रविवार, 17 फ़रवरी 2013

गोंडवाना जगत में विभाजक और एकात्मक तत्व एक विचार प्रवाह सत्य की ओर

          भावुक और जानकार व्यक्तियों का विश्वास है कि आज के विश्व के लिए किसी सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक पुनर्गठन से भी अधिक गहरी एवं मूलभूत आवश्यकताएं हैं. आत्मिक पुनर्जागरण की खोई हुई आस्था को पुनः प्राप्त करने की. जब सभ्यता में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तब वह विखंडित होने लगती है. इससे उत्पन्न होने वाली निराशा के मध्य मानवप्रजा वर्तमान समाज व्यवस्था की अपूर्णता को स्वीकार करने और नए सिरे से उसकी नीव डालने एअथा उसके आधार को बदलने की ओर उन्मुख होता है. इसके कारण आत्मान्वेषण के महान आंदोलनों का जन्म होता है. ऐसी ही एक अदभुत कड़ी के रूप में आज गोंडवाना जगत में पुनर्जागरण की दिव्य-शक्ति के खोजी यात्रा-पथ में विश्व प्रसिद्ध इतिहासज्ञ की तथ्यपूर्ण, तर्क संगत, ज्ञानवर्धक, सूत्रात्मक वाक्यांशों की ओर, सगा जगत का ध्यानाकर्षण करना ही हमारा मुख्य उद्देश्य होगा. ताकि हम हमारे वास्तविक माटी से जुड़े हुए उन महान व्यक्तियों के बलिदान को नजदीक से पहचान सकें, जिन्होंने जय-सेवा शक्ति से गोंडवाना-जगत की एक अलग पहचान बनाई थी और है. विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार सर मैक्समूलर महोदय ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सन १८८२ में अपने भाषण में कहा था कि- "हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं ? केवल यह जानने के लिए कि हमारे पूर्वज कौन थे ? उनके धार्मिक आचार विचार और विश्वास क्या थे ?" इस सूत्रात्मक वाक्यांश के पृष्ठभूमि में यदि हम आज गोंडवाना जगत के पुनर्जागरण के लिए बातें करें, तो सबसे पहले हमें अपने भूतकाल और वर्तमान काल को झांककर स्पष्ट देखना होगा और पुनर्विचार करने के लिए हमें चिंतन और मनन की आज अधिक आवश्यकता होगी और है.

          मैक्समूलर महोदय के इस मौलिक सूत्रात्मक वाक्यांश में समाहित कथावस्तु की एक सामान्य परिभाषा को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज भारत के प्राचीन कालातीत पर लिखा इतिहास आर्य, क्षत्रीय और ब्राम्हणों का इतिहास बनाकर लिखा गया है. उसके बाद राजपूतों का इतिहास, वह भी उच्च वर्ग का इतिहास ही कहा जा सकता है. तदोपरांत मुस्लिम सम्राटों, नवाबों और अंत में अंग्रेज लार्डों का इतिहास लिखा गया. परन्तु भारत के मूलनिवासियों का, जिनकी जनसंख्या का ८५% है, (१) का इतिहास लिखा गया ? इस प्रश्न-चिन्ह के साथ अत्यधिक महत्वपूर्ण बात “भारत के महापंजीयक के कार्यालय अनुसार ३१ दिसंबर १९८८ को देश की जनसंख्या ८० करोड़ से अधिक थी. (२) की जानकारी जिसमे दर्शाई गई है, जिसमे निसंदेह अब पहले से भी अधिक हमारी जनसंख्या आज देश में होगी.” के इस तथ्य को भी हमें याद रखना होगा. सगा-जगत के अंतः सूत्र में व्याप्त हमारी यह मूल भावना कि हम आज अपने इतिहास की एक निर्णायक घड़ी पर आ पहुंचे हैं. इसलिए हमें हमारी पोषक सोच तत्व में ऐसा चुनाव कर लेना होगा, जो सदियों की घटनाओं की गति एवं दिशा को निश्चित रूप से सत्य मार्ग का एक दिव्य दर्शन हमें प्रदान कर सके, जो हमारे युग के लिए कुछ नवीन नहीं होगा वरन प्राचीनतम और नवीनतम चिंतन प्रयासों के बीच से हमें एक ऐसी अटूट आस्था, अटल विश्वास, युग सत्य और दिव्य ज्ञान के साथ ही दिव्य ज्योति उपलब्ध हो सके, जो हमारी कमजोरियों और हींन भावनाओं की अंधकार को दूर कर हमें एक श्रेष्ठ व्यक्ति बना सके. अन्धकार को लाठी से कितना ही पीटें, अन्धकार दूर नहीं होगा, परन्तु हम एक छोटा सा दीपक जला दें तो अवश्य अन्धकार दूर होगा. इसी सोच की मूमि से प्रेरित यह एक विचार-प्रवाह होगा जो हमारा छोटा सा प्रयास होगा. ज्ञान दीप को हमें सदैव ही जलाये रखना होगा, तभी सगा-जगत में आज व्याप्त भयावहः विभाजक घटा छट सकेगा. छटने की गति हमारी पुनर्जागरण की गति पर निर्भर होगी और है.

          गोंडवाना वासी के इस खोजी इतिहास के लिये हमें आज गोंडवाना भूखण्ड में बिखरे हुए द्रविणी गोंडी भाषिक मूल निवसियों से संबंधित लोक-साहित्य में इतिहास के मौलिक सूत्रात्मक तथ्य कैसे और कब ? की प्रामाणिक दस्तावेज को, संकलित करना अधिक आवश्यक हो गया है. भारत में गोंडवाना-जगत का प्रादुर्भाव और हमारी सगा-समाजिक संरचना में समाहित प्रकृति सादृश्य दिव्य-शक्ति, गोंडी भाषा जगत, गोंडी दर्शन जगत, गोंडी संस्कृति जगत, गोंडी कला जगत, गोंडी लोकसाहित्य जगत, गोंडी भूखण्ड जगत इत्यादि मौलिक विषय वस्तुओं के तथ्यों से सृजनित हमारा यह खोजी गोंडवाना इतिहास अपने तथ्यात्मक कथावस्तु और दिव्य-शक्ति के सत्यज्ञान की चेतना-शक्ति को साकार रूप देने के लिये आज विभिन्न विषयों के विव्दानो की द्स्तावेजिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी, इसलिए भूगर्भ शास्त्रियों, मानव शास्त्रियों, समाज शास्त्रियों, भाषाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासविदों के विभिन्न तर्क कसौटी, के भट्टी में तपे तथ्यात्मक चेतना-शक्ति के सटीक प्रामाणिक कथ्य से दमकते निखरे प्रमाणों को, जो दिव्य सत्य की दमक से चढ़े आवरण को, ऐसी महत्वपूर्ण, तथ्यपूर्ण एवं प्रामाणित दस्तावेजों को ही उपयुक्त स्थानों में समावेस करने का हमे पूर्ण प्रयास करना होगा, तभी हम सत्य की उस दिव्य-शक्ति के ज्ञान-दीप से गोंडवाना-जगत में सोती-चेतना को झकझोरने के लिऐ निश्चित रूप से हम कुछ दृढ़-पग उठा सकेंगें. इसी सोच भूमि से प्रेरित होकर यह कृमिक संकलित की गई महत्वपूर्ण तथ्य है. यदि हमारी पुनर्जागरण के उद्देश्य-पथ में थोड़ा सा भी योगदान सगा-जगत को कर सका, तो यह हमारा विनम्र प्रयास कार्य सफलीभूत हो सकेगा, परन्तु हमें एक बात सदैव याद रखना होगा कि सत्य इतना कड़वा भी होता है कि वह उजागर करने की बहुत कम इजाजत देता है और जिन्हें दे देता है, वे उसी के घूंट पीकर मरण कर लेते हैं, लेकिन उनका मरना ही एक मृत-समाज की एक संजीवनी होती है.

          गोंडवाना-दर्शन समय चक्र है जो गोंडवाना जगत में व्याप्त आज की विसंगतियों और हमारी हीन भावनाओं अर्थात अज्ञानताओं का सर्वनाश करने के लिए चल पड़ा है. गोंडवाना  सगा जगत की अंतरात्मा में गुरु कृपा से प्रज्वलित यह पुरातन दिव्य ज्ञान शक्ति, जो मानवीय गुणों से भरपूर, तथ्यात्मक, पोषक यह सत्यज्ञान दीप की इस दिव्य चेतना शक्ति को सगा जगत पुनः जन मानस के मनो में आत्मीय पुनर्जागरण के शक्ति रूप में पुनरोत्थान करने के लिए, आज हमें अनवरत प्रयास करना होगा, तभी हम हमारे अतीत और वर्तमान के लिए जिन मूल्यों को हम अब तक स्वीकार करते रहे और हैं, उन्हीं सामाजिक मूल्यों को आज हम विवेक और तर्क की कसोटी पर निष्पक्ष होकर कसें, तभी हम हमारे समाजिक सगा-जगत के अधिक गहराई तक अर्थात मूल-भाव में पहुंच सकेंगे, जो सत्यज्ञान की ओर हमारे बढ़ते कदम का श्रीगणेश होगा. गोंडवाना दर्शन पत्रिका में प्रकाशित तथ्यपूर्ण सामग्री, न केवल वैज्ञानिक खोज प्रमाणों के तर्क-संगत संकलित तथ्यों की दस्तावेजी जानकारी है, वरन यह हमारे बिखरे लोकसाहित्य की अनवरत तलाश-पथ भी होगा. इसलिए सदैव चिर-परिचित अपनी समाजिक मूल्यों की अलग पहचान को पुनर्जीवित करके उसे अनवरत बनाए रखना ही हमारे लिये आवश्यक पोषक तत्व होगा. गोंडवाना के विभिन्न हिस्सा में लुके-छिपे, दबे-गड़े इतिहास की तलाश ..... हमारी अपनी वैज्ञानिक विरासत और वैज्ञानिक संस्कृति की तलाश .... कितना विशाल आयोजन है, इस तलाश के पीछे ...... और कितना सफल हो गया है, यह आयोजन हमारे सगा-जगत के लिए, यह हमारा अंतरंग आंकलन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न चिन्ह होगा, उस प्रश्नोत्तर की तलाश हमे होगी. गोंडवाना-दर्शन ऐसे ही युवा-मनों की तलाश में संलग्न है, जो गोंडवाना के विभिन्न हिस्सों और इतिहास के पृष्ठों में गोंडवाना की अपनी छाप को तलाशने में रोमांचक अभियान पर निकल सके, परन्तु उनका इरादा तो सत्य की सर्वोच्च ज्ञान-शक्ति, की प्राप्ति है. गोंडवाना जगत को अब जानने और समझने का अनुपम समयावसर के लिए आज योग चक्र बनता हुआ दृष्टिगोचर होता है, जिसके मिलन केन्द्र बिंदु में समाहित तत्वज्ञान, वैज्ञानिक सोच की परंपरा में कितनी पुरानी हैं ? ...... कि विज्ञान क्या मात्र पश्चिम की देन है .........? मूल तथ्यों को विवेचनात्मक विचारधारा, में चिंतन और मनन के माध्यम से सृजनित पुनर्विचार की शक्ति ही हमारी अज्ञानता को दूर कर हमे पुनर्जागरण के मूलमंत्र की एकात्मक शक्ति के रूप में सत्य मार्ग का दिव्य-दर्शन प्रदान करेगी ऐसी हमारी चिंतन प्रवाह है.

          यह वह महान भूखण्ड है, जहां जन्मे सिंह सपूतों ने अपने अदम्य साहस, शौर्य पराक्रम, तपस्या, बलिदानों के मानव-सेवा के साथ ही जंगम और स्थावर जीव-सेवा की अदभुत अलख जगाई और उसी सत्यज्ञान की जय सेवा पथ परम्परा में लौह-लाडली ललनाओं की हिस्सेदारी भी कहीं कम नहीं है. उनके जौहर और उत्सर्ग की अमर-गाथाएँ आज भी गोंडवाना जगत में, उनके बिखरे-उत्सर्ग की सोंधी मिट्टी से रचे सने, मन-मोहक, तथ्य, कथ्य के चंहुमुखी मानवीय सुगंध से सृजनित जय-सेवा दिव्य शक्ति जन मानस के मन को प्रेरित कर, उव्देलित करती रहती है और युग युगों तक करती रहेगी. हमारे इस चिर गौरवान्वित खोजी इतिहास की तलाश कड़ी में, यह हमारा विनम्र कार्य केवल संकलन में कृमिक कार्य में कथावस्तु को जोड़ने वाली एक कड़ी मात्र ही प्रयास होगा. गोंडवाना की समृद्धि, गोंडवाना की भौतिकी एवं भौमिकी इतिहास, गोंडवाना की समृद्ध पुरातत्व गोंडवाना जगत का महामानव, गोंडवाना धर्म जगत (कोया पुनेम जगत) गोंडवाना का गोइंदारी वाणी खोज वाली कुल देवताएं गोंडवाना की संगीतिक उपलब्धियां, गोंडवाना की गौरव गाथा इत्यादि हमारी मौलिक विचार प्रवाह है. गोंडवाना जगत को यदि खोजी विचार प्रवाह हमारे इतिहास सृजन में कुछ योगदान कर सका, या सत्य तथ्यों को उजागर करने के गौरव पथ में, कुछ शोभा वृद्धि कर सका, तो हमारा यह प्रयास सफल हो सकेगा. प्रमुख विषय वस्तुओं के बिभिन्न शीर्षकों पर लिखित और आज तक प्रकाशित महत्वपूर्ण तथ्यों पर हम पुनर्विचार करेंगें, तभी हमे सत्य मार्ग का पथ दृष्टि गोचर हो सकेगा. कहने का हमारा तात्पर्य है कि ज्ञान से ही हमे सत्यमार्ग मिल सकेगा और आत्मिक पुनर्जागरण से ही हमे सत्यज्ञान मिल सकेगा, तभी हम अपनी खोई हुई आस्था विश्वास, आत्मबल के दिव्यज्ञान को पुनः प्राप्त कर सकेगें. ऐसी हमारी सोच धारा है. इसलिए गोंडवाना जगत में हमारा विनम्र निवेदन होगा की अपना स्पष्ट दिशा निर्देश निसंकोच हमे सत्य पथ के लिये देने का कष्ट करेंगें. हम बहुत उत्सुकता से गोंडवाना जगत के खोजी सुझाव आशीर्वाद की बाट जोह रहे हैं, इस आस में कि आपके खोजी तलाश फल का अनुपम सहयोग प्रदान में अनुग्रहीत करेगा.

          गोंडवाना भूखण्ड में आदिकाल से गोंडवाना मानव जगत अर्थात कोया वंशीय सगा जगत के हमारे जन मानस के मनों में अर्थात हमारे मानवात्माओं में बिखरे लोक कथासरों, लोक गीतों, लोक जीवन में आज समाहित विभिन्न तथ्य और कथ्य सामग्री जो हमे आज उपलब्ध होगा, वह हमारा पुरातन समाजिक संरचना में लोकतंत्र व्यवस्था की देंन रही और है. उस महान शक्ति को हमे आज अनवरत बनाये रखना ही होगा. तभी हम हमारे गोंडवाना जगत के उपयुक्त और सही छबि की छाप सहित अलग पहचान के साथ हम आज जीवित रह सकेंगे. इसी मूल भावना से प्रेरित होकर, हम हमारे गुरु कृपा से प्राप्त गोंडवाना की दिव्य शक्ति स्थावर और जंगम जीव जगत के लिये लोंगो के अमर संदेश में निर्दिष्ट सेवाभाव जय सेवा प्रकृति सेवा मानव सेवा की महान सेवा शक्ति के संदेश के साथ भी हम न्याय कर सकेंगे. यही सोच प्रवाह हमे सबसे पहले हमारे धरती जगत (मात्र शक्ति के रूप में वनस्पति जगत (पितृ शक्ति के रूप में अर्थात जीवन शक्ति) और जीव जगत (फड़ापेन की शक्ति के रूप में) पुर्वांकित महान दिव्य शक्तियों के लये कृतज्ञता प्रगट करने के पुरातन पद्धति को हम आज भूलें नहीं, क्योंकि हमारे गोंडवाना जगत के धर्म प्रदर्शन में आदि धर्म गुरु पारी कुपार लिंगों ने कोया पुनेम दर्शन अर्थात गोंडवाना धर्म दर्शन में, प्रकृति सादृश्य क्रिया प्रक्रिया की सर्वोच्च दिव्य ज्ञान के अटूट विश्वास को कोया जगत अर्थात गोंडवाना जगत में आदि काल से हमारे आंतरिक मनों में एक आश्चर्य चकित दिव्य चेतना दीप को प्रज्वलित की है, जो चिरंतन सत्यज्ञान, सत्यमार्ग प्रकृति सादृश्य और विज्ञान सम्मत भी है. गोंडवाना जगत सदैव इसके उपर रहे और है, केवल आज हमे हमारे प्राचीन मूल्यों की सामाजिक मान्यताओं के मूल भाव को आज के वैज्ञानिक परिवेश में तुलनात्मक अध्ययन कर पुनर्विचार करना ही हमारे लिये बहुत आवश्यक और उपयुक्त तथ्य होगा. क्योंकि वही समन्वित निष्कर्ष तथ्य ही हमारी मानसिकता की सोच पथ की स्पष्ट दिशाबोध कर सकेगा. इसलिए गोंडवाना भूखण्ड की भौतिकी संरचना से संबंधित खोजी कथा वस्तु की इतिहास में सोभा वृद्धि के लिये सबसे पहले हमारी माटी से जुड़े धरती माता की वैज्ञानिक परिवेश में खोजी कथा से हम शुभारंभ करते हैं.

          धूल के बादल से महाद्वीपों और समुद्रों का ग्रह यह समझा जाता है कि पृथ्वी अपने अस्तित्व में सौर-प्रणाली के एक भाग के रूप में बनी. यह अपने अस्तित्व में किस प्रकार आई, निर्माण के समय इसका स्वरूप क्या था ? और इसकी उपरी पपड़ी आवरण और बीच के भाग के अपने वर्तमान स्वरूप में इसका विकास किस प्रकार हुआ इन बातों के बारे में वैज्ञानिक एक मत नहीं हैं. संभवतः पृथ्वी गैस और धूल के चक्कर लगाते हुए बादल से बनी है. अपनी प्रारंभिक आस्था में पृथ्वी सिलिकन यौगिकों, लोहे, मैग्नेशियम आक्साइडों तथा सभी प्राकृतिक रासायनिक तत्वों की थोड़ी थोड़ी मात्रा में एक पिंड के रूप में बनी. ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी आरंभ में ठंडी थी. निश्चित ही यह गरम नहीं रही होगी. इसके बहुत से उड़ जाने वाले तत्व, जैसे पारा वर्तमान में समान मात्रा में अधिक दिन नहीं टिक सके. अपने निर्माण के समय धरती गरम होना शुरू हुई. गर्मी तीन स्त्रोतों में प्राप्त हुई. पहला स्त्रोत वे परमाणु थे जो स्थिर स्थिति में आ गई थी. घूमते रहने की उनकी ऊर्जा ऊष्मा की ऊर्जा में बदल गई. इस गर्मी में से कुछ गर्मी पृथ्वी में ही बची रही. दूसरा स्त्रोत है इसका आंतरिक भाग पृथ्वी के विकसित होने से इसका अंदरूनी भाग सतह पर जमने वाली सामग्री के वजन से कड़ा हो गया. इस प्रकार कड़क होने से गर्मी पैदा हुई, जिसका अधिकांश भाग पृथ्वी के बाहर जमा होने वाली सामग्री के कारण अन्दर ही रह गया. इसके आलावा पृथ्वी में प्रवेश करने वाले यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम जैसे रेडियों धर्मी पदार्थों के पृथ्वी में प्रविष्ट होने से उनके नष्ट होंने पर गर्मी पैदा हुई गर्मी के पहले दो स्त्रोत पृथ्वी के पूर्णतः बन जाने के पश्चात समाप्त हो गये किन्तु रेडियो धर्मिता की गर्मी आज भी बराबर बन रही है, चूँकि चट्टानों में से गर्मी आसानी से बाहर नही निकल पाती इसलिए धरती की सतह के नीचे पैदा होने वाली गर्मी बहुत धीरे-धीरे बाहर निकलती है.

          प्रकृति में प्राप्त मूलतत्व हाइड्रोजन (परमाणु संख्या १) लेकर सबसे भारी मूल तत्व यूरेनियम (परमाणु संख्या ९२) तक. प्लूटोनियम नामक मूलतत्व (परमाणु संख्या ९४) यूरेनियम और थोरियम के अयस्कों में सूक्ष्म मात्रा में मिलता प्रकृति की इन्हीं बहुमूल्य ९२ मूलतत्वों की भौतिकी क्रिया प्रक्रिया से सृजनित, इस भौतिक धरती जगत के निर्माणावधि के काल चक्र में हमे खोजी महत्वपूर्ण तथ्यात्मक वैज्ञानिक कथावस्तु आज उपलब्ध हुआ है उसमें प्रकृति के मूलतत्व का धरती निर्माण के भौतिकी विकासावधि में योगदान किस स्थिति में, किस रूप में, किस प्रकार मिला यह प्रश्नोत्तर हमारे लिए अभी तक रहस्य बना रहा, उसी चिंतन प्रवाह में हमारे पुर्वांकित खोजी वैज्ञानिक कथावस्तु को गोंडवाना जगत के लिए आज प्रस्तुत किये हैं, यदि वह हमारे सगा जगत के चिंतन धारा में आज कुछ मदद कर सका, तो हमे बड़ी खुशी अनुभव होगी. गोंडवाना भूखण्ड में आदिकाल से गोंडवाना जगत में चिरपरिचित सामाजिक प्रथा या मान्यता के मूलभाव में हमारे कोया वंशीय मानव जगत अर्थात कोयतुर सगाजगत के अंतरात्मा में गोंडी कुल देवताओं ५ के प्रति अटूट विश्वास का सुदृढ़सेतु कैसे सृजनित हुआ यह प्रश्नोतर भी हमारे सामाजिक-जीवन में आज रहस्य बना हुआ है. उसकी पुष्टि के लिए आज हमे लोक जीवन में सदैव प्रवाहित हमारी मात्र-भाषा की शक्ति से सृजनित बिखरे लोक-साहित्य से निःसन्देह हो सकती है, इसलिए आज अधिक आवश्कता है इस चिंतन-प्रवाह से पुनर्विचार करने की. उसके तथ्यात्मक इतिहास कथावस्तु क्या है ? खोजना और मौलिक तथ्यों में विवेचनात्मक अध्ययन के लिए, आज हमे हमारे धर्म दर्शन के मूल तथ्यों का भी स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी आवश्यक है. गोंडवाना धर्म दर्शन के संस्थापक महामानव, आदि धर्मगुरु पहान्दी पारी कुपार लिंगों के मानव कर्तव्य संदेश में निर्दिष्ट दर्शन तथ्यों का कथावस्तु क्या है ? वह और न कुछ होकर मोटे तौर पर केवल प्रकृति की सर्वोच्च दिव्य-शक्ति से सृजनित, सत्यज्ञान के रहस्यात्मक तथ्यों की केवल महत्वपूर्ण दस्तावेजीक जानकारी है, का दिव्य ज्ञान शक्ति हमे कैसे मिला ? यह प्रश्न चिन्ह गोंडवाना जगत को अवश्य आज उठित होगा, क्योंकि विभिन्न धर्मों के भ्रमजाल से भ्रमित होकर, आज हम गोंडवाना धर्म जगत के सत्यज्ञान से अनभिज्ञ है, यही आज हमारी कमजोरी हीन भावना और अज्ञानता है, जो हमारे आत्मबल में गतिरोध उत्पन्न करती है. विवादास्पद तथ्यों के लिये शोध और स्पष्ट हमारा चिंतन-प्रवाह विवेचनात्मक प्रक्रिया का ही दिशा-बोध होगा. गोंडवाना-जगत की अंतरात्मा में दिव्य सत्यज्ञान की ज्योति की आदिकाल से ही गुरु की परंपरा ने प्रज्वलित किया और है, तभी तो इतिहास और धर्म के अनेक कठिनाइयों के बाद भी, आज हमारा गोंडवाना-दर्शन विद्दमान है. प्रकृति सादृश्य तत्वज्ञान पर आधारित गोंडी-दर्शन को स्थापना आदिकाल में धर्म गुरु लिंगों ने की और सगा सामाजिक संरचना में उसी दर्शन की मान्यताओं के मूल्यों को व्यवहारिक रूप से प्रदान कर सामाजीकरण किया, इसलिए आज भी हमे हमारे समाज में विधिवत विद्दमान दृष्टिगोचर होता है. वैज्ञानिक परिवेश और हमारे दर्शन परिवेश के मौलिक तथ्यों पर विवेचनात्मक अध्ययन ही, गोंडवाना-जगत को अपने दर्शन के वास्तविक महत्व से, आज पुनः परिचित करा सकेगा.

          दोनों तथ्यों में आज समन्वित चिंतन-प्रवाह की हम, अधिक आवश्यकता महसूस करते हैं, ताकि हम इसमें कितनी समानता है, इस पर आज सोचने समझने और बिचारने का प्रमुख दायित्व गोंडवाना-जगत पर होगी, क्योंकि आज हमे यह स्पष्ट जानना और समझना अधिक आवश्यक हो गया है, कि गोंडवाना-जगत में वैज्ञानिक-चिंतन की परंपरा कितनी पुरानी है ? कि विज्ञान क्या मात्र वर्तमान-युग की देन है ? संदर्भित कथावस्तु गोंडी विचारक, मूर्धन्य गोंडीविद, प्रसिद्ध गोंडी साहित्यकार को विज्ञान-सम्मत, तर्क-संगत, तथ्य पूर्ण और महत्वपूर्ण गद्यांशों का हम अग्रिम पृष्ठों में उल्लेख करेंगें. गोंडवाना-जगत को विवेक और तर्क की कसौटी पर कसेंगें, तभी हम स्पष्ट मूल्यांकन कर, समझ सकेंगें.

          कली कंकाली अर्थात जंगो रायतार माता के आश्रम के बारह पुत्र कालांतर में कोया पुनेम के आदि धर्म गुरु पहांदीपारी कुपार लिंगों के शिष्य बने. उनका देव सगा गोत्र विभाजन की प्रक्रिया ऐसा रहा- सावरी (सेमर) वृक्ष के पत्तियों के गुट समूहानुसार और सूर्य माला के ग्रहों की रचनाधार पर क्रमशः उन्दाम, चिन्दाम, कोन्दाम, नाल्वेन, सैवेन, सार्वेन, येर्वेन, अर्वेन, नर्वेन, पदवेन, पार्वूद और पार्र्ड  किया. प्रथम सात देव-सगा धारकों में सात सौ (७००) कुल गोत्र नाम है, कोआकाशी, शेंदरी, जामूनी, नीला, हरा, पीला, और लाल रंग का वस्त्र दिया और शेष पांच सगाओं (भूमक शाखा सगा) के केवल पचास (५०) कुल गोत्र नाम है, को सूर्य प्रकाशी (पुरवा तिरेपी) अर्थात सफेद रंग का वस्त्र दिया. अपने सभी शिष्यों को धर्म गुरु पारी कुपार लिंगों ने सगा-गोंगो बाना से सुसज्जित कर गोंएन्दाडी (गोंएंडी, गोंडी) भाषा में कोया पुनेम ज्ञान की दिव्य ज्योति दी. वे ही मूल मानव-समाज कालांतर में कोयावंशीय सगा-जगत के कुल-देवताएं अर्थात मूल पुरुष कहलाये. वंशोत्पत्ति के लिए स्त्री सत्व भी आवश्यक तत्व है, जो विज्ञान सम्मत महत्वपूर्ण ज्ञान तथ्य है, इसलिए कोयतूर-जगत में बारह कुल-देवियाँ अर्थात मूल स्त्री सत्व को भी कुल-देवता ही कहा गया, यही कुल देवी देवताएं ही आज कोयतूर-जगत में व्याप्त मूल चौबीस कुल-देवताओं की बहुप्रशंसित तथ्यपूर्ण संख्या रहा और है. कोयावंशीय मानव जगत में, जब कोया-पुनेमी प्रचार-प्रसार का कार्य सम्पन्न हो चुका, इसके अलावा सगा-संबंध प्रस्थापित प्रक्रिया में कठिनाईयां उत्पन्न होने लगी तब कोयतूर जगत में व्दितीय पुनेम मुठवाशय लिंगों (रावेण पोन्याल) ने कालांतर में बारह मूलसगा देवी (जंगो रायतार माता शाखा के एक, दो और तीन देव. आदि धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के चार, पांच, छ:, सात देव. इन सात सगा देवों के भुमक शाखा के आठ, नौ, दस, ग्यारह और बारह देव) को सामाजिक और धार्मिक दर्शन में सगा समायोजन की विलीनीकरण के महत्वपूर्ण प्रक्रिया को, आदि धर्म गुरु पहांदीपारी कुपार लिंगों से मूल-सिद्धांत सम और विषम देव-संख्या के भावना के अन्तर्गत संपन्न किया, जिसमे उन्होंने धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के मूल चार कुल सगा देवताओं को हरेक सगा देवता के साथ सगा समायोजन प्रक्रिया को सम्पन्न किये, जिसमे एक सगा देव भूमक शाखा से और दूसरा सगा देव जंगो रायतार माता शाखा से लिया गया जो मूल सात सौ पचास (७५०) कुल गोत्र नामों में सगा समायोजन की प्रक्रिया निम्नांकित है :-


१.   चार देव के साथ + दस देव शाखा + दो देव शाखा - १०० + १० + १०० = २१०
२.   पांच देव से साथ + नव देव शाखा + एक देव शाखा -  १०० + १० + १०० = २१०
३.   छ: देव के साथ + आठ देव शाखा + बारह देव शाखा  - १०० + १० + १० = १२०
४. सात देव के साथ + ग्यारह देव शाखा + तीन देव शाखा - १०० + १० + १०० = २१०

कुल योग = ७५०

          गोंडवाना भूखंड में मूलनिवासी गोंडी-भाषिक धरती-पुत्रों को अपने गोंडी-जगत में, गुरु-कृपा ने आदि-काल से ही हमारे सगा समाजिक संरचना में, इस अदभुत दिव्य ज्ञान-शक्ति गोंडी तत्वज्ञान में फड़ापेन शक्ति का दर्शन, गोंडवाना कुल-देवता की सैद्धांतिक मान्यता पर आधारित हमारे चौबीस मूल वंशोत्पादक कुल-देवता का दर्शन, सगा देव धारकों के कुल-गोत्र नाम और कुल गोत्र चिन्ह का दर्शन, सगा देव बाना अर्थात सगा धर्म ध्वज का दर्शन, सम-विसम सगा-गोत्र और कुल चिन्ह के सगा-शाखाओं में ही वैवाहिक संबंध प्रस्थापित करने का दर्शन, सम-विसम गोत्र नाम और सम-विसम कुल चिन्ह से धारकों के माध्यम से ही प्रकृति-संतुलन करने का दर्शन, इत्यादि इस मौलिक गोंडी तत्वज्ञान को गुरु-शिष्य परम्परानुसार ही, इस दर्शन को व्यव्हारिक रूप से व्यवस्थापित किया था और है. गोंडी लोक साहित्य में बिखरे अनमोल मोती, जो आज उसकी स्पष्ट पुष्टि करती है और सगा-जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारणीय तथ्य चार संभाग के भूखण्ड, चार वंश के मानव, चार गोंडी तत्वज्ञान के महामानव धर्म गुरु, बारह मूल सगा देवों के समायोजन प्रक्रिया के उपरान्त (प्रकियोपरांत) कालान्तर में चार मूल सगा देव शाखाओं की मान्यता, इत्यादि मौलिक तत्व भी आज उपलब्ध करती है. गोंडी तत्वज्ञान और तथ्य से भली भांति सगा-जगत आज पुनर्परिचित हो गये ही होंगे, ऐसा हमारी समझ है. चार अंक संख्या की यह बहुचर्चित और सोचनीय तथ्यात्मक प्रशंग है जो निसंदेह आज सगा–जगत के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न-चिन्ह होगी. क्योंकि बारह मूल सगा देवों की समायोजन प्रक्रिया के कालान्तर में उभरी, यह हमारे मूल कुल देवताओं की बहू प्रशंसित चौबीस संख्या की ही सिर्फ गणनात्मक मान्यताओं का सूचक-संख्या रही होगी और है. धर्म गुरु कुपार लिंगों शाखा के मूल चार, पांच, छ: और सात सगा देवों की अंक संख्या को जोड़े तो सिर्फ बाईस-सगा देवों की संख्या हमे मिलती है. उसमे हमारे अन्य आठ मूल सगा-देव शाखाएं भी मूल गोंडी सिद्धांतिक प्रक्रिया के तहत सम्मिलित की गई है. इसके अलावा आदि धर्म गुरु पारी लिंगों और आदि क्रांति देवी जंगों रायतार माता को भी जोड़े तो हमे जो संख्या मिलेगी वह हमारे चौबीस मूल सगा देवों की गणनात्मक संख्या का सूचक चिन्ह होगा, परन्तु विश्व-निर्माण में हमारे गोंडवाना-जगत की इस महत्वपूर्ण बहु-प्रशंसिय चौबीस मूल वंशोत्पादक कुल-देवताओं के योगदान को दुनिया नकार नहीं सकती. इसी संदर्भ में कोयतूर सगा-जगत के चिंतन और सोधक् मान्यवर ऋषि मसराम ने भी अपने शोध-लेख में जानकारी भी दी है, कि कोयतूर धर्म जगत में आदिम समाज के आधदेव लिंगों और जंगो रायतार, इनसे चार शाखाएं निर्मित हुई. १. राजा कोलासुर (काली) २. सेनापति-मायको सुगाल ३. तत्ववेत्ता-होरा जोती ४. देवदूत-तुरपोऊ-याल (महाकाली) इन चारो को ४, ५, ६, ७, देवों को २२ देव बनाया गया. इस संदर्भ में चार कुल सगा देवों के २२ देव आध देवता लिंगों और जंगो, यही हमारे २४ देवताओं की संख्या है. इसकी मूल देवताओं को वंश में ही हमारे सम्पूर्ण गोंडवाना-जगत निहित है.

          इस संदर्भ में प्रोफेसर चौहान ‘भारतीय शूर वन्य जमात गोंड’ में लिखते हैं, उसे भी हमे गोंडी तर्क-कसौटी में कसना होगा. बुढादेव ने इस सृष्टि का निर्माण किया है, बारह गोंड देवताओं ने इस सृष्टि का निर्माण किया है. गोंड बारह देवताओं का धार्मिक रूप व व्यवहार आज भी पुरानी रीति से है. इसके देवता भी प्रथक हैं. इनका देवता बूढ़ा है, जिसमे बड़ादेव भी समाहित हैं, जो सभी देवी की सहयोग से बना है. बूढ़ादेव समूह से बना होगा ऐसा भी लोग बताते हैं. कुछ भी हो तो भी गोंड लोगों के विश्व-निर्माण में चौबीस देवताओं का विशिष्ट महत्व है. इसलिए कोयतूर-जगत के धार्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक जीवन-मूल्यों की मौलिकता को समझें तभी हम कोयतुर-जगत को करीब से समझ सकेगें अन्यथा नही. इसी संदर्भ में हम एक और प्रसिद्ध गोंडी साहित्यकार मान्यवर लिखारी सिंह वट्टी के लेख ‘गोंडी संस्कृति का प्रतीत अशोक चक्र’ का प्रसंगांश भी उल्लेख करते हैं. हमे उनके विवेचनात्मक तथ्यों पर विशेष ध्यान देना होगा. कोया वंश चक्र में धम्म-चक्र का स्वरूप स्वयं ही स्पष्ट है. इसका पूर्व स्वरूप तथा विकसित संकल्प राजा अशोक ने अपने शिल्पकला में स्पष्ट किया है. जिसमे राजा अशोक ने सिंह मुद्रा शांति-चक्र का रहस्योदघाटन प्राचीन-काल में अनार्य गोंड कितने ही आर्यों के पूर्व से ही भारत में निवास कर रहे हैं. अशोक के चौबीस चक्र गोंड देवताओं के चौबीस बहुप्रशंसिय वंशोत्पादक याने बुद्ध धर्म में से चौबीस चक्र आभास होता है. यह भी अत्यंत सूचक तथा सोचनीय कल्पना है कि गौतम बुद्ध भी मुरीय गोंड थे, इसलिए गोंडी संस्कृति के संकेत तथा कल्पना उनके धर्म चक्र में मिलता है. आगे लिखते हैं कि धम्म-चक्र हिन्दू की कल्पना तथा पुराणों में कही गई बात ठीक नही है. धम्म-चक्र गोंडी-संस्कृति का शत प्रतिशत प्रतिबिम्ब है. मूल चक्र गोंडी संस्कृति की प्रतीक है. मूल स्त्रोत धम्म-चक्र का गोंगो संस्कृति ही है. हमारी भूल के कारण हिन्दू समाज के लोग, गुमराह करने के लिए नहीं चूकते कि धम्म चक्र हिन्दू का ही अंग है. अब हमे सजग होना होगा तथा स्पष्ट समझना होगा कि हमारा राष्ट्रीय चिन्ह धम्म चक्र (अशोक-चक्र) ही गोंडी संस्कृति का मूल स्त्रोत है.

          सारांश यह है कि गोंडवाना-जगत की उत्पत्ति और हमारी सगा-समाजिक संरचना में हमारे मूल धार्मिक और व्यवहारिक जीवन मूल्यों में सदैव उन्नति हित रीति-नीति का सीधा संबंध मोटे तौर पर प्रकृति सदृश्य नियम की उस सृजन-प्रक्रिया (धरती-जगत की दिव्य-शक्ति, वनस्पति-जगत की दिव्य-शक्ति, जीव-जगत की दिव्य-शक्ति) में अंतर्नीहित शक्ति की दिव्य ज्योति का ही संक्षेप में हमारी यही एकात्मक गोंडी तत्वज्ञान और दर्शन की मौलिक कथावस्तु रहा और है, जो जंगम और स्थावर जीव-धारियों के लिये सर्वथा उन्नत एवं समृद्ध दिव्य शक्ति रहा है और है. वह गोंडवाना के गौरवशाली अतीत का सदैव एक स्वर्णिम पृष्ठ रहा और है. हम गोंडवाना-वासियों को उस दिव्य-ज्ञान पर गर्व रहा है और है. उसकी मौलिक ज्ञान और तथ्य आज विज्ञान सम्मत भी है. जिस युग में हम सिधु घाटी सभ्यता के धनी थे, उस काल में पश्चिम की आनेक् जातियां असभ्य एवं बर्बर जीवन व्यतीत किया करती थी. इस बात का भी हमे ध्यान रहे कि बहुत संभव है, इससे भी अधिक व प्राचीन अवशेष भारत की रलगर्भा भूमि के निचे दबे पड़े हो, इसलिए भी गोंडवाना में चहूँमुखी खोज की आज आवश्यकता जान पड़ती है, क्योंकि महत्वपूर्ण नवीन जानकरियां तभी हमे प्राप्त हो सकेगा. आज हमारे पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि किसी समय पृथ्वी का सम्पूर्ण भूखण्ड २X१० की घात ८ वर्ग किमी. (८ करोड़ वर्ग मील) के एक मात्र महाव्दीप के रूप में था. उस आदिमयुगीन महाव्दीप आज ‘पेंजिया’ के नाम से जाना जाता है. लगभग १९ करोड़ वर्ग जुरेसिक काल में यह दो विशाल महाव्दिप में बट गया और लारेशिया (यूरेशिया, ग्रीनलैंड, उतरी अमरीका तथा ‘गोंडवाना लैंड’ (आफ्रिका, अरब, भारत, दक्षिण अमरीका, ओरोनिया, अंटार्कटिका) नाम दिये गये. लगभग १२ करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना लैंड भी दो भागों में विभक्त हो गया. आज के लगभग ४५ करोड़ वर्ष पूर्व अर्थात, आडोबिशियन-काल तक दक्षिणी ध्रूव संभवत: वहाँ था, जहां आज सहारा का मरुस्थल है.

          मानव समाज की अनेक जातियां केवल, अपने आपको उच्च-वर्ग और सभ्य-समाज के साथ जोड़ने और समझने की लम्बी-दौड़ में लम्बे-समय से संलग्न रहे और हैं. अपितु यह न जाने बिना कि उनका अखण्डित सत्यज्ञान और दर्शन क्या रहा और है ? इसलिए वे मिथ्याभिमान से ग्रस्त और भ्रमित रहे और हैं. वे मानव समाज की इस दिव्य अखण्डित सत्यज्ञान तथा परखज्ञान और मानवीय जीवन मूल्यों की समाजीकरण में प्रकृति की अदभूत अनमोल और खोजी एकात्म तत्व, जिसमे मानव जाति की सही आदर्शो पर चंहुमुखी उन्नति, समृद्ध, सुखमय-जीवन और मनुष्यता के भाव में अन्तनिहित दर्शन रहा है. ऐसे दिव्य ज्ञान-ज्योति से वे अनजान रहे और हैं. उच्च-वर्ग और सभ्य-समाज से ही अपने को जोड़ने और उसमे समझने वालों के दिलों में, सृजनित-भू भाव कालान्तर में मिथ्याभिमान के दुश्चक्र के रूप में हमे यह मानव-विभाजित विभाजक-तत्व, वर्णभेद, जातिभेद, रंगभेद, भाषाभेद, धर्मभेद इत्यादि मिलता रहा और है. अमानवीय अहम-भावना की उनकी यही देन मानव जगत के लिए रही और है. इसकी पुष्टि मानव जगत को ठोस प्रमाणिक ऐतिहासिक घटनाएँ करती रही और है. इसके अलावा मानव समाज उसके अभिशाप के दुश्चक्र के रूप चतुर्दिक व्याप्त असमानता, अमानवीय, असमाजिक अज्ञानता, अवैज्ञानिक, कपोल कल्पित कथा को अदूरदर्शी तथ्यों ने ही मानव-जाति को कालान्तर में केवल विभाजित करती रही और है, फलस्वरूप उनमे शोषण की प्रवृत्ति बढती गई और मानव-जगत में उनकी वर्ण-व्यवस्था ब्राम्हण यज्ञ के नाम पर, क्षत्रिय करों के नाम पर तथा वैश्य लाभ के नाम पर, भयानक रूप से शोषण करते रहे और हैं. इसकी पुष्टि ब्राम्हण-ग्रंथों से होती रही और है. हमारा सगा-जगत उनके दुश्चक्र से कैसे अछूत रखते ? इसकी पुष्टि हमारे ठोस एतिहासिक घटनाएँ भी करती है और है. उनके द्वारा बोये गये फूट के बीजों की ही देंन रही है की हम अपने ही धरती और अपने ही गोंडवाना—आदर्शों के जीवन-मूल्यों पर आधारित सच्चे इतिहास से भी अनजान रहे और हैं.

          इस बात की भी हमे ध्यान रहे, कि जो धरती पुत्र सदैव मानव-पोषण अन्नदाता रहा और वह अपने ही धार्मिक और सामाजिक दर्शन मूल्यों पर आधारित सच्चे-इतिहास से प्रेरक-शक्ति प्राप्त करता रहा और है. वह मानव समाज कभी मृत नहीं रहा है और न रहेगा क्योंकि उसका निश्चित रूप से अस्तित्वकर्ता सदैव उपलब्ध रहा है और रहेगा. सगा-मानव का जन्म (प्रादुर्भाव पयुंडाय, सुधार) और मृत्यु (अस्तित्व विहीन भुरडाय, बिगाड) ठीक उसी तरह है जैसे प्रजनन शक्ति और प्रकृति बिगाड़-शक्ति की गुण धर्म परिवर्तनशील है, जो अखंडित सत्यज्ञान रहा है और रहेगा उसका कोया-जगत सदैव उपासक रहे, हैं और रहेगा. गोंडवाना-जगत में हमारा सगा-समाज सदैव गोंडवाना के जीवन मूल्यों पर आधारित सच्चे अस्तित्व में रहा है. और रहेगा. कोया मानव आते-जाते रहेगें जो एक शास्वत प्रक्रिया की अखण्डित नियम और सत्यज्ञान है. गोंडवाना-जगत में-चतुर्दिक बिखरे हमारी लोक-साहित्य में समाहित अनमोल, अमृत-विचार के दिव्य मोतियों का संकलन, अध्ययन और चिंतन-मनन की आज अधिक आवश्यकता जान पड़ती है, क्योंकि तभी हम हमारे दर्शन की समाजीकरण में बिखरे अलिखित अर्थात मौखिक दिव्य ज्ञान-ज्योति के ठोस प्रमाणों को सगा-जगत में स्थापित आदर्शों के नियम और उनके संस्थापक महामानव को आज हम स्पष्ट जान सकेंगें. हमारे सामाजिक संरचना में अंतर्नीहित लोकतंत्रिक आदर्शों, नियम की स्थापना के साथ ही राष्ट्र की स्पष्ट धारणा, तब सृजनित हो चुकी थी, जब आज का उच्च-वर्ग और सभ्य कहा जाने वाला समाज चरवाहों के घुमक्कड़-जीवन व्यतीत करता था. इसकी पुष्टि मोहनजोदड़ो की सभ्यता और संस्कृति करती रही और है. संस्कृति का संबंध मनुष्य के उदात्त गुणों के साथ है, जबकि सभ्यता भौतिक सुख-समृद्धि का घोतक करती है. सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य को मानव के रूप में विकसित करना सभ्यता एवं संस्कृति दोनों का लक्ष्य रहा है. दोनों के स्वरूप में बहुत कुछ मिले-जुले और परस्पर पूरक होते हैं. इसलिए कोयतूर-जगत को अपने धार्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक सच्ची जीवन-मुल्यों को सच्ची सामाजिकता को ठीक से समझना होगा तभी कोयतूर-जगत अपने आदर्शों को आज समझ सकेगा. यही विचार मंथनोपरांत जानना, समझना और व्यवहारिक रूप में आदर्शों को मानना ही हमारी आत्मिक पुनर्जागरण की दिव्य शक्ति होगी, जो हमारी खोई हुई आत्मज्ञान को पुनर्स्थापित करने में अधिक बल देगी, जैसे हमारी सोच की मानसिकता बनती है.

          धरती निर्माण के प्रारम्भिक कालखण्ड में भौतिक प्रक्रिया की वैज्ञानिक मूल्यों पर तथ्यों में, यदि हम तुलनात्मक अध्ययन निष्पक्ष करें तों हमे गोंडवाना-जगत के सामाजिक आदर्शों के दर्शन में, उसके सच्चे मौलिक तथ्यों के जड़ों तक पहुंचने में अर्थात भली-भांति समझने में, यह वैज्ञानिक तथ्य आज हमे आत्माधिक सहायक सिद्ध करेगी ऐसी हमारी  मानसिकता की समझ है. मध्य भाग आवरण और पपड़ी पृथ्वी में गर्मी के सदैव बने रहने वाले इस स्त्रोत से पृथ्वी के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ा है. पृथ्वी की प्रारम्भिक अवस्था में रेडियो धर्मी बहुत तेजी से बनी, किन्तु उतनी तेजी से निकल नहीं सकी, उसके कारण लाखो वर्ष बाद पृथ्वी में तापमान लोहे के पिघलने के तापमान तक पहुँच गया, किन्तु पृथ्वी के बीच-बीच में ऐसा नहीं हुआ. पृथ्वी के बीच का हिस्सा सबसे गरम इलाका होने के बावजूद सबसे अधिक दबाव वाला हिस्सा भी बना रहा. किसी धातु के पिघलने का तापमान उस पर पड़ने वाले दबाव में वृद्धि होने से बढ़ता है. जिस-जिस क्षेत्र में लोहा पिघला वह पृथ्वी के अन्दर ४०० से ८०० किलोमीटर (२५०-५०० मील) की गहराई में था जहां पर तापमान और दबाव का एक उपयुक्त समन्वय मौजूद था. लोहे के पिघलने से वह बूंद-बूंद बनकर पृथ्वी के बीच में आना शुरू हो गया क्योंकि लोहे की वे बुँदे आसपास की अन्य समग्री से अधिक भारी थी. लोहे के इन बूंदों के जमा होने से इसकी गुरुत्वाकर्षण उर्जा गर्मी की उर्जा में बदल गई, जिससे पृथ्वी का तापमान और भी अधिक बढ़ गया. तापमान में इस वृद्धि से लोहे के पिघलने का क्षेत्र तब तक बढ़ता गया, जब तक वह पृथ्वी के अन्दर तकरीबन सारे भाग में नहीं फ़ैल गया. इस समय तक दूसरे अन्य तत्व भी पिछले. कुछ अंशतः और कुछ पूर्णतः भारी तत्व पृथ्वी के बीच में आ गये और हल्के तत्व ऊपर उठते हैं. वजन के कारण सामग्री अलग-अलग स्थान पर जमा होती गई. पिघलने वाले भारी तत्वों में मुख्य स्थान लोहे का था. ये तत्व पिघलकर पृथ्वी के बीच में द्रवरूप में जमा हो गये. हल्के तत्व में प्रमुख मात्रा सिलिकन की थी. वे तत्व पृथ्वी के सतह के भाग पर आ गये तथा वंहा ठंडे होकर कड़ो पपड़ी के रूप में जमा हो गये. बाकि मूल सामग्री बीह के और पपड़ी के मध्य आवरण के रूप में जमा हो गये.

          पृथ्वी के इतिहास का समय मान चट्टानों के निर्माण की सही तिथि दर्शाए जाने के बहुत पहले भू-वैज्ञानिकों ने एक सापेक्षित समय मान निर्मित किया था, जिसे उन्होंने युगों अवधियों तथा काल में विभाजित किया है. कुछ समय पहले तक पृथ्वी के निर्माण संबंधी मुख्य घटनाओं तथा पृथ्वी के उदभव के समय का अनुमान किया जाता था. किन्तु अब उनमे बहुत सी घटनाओं की तिथि बताई जा सकती है जो उनकी रेडियों धर्मिता के अध्यन से प्राप्त की गई हो.


प्रकृति की परिवर्तनशील शक्ति में भौतिकी प्रक्रिया की वैज्ञानिक मूल प्रमाणों पर आधारित उस सृजनित तत्वों को भी हम धरती-जगत की वैज्ञानिक उत्पत्ति के इतिहासानुसार राज्य से लगभग ३०० सौ करोड़ वर्ष पूर्व भूपटल के ठंडा होने से शैलों का सर्वप्रथम निर्माण इसी महाकल्प में हुआ था. इस महाकल्प में भूगर्भीय उथल पुथल तलछट एवं लावा का जमाव, अपरदन, भूसंचलन एवं पर्वतों के निर्माण की क्रियाओं की पुनरावृत्ति के फलस्वरूप विश्व के कतिपय प्राचीनतम कठोर भूखण्डों का निर्माण हुआ, जिसमे से दक्षिणी गोलार्द्ध में विस्तृत विशाल गोंडवाना भूखण्ड भी एक था. इसी गोंडवाना का एक भाग प्रायः व्दितीय भारत भी है, जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण छतीसगढ़ आता. यह महाकल्प लाखो जीवों को छोड़कर प्राणीविहिन एवं वनस्पति विहिन था. इस उपरोक्त उल्लेख प्रसंगांश में, भौतिकी प्रभाव से उत्पन्न तत्व परिणामों और भूखण्ड को समझकर, धरती निर्माण प्रक्रिया पर आज सगा जगत स्वयं विचार मंथन कर, तथ्यों पर निष्पक्ष मूल्यांकन करते हुये, स्वतः सत्य की ओर बढ़ें, यही हमारी शुभकामनाएँ होगी.
ठाकुर कोमल सिंह मरई
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बुधवार, 23 जनवरी 2013

गोंडवाना का सेवा सेवा जय सेवा महामंत्र

यही प्रकृति शक्ति है, यही मातृशक्ति है,
यही परिवार सेवा है, यही जन सेवा है,
यही समाज सेवा है, यही संसार सेवा है.
यह छोटे और बड़े, स्त्री और पुरुष
सभी में नीहित है. भूख में, प्यास में,
बस सेवा ही सेवा है. 
           "सेवा" कोयतूर का धर्म है, सेवा कोयतूर का नैतिक आचरण है, सेवा कोयतूर का सत्कर्म है, सेवा कोयतूरों का महामंत्र है. सेवा शब्द के अर्थ को लेकर अनेक व्यक्तियों में अभी भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है. कुछ लोग इसे शिव या शिवा का परिवर्तित रूप मानते हैं. कुछ लोग उच्च वर्ग के हित में निम्न वर्ग द्वारा किया गया कार्य या त्याग को सेवा मानते हैं. कुछ लोग मंदिर में मूर्ती को नियमित जल, फूल इत्यादि चढ़ाने को सेवा मानते हैं. मेरे ख़याल से ये सभी धारणा कोयापुनेमी "सेवा" धारणा से भिन्न है. कोयापुनेम का महामंत्र/मूलमंत्र सेवा है, जो मानवता और मानवीय संबंधों की शाश्वत रक्षा के लिए आदि गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो द्वारा कोया वंशियों को दिया गया है. कुपार लिंगो द्वारा सेवा के अंतर्गत निम्नलिखित की सेवा का विधान है :-

१-     जन्मदाताओं की सेवा 


          प्रत्येक जीव को इस सृष्टि का प्रथम दर्शन कराने वाली दो महाशक्तियां हैं. वे हैं सल्लां और गांगरा शक्ति के धारक माता और पिता. जिन माता पिताओं के प्रति हमारा रोम-रोम चिर है. हमारा तन-मन और बुद्धि उन्ही की दी हुई है. हमारे पास आज जो कुछ भी है, उन्ही की कृपा से है. जब हम पैदा हुए तो असहाय थे, न तो चल फिर सकते थे, न भोजन प्राप्त कर सकते थे, न ही अपनी रक्षा कर पाते थे. उस समय माता पिता ने ही स्वयं कष्ट उठाकर भी पैदा होते ही हमारी सेवा किये. उस समय यदि माता पिता की सेवा नहीं मिलती तो हम जीवित नहीं रह पाते. उन्होंने हमें नहलाये, धुलाये, मल-मूत्र साफ़ किये, स्तनपान कराये. इसलिए माता-पिता के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है की जब वे वृद्ध हो जावें तो हम उनकी पूर्ण सृद्धा और भक्ति से निस्वार्थभाव से तन, मन और धन से सेवा करें. जन्मदाताओं की सेवा ही सल्लां गांगरा की सेवा और सजोरपेन की पूजा है. जिसने माता पिता के महत्व को नहीं जाना, वह सजोरपेन को नहीं पहचाना. माता पिता को छोड़कर मंदिरों में मूर्ती पूजा किया, तीर्थों में घूम-घूम कर स्नान किया, वह व्यर्थ ही अपने जीवन के बहुमूल्य समय बर्बाद किया. कोयापुनेम में जन्मदाताओं की सेवा को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है. महिलाओं के लिए सास-ससुर की सेवा सर्वोपरी है. जिस कुल में महिलाएँ विवाह करके लाई जाती हैं, उस कुल के वृद्धजन उनके लिए पूज्यनीय होते हैं.


२-     संतान सेवा 


          युवा स्त्री-पुरुषों के विवाहोपरांत संतान की उत्पत्ति होती है. उनकी सेवा सुश्रुषा का पूर्ण दायित्व उनके माता पिता का होता है. यदि माता पिता अपने बच्चों की ठीक ढंग से सेवा एवं परवरिश करेंगे तो वे भविष्य में होनहार, योग्य नागरिक बनेंगे. बलिष्ट एवं विवेकशील बनेंगे, सत्चरित्र बनेंगे. उनमे सुसंस्कार का समावेश होगा. अधिकांश पढ़े-लिखे सभ्य  कहलाने वाले व्यक्ति अपने बच्चों की सेवा स्वयं न करके किसी नौकर नौकरानियों से सेवा व परवरिश कराते हैं. अधिकांश शहरी माताएं अपने स्तन का दूध अपने बच्चों को नहीं पिलाती और बाजार से दूध खरीद कर पिलाती हैं. वे सोचती हैं कि स्तनपान कराने से उनकी सुन्दरता नष्ट हो जाएगी. परिणामस्वरूप उनकी संतान सुसंस्कारित नहीं हो पाते. अस्वस्थ, कमजोर, विवेकहीन, शीलगुणहीन होते हैं. इसलिए कोयापुनेम में अपनी संतान की सेवा सुश्रुषा स्वयं करने का विधान है.


३-     सगा सेवा


          गोंडी धर्म में सम और विषम गोत्र धारक आपस में एक-दूसरे के सगाजन कहलाते हैं. इन्ही सगाजनों के बीच आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं. गोंडों में सभी धार्मिक और सामाजिक कार्य सगाजनों द्वारा संपन्न कराये जाने का विधान है. समाज में विवाह संस्कार, मृत्यु संस्कार या अन्य कोई भी देव पूजन कार्यों में ब्राम्हण, नाई, धोबी आदि से कोई भी कार्य नहीं कराये जाते. ये सभी कार्य सगाजनों द्वारा ही संपादित किये जाते हैं. इसलिए सगाजनों के बीच सामंजस्य और सेवा भाव आवश्यक है. सम और विषम गोत्रीय सगाजन आपस में एक दूसरे के पूज्यनीय होते हैं. उन्हें एक दूसरे की सेवा करनी चाहिए. जब भी जरूरत पड़े, सगाजन आपस में सेवा एवं सहयोग करके समस्त गोंडवाना समाज का कल्याण कर सकते हैं. इस प्रकार की सगा सामाजिक व्यवस्था विश्व के किसी भी धर्म में नहीं हैं. 


४-     दीन दुखियों की सेवा 


          गोंड समाज में कुछ धनी लोग हैं और अधिकांश निर्धन है. बहुतों की स्थिति तो और भी विकट है. उन्हें जिंदा रहने के लिए मुश्किल से आहार मिल पाता है. बीमार होने पर ईलाज नहीं करा पाते. शरीर ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र उपलब्ध नहीं हो पाते. रहने के लिए टूटी फूटी घास पूस की झोपड़ी होती है. इसी में किसी तरह धूप, सर्दी और वर्षा से अपनी जान बचाते हैं. ऐसे व्यक्ति विवाह या मृत्यु संस्कार के अवसर पर या बीमारी पड़ने पर मजबूर हो जाते हैं. अर्थाभाव के कारण ये अपनी रही सही जमीन बर्तन आदि भी बेच डालते हैं. समाज के धनी लोगों का कर्तव्य बन जाता है की वे ऐसे निर्धनों की वक्त आने पर यथासंभव सेवा करे एक व्यक्ति न करे तो समाज के व्यक्ति  चंदा करके उसे कष्ट से बचाने का प्रयत्न करना चाहिए. दीन दुखियों की सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए ये भी हमारे समाज रूपी शरीर के अंग  हैं. शरीर का एक अंग विकारग्रस्त हो जाने पर पूरा शरीर अस्वस्थ्य हो जाता है. शरीर की कुशलता के लिए सभी अंगो का स्वास्थ्य होना आवश्यक है. इसी प्रकार समाज में सभी का विकास एक साथ होना आवश्यक है.


५ -     धरती की सेवा


            धरती से अनाज पैदा करना, वृक्ष लगाकर फल प्राप्त करना, धरती को खाध डालकर उपजाऊ बनाना ही धरती की सेवा है. गोंडीयनों का मुख्य व्यवसाय कृषि है. कृषि कार्य करना सच्चे मर्द की पहचान समझा जाता है. कृषि कार्य में हिम्मत और मेहनत की जरूरत होती है. भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, बरसात, थकान सभी को सहन करके गोंड धरती की सेवा करता है. पसीना बहाता हुआ सुख की आशा में अथक परिश्रम करता है. अन्न उपजाता है और विश्व का भरण पोषण करता है. आजकल अधिकांश लोग पढ़े लिखे होने के बाद कृषि कार्य नहीं करना चाहते. नौकरी की तलाश में समय बरबाद करते हैं. जो व्यक्ति अपने आपको कृषि के काबिल नही समझते वह मर्द कहलाने योग्य नहीं हैं. धरती माता की सेवा जो व्यक्ति सही लगन से करता है वह कभी भूख से नहीं मरता और कभी भीख नहीं मांगता. धरती माता की गोद में जितने जितने वृक्ष उगाएंगें. वह उससे कई गुनी अधिक फल प्रदान करता है. बड़े बड़े कारखाने स्थापित करने से, गोला बारूद बनाने से धरती की सेवा नहीं होती है. बल्कि धरती की हरियाली नष्ट होती है. धरती की सेवा करने के लिए अधिक से अधिक अनाज पैदा करें. फलदार वृक्ष लगायें. समाज कल्याण के लिए सेवा भाव प्रत्येक कोया जनों में होना चाहिए. एक पवित्र कार्य समझकर उसे करना चाहिये. जिस प्रकार दो सिक्ख आपस में अभिवादन करते समय "सत श्री अकाल " शब्द का प्रयोग करते हैं, मुसलमान अस्सलाम वालेकुम करते हैं, ईसाई गुडमार्निंग कहतें हैं, हिन्दू जयराम जी की कहते हैं. इसी प्रकार हम गोंडी धर्मी लोग अभिवादन करते समय "जय सेवा" कहते रहें. आदि गुरु व्दारा बताया गया यह सेवा मंत्र कोया समाज का मूल मंत्र है. हमे इस मंत्र का जाप श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ करना चाहिए इससे हमे आत्म शक्ति एवं प्रेरणा की प्राप्ति होती.
                                               --००--                                  

शनिवार, 19 जनवरी 2013

गोंडी धर्म और विश्व शान्ति

                 मानव जीवन को सौम्य और सुसंस्कृत बनाने वाले जीवन मार्ग को ही धर्म कहते हैं. आज विश्व में अनगिनत धर्म, पंथ विकसित हो गए हैं जो अपने आप को अलग और श्रेष्ठ धर्म की संज्ञा से विभूषित करते हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, यहूदी आदि धर्म अपने आप को श्रेष्ठ बताकर वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं. इन धर्मों के अपने अपने ग्रन्थ हैं और ये ग्रन्थ मानव रचित हैं. इन ग्रंथों में मनुष्य के विचार और कल्पनाओं के संग्रह हैं. अलग-अलग धर्मग्रंथ अलग-अलग मनुष्यों के विचार और उनकी कल्पनाओं को व्यक्त करते हैं. प्रत्येक मनुष्यों के विचार और कल्पनाएँ अलग-अलग होती हैं. एक व्यक्ति की कल्पनाएँ अन्य व्यक्तियों को पसंद नहीं आती. इसलिए धर्मावलंबियों में मतभेद है. विश्व के जितने भी धर्म कल्पना पर आधारित हैं वे सभी बल पूर्वक या छलपूर्वक लादे गए हैं. ये  धर्मावलम्बी यह जानते हुए भी कि अमुक मान्यता कपोल कल्पित है, फिर भी भयवश अंधानुकरण करते चले जाते हैं. इन धर्मों के ठेकेदारों ने स्वर्ग-नरक का भय बताकर धर्म के पक्ष-विपक्ष में तर्क करने की योजना को ही निरस्त कर दिया है और उन खोखले धर्मों के पक्ष में आँख बंद करके गुणगान करने का ही मार्ग प्रशस्त किया है. आखिर वे अपने धर्म की आलोचना से इतने घबराते क्यों हैं कि आलोचना करने वालों के लिए तलवार लेकर उठ खड़े हो जाते हैं ! जबकि शाश्वत सत्य पर तो आलोचना का प्रभाव ही नहीं पड़ता. शाश्वत सत्य धर्म वही है, जो निर्विवाद हो और निर्विवाद केवल प्रकृति ही है.


          प्राचीन काल के अनार्यों ने आर्यों के यज्ञविधान (अन्न जारण प्रथा) का विरोध किया सो आर्यों ने अनार्यों के संस्कृति और वैभव को मिटा देने का संकल्प लिया. इसी तारतम्य में बौद्धों की भी बड़ी तादात में हत्या किये. इसी प्रकार ईसाई और इस्लाम में भी धर्म को लेकर मारकाट, हत्याएं होती रहती है. जिस धर्म के नाम पर एक मानव दूसरे मानव के रक्त का प्यासा हो वह धर्म नहीं है. ऐसी धर्म की उपस्थिति में विश्व शान्ति स्थिति नहीं बन सकती. संकीर्ण विचारधारा को धर्म का नाम देकर विश्व शान्ति की दुहाई देना निरा मूर्खता है. आज सभी सुसंस्कृत कहे जाने वाले अधिकांश विधर्मी कुत्ते, बिल्लियों को तो बिस्तर में सुलाते हैं. अपनी थाली में खाना खिलते हैं और अन्य वर्गों के मनुष्यों की छाया को स्पर्श करने से भी परहेज करते हैं. उनका स्पर्श किया हुआ भोजन त्याज्य है, परन्तु उन्ही का कमाया हुआ अनाज त्याज्य नहीं है. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जिस वर्ग के मनुष्य को छूना पाप समझते हैं, उसी वर्ग की महिलाओं से बलात्कार करना त्याज्य नहीं है.


          हिन्दू धर्म ग्रंथों में लिखा है कि उनके धर्म के विषय में सन्देश करना पाप है. ऐसा करने वाला अंत में नरक में जाता है. वहाँ उन्हें अनेक यातनाएं दी जाती है. इस धर्म को मानने वाला स्वर्ग जाता है. वहाँ उसे देवी देवताओं के सामान सुख मिलता है. सच तो यह है कि हिन्दू ग्रंथों में जो स्वर्ग नरक की बात लिखी गई है, वह कोरी कल्पना है. वर्तमान युग में अन्तरिक्ष के विभिन्न ग्रह-उपग्रहों की जानकारी प्राप्त कर ली गई है परन्तु स्वर्ग और नरक नामक ग्रहों का कहीं भी पता नहीं है. हिन्दू ग्रंथों में आर्यों और अनार्यों के युद्ध का वर्णन अनार्य राजाओं की हत्या, उनकी संस्कृति का विध्वंश, यज्ञ विधान (अन्न जारण प्रथा) का प्रचार, नायक नाईकाओं का मिलन एवं विरह आदि का ही वर्णन है, इनके सिवा कुछ भी नहीं है. फिर भी बहकावे में आकर भयवश लोग उन्ही को धर्मग्रंथ समझकर पूजते हैं. आज तक लोगों को उस धर्म से क्या मिला है ? भेदभाव, तिरस्कार, साम्प्रदाईकता, गरीबी बस.


          आज विश्व स्तर पर सर्वत्र अशांति है. सभी जगह युद्ध की आशंकाएं  हर समय बनी रहती है. अधिकांश युद्ध, मार-काट और मतभेद धर्म के नाम पर ही होते हैं. धार्मिक मतभेद और युद्ध संकीर्ण मान्यताओं के कारण होते हैं. आज विश्व में जितने छोटे-बड़े सम्प्रदाय हैं, उनकी मान्यताएं एक-दूसरे  से नहीं मिलती. इसलिए वे सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक नहीं हो सकते. जब तक एक सर्वमान्य और सार्वभौमिक धर्म अस्तित्व में नहीं होगा और उससे सब लोग परिचित होकर उसकी मान्यताओं को आत्मसात नहीं करेंगे तब तक विश्व शान्ति स्थापित नहीं हो सकती. एक सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक धर्म का निर्माण करना आज मनुष्य के बूते की बाहर की बात है, क्योंकि सभी मनुष्यों के विचार अलग-अलग होते हैं. इस प्रकार का धर्म विश्व में एक ही है जो सर्वमान्य एवं सार्वभौम को कायम रख सकता है. वह है "कोया पूनम". इस धर्म के सभी नीति नियम और मान्यताएं मानव निर्मित नहीं हैं, वरण प्रकृति पर आधारित है. प्रकृति के नियम क्षेत्रीयता, जातीयता, साम्प्रदायिकता आदि संकीर्णताओं से मुक्त एक सार्वभौमिक नियम है. वर्षा, ठण्ड, धूप सभी मनुष्यों पर सामान रूप से प्रभाव डालते हैं. वे किसी धर्म या जाति के लिए नहीं होते. इसी प्रकार प्रकृति के समस्त गतिविधियों का प्रभाव समस्त चर-अचर, जड़-चेतन प्राणियों पर पड़ता है. हम सब उसी प्रकृति के अवयव हैं. प्राकृतिक तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है. इसलिए हम इस प्रकृति के एक ही नियम से संचालित हो सकते हैं.


          यदि प्रकृति के इन नियमों को विश्व में सर्वत्र अनुकरण करें तो राष्ट्रों को सुरक्षा सम्बन्धी हथियारों का बजट समाप्त कर देना पड़ेगा, क्योंकि सभी सत्य ज्ञान संपन्न होकर एक दूसरे का सहयोग और सेवा करेंगे तथा वैमनष्यता समाप्त हो जाएगी. ईर्ष्या, द्वेष, युद्ध विध्वंश, साम्प्रदायिकता आदि शब्द लुप्त हो जायेंगे. जिस प्रकार आकाशीय पिंड अपने अपने परिपथ में घुमते हुए आपस में नहीं टकराते. इसी प्रकार हम भी सही रास्ते पर चलते हुए आपस में नहीं टकरायेंगे तब विश्व में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित हो सकती है. यदि विश्व के सभी देश अपने अपने संकीर्ण साम्प्रदायिकता के दायरे में रहकर विश्व शान्ति की बातें करते हैं तो वे अरण्य रोदन के शिवा कुछ नहीं कर रहे हैं. कोया पूनम की मान्यताओं से विश्व में झगड़े फसाद आपसी टकराव समाप्त हो सकते हैं और एक सौहाद्रपूर्ण वातावरण का निर्माण हो सकता है.

           आज कोयाजनों के प्राकृतिक शक्तियों का अमूल्य धरोहर है जिसका वे उपयोग करना नहीं जानते. यदि वे इनका उपयोग शुरू कर दें तो विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय उनके सामने घुटने टेक देंगें. कुछ आर्य धर्मियों का विचार है कि वे यज्ञ हवन इसलिए करते हैं क्योंकि इसके द्वारा वे विश्व शांति की कमाना करते हैं. पर्यावरण में सुधार होगा, परन्तु गौर कीजिये कि एक गरीब जो रात दिन लंगोटी लगाकर ठण्ड और धूप को  सहन करके पसीने बहाकर मेहनत से अन्न पैदा करता है, उस गाढ़ी कमाई को आग के हवाले कर देने से क्या विश्व में शांति आ सकती है ? कदापि नही. उन अन्न जलाने वालों को क्या मालूम कि भूख की तड़फ क्या होती है. भूख से हमारे गरीब  भाइयों का किस तरह विकास अवरुद्ध होता है. देश में गरीबी का सबसे मुख्य कारण आर्यों का यज्ञ प्रथा ही है. हिंदु धर्म के लोग गरीबी से वाकिफ नही हैं, क्योंकि इन्हें तो मुप्त में खाने को मिल जाता है. वे भीख मांग लेने का धंधा भी कर लेते हैं. हमारे समाज में इस प्रकार की घृणित प्रथा नहीं है. हम तो बिना मेहनत के खाना सीखा ही नहीं हैं. यह अधर्म का काम है. जो लोग जीवन संघर्ष में टिक नही पाते वे या तो साधू सन्यासी बनने का ढोंग रचाते हैं या भीख मांगने का कायराना हरकत करते फिरते हैं. गोंड कभी भीख नहीं मांगता क्योंकि वह कायर नहीं है. वह तो जीवन संघर्ष में मरते दम तक पसीने बहाकर अन्न पैदा करता है और सभी जीवों का उदर पोषण करता है. यदि देश को समृद्ध और विकसित बनाना है तो गोंडी धर्म के सिद्धांतों का आत्मसात करना होगा. देश धन धान्य से सम्पन्न होगा. कोई भूखा नहीं रहेगा तो चोरी डकेती लड़ाई-झगड़ा सब शांत हो जायेंगें. यदि हमे विश्व में वर्ग विहीन, जाति विहीन स्वस्थ्य समाज की स्थापना करनी है तो हमें "कोया पुनेम" (गोंडी धर्म) के आदर्शों का अनुकरण करना पड़ेगा. हमें विधर्मियों के लच्छेदार बातों में कदापि नहीं आना है. स्वविवेक का सहारा लीजिए. सत्य ज्ञान और सत्यमार्ग का अनुसरण कीजिये. निश्चित ही निकट भविष्य में इसके लाभ आपके जीवन में परिलक्षित होंगें. गोंडी धर्म के पवित्र आदर्शों का प्रचार प्रसार कीजिये और विश्व शांति के निर्माण में अपना अपूर्व योगदान दीजिये.
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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

फड़ापेन शक्ति उपासना

          कोया वंशीय गोंड सगा समाज के लोग फड़ापेन शक्ति
सल्लां गांगरा (फड़ापेन) का प्रतीक
की उपासना करते हैं. गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण संसार की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन को ही माना गया है. फड़ापेन शब्द का अर्थ है- परम शक्ति या सर्वोच्च शक्ति. फड़ा याने परम/सर्वोच्च तथा पेन याने शक्ति होता है. इस प्रकार फड़ापेन याने संसार की सर्वोच्च शक्ति जिसे सल्लां और गांगरा यह दो पूना-ऊना (धन-ऋण) गुणतत्व कहा जाता है. सल्लां आस तत्व का और गांगरा चक्र तत्व का, सल्लां नर सत्व का और गांगरा मादा सत्व का ध्योतक है. यही दो गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से सम्पूर्ण संसार चक्र चलता है.


    गोंड समाज के लोग फड़ापेन के रूप में जिन सल्लां और गांगरा प्रतीकों की उपासना करते हैं, उनमे सल्लां का प्रतीक लम्बाकार और गांगरा का प्रतीक चक्राकार होता है. चक्र में १२  गांगरा होते हैं. बारह गांगरा सम्पूर्ण विश्व मंडलीय ग्रहों के और गोंड सगा समाज के १२ सगाओं के ध्योतक है. उसी प्रकार सल्लां तत्व का लम्बाकार प्रतीक आस तत्व का द्योतक है. जिस प्रकार पुकराल का हर ग्रह अपनी अपनी कक्ष में अपने अपने सल्लां रूपी आस तत्व के आधार से परिक्रमा करते हैं और एक दूसरे से अपनी गुरुत्वाकर्षण सल्लां शक्ति के बल पर जुड़ा करते हैं, ठीक उसी प्रकार गोंड समाज के बारह सगाओं के लोग अपने सगा कक्ष में बंधू भाव से रहते हैं और विषम सगाओं के लोगों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं. गोंडी तत्वज्ञान के अनुसार फड़ापेन शक्ति की उपासना याने सम्पूर्ण सगा समाज की उपासना माना जाता है.

       फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा यह दो परस्पर विरोधी परन्तु एक दूसरे के पूरक पूना-ऊना (धन-ऋण) गुण तत्वों की क्रिया प्रतिक्रया से ही प्रकृति में एकरूपता और नियमबद्धता बनी रहती है. गोंडी धर्म तत्वज्ञान की मान्यता के अनुसार जिस जगत में हम रहते हैं, अनेक प्रकार के व्यवहार करते हैं, जिनका पञ्चज्ञानेन्द्रियों से अनुभव लेते हैं, वह जगत सत्य है. यह जड़ जगत मायाभास नहीं है. मनुष्य को जैसा अनुभव होता है, वैसा ही उसका स्वरुप है. प्रकृति का व्यवहार सूत्रबद्ध, नियमबद्ध रूप से चलता है. इसका कारण फड़ापेन शक्ति की सल्ला और गांगरा परस्पर विरोधी परन्तु एक दुसरे के पूरक पूना-ऊना गुण तत्वों की आपसी क्रिया प्रतिक्रया और उनका कार्यकारण सम्बन्ध है. यह घटना घटित करना या रोकना किसी के भी हाथ में नहीं है. नीयति या प्राकृतिक शक्ति जिसे हम फड़ापेन मानते हैं, सभी प्राकृतिक व्यवहारों का नियंत्रण करती है. उसी को ही धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने संसार की सर्वोच्च प्रजनन शक्ति माना है.

          गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अनुसार प्रकृति सत्य है. वह पहले भी थी और आगे भी रहेगी. सत्य का स्वरूप स्वयं सिद्ध है. भौतिक जगत का ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव पर ही होता है. ज्ञानेन्द्रियाँ ही यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं. अपने पञ्चज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्रत्यक्ष जगत का ज्ञान प्राप्त करके अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर उसका अर्थ लगाकर उस प्रकार वर्ताव या व्यवहार करना बुद्धीमान का कर्तव्य है. बौद्धिक ज्ञान शक्ति से ही प्रकृति के तत्वों का और नियमों का ज्ञान मनुष्य को होता है. प्रकृति के तत्वों का ज्ञान, उपासना याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत, पशु-पक्षी और पनास्पति की उपासना करना है. अर्थात प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति की उपासना करना है. प्रकृति की सर्वोच्च ज्ञान शक्ति की उपासना करना याने मनुष्य के दिल में सभी जीव सत्वों के प्रति सेवा भाव जागृत करना है. यही सेवा भाव ज्ञान अनुभव को गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने "सुर्वय पेंतोल" (सर्वोच्च आनंद) की अवस्था माना है. इस अवस्था में मनुष्य के दिल में सगाजन सेवा भाव, प्राणी सेवा भाव और निर्जीव सत्वों का सेवा भाव जागृत होता है. उसी से उसको सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि सगाजन सेवा भाव में ही स्वयं का कल्याण साध्य होता है. वह जय सेवा गोंडी धर्म मन्त्र का अधिष्ठाता बन जाता है. यही फड़ापेन शक्ति उपासना का तात्विक स्वरुप है.

         इस प्रकार की जो उच्च कोटि की फड़ापेन ज्ञान उपासना है, वही प्रकृति के सत्वों से अर्थात गुण सत्वों से निर्माण होने वाले जीव जगत के प्रति सेवा भावना है. एक ही फड़ापेन अधिष्ठान शक्ति के सल्लां-गांगरा, पूना-ऊना, माता-पिता, नर-मादा, दांया-बांया, आस-चक्र, समनी-उन्मनी यह दोनों प्रकार की विभिन्न भाव शक्तियां फड़ापेन शक्ति के तत्व हैं. जब इन दोनों परस्पर विरोधी गुण तत्वों की आपस में क्रिया प्रतिक्रया नहीं होती, तब तक नवीन गुण सत्व का निर्माण नहीं हो सकता. इसी फड़ापेन शक्ति का ज्ञानानुभव होना याने मानव की जीव जगत का यथार्थ ज्ञानानुभव होना है. फड़ापेन शक्ति रूपी सल्लां और गांगरा गुण तत्वों का ज्ञान होना याने मनुष्य को बौद्धिक ज्ञान का साक्षात्कार होना है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने तत्व ज्ञान की ज्ञान दृष्टि से यथार्थ ज्ञान प्रकाश की अनुभूति होती है, ऐसा अपने कोया पेन शिष्यों को बताया है. कुपार लिंगो का गोंडी धर्म तत्व ज्ञान प्रकृति और जीव जगत को मिथ्या नहीं मानता. अर्थात फड़ापेन शक्ति का स्थूल और व्यक्त रूप में जो जीव जगत हमें दिखाई देता है, वह सत्य है. उसके परे इस विश्व में और कुछ भी नहीं.

          गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो के मातानुसार हर एक मनुष्य का ध्येय याने "सुर्वय पेंतोल" अर्थात परम आनंद की प्राप्ति है और व्यक्ति स्वयंपूर्ण सत्व नहीं होने के कारण वह अकेला जी नहीं सकता. उसे अपने मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक सुख शान्ति के लिए प्रकृति के अन्य जीव, निर्जीव सत्वों पर अवलंबित रहना पड़ता है. प्रकृति के अन्य सत्वों की सेवा उसे तभी प्राप्त होती है, जब वह उनकी स्वयं सेवा करता है. इस प्रकार परम आनंद की प्राप्ति सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति है. सर्वोच्च सेवाभाव की जागृति तब तक नहीं होती जब तक मनुष्य की मुक्ति जीवन के क्लेशों से नहीं हो जाती. सुर्वय पेंतोल अवस्था याने जीव जगत के क्लेशों का अंत और चिरकालिक आनंद की प्राप्ति है. मनुष्य के सभी अन्य ध्येय इस अंतिम सेवाभाव के ध्येय से बहुत ही गौण है.

          मनुष्य जीवन दुखमय होने का कारण उसका अज्ञान और तमपेनी (आशक्ति) है. अज्ञान मनुष्य के तमपेनियों से आता है. मनुष्य ने अपनी तमपेनियों की भावनाओं पर विजय पाकर बौद्धिक ज्ञान विकास का मार्ग स्वीकार किया तो उसे फड़ापेन रूपी सल्लां-गांगरा गुणतत्वों का बौद्धिक ज्ञान प्रकाश प्राप्त होता है. उसके मन में जन कल्याण की भावना जागृत होती है और जन कल्याण करते हुए वह स्वकल्याण साध्य करता है. वह क्लेशों के बंधन से मुक्त होकर सुख-शान्ति और आनंद के सागर में तैरता है. उसके दिल में सगा जन सेवा भाव जागृत होता है और उसे जन सेवा यह गोंडी धर्म तत्वज्ञान के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करके सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होती है.

          इसलिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने अपने शिष्यों को बताया कि अज्ञान दूर करने के लिए हर एक मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए. यही बुद्धियुक्त मानव का परम कर्तव्य है. इसके लिए लिंगो ने गाँव-गाँव में गोटूल नामक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने की सलाह अपने कोयापेन शिष्यों को दी और वहाँ पर सगा नेंग, सगाचार, सगा तय, सगा कयोम और सगा मोद अर्थात सगा नियम, सगा निर्णय, सगा कर्तव्य और सगा ज्ञान सम्बन्धी शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज को देने का मार्गदर्शन किया. सगा समाज नीतिमूल्यों के अनुसार वर्ताव या व्यवहार करने से मनुष्य का मन तृप्त होता है. सगा कक्ष में रहकर सगा समाज को पोषक कर्तव्य करने से मनुष्य का मन सगा समाज जीवन में केंद्रीभूत होता है. मन को केन्द्रित करके सगा सामाजिक तत्वज्ञान किस तत्व पर आधारित है, यह जानकारी अपनी बौद्धिक शक्ति से प्राप्त करने से मनुष्य को प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन के सल्लां और गांगरा गुणतत्वों के ज्ञान प्रकाश का साक्षात्कार होता है. अर्थात इस ज्ञान से परम ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे मानव जाति के दुखों का समूल अंत करने के लिए मनुष्य के दिल में सेवा भाव की जागृति होती है. इससे व्यष्टि मन समष्टिमन रूप बनता है. अज्ञानी जीव ज्ञान स्वरुप होता है. उसे पेंतीलावस्था अर्थात परम सुख की अनुभूति होती है और वह "जय सेवा" इस गोंडी धर्म मन्त्र का परिपालनकर्ता बन जाता है.

          इसी कारण पारी कुपार लिंगो ने सम्पूर्ण मानव समाज को सगा सामाजिक नीतिमूल्यों का परिपालन करके सगा ज्ञान की शरण में जाने के लिए कहा है. सगा समाज का सगा ज्ञान के शरण में जाना याने जिस प्राकृतिक शक्ति फड़ापेन के सल्लां-गांगरा परस्पर विरोधी गुण तत्वों के आधार पर गोंड समाज की सम-विषम सगाओं की संरचना की गई है, उस नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना है. फड़ापेन रूपी नैसर्गिक शक्ति के शरण जाना याने सम्पूर्ण विश्व मंडल के जीव जगत का यथार्थ ज्ञान का विकास करना है. बौद्धिक ज्ञान का विकास करना याने अज्ञान का समूल अंत करना है. अज्ञान का समूल अंत करना याने क्लेशपूर्ण जीवन को आनंद स्वरुप बनाना है. जीवन को आनंद स्वरुप बनाना याने सगा जन कल्याण साध्य करना है. सगा जन कल्याण साध्य करना याने जय सेवा मन्त्र का परिपालन करके जन कल्याण के साथ स्वयं का कल्याण साध्य करना है.

          इसके लिए गोंडी धर्म गुरु पारी कुपार लिंगो ने श्रेष्ठ उपासनीय शक्ति फड़ापेन को ही माना है. उस शक्ति के सल्लां-गांगरा तत्व याने नर-मादा तत्व हैं, जो माता पिता के प्रजनन शक्ति के रूप में हैं. इसलिए लिंगो ने माता-पिता की सेवा को फड़ापेन शक्ति की उपासना के बराबर बताया है, क्योंकि वे फड़ापेन शक्ति के ही साक्षात रूप हैं.

          पहांदी पारी कुपार लिंगो को अपनी बौद्धिक ज्ञान शक्ति से सम्पूर्ण विश्व का साक्षात अंतर्ज्ञान प्राप्त हुआ था. उसी के आधार पर उसने सगा समाज की स्थापना की और सम्पूर्ण कोया वंशीय मानव समाज को सगायुक्त सामाजिक संरचना के ढाँचे में विभाजित किया. भौतिक शास्त्र ने भी यह सिद्ध कर दिखाया है कि प्रकृति के खगोलीय अणुओं से कोई भी तत्व स्थिर न होकर सूक्ष्म से सूक्ष्म घटक स्वयं शक्तिरूप क्रियाशील और परिवर्तनीय है. इन अणुओं के पूना-ऊना (धन-ऋण) परस्पर विरोधी गुण तत्वों के कारण उनमे क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है. इन अणुओं का पूना-ऊना शक्ति याने फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा गुणतत्व हैं. इसके अतिरिक्त इस पुकराल (सृष्टि) में कुछ भी नहीं है. अणुओं में हरदम क्रिया प्रतिक्रया होती रहती है और प्रकृति का चक्र भी नियमबद्ध चलता रहता है.

          अणु की क्रिया प्रतिक्रया से ही उनके कर्मात्मक संस्कार याने नवनिर्मित गुणयुक्त सूक्ष्म भाग बाहर फेंके जाते हैं और वे अन्य सत्वों में जाकर चिपकते हैं या उनको अपनी और खींच लेते. वे कर्मात्मक संस्कार मूल जिस वास्तु के होंगे, उन्ही के गुण संस्कार वे नित्य दर्शाते रहते हैं और परस्पर विरोधी गुणतत्वों में जाकर चिपकते हैं या स्वयं खींच लेते हैं. ठीक उसी तरह पारी कुपार लिंगो द्वारा सगा संरचना का निर्माण किया गया. गोंड सगा समाज के सगा शाखाओं में क्रिया प्रतिक्रियाएं होती रहती है. एक सगा घटक के स्त्री-पुरुष एक ही गुण संस्कार वाले होते हैं और विषम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से अपना पारी (वैवाहिक) सम्बन्ध स्थापित करते हैं.  सम सगाओं के गुण संस्कार वाले स्त्री-पुरुषों से वे कभी भी पारी सम्बन्ध स्थापित नहीं करते. सम सगाओं के लड़के-लड़कियों का रिश्ता भाई बहनों का होता है. उनमे कभी भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता. बल्कि दो परस्पर विरोधी गुण संस्कार वाले तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रया से ही नवीनतम शक्तिशाली गुणतत्व का निर्माण होता है. विभिन्न सगाओं के विभिन्न आनुवांशिक गुण संस्कार वाले लड़के लड़कियों का पारी अर्थात वैवाहिक सम्बन्ध में शक्तिशाली और बुद्धिमान नव तत्वों का पैदावार हो सके, इसलिए पारी कुपार लिंगो ने सम-विषम सगाओं में पारी सम्बन्ध प्रस्थापित करने के सामाजिक सम्बन्ध बनाए हैं, जो आज भी गोंड सगा समाज में प्रचलित हैं. इन पर से गोंड सगा समाज की सामाजिक संरचना प्राकृतिक नियमों पर किस प्रकार आधारित है, यह सिद्ध होता है.

          इसलिए पारी कुपार लिंगो ने बताया है कि सगा सामाजिक संरचना जिस प्राकृतिक शक्ति के गुणतत्वों पर आधारित है, उस फड़ापेन शक्ति की उपासना करने से, उसके सल्लां-गांगरा तत्वों का ज्ञान प्रकाश अपनी बौद्धिक ज्ञान से समझने से प्रत्येक मनुष्य अपने सगा कक्ष के मार्ग से ही अपना वर्ताव और व्यवहार सुनिश्चित करता है, जिससे किसी को किसी भी प्रकार का दुःख नहीं पहुंचता. सभी लोग सगानीति, सगाचार, सगाकर्म, सगाकर्तव्य और सगा सेवा करते रहते हैं, जिससे सम्पूर्ण मानव समाज सुखी और समृद्ध होकर "सुर्वय पेंतोल" अवस्था का अनुभव करता है. इसलिए गोंडी धर्म गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो ने फड़ापेन को ही उपास्य शक्ति माना है.
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शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

आदिवासी कुल का महाबली रावण की पूजा

        भारत व दक्षिण गोलार्ध में अनार्य संस्कृति के अधिष्ठाता महान ज्ञानी रावण की पूजा होती है- मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाड़ू, कर्नाटक, केरल, श्रीलंका, मिनिकाय व्दीप, लक्ष्यव्दीप, अंडमान निकोबार, आफ्रिका, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, दक्षिण अमेरिका, और ब्रम्हदेश, थाईलेंड आदि देशों में महान दार्शनिक धर्मवेता वैज्ञानिक तंत्र-मंत्र के प्रकांड ज्ञाता अनार्य संस्कृति के प्रवर्तक गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगो के अन्यन भक्त विश्व विजेता महाबली रावण की पूजा बड़े उत्साह और श्रद्धा से करते हैं.
        
        मध्यप्रदेश के राजपूत नगर से कोई ७० कि.मी दूर भाटखेड़ी नमक गांव पूरे देश में रावण मेघनाथ के गांव के नाम से जाना जाता है. इस गांव में रावण और मेघनाथ की दो विशालकाय मूर्तियाँ हैं. जिनकी पूजा की जाती है.


        गाँव वालों को रावण और मेघनाथ की मूर्तियों की स्थापना की पूरी जानकारी तो नहीं लेकिन वे कहते हैं कि हमारे बाप दादा बताते थे कि त्रेता युग में अवंतिका क्षेत्र से पुरी में संगम स्थान पर जाने के पश्चात रावण और मेघनाथ का यहाँ पड़ाव रहा है, तभी से यहाँ के लोगों ने रावण और मेघनाथ की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा शुरू की. आज से छह दशक पूर्व कारीगरों को बुलाकर गांव वालों ने पैसा इकट्टा कर सीमेंट कांक्रेट की दो मूर्तियाँ बनवा दी.


        गाँव के बुजुर्ग रामलाल यादव, दयाराम, बद्रीलाल ने गोंडवाना दर्शन के  सम्पादक को बातचीत के दौरान जानकारी दी कि रामायण ग्रंथों में कुछ इसका उल्लेख है. सात आठ सौ की आबादी वाले गाँव में घर-घर में इनका जीवन बदल दिया है.


        आगरा-बंबई राजमार्ग से गुजरने वाले राहगीरों के मन में इन विशाल मूर्तियों को देखकर एक जिज्ञासा होती है. कि आखिर ये किसकी है. देश-विदेश के पर्यटकों को यह स्थान बहुत अच्छा लगता है. वे यहाँ रुककर विभिन्न मुद्राओं में इन मूर्तियों के साथ फोटो खीचकर संतुष्ट होते है. यह क्रम आज भी जारी है. लोग यहाँ मन्नतें भी मांगने लगे हैं. जिसकी मनोकामना पूरी हो जाती है. वे यहाँ आकर नारियल चढ़ाकर अगरबत्ती जलाकर इन मूर्तियों को प्रसन्न करते हैं और संतोष का अनुभव करतें हैं.


        विशालकाय मूर्तियों की ऊंचाई आठ फिट और चौड़ाई चार फिट है. अन्जाने में बस, ट्रक, कार, आदि वाहनों से गुजरने वाले यात्री इन्हें देखकर चकित हो जाते हैं. कुछ पैसे फेकते हैं तो कोई हाथ जोड़कर नमन करते हैं.


        इन मूर्तियों से कुछ दूरी पर उज्जैन-गुना रेल्वे लाइन है. रेलयात्री भी इनको देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं. कुछ दूरी पर प्रचीन बावड़ी तथा समाधि स्थल का प्रतीक स्वरूप एक चबूतरा बना हुआ है. गाँव वालों को इनके संबंध में भी कोई जानकारी नहीं है.


        दशहरा यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. रावण और मेघनाथ के लिए दो अलग-अलग रथ सजाकर जुलुस निकाला जाता है और सम्मान के साथ विसर्जन किया जाता है.


        रायपुर के शैलेन्द्र नगर में भी लगभग १२ फीट की महाबली रावन की मूर्ती बनाई गई है. शैलेंद्र नगर वासियों ने बताया की वे लोग १९८२ में रावन की मूर्ती सीमेंट और कांक्रीट से बनवाया है और स्थापित किया. मूर्ती के पास में रहने वाले एक बुजुर्ग बताते हैं कि लोग इस आदिवासी कुल के रावन को बुराई के प्रतीक में मानते हैं और हर वर्ष दशहरा के दिन इस महाबली का दहन करते हैं, किन्तु हमारे पूर्वजों नें इसकी पूजा करने के लिए इसे बनवाया है. हमारे पूर्वज इस महाबली की पूजा कबसे करते आ रहे हैं हमें नहीं मालूम, किन्तु उन्हें देखकर हम भी इनकी पूजा करते हैं. सच्चे मन से इनकी पूजा करने से जीवन फलित होता है, ऐसा हमारे पूर्वज कहते हैं. इसलिए हम भी इनकी पूजा करते हैं, सम्मान करते हैं. हम भी महाबली रावन के आशीर्वाद से फलित होते रहे हैं. इन्हें हम नहीं जलाते. इन्हें जलाने वाले उत्सवों और त्योहारों में हम शामिल भी नहीं होते.


        लोगों ने इसे बुराई के प्रतीक में क्यों माना हमें पता नहीं है, किन्तु लोग अपने मन की बुराई को मन से निकालने के बजाय इस देवता का दहन करते हैं. यह बात हमें समझ में नहीं आता कि लोग अपनी बुराई को जलाने के बजाय इसकी मूर्ती बनाकर क्यों उसे जलाते हैं ? जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाएं.


        शैलेन्द्र नगर वासी दशहरा के दिन महाबली रावन की धूमधाम से पूजा करते हैं और मोहल्ले भर प्रसाद बांटकर अपनी मनोकामना फलित करने हेतु खुशियाँ मनाते हैं.