बारह देव शाखा  - १०० + १० + १० = १२०
४. सात देव के साथ + ग्यारह देव शाखा + तीन देव शाखा - १०० + १० + १०० = २१०

कुल योग = ७५०

          गोंडवाना भूखंड में मूलनिवासी गोंडी-भाषिक धरती-पुत्रों को अपने गोंडी-जगत में, गुरु-कृपा ने आदि-काल से ही हमारे सगा समाजिक संरचना में, इस अदभुत दिव्य ज्ञान-शक्ति गोंडी तत्वज्ञान में फड़ापेन शक्ति का दर्शन, गोंडवाना कुल-देवता की सैद्धांतिक मान्यता पर आधारित हमारे चौबीस मूल वंशोत्पादक कुल-देवता का दर्शन, सगा देव धारकों के कुल-गोत्र नाम और कुल गोत्र चिन्ह का दर्शन, सगा देव बाना अर्थात सगा धर्म ध्वज का दर्शन, सम-विसम सगा-गोत्र और कुल चिन्ह के सगा-शाखाओं में ही वैवाहिक संबंध प्रस्थापित करने का दर्शन, सम-विसम गोत्र नाम और सम-विसम कुल चिन्ह से धारकों के माध्यम से ही प्रकृति-संतुलन करने का दर्शन, इत्यादि इस मौलिक गोंडी तत्वज्ञान को गुरु-शिष्य परम्परानुसार ही, इस दर्शन को व्यव्हारिक रूप से व्यवस्थापित किया था और है. गोंडी लोक साहित्य में बिखरे अनमोल मोती, जो आज उसकी स्पष्ट पुष्टि करती है और सगा-जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारणीय तथ्य चार संभाग के भूखण्ड, चार वंश के मानव, चार गोंडी तत्वज्ञान के महामानव धर्म गुरु, बारह मूल सगा देवों के समायोजन प्रक्रिया के उपरान्त (प्रकियोपरांत) कालान्तर में चार मूल सगा देव शाखाओं की मान्यता, इत्यादि मौलिक तत्व भी आज उपलब्ध करती है. गोंडी तत्वज्ञान और तथ्य से भली भांति सगा-जगत आज पुनर्परिचित हो गये ही होंगे, ऐसा हमारी समझ है. चार अंक संख्या की यह बहुचर्चित और सोचनीय तथ्यात्मक प्रशंग है जो निसंदेह आज सगा–जगत के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न-चिन्ह होगी. क्योंकि बारह मूल सगा देवों की समायोजन प्रक्रिया के कालान्तर में उभरी, यह हमारे मूल कुल देवताओं की बहू प्रशंसित चौबीस संख्या की ही सिर्फ गणनात्मक मान्यताओं का सूचक-संख्या रही होगी और है. धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के मूल चार, पांच, छ: और सात सगा देवों की अंक संख्या को जोड़े तो सिर्फ बाईस-सगा देवों की संख्या हमे मिलती है. उसमे हमारे अन्य आठ मूल सगा-देव शाखाएं भी मूल गोंडी सिद्धांतिक प्रक्रिया के तहत सम्मिलित की गई है. इसके अलावा आदि धर्म गुरु पारी लिंगों और आदि क्रांति देवी जंगों रायतार माता को भी जोड़े तो हमे जो संख्या मिलेगी वह हमारे चौबीस मूल सगा देवों की गणनात्मक संख्या का सूचक चिन्ह होगा, परन्तु विश्व-निर्माण में हमारे गोंडवाना-जगत की इस महत्वपूर्ण बहु-प्रशंसिय चौबीस मूल वंशोत्पादक कुल-देवताओं के योगदान को दुनिया नकार नहीं सकती. इसी संदर्भ में कोयतूर सगा-जगत के चिंतन और सोधक् मान्यवर ऋषि मसराम ने भी अपने शोध-लेख में जानकारी भी दी है, कि कोयतूर धर्म जगत में आदिम समाज के आधदेव लिंगों और जंगो रायतार, इनसे चार शाखाएं निर्मित हुई. १. राजा कोलासुर (काली) २. सेनापति-मायको सुगाल ३. तत्ववेत्ता-होरा जोती ४. देवदूत-तुरपोऊ-याल (महाकाली) इन चारो को ४, ५, ६, ७, देवों को २२ देव बनाया गया. इस संदर्भ में चार कुल सगा देवों के २२ देव आध देवता लिंगों और जंगो, यही हमारे २४ देवताओं की संख्या है. इसकी मूल देवताओं को वंश में ही हमारे सम्पूर्ण गोंडवाना-जगत निहित है.

          इस संदर्भ में प्रोफेसर चौहान ‘भारतीय शूर वन्य जमात गोंड’ में लिखते हैं, उसे भी हमे गोंडी तर्क-कसौटी में कसना होगा. बुढादेव ने इस सृष्टि का निर्माण किया है, बारह गोंड देवताओं ने इस सृष्टि का निर्माण किया है. गोंड बारह देवताओं का धार्मिक रूप व व्यवहार आज भी पुरानी रीति से है. इसके देवता भी प्रथक हैं. इनका देवता बूढ़ा है, जिसमे बड़ादेव भी समाहित हैं, जो सभी देवी की सहयोग से बना है. बूढ़ादेव समूह से बना होगा ऐसा भी लोग बताते हैं. कुछ भी हो तो भी गोंड लोगों के विश्व-निर्माण में चौबीस देवताओं का विशिष्ट महत्व है. इसलिए कोयतूर-जगत के धार्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक जीवन-मूल्यों की मौलिकता को समझें तभी हम कोयतुर-जगत को करीब से समझ सकेगें अन्यथा नही. इसी संदर्भ में हम एक और प्रसिद्ध गोंडी साहित्यकार मान्यवर लिखारी सिंह वट्टी के लेख ‘गोंडी संस्कृति का प्रतीत अशोक चक्र’ का प्रसंगांश भी उल्लेख करते हैं. हमे उनके विवेचनात्मक तथ्यों पर विशेष ध्यान देना होगा. कोया वंश चक्र में धम्म-चक्र का स्वरूप स्वयं ही स्पष्ट है. इसका पूर्व स्वरूप तथा विकसित संकल्प राजा अशोक ने अपने शिल्पकला में स्पष्ट किया है. जिसमे राजा अशोक ने सिंह मुद्रा शांति-चक्र का रहस्योदघाटन प्राचीन-काल में अनार्य गोंड कितने ही आर्यों के पूर्व से ही भारत में निवास कर रहे हैं. अशोक के चौबीस चक्र गोंड देवताओं के चौबीस बहुप्रशंसिय वंशोत्पादक याने बुद्ध धर्म में से चौबीस चक्र आभास होता है. यह भी अत्यंत सूचक तथा सोचनीय कल्पना है कि गौतम बुद्ध भी मुरीय गोंड थे, इसलिए गोंडी संस्कृति के संकेत तथा कल्पना उनके धर्म चक्र में मिलता है. आगे लिखते हैं कि धम्म-चक्र हिन्दू की कल्पना तथा पुराणों में कही गई बात ठीक नही है. धम्म-चक्र गोंडी-संस्कृति का शत प्रतिशत प्रतिबिम्ब है. मूल चक्र गोंडी संस्कृति की प्रतीक है. मूल स्त्रोत धम्म-चक्र का गोंगो संस्कृति ही है. हमारी भूल के कारण हिन्दू समाज के लोग, गुमराह करने के लिए नहीं चूकते कि धम्म चक्र हिन्दू का ही अंग है. अब हमे सजग होना होगा तथा स्पष्ट समझना होगा कि हमारा राष्ट्रीय चिन्ह धम्म चक्र (अशोक-चक्र) ही गोंडी संस्कृति का मूल स्त्रोत है.

          सारांश यह है कि गोंडवाना-जगत की उत्पत्ति और हमारी सगा-समाजिक संरचना में हमारे मूल धार्मिक और व्यवहारिक जीवन मूल्यों में सदैव उन्नति हित रीति-नीति का सीधा संबंध मोटे तौर पर प्रकृति सदृश्य नियम की उस सृजन-प्रक्रिया (धरती-जगत की दिव्य-शक्ति, वनस्पति-जगत की दिव्य-शक्ति, जीव-जगत की दिव्य-शक्ति) में अंतर्नीहित शक्ति की दिव्य ज्योति का ही संक्षेप में हमारी यही एकात्मक गोंडी तत्वज्ञान और दर्शन की मौलिक कथावस्तु रहा और है, जो जंगम और स्थावर जीव-धारियों के लिये सर्वथा उन्नत एवं समृद्ध दिव्य शक्ति रहा है और है. वह गोंडवाना के गौरवशाली अतीत का सदैव एक स्वर्णिम पृष्ठ रहा और है. हम गोंडवाना-वासियों को उस दिव्य-ज्ञान पर गर्व रहा है और है. उसकी मौलिक ज्ञान और तथ्य आज विज्ञान सम्मत भी है. जिस युग में हम सिधु घाटी सभ्यता के धनी थे, उस काल में पश्चिम की आनेक् जातियां असभ्य एवं बर्बर जीवन व्यतीत किया करती थी. इस बात का भी हमे ध्यान रहे कि बहुत संभव है, इससे भी अधिक व प्राचीन अवशेष भारत की रलगर्भा भूमि के निचे दबे पड़े हो, इसलिए भी गोंडवाना में चहूँमुखी खोज की आज आवश्यकता जान पड़ती है, क्योंकि महत्वपूर्ण नवीन जानकरियां तभी हमे प्राप्त हो सकेगा. आज हमारे पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि किसी समय पृथ्वी का सम्पूर्ण भूखण्ड २X१० की घात ८ वर्ग किमी. (८ करोड़ वर्ग मील) के एक मात्र महाव्दीप के रूप में था. उस आदिमयुगीन महाव्दीप आज ‘पेंजिया’ के नाम से जाना जाता है. लगभग १९ करोड़ वर्ग जुरेसिक काल में यह दो विशाल महाव्दिप में बट गया और लारेशिया (यूरेशिया, ग्रीनलैंड, उतरी अमरीका तथा ‘गोंडवाना लैंड’ (आफ्रिका, अरब, भारत, दक्षिण अमरीका, ओरोनिया, अंटार्कटिका) नाम दिये गये. लगभग १२ करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना लैंड भी दो भागों में विभक्त हो गया. आज के लगभग ४५ करोड़ वर्ष पूर्व अर्थात, आडोबिशियन-काल तक दक्षिणी ध्रूव संभवत: वहाँ था, जहां आज सहारा का मरुस्थल है.

          मानव समाज की अनेक जातियां केवल, अपने आपको उच्च-वर्ग और सभ्य-समाज के साथ जोड़ने और समझने की लम्बी-दौड़ में लम्बे-समय से संलग्न रहे और हैं. अपितु यह न जाने बिना कि उनका अखण्डित सत्यज्ञान और दर्शन क्या रहा और है ? इसलिए वे मिथ्याभिमान से ग्रस्त और भ्रमित रहे और हैं. वे मानव समाज की इस दिव्य अखण्डित सत्यज्ञान तथा परखज्ञान और मानवीय जीवन मूल्यों की समाजीकरण में प्रकृति की अदभूत अनमोल और खोजी एकात्म तत्व, जिसमे मानव जाति की सही आदर्शो पर चंहुमुखी उन्नति, समृद्ध, सुखमय-जीवन और मनुष्यता के भाव में अन्तनिहित दर्शन रहा है. ऐसे दिव्य ज्ञान-ज्योति से वे अनजान रहे और हैं. उच्च-वर्ग और सभ्य-समाज से ही अपने को जोड़ने और उसमे समझने वालों के दिलों में, सृजनित-भू भाव कालान्तर में मिथ्याभिमान के दुश्चक्र के रूप में हमे यह मानव-विभाजित विभाजक-तत्व, वर्णभेद, जातिभेद, रंगभेद, भाषाभेद, धर्मभेद इत्यादि मिलता रहा और है. अमानवीय अहम-भावना की उनकी यही देन मानव जगत के लिए रही और है. इसकी पुष्टि मानव जगत को ठोस प्रमाणिक ऐतिहासिक घटनाएँ करती रही और है. इसके अलावा मानव समाज उसके अभिशाप के दुश्चक्र के रूप चतुर्दिक व्याप्त असमानता, अमानवीय, असमाजिक अज्ञानता, अवैज्ञानिक, कपोल कल्पित कथा को अदूरदर्शी तथ्यों ने ही मानव-जाति को कालान्तर में केवल विभाजित करती रही और है, फलस्वरूप उनमे शोषण की प्रवृत्ति बढती गई और मानव-जगत में उनकी वर्ण-व्यवस्था ब्राम्हण यज्ञ के नाम पर, क्षत्रिय करों के नाम पर तथा वैश्य लाभ के नाम पर, भयानक रूप से शोषण करते रहे और हैं. इसकी पुष्टि ब्राम्हण-ग्रंथों से होती रही और है. हमारा सगा-जगत उनके दुश्चक्र से कैसे अछूत रखते ? इसकी पुष्टि हमारे ठोस एतिहासिक घटनाएँ भी करती है और है. उनके द्वारा बोये गये फूट के बीजों की ही देंन रही है की हम अपने ही धरती और अपने ही गोंडवाना—आदर्शों के जीवन-मूल्यों पर आधारित सच्चे इतिहास से भी अनजान रहे और हैं.

          इस बात की भी हमे ध्यान रहे, कि जो धरती पुत्र सदैव मानव-पोषण अन्नदाता रहा और वह अपने ही धार्मिक और सामाजिक दर्शन मूल्यों पर आधारित सच्चे-इतिहास से प्रेरक-शक्ति प्राप्त करता रहा और है. वह मानव समाज कभी मृत नहीं रहा है और न रहेगा क्योंकि उसका निश्चित रूप से अस्तित्वकर्ता सदैव उपलब्ध रहा है और रहेगा. सगा-मानव का जन्म (प्रादुर्भाव पयुंडाय, सुधार) और मृत्यु (अस्तित्व विहीन भुरडाय, बिगाड) ठीक उसी तरह है जैसे प्रजनन शक्ति और प्रकृति बिगाड़-शक्ति की गुण धर्म परिवर्तनशील है, जो अखंडित सत्यज्ञान रहा है और रहेगा उसका कोया-जगत सदैव उपासक रहे, हैं और रहेगा. गोंडवाना-जगत में हमारा सगा-समाज सदैव गोंडवाना के जीवन मूल्यों पर आधारित सच्चे अस्तित्व में रहा है. और रहेगा. कोया मानव आते-जाते रहेगें जो एक शास्वत प्रक्रिया की अखण्डित नियम और सत्यज्ञान है. गोंडवाना-जगत में-चतुर्दिक बिखरे हमारी लोक-साहित्य में समाहित अनमोल, अमृत-विचार के दिव्य मोतियों का संकलन, अध्ययन और चिंतन-मनन की आज अधिक आवश्यकता जान पड़ती है, क्योंकि तभी हम हमारे दर्शन की समाजीकरण में बिखरे अलिखित अर्थात मौखिक दिव्य ज्ञान-ज्योति के ठोस प्रमाणों को सगा-जगत में स्थापित आदर्शों के नियम और उनके संस्थापक महामानव को आज हम स्पष्ट जान सकेंगें. हमारे सामाजिक संरचना में अंतर्नीहित लोकतंत्रिक आदर्शों, नियम की स्थापना के साथ ही राष्ट्र की स्पष्ट धारणा, तब सृजनित हो चुकी थी, जब आज का उच्च-वर्ग और सभ्य कहा जाने वाला समाज चरवाहों के घुमक्कड़-जीवन व्यतीत करता था. इसकी पुष्टि मोहनजोदड़ो की सभ्यता और संस्कृति करती रही और है. संस्कृति का संबंध मनुष्य के उदात्त गुणों के साथ है, जबकि सभ्यता भौतिक सुख-समृद्धि का घोतक करती है. सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य को मानव के रूप में विकसित करना सभ्यता एवं संस्कृति दोनों का लक्ष्य रहा है. दोनों के स्वरूप में बहुत कुछ मिले-जुले और परस्पर पूरक होते हैं. इसलिए कोयतूर-जगत को अपने धार्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक सच्ची जीवन-मुल्यों को सच्ची सामाजिकता को ठीक से समझना होगा तभी कोयतूर-जगत अपने आदर्शों को आज समझ सकेगा. यही विचार मंथनोपरांत जानना, समझना और व्यवहारिक रूप में आदर्शों को मानना ही हमारी आत्मिक पुनर्जागरण की दिव्य शक्ति होगी, जो हमारी खोई हुई आत्मज्ञान को पुनर्स्थापित करने में अधिक बल देगी, जैसे हमारी सोच की मानसिकता बनती है.

          धरती निर्माण के प्रारम्भिक कालखण्ड में भौतिक प्रक्रिया की वैज्ञानिक मूल्यों पर तथ्यों में, यदि हम तुलनात्मक अध्ययन निष्पक्ष करें तों हमे गोंडवाना-जगत के सामाजिक आदर्शों के दर्शन में, उसके सच्चे मौलिक तथ्यों के जड़ों तक पहुंचने में अर्थात भली-भांति समझने में, यह वैज्ञानिक तथ्य आज हमे आत्माधिक सहायक सिद्ध करेगी ऐसी हमारी  मानसिकता की समझ है. मध्य भाग आवरण और पपड़ी पृथ्वी में गर्मी के सदैव बने रहने वाले इस स्त्रोत से पृथ्वी के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ा है. पृथ्वी की प्रारम्भिक अवस्था में रेडियो धर्मी बहुत तेजी से बनी, किन्तु उतनी तेजी से निकल नहीं सकी, उसके कारण लाखो वर्ष बाद पृथ्वी में तापमान लोहे के पिघलने के तापमान तक पहुँच गया, किन्तु पृथ्वी के बीच-बीच में ऐसा नहीं हुआ. पृथ्वी के बीच का हिस्सा सबसे गरम इलाका होने के बावजूद सबसे अधिक दबाव वाला हिस्सा भी बना रहा. किसी धातु के पिघलने का तापमान उस पर पड़ने वाले दबाव में वृद्धि होने से बढ़ता है. जिस-जिस क्षेत्र में लोहा पिघला वह पृथ्वी के अन्दर ४०० से ८०० किलोमीटर (२५०-५०० मील) की गहराई में था जहां पर तापमान और दबाव का एक उपयुक्त समन्वय मौजूद था. लोहे के पिघलने से वह बूंद-बूंद बनकर पृथ्वी के बीच में आना शुरू हो गया क्योंकि लोहे की वे बुँदे आसपास की अन्य समग्री से अधिक भारी थी. लोहे के इन बूंदों के जमा होने से इसकी गुरुत्वाकर्षण उर्जा गर्मी की उर्जा में बदल गई, जिससे पृथ्वी का तापमान और भी अधिक बढ़ गया. तापमान में इस वृद्धि से लोहे के पिघलने का क्षेत्र तब तक बढ़ता गया, जब तक वह पृथ्वी के अन्दर तकरीबन सारे भाग में नहीं फ़ैल गया. इस समय तक दूसरे अन्य तत्व भी पिछले. कुछ अंशतः और कुछ पूर्णतः भारी तत्व पृथ्वी के बीच में आ गये और हल्के तत्व ऊपर उठते हैं. वजन के कारण सामग्री अलग-अलग स्थान पर जमा होती गई. पिघलने वाले भारी तत्वों में मुख्य स्थान लोहे का था. ये तत्व पिघलकर पृथ्वी के बीच में द्रवरूप में जमा हो गये. हल्के तत्व में प्रमुख मात्रा सिलिकन की थी. वे तत्व पृथ्वी के सतह के भाग पर आ गये तथा वंहा ठंडे होकर कड़ो पपड़ी के रूप में जमा हो गये. बाकि मूल सामग्री बीह के और पपड़ी के मध्य आवरण के रूप में जमा हो गये.

          पृथ्वी के इतिहास का समय मान चट्टानों के निर्माण की सही तिथि दर्शाए जाने के बहुत पहले भू-वैज्ञानिकों ने एक सापेक्षित समय मान निर्मित किया था, जिसे उन्होंने युगों अवधियों तथा काल में विभाजित किया है. कुछ समय पहले तक पृथ्वी के निर्माण संबंधी मुख्य घटनाओं तथा पृथ्वी के उदभव के समय का अनुमान किया जाता था. किन्तु अब उनमे बहुत सी घटनाओं की तिथि बताई जा सकती है जो उनकी रेडियों धर्मिता के अध्यन से प्राप्त की गई हो.


प्रकृति की परिवर्तनशील शक्ति में भौतिकी प्रक्रिया की वैज्ञानिक मूल प्रमाणों पर आधारित उस सृजनित तत्वों को भी हम धरती-जगत की वैज्ञानिक उत्पत्ति के इतिहासानुसार राज्य से लगभग ३०० सौ करोड़ वर्ष पूर्व भूपटल के ठंडा होने से शैलों का सर्वप्रथम निर्माण इसी महाकल्प में हुआ था. इस महाकल्प में भूगर्भीय उथल पुथल तलछट एवं लावा का जमाव, अपरदन, भूसंचलन एवं पर्वतों के निर्माण की क्रियाओं की पुनरावृत्ति के फलस्वरूप विश्व के कतिपय प्राचीनतम कठोर भूखण्डों का निर्माण हुआ, जिसमे से दक्षिणी गोलार्द्ध में विस्तृत विशाल गोंडवाना भूखण्ड भी एक था. इसी गोंडवाना का एक भाग प्रायः व्दितीय भारत भी है, जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण छतीसगढ़ आता. यह महाकल्प लाखो जीवों को छोड़कर प्राणीविहिन एवं वनस्पति विहिन था. इस उपरोक्त उल्लेख प्रसंगांश में, भौतिकी प्रभाव से उत्पन्न तत्व परिणामों और भूखण्ड को समझकर, धरती निर्माण प्रक्रिया पर आज सगा जगत स्वयं विचार मंथन कर, तथ्यों पर निष्पक्ष मूल्यांकन करते हुये, स्वतः सत्य की ओर बढ़ें, यही हमारी शुभकामनाएँ होगी.
ठाकुर कोमल सिंह मरई
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बुधवार, 23 जनवरी 2013

गोंडवाना का सेवा सेवा जय सेवा महामंत्र

यही प्रकृति शक्ति है, यही मातृशक्ति है,
यही परिवार सेवा है, यही जन सेवा है,
यही समाज सेवा है, यही संसार सेवा है.
यह छोटे और बड़े, स्त्री और पुरुष
सभी में नीहित है. भूख में, प्यास में,
बस सेवा ही सेवा है. 
           "सेवा" कोयतूर का धर्म है, सेवा कोयतूर का नैतिक आचरण है, सेवा कोयतूर का सत्कर्म है, सेवा कोयतूरों का महामंत्र है. सेवा शब्द के अर्थ को लेकर अनेक व्यक्तियों में अभी भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है. कुछ लोग इसे शिव या शिवा का परिवर्तित रूप मानते हैं. कुछ लोग उच्च वर्ग के हित में निम्न वर्ग द्वारा किया गया कार्य या त्याग को सेवा मानते हैं. कुछ लोग मंदिर में मूर्ती को नियमित जल, फूल इत्यादि चढ़ाने को सेवा मानते हैं. मेरे ख़याल से ये सभी धारणा कोयापुनेमी "सेवा" धारणा से भिन्न है. कोयापुनेम का महामंत्र/मूलमंत्र सेवा है, जो मानवता और मानवीय संबंधों की शाश्वत रक्षा के लिए आदि गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो द्वारा कोया वंशियों को दिया गया है. कुपार लिंगो द्वारा सेवा के अंतर्गत निम्नलिखित की सेवा का विधान है :-

१-     जन्मदाताओं की सेवा 


          प्रत्येक जीव को इस सृष्टि का प्रथम दर्शन कराने वाली दो महाशक्तियां हैं. वे हैं सल्लां और गांगरा शक्ति के धारक माता और पिता. जिन माता पिताओं के प्रति हमारा रोम-रोम चिर है. हमारा तन-मन और बुद्धि उन्ही की दी हुई है. हमारे पास आज जो कुछ भी है, उन्ही की कृपा से है. जब हम पैदा हुए तो असहाय थे, न तो चल फिर सकते थे, न भोजन प्राप्त कर सकते थे, न ही अपनी रक्षा कर पाते थे. उस समय माता पिता ने ही स्वयं कष्ट उठाकर भी पैदा होते ही हमारी सेवा किये. उस समय यदि माता पिता की सेवा नहीं मिलती तो हम जीवित नहीं रह पाते. उन्होंने हमें नहलाये, धुलाये, मल-मूत्र साफ़ किये, स्तनपान कराये. इसलिए माता-पिता के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है की जब वे वृद्ध हो जावें तो हम उनकी पूर्ण सृद्धा और भक्ति से निस्वार्थभाव से तन, मन और धन से सेवा करें. जन्मदाताओं की सेवा ही सल्लां गांगरा की सेवा और सजोरपेन की पूजा है. जिसने माता पिता के महत्व को नहीं जाना, वह सजोरपेन को नहीं पहचाना. माता पिता को छोड़कर मंदिरों में मूर्ती पूजा किया, तीर्थों में घूम-घूम कर स्नान किया, वह व्यर्थ ही अपने जीवन के बहुमूल्य समय बर्बाद किया. कोयापुनेम में जन्मदाताओं की सेवा को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है. महिलाओं के लिए सास-ससुर की सेवा सर्वोपरी है. जिस कुल में महिलाएँ विवाह करके लाई जाती हैं, उस कुल के वृद्धजन उनके लिए पूज्यनीय होते हैं.


२-     संतान सेवा 


          युवा स्त्री-पुरुषों के विवाहोपरांत संतान की उत्पत्ति होती है. उनकी सेवा सुश्रुषा का पूर्ण दायित्व उनके माता पिता का होता है. यदि माता पिता अपने बच्चों की ठीक ढंग से सेवा एवं परवरिश करेंगे तो वे भविष्य में होनहार, योग्य नागरिक बनेंगे. बलिष्ट एवं विवेकशील बनेंगे, सत्चरित्र बनेंगे. उनमे सुसंस्कार का समावेश होगा. अधिकांश पढ़े-लिखे सभ्य  कहलाने वाले व्यक्ति अपने बच्चों की सेवा स्वयं न करके किसी नौकर नौकरानियों से सेवा व परवरिश कराते हैं. अधिकांश शहरी माताएं अपने स्तन का दूध अपने बच्चों को नहीं पिलाती और बाजार से दूध खरीद कर पिलाती हैं. वे सोचती हैं कि स्तनपान कराने से उनकी सुन्दरता नष्ट हो जाएगी. परिणामस्वरूप उनकी संतान सुसंस्कारित नहीं हो पाते. अस्वस्थ, कमजोर, विवेकहीन, शीलगुणहीन होते हैं. इसलिए कोयापुनेम में अपनी संतान की सेवा सुश्रुषा स्वयं करने का विधान है.


३-     सगा सेवा


          गोंडी धर्म में सम और विषम गोत्र धारक आपस में एक-दूसरे के सगाजन कहलाते हैं. इन्ही सगाजनों के बीच आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं. गोंडों में सभी धार्मिक और सामाजिक कार्य सगाजनों द्वारा संपन्न कराये जाने का विधान है. समाज में विवाह संस्कार, मृत्यु संस्कार या अन्य कोई भी देव पूजन कार्यों में ब्राम्हण, नाई, धोबी आदि से कोई भी कार्य नहीं कराये जाते. ये सभी कार्य सगाजनों द्वारा ही संपादित किये जाते हैं. इसलिए सगाजनों के बीच सामंजस्य और सेवा भाव आवश्यक है. सम और विषम गोत्रीय सगाजन आपस में एक दूसरे के पूज्यनीय होते हैं. उन्हें एक दूसरे की सेवा करनी चाहिए. जब भी जरूरत पड़े, सगाजन आपस में सेवा एवं सहयोग करके समस्त गोंडवाना समाज का कल्याण कर सकते हैं. इस प्रकार की सगा सामाजिक व्यवस्था विश्व के किसी भी धर्म में नहीं हैं. 


४-     दीन दुखियों की सेवा 


          गोंड समाज में कुछ धनी लोग हैं और अधिकांश निर्धन है. बहुतों की स्थिति तो और भी विकट है. उन्हें जिंदा रहने के लिए मुश्किल से आहार मिल पाता है. बीमार होने पर ईलाज नहीं करा पाते. शरीर ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र उपलब्ध नहीं हो पाते. रहने के लिए टूटी फूटी घास पूस की झोपड़ी होती है. इसी में किसी तरह धूप, सर्दी और वर्षा से अपनी जान बचाते हैं. ऐसे व्यक्ति विवाह या मृत्यु संस्कार के अवसर पर या बीमारी पड़ने पर मजबूर हो जाते हैं. अर्थाभाव के कारण ये अपनी रही सही जमीन बर्तन आदि भी बेच डालते हैं. समाज के धनी लोगों का कर्तव्य बन जाता है की वे ऐसे निर्धनों की वक्त आने पर यथासंभव सेवा करे एक व्यक्ति न करे तो समाज के व्यक्ति  चंदा करके उसे कष्ट से बचाने का प्रयत्न करना चाहिए. दीन दुखियों की सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए ये भी हमारे समाज रूपी शरीर के अंग  हैं. शरीर का एक अंग विकारग्रस्त हो जाने पर पूरा शरीर अस्वस्थ्य हो जाता है. शरीर की कुशलता के लिए सभी अंगो का स्वास्थ्य होना आवश्यक है. इसी प्रकार समाज में सभी का विकास एक साथ होना आवश्यक है.


५ -     धरती की सेवा


            धरती से अनाज पैदा करना, वृक्ष लगाकर फल प्राप्त करना, धरती को खाध डालकर उपजाऊ बनाना ही धरती की सेवा है. गोंडीयनों का मुख्य व्यवसाय कृषि है. कृषि कार्य करना सच्चे मर्द की पहचान समझा जाता है. कृषि कार्य में हिम्मत और मेहनत की जरूरत होती है. भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, बरसात, थकान सभी को सहन करके गोंड धरती की सेवा करता है. पसीना बहाता हुआ सुख की आशा में अथक परिश्रम करता है. अन्न उपजाता है और विश्व का भरण पोषण करता है. आजकल अधिकांश लोग पढ़े लिखे होने के बाद कृषि कार्य नहीं करना चाहते. नौकरी की तलाश में समय बरबाद करते हैं. जो व्यक्ति अपने आपको कृषि के काबिल नही समझते वह मर्द कहलाने योग्य नहीं हैं. धरती माता की सेवा जो व्यक्ति सही लगन से करता है वह कभी भूख से नहीं मरता और कभी भीख नहीं मांगता. धरती माता की गोद में जितने जितने वृक्ष उगाएंगें. वह उससे कई गुनी अधिक फल प्रदान करता है. बड़े बड़े कारखाने स्थापित करने से, गोला बारूद बनाने से धरती की सेवा नहीं होती है. बल्कि धरती की हरियाली नष्ट होती है. धरती की सेवा करने के लिए अधिक से अधिक अनाज पैदा करें. फलदार वृक्ष लगायें. समाज कल्याण के लिए सेवा भाव प्रत्येक कोया जनों में होना चाहिए. एक पवित्र कार्य समझकर उसे करना चाहिये. जिस प्रकार दो सिक्ख आपस में अभिवादन करते समय "सत श्री अकाल " शब्द का प्रयोग करते हैं, मुसलमान अस्सलाम वालेकुम करते हैं, ईसाई गुडमार्निंग कहतें हैं, हिन्दू जयराम जी की कहते हैं. इसी प्रकार हम गोंडी धर्मी लोग अभिवादन करते समय "जय सेवा" कहते रहें. आदि गुरु व्दारा बताया गया यह सेवा मंत्र कोया समाज का मूल मंत्र है. हमे इस मंत्र का जाप श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ करना चाहिए इससे हमे आत्म शक्ति एवं प्रेरणा की प्राप्ति होती.
                                               --००--                                  

शनिवार, 19 जनवरी 2013

गोंडी धर्म और विश्व शान्ति

                 मानव जीवन को सौम्य और सुसंस्कृत बनाने वाले जीवन मार्ग को ही धर्म कहते हैं. आज विश्व में अनगिनत धर्म, पंथ विकसित हो गए हैं जो अपने आप को अलग और श्रेष्ठ धर्म की संज्ञा से विभूषित करते हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, यहूदी आदि धर्म अपने आप को श्रेष्ठ बताकर वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं. इन धर्मों के अपने अपने ग्रन्थ हैं और ये ग्रन्थ मानव रचित हैं. इन ग्रंथों में मनुष्य के विचार और कल्पनाओं के संग्रह हैं. अलग-अलग धर्मग्रंथ अलग-अलग मनुष्यों के विचार और उनकी कल्पनाओं को व्यक्त करते हैं. प्रत्येक मनुष्यों के विचार और कल्पनाएँ अलग-अलग होती हैं. एक व्यक्ति की कल्पनाएँ अन्य व्यक्तियों को पसंद नहीं आती. इसलिए धर्मावलंबियों में मतभेद है. विश्व के जितने भी धर्म कल्पना पर आधारित हैं वे सभी बल पूर्वक या छलपूर्वक लादे गए हैं. ये  धर्मावलम्बी यह जानते हुए भी कि अमुक मान्यता कपोल कल्पित है, फिर भी भयवश अंधानुकरण करते चले जाते हैं. इन धर्मों के ठेकेदारों ने स्वर्ग-नरक का भय बताकर धर्म के पक्ष-विपक्ष में तर्क करने की योजना को ही निरस्त कर दिया है और उन खोखले धर्मों के पक्ष में आँख बंद करके गुणगान करने का ही मार्ग प्रशस्त किया है. आखिर वे अपने धर्म की आलोचना से इतने घबराते क्यों हैं कि आलोचना करने वालों के लिए तलवार लेकर उठ खड़े हो जाते हैं ! जबकि शाश्वत सत्य पर तो आलोचना का प्रभाव ही नहीं पड़ता. शाश्वत सत्य धर्म वही है, जो निर्विवाद हो और निर्विवाद केवल प्रकृति ही है.


          प्राचीन काल के अनार्यों ने आर्यों के यज्ञविधान (अन्न जारण प्रथा) का विरोध किया सो आर्यों ने अनार्यों के संस्कृति और वैभव को मिटा देने का संकल्प लिया. इसी तारतम्य में बौद्धों की भी बड़ी तादात में हत्या किये. इसी प्रकार ईसाई और इस्लाम में भी धर्म को लेकर मारकाट, हत्याएं होती रहती है. जिस धर्म के नाम पर एक मानव दूसरे मानव के रक्त का प्यासा हो वह धर्म नहीं है. ऐसी धर्म की उपस्थिति में विश्व शान्ति स्थिति नहीं बन सकती. संकीर्ण विचारधारा को धर्म का नाम देकर विश्व शान्ति की दुहाई देना निरा मूर्खता है. आज सभी सुसंस्कृत कहे जाने वाले अधिकांश विधर्मी कुत्ते, बिल्लियों को तो बिस्तर में सुलाते हैं. अपनी थाली में खाना खिलते हैं और अन्य वर्गों के मनुष्यों की छाया को स्पर्श करने से भी परहेज करते हैं. उनका स्पर्श किया हुआ भोजन त्याज्य है, परन्तु उन्ही का कमाया हुआ अनाज त्याज्य नहीं है. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जिस वर्ग के मनुष्य को छूना पाप समझते हैं, उसी वर्ग की महिलाओं से बलात्कार करना त्याज्य नहीं है.


          हिन्दू धर्म ग्रंथों में लिखा है कि उनके धर्म के विषय में सन्देश करना पाप है. ऐसा करने वाला अंत में नरक में जाता है. वहाँ उन्हें अनेक यातनाएं दी जाती है. इस धर्म को मानने वाला स्वर्ग जाता है. वहाँ उसे देवी देवताओं के सामान सुख मिलता है. सच तो यह है कि हिन्दू ग्रंथों में जो स्वर्ग नरक की बात लिखी गई है, वह कोरी कल्पना है. वर्तमान युग में अन्तरिक्ष के विभिन्न ग्रह-उपग्रहों की जानकारी प्राप्त कर ली गई है परन्तु स्वर्ग और नरक नामक ग्रहों का कहीं भी पता नहीं है. हिन्दू ग्रंथों में आर्यों और अनार्यों के युद्ध का वर्णन अनार्य राजाओं की हत्या, उनकी संस्कृति का विध्वंश, यज्ञ विधान (अन्न जारण प्रथा) का प्रचार, नायक नाईकाओं का मिलन एवं विरह आदि का ही वर्णन है, इनके सिवा कुछ भी नहीं है. फिर भी बहकावे में आकर भयवश लोग उन्ही को धर्मग्रंथ समझकर पूजते हैं. आज तक लोगों को उस धर्म से क्या मिला है ? भेदभाव, तिरस्कार, साम्प्रदाईकता, गरीबी बस.


          आज विश्व स्तर पर सर्वत्र अशांति है. सभी जगह युद्ध की आशंकाएं  हर समय बनी रहती है. अधिकांश युद्ध, मार-काट और मतभेद धर्म के नाम पर ही होते हैं. धार्मिक मतभेद और युद्ध संकीर्ण मान्यताओं के कारण होते हैं. आज विश्व में जितने छोटे-बड़े सम्प्रदाय हैं, उनकी मान्यताएं एक-दूसरे  से नहीं मिलती. इसलिए वे सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक नहीं हो सकते. जब तक एक सर्वमान्य और सार्वभौमिक धर्म अस्तित्व में नहीं होगा और उससे सब लोग परिचित होकर उसकी मान्यताओं को आत्मसात नहीं करेंगे तब तक विश्व शान्ति स्थापित नहीं हो सकती. एक सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक धर्म का निर्माण करना आज मनुष्य के बूते की बाहर की बात है, क्योंकि सभी मनुष्यों के विचार अलग-अलग होते हैं. इस प्रकार का धर्म विश्व में एक ही है जो सर्वमान्य एवं सार्वभौम को कायम रख सकता है. वह है "कोया पूनम". इस धर्म के सभी नीति नियम और मान्यताएं मानव निर्मित नहीं हैं, वरण प्रकृति पर आधारित है. प्रकृति के नियम क्षेत्रीयता, जातीयता, साम्प्रदायिकता आदि संकीर्णताओं से मुक्त एक सार्वभौमिक नियम है. वर्षा, ठण्ड, धूप सभी मनुष्यों पर सामान रूप से प्रभाव डालते हैं. वे किसी धर्म या जाति के लिए नहीं होते. इसी प्रकार प्रकृति के समस्त गतिविधियों का प्रभाव समस्त चर-अचर, जड़-चेतन प्राणियों पर पड़ता है. हम सब उसी प्रकृति के अवयव हैं. प्राकृतिक तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है. इसलिए हम इस प्रकृति के एक ही नियम से संचालित हो सकते हैं.


          यदि प्रकृति के इन नियमों को विश्व में सर्वत्र अनुकरण करें तो राष्ट्रों को सुरक्षा सम्बन्धी हथियारों का बजट समाप्त कर देना पड़ेगा, क्योंकि सभी सत्य ज्ञान संपन्न होकर एक दूसरे का सहयोग और सेवा करेंगे तथा वैमनष्यता समाप्त हो जाएगी. ईर्ष्या, द्वेष, युद्ध विध्वंश, साम्प्रदायिकता आदि शब्द लुप्त हो जायेंगे. जिस प्रकार आकाशीय पिंड अपने अपने परिपथ में घुमते हुए आपस में नहीं टकराते. इसी प्रकार हम भी सही रास्ते पर चलते हुए आपस में नहीं टकरायेंगे तब विश्व में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित हो सकती है. यदि विश्व के सभी देश अपने अपने संकीर्ण साम्प्रदायिकता के दायरे में रहकर विश्व शान्ति की बातें करते हैं तो वे अरण्य रोदन के शिवा कुछ नहीं कर रहे हैं. कोया पूनम की मान्यताओं से विश्व में झगड़े फसाद आपसी टकराव समाप्त हो सकते हैं और एक सौहाद्रपूर्ण वातावरण का निर्माण हो सकता है.

           आज कोयाजनों के प्राकृतिक शक्तियों का अमूल्य धरोहर है जिसका वे उपयोग करना नहीं जानते. यदि वे इनका उपयोग शुरू कर दें तो विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय उनके सामने घुटने टेक देंगें. कुछ आर्य धर्मियों का विचार है कि वे यज्ञ हवन इसलिए करते हैं क्योंकि इसके द्वारा वे विश्व शांति की कमाना करते हैं. पर्यावरण में सुधार होगा, परन्तु गौर कीजिये कि एक गरीब जो रात दिन लंगोटी लगाकर ठण्ड और धूप को  सहन करके पसीने बहाकर मेहनत से अन्न पैदा करता है, उस गाढ़ी कमाई को आग के हवाले कर देने से क्या विश्व में शांति आ सकती है ? कदापि नही. उन अन्न जलाने वालों को क्या मालूम कि भूख की तड़फ क्या होती है. भूख से हमारे गरीब  भाइयों का किस तरह विकास अवरुद्ध होता है. देश में गरीबी का सबसे मुख्य कारण आर्यों का यज्ञ प्रथा ही है. हिंदु धर्म के लोग गरीबी से वाकिफ नही हैं, क्योंकि इन्हें तो मुप्त में खाने को मिल जाता है. वे भीख मांग लेने का धंधा भी कर लेते हैं. हमारे समाज में इस प्रकार की घृणित प्रथा नहीं है. हम तो बिना मेहनत के खाना सीखा ही नहीं हैं. यह अधर्म का काम है. जो लोग जीवन संघर्ष में टिक नही पाते वे या तो साधू सन्यासी बनने का ढोंग रचाते हैं या भीख मांगने का कायराना हरकत करते फिरते हैं. गोंड कभी भीख नहीं मांगता क्योंकि वह कायर नहीं है. वह तो जीवन संघर्ष में मरते दम तक पसीने बहाकर अन्न पैदा करता है और सभी जीवों का उदर पोषण करता है. यदि देश को समृद्ध और विकसित बनाना है तो गोंडी धर्म के सिद्धांतों का आत्मसात करना होगा. देश धन धान्य से सम्पन्न होगा. कोई भूखा नहीं रहेगा तो चोरी डकेती लड़ाई-झगड़ा सब शांत हो जायेंगें. यदि हमे विश्व में वर्ग विहीन, जाति विहीन स्वस्थ्य समाज की स्थापना करनी है तो हमें "कोया पुनेम" (गोंडी धर्म) के आदर्शों का अनुकरण करना पड़ेगा. हमें विधर्मियों के लच्छेदार बातों में कदापि नहीं आना है. स्वविवेक का सहारा लीजिए. सत्य ज्ञान और सत्यमार्ग का अनुसरण कीजिये. निश्चित ही निकट भविष्य में इसके लाभ आपके जीवन में परिलक्षित होंगें. गोंडी धर्म के पवित्र आदर्शों का प्रचार प्रसार कीजिये और विश्व शांति के निर्माण में अपना अपूर्व योगदान दीजिये.
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