गुरुवार, 1 सितंबर 2011

क्या आदिवासी/जनजातियाँ मूर्ती पूजक हैं ?

                   गणेश पूजा श्री बाल गंगाधर तिलक ने सन १९०५ में पूना, महाराष्ट्र से शुरू किया था। श्री बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीय हित में सामुदायिक एकता के महत्व को प्रदर्शित करने के लिए गणेश पूजा का महत्व बताया था। वह निश्चित ही देश की आजादी के लिए समयानुकूल सामुदायिक एकता को प्रदर्शित करने का माध्यम था। यह उत्सव आज शहर से फैलकर गाँव गाँव तक पहुच रहा है. वहीँ ग्रामीण आदिवासी समाज में इस उत्सव की पूर्ण स्वीकारोक्ति अब भी नहीं मिलती। इसका आशय यह बिलकुल नहीं है कि उन्होने देश कि स्वतन्त्रता मे साथ नहीं दिए या उनमें राष्ट्रीयता, देशभक्ति कि कोई कमी रही, बल्कि बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आंदोलन के पहले इस देश के आदिवासी/ जनजातियों ने ही स्वतन्त्रता आंदोलन की नीव रखी थी। जीतने क्रांतिकारी गांधी के समय के स्वतन्त्रता आंदोलन मे शहीद हुए उससे कई गुना ज्यादा इस देश में स्वतन्त्रता आंदोलन की नीव रखने आदिवासी/ जनजाति वीरों ने अपनी आहुति दी। तब न ही गांधी जी का आंदोलन खड़ा हुआ था और न ही बाल गंगाधर तिलक का।


          आज गणेश स्थापना के मायने बिलकुल भिन्न हैं। हम इस माध्यम से परिवार, समुदाय की एकता को भी प्रदर्शित नहीं कर पा रहे हैं। कहाँ गया वह सामूहिक हित, राष्ट्रीयता, देश हित और जन हित की भावना ? किस सामाजिक और सांस्कारिक जीवन की ओर बढ़ रहे हैं हम ? किस सांस्कारिक जीवन को अपना रहा है मानव समाज ? हम किस तरह के सांस्कारिक बीज बो रहे हैं अपनी आने वाली पीढ़ी और समाज की धरती पर ? यह मेरे समझ से परे है।

गणेश एवं दुर्गा उत्सव की सार्थकता -

          आज से शहरों में गणेश उत्सव के नाम से शोरगुल शुरू हो गया। हैसियत के आधार पर गणेश की मूर्तियों की बोली लग रही है। पचास-सौ से लेकर हजारों में। यह उत्सव घर, परिवार, मोहल्ले और समुदाय की हैसियत को प्रदर्शित करने का माध्यम भी बन गया है। जितनी बड़ी मूर्ती उतनी बड़ी हैसियत के साथ यह उत्सव शुरू होता है। नौ दिन तक बच्चे, जवान और बूढों में भी इस उत्सव का परवान चढ़ा होता है। कई पढ़ने वाले बच्चे स्कूल से भी छुट्टी ले लेते हैं। बहुत अच्छा लगता है यह देखकर कि सभी लोग मिल-जुल कर इस कार्य में अपनी भागीदारी निभाते हैं। स्थापना के समय से अंत तक हवन पूजन, कीर्तन, नाच, गम्मत, प्रतियोगिता आदि इस उत्सव में शामिल हो जाते हैं। अधिक खुशियाँ मनाने के लिए हैसियत के अनुसार आर्केस्ट्रा, फ़िल्मी अभिनेताओं के कार्यक्रम को आमंत्रित कर लिया जाता है। अंतिम दिन के हवन में अनेक खाद्य पदार्थों का मिश्रण आग के हवाले कर देते हैं। जो अन्न मानव/ प्राणियों के जीवन का मुख्य आधार है, उसे आग में जलाकर गणपति/मूर्तियों से आशीर्वाद प्राप्त/प्राप्ति मान लेते हैं।

           उसी प्रकार गणेश उत्सव के पश्चात दुर्गा उत्सव का समय आता है। यह उत्सव मातृका पूजा के रूप में पूरे देश में परवान के साथ मनाया जाता है। बड़े-बड़े कृत्रिम भवन और आकर्षक पंडाल, झाकियां, उसपर कृत्रिम पैंट और रासायनो का रंगरोगन बहुत ही भाता है। लोग आकर्षित होते है। इस आकर्षण को श्रृद्धा और मानवीय संस्कार मान लेते है। इसका भी ९ दिनों पश्चात वही हश्र किया जाता है, जो गणेश उत्सव का होता है। पूरे देश में लाखो टनों के हिसाब से मूर्तियों, झाकियों का कचड़ा जलाशयों में डालकर प्रकृति की इकोसिस्टम/जीवन चक्रण को खराब करने का मानव निर्मित कुटिल खेल किया जाता है। क्या ऐसे उत्सवों के स्वरुप को हम अपनी संस्कृति का परिवेश मान सकते हैं ?

गणेश/दुर्गा उत्सवों का लाभ -

          हिंदू वैदिक ग्रंथों में गणेश को बुद्धि का दाता/देवता माना गया है और इसी भावना से समस्त हिंदू समुदाय मिट्टी के बने कृत्रिम गणेश की मूर्ती की स्थापना कर ९ दिन तक इसकी सेवा धूप-दीप जलाकर तथा आरती उतारकर करता है। आरती में इसकी महिमा का बखान इतना कि "अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया, बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया" और बहुत से बखान इसमें मिलते हैं. अतिसंयोक्ति की भी सीमा होती है, परन्तु इसकी कोई सीमा नहीं है। इन उत्सवों के प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष लाभ का किस तरह आकलन किया जाए, यह मेरे समझ से परे है। यदि हम इसे मानव सांस्कारिक लाभ की दृष्टि से भी देखे तो भी वास्तविक तथ्य नजर नहीं आता। क्या तिलक के द्वारा १९०५ में प्रथम गणेश स्थापना के पूर्व इंसानों में बुद्धि नहीं थी ? क्या लोगों में वेदों, पुराणों को लिखने के पूर्व बुद्धि नहीं थी ? क्या विज्ञान के आविष्कार के समय मनुष्य में बुद्धि नहीं थी ? फिर आज यहाँ इसे बुद्धि के देवता कहकर मजाक क्यों बना रहे है ? इस मजाक में कहीं न कहीं किसी न किसी व्यक्ति या समुदाय का हितलाभ तो जरूर होगा तभी तो देश में गणेश उत्सव और दुर्गा उत्सव उल्लास भरा और हंगामेदार होता है।

प्रत्यक्ष लाभ-

          इन उत्सवों के पूर्व से ही मूर्तियों का निर्माण शुरू हो जाता है. ये मूर्तियां आर्डर पर या बिना आर्डर के भी बनाए जाते है। इससे कुछ मूर्तिकारों को वर्ष में एक या दो बार आर्थिक लाभ होता है। पंडाल लगाने वाले का पंडाल ९ दिन के लिए किराए पर लग जाता है। इसके पश्चात स्थापना के सामग्रियों का दौर चलता है। इसमें सबसे ज्यादा व्यवसाईयो को १० दिन तक विभिन्न पूजा सामग्रीयों के विक्रय से आर्थिक लाभ होता है। पूजक और पंडिताई करने वाले लोगों को भी बैठे-बैठे दान मिलते रहता है। आम जनता इस अवसर पर श्रृद्धा के नाम से सर्वाधिक आर्थिक हानि शिकार होते रहता है। उसे कुछ भी नहीं मिल पाता. इसलिए आम जनता इसी कहावत से चरितार्थ होते हैं - "चीता का मुह रीता का रीता" अर्थात जो मेहनत से रूपये पैसे कमाता है, वह एक सप्ताह तक अपनी मेहनत की कमाई को इन्ही उत्सवों में दान, दक्षिणा, चढ़ावा, भोग देकर फिर से खाली हो जाता है। उन्हें इस अन्ध श्रृद्धा से क्या लाभ होता है, मुझे पता नहीं।

मानव सांस्कारिक लाभ -

          इस परिवेश/व्यवस्था के द्वारा सुदृण मानव समाज ने अपने संस्कारों को गली कूचों में निकाल कर रख दिया नजर आता है. इन उत्सवों तक घर के संस्कार गली में ही नजर आते हैं। आज का बदलता परिवेश निश्चित ही इसका गवाह है। माता पिता की सेवा संस्कार गणेश उत्सव के संस्कारों से फीका पड़ जाता है। जिसने पैदा किया, टट्टी पेशाब धोया, पाला पोसा, चलना सिखाया, जीवन का दर्शन कराया, वही मानव आज अपने मूल ईस्वरीय संस्कार स्वरुप ज़िंदा माता पिता की सेवा को छोड़कर मूर्ती पूजा में लगा है। इस कटु सत्य के शिवा इन उत्सवों की गहराई में मुझे कोई सांस्कारिक लाभ नजर नहीं आता है।

इन कृत्रिम उत्सवों की हानियाँ -

          नौ दिन पश्चात इन सभी छोटे एवं भारी भरकम मूर्तियों को नदी या पवित्र जलाशयों के हवाले कर देते हैं। इनको बनाने में लगी सामग्रियां लकड़ी, मिट्टी और रंग रोगन के लिए उपयोग में लाये जाने वाले पैंट, हानिकारक रासायनिक पदार्थ सभी जल में डाल देते हैं और यह मान लेते हैं कि हमने अगले आने वाले साल तक के लिए गणपति/माता जी से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। मूर्ती विसर्जन के नाम से प्रशासनिक अमले को भी इसमें झोक दिया जा रहा है। बड़े-बड़े मशीनों और क्रेनों का इस्तेमाल मूर्तियों को नदी और जलाशयों में विसर्जन करने के लिए लगाया जा रह है। पवित्र विसर्जन के नाम से लाखो टन कचड़ा नदी, जलाशयों में डाल देते हैं, परन्तु जलाशयों में कचड़ा, रासायनिक पैंट आदि डालते समय हम यह नहीं सोचते कि इसका जलचरों पर और मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा. प्रतिवर्ष इन मूर्तियों के लाखो टन कचड़े और पैंट के जरह से मछलियाँ और अन्य जलचर, वनस्पति आदि नष्ट हो रहे हैं। पानी जहरीला हो रहा है और पानी जहरीला होने के कारण पीने के लिए उपुक्त नहीं रहा। कचडों से जलाशय पटने के कारण जलाशयों की जल धारण क्षमता कम हो गए हैं या पूरे पट चुके है, जिसके कारण जमीन का मीठे जल का स्तर नीचे जाना और आसानी से मीठे जल की उपलब्धता नहीं होने से इसे प्राप्त करने के लिए होड़ मची रहती है। नलों में कतार लगी रहती है. इसे प्राप्त करने के लिए लाठी-भोंगे, चाक़ू-तलवारों का चलना आम बात हो गई हैं, कईयों की जानें जा चुकी है। दूसरी ओर हवन-पूजन के समय अंधाधुंध जलाए जाने वाली अन्न सामग्री, लकड़ी आदि का धुआँ जीवनदाईनी वायु का प्रदूषण भी बढ़ाता है। लाऊडस्पीकर को तेज आवाज में बजाया जाना मोहल्ले की निशानी बन जाती है। इससे ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता है, जिससे शहरों में पढ़ने वाले बच्चे, बीमार व्यक्ति आदि अत्यधिक प्रभावित होते हैं। क्या यही है ईश्वर के प्रति मानव समाज की वास्तविक श्रृद्धा और संस्कृति के अर्थ का प्रदर्शन ?

आदिम संस्कृति एवं सार्थकता -

          आदिम समाज की संस्कृति में मूर्ती पूजा का रिवाज नहीं है. आदिम समाज की संस्कृति प्रकृति संरक्षण पर विश्वास रखता है और यह मानता है कि प्रकृति संरक्षित है तो मानव जीवन संरक्षित है। इसी समय भादो अमावस्या के पश्चात या कुंवार उजियारी से उसके जीवन के प्रकृतिगत सांस्कारिक कार्य शुरू होते हैं। अपने सांस्कारिक संरचना के आधार पर समस्त आदिवासी समाज में "नया खाने" का रिवाज है। इस नया खाई में किसानो के द्वारा बोये गए पहली फसल के अनाज और नए साग-सब्जी का प्रथम भोग अपने पूर्वजों को देता है। उसके बाद वह स्वयं ग्रहण करता है। इस प्रकृतिगत जीवन सांस्कारिक पूजा में अपने कुल गोत्रज जीव, वनस्पति, पञ्च तत्व (धरती, हवा, पानी, अग्नि, आकाश), सभी ग्रह-नक्षत्र, दशो दिशाओं, वन संपदा, खनिज सम्पदा आदि को घर पर देव स्थान और घर से बाहर जीवों के रहने के स्थान या स्वयं के खेत में किसी झाड़ के नीचे स्थान की स्वच्छ जल से लिपाई कर दीपक जलाकर, बंदन लगाकर और साल झाड़ से प्राप्त गोंद (राल) का छेने के अंगार में होम देकर सभी प्रकृतिगत देव स्वरूपों का सुमिरन करते हुए नए फसल/खाद्य सामग्रियों का भोग चढाता है। इसके पश्चात घर के अंदर पूर्वज स्थान/देव स्थान में यही प्रक्रिया दोहराते हैं, किन्तु यहाँ अपने कुल, कुनबा, पुरखा का सुमिरन कर भोग चढाया जाता है। आदिम समाज की पूजा पद्धति में किसी भी अन्न या खाद्य सामग्री को जलाकर भोग देने का विधान नहीं है और न ही शंख फूकने व पोंगा बजा-बजा कर आवाज करने की जरूरत।

           नया खाई के अलावा प्रत्येक प्रमुख कार्यों (जैसे-धान का बीज खेत में डालना, रोपा लगाना, रोपा लगाकर खत्म करना, धान काटना, धान की मिसाई करना, मिसाई खत्म करना, धान को कोठी में डालना, बोवाई के लिए धान बीज कोठी से निकालना, त्यौहार मनाना आदि) की शुरुवात और किसी कार्य के अंत में भी इसी प्रक्रिया को कार्य के तथ्यों/विषयवस्तुओं की मानवीय जीवन में महत्ता और उपयोगिता के आधार पर उनकी पूजा-अर्चना/सुनिरन की जाती है। सभी धार्मिक कार्यों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि परिवार की स्त्रीशक्ति के रजोवृति के समय देव, घर, परिवार की कोई भी पूजा/उपासना का कार्य नहीं किया जाता।

          इसके अलावा ग्रामीण पारिवेश में ग्राम देवताओं- ग्राम निवासियों तथा ग्राम की रक्षा करने वाली ग्राम माता खेरमाई, ग्राम की रक्षा करने वाला ग्राम प्रमुख ठाकुर देव, ग्राम के पशुधन, फसलों की सुरक्षा करने वाला खीला मुठ्वा, ग्राम के शरहद में रहकर ग्राम में व्याधियो को घुसने से रोकने वाला देव नारसेन देव आदि की पूजा प्रत्येक वर्ष खेती का कार्य शुरू होने के पहले कर लिया जाता है। रोग, व्याधि की ईलाज के लिए प्रकृति की गोद में पाए जाने वाले वानस्पतिक औषधि, जड़ी-बूटियों, दवादार पौधों, पत्थरो, मिट्टी, पत्तों, जीव-निर्जीव, ठोस-तरल पदार्थों, तत्वों आदि तथा ग्रामीण जीवन पद्धति में प्रचलित आंतरिक विद्या (तंत्र-मंत्र) शक्ति एवं प्राप्ति के स्थलों (पाट-पीढ़ा) आदि की पूजा अगस्त अमावश्या में किये जाने की महत्ता आदिम ग्राम जीवन के परिवेश में मिलती है।

          मानव जीवन के सभी आवश्यक संस्कार, सभी आवाश्यक वस्तुएं, खाद्य पदार्थ, औषधियां, प्राकृतिक विद्या/ईश्वर आदि इसी पुकराल (प्रकृति-श्रृष्टि) में विद्यमान हैं। इसलिए आदिम समाज किसी अन्य ईश्वर या भगवान को नहीं ढूँढता। वह ईश्वर स्वरुप माता पिता, पूर्वजों के अलावा प्रकृति की ही किसी न किसी रूप में पूजा करता है। इसीलिए वह प्रकृति का पुजारी कहलाता है। सम्पूर्ण आदिवासी समाज के किसी भी पूजा विधान में मूर्ती पूजा की महत्ता नहीं मिलती। यही प्रकृति पूजा का सास्वत सत्य है।

         एक विशिष्ट प्रकार के स्वार्थी और जहरीली मंशा रखने वाले मानव प्रजातियों द्वारा इस देश की कुदरती ज्ञान, संस्कार, आस्था वाले मानव समाज और उनकी उपजाऊ विवेक मे जो कृत्रिम आस्था के जहरीले बीज बोये जा रहे हैं, वे सब संस्कार, एकता, मानवता, भाईचारा, ईश्वरत्व पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि कुदरत, शिक्षा, विज्ञान, इन्सानों की बुद्धि और विवेक को बांझ बनाए रखने के लिए सोच समझकर ये सब उपक्रम शुरू किए गए हैं !!
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रविवार, 24 जुलाई 2011

भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभादेवी सिंह पाटील का शुभकामना सन्देश.

भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभादेवी सिंह पाटील द्वारा
छत्तीसगढ़, रायपुर में मनाये जाने वाले "विश्व आदिवासी दिवस" दिनांक 09/08/2011
के लिए आयोजन समिति के अध्यक्ष, श्री बी.पी.एस.नेताम (से.नि.भा.प्र.से.)
को प्रेषित शुभकामना सन्देश.


शनिवार, 23 जुलाई 2011

विश्व आदिवासी दिवस ९ अगस्त, २०११, छत्तीसगढ़, रायपुर.

विश्व आदिवासी दिवस

"एक तीर एक कमान, सब आदिवासी एक सामान"
INTERNATIONAL DAY OF WORLD'S INDIGENOUS PEOPLE
दिनांक 9 अगस्त 2011
स्थान- इंडोर स्टेडियम, बूढ़ा तालाब के पास, रायपुर (छत्तीसगढ़)

विश्व आदिवासी दिवस क्या है ?
          द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरे विश्व में शान्ति स्थापना के साथ-साथ विश्व के देशों में पारस्परिक मैत्रीपूर्ण समन्वय बनाना, एक-दूसरे के अधिकार एवं स्वतंत्रता को सम्मान के साथ बढ़ावा देना, विश्व से गरीबी उन्मूलन, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के विकास के उद्देश्य से 24 अक्टूबर 1945 में "संयुक्त राष्ट्र संघ" का गठन किया गया, जिसमे अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत सहित वर्तमान में 193 देश सदस्य हैं। अपने गठन के 50 वर्ष बाद "संयुक्त राष्ट्र संघ" ने यह महसूस किया है कि 21 वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत जनजातीय (आदिवासी) समाज अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, बेरोजगारी एवं बंधुआ मजदूर जैसे समस्याओं से ग्रसित हैं. जनजातीय समाज के उक्त समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व के ध्यानाकर्षण के लिए वर्ष 1994 में "संयुक्त राष्ट्र संघ" के महासभा द्वारा प्रतिवर्ष 9 अगस्त को "INTERNATIONAL DAY OF THE WORLD'S INDIGENOUS PEOPLE" विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया गया. तत्पश्चात पूरे विश्व यथा अमेरिकी महाद्वीप, अफ्रीकी महाद्वीप तथा एशिया महाद्वीप के आदिवासी बाहुल्य देशों में 9 अगस्त को "विश्व आदिवासी दिवस" बड़े जोर-शोर से मनाया जाता है, जिसमे भारत भी प्रमुखता से शामिल है.

भारत में निवासरत आदिवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत के संविधान में किए गए प्रावधान

          वर्ष 1947 में भारत के स्वतंत्रता पश्चात भारत के लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था चलाने के लिए संविधान का निर्माण किया गया, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. संविधान में कुल 22 भाग, 12 अनुसूची एवं 395 अनुच्छेद हैं. इनमे से सर्वाधिक अनुच्छेद- अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) के हित संरक्षण के लिए हैं, जिनमे निम्न मुख्य हैं :-

(१) अनुच्छेद 366 में - अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित किया गया है.

(२) अनुच्छेद 342 में - पूरे भारत के प्रत्येक राज्य में निवासरत आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) जातियों की सूची घोषित किया गया है.

(३) अनुच्छेद 244(1) में - अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण के बारे में उपबंध हैं.

(४) अनुच्छेद 244(1)5 - में अनुसूचित क्षेत्रों को लागू विधि (क़ानून) का स्पष्ट प्रावधान है अर्थात इन क्षेत्रों में भूमि का अंतरण और आवंटन, बैंकिंग सिस्टम, शान्ति एवं प्रशासन इत्यादि संबंधी प्रशासनिक कार्य गैर आदिवासी क्षेत्रों से अलग होगा.

(५) अनुच्छेद 244(1) - अंतर्गत 73 वाँ संविधान संशोधन द्वारा पांचवी अनुसूची पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 पेशा क़ानून के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच पद एवं जनपद/जिला पंचायतों के अध्यक्ष पद तथा उक्त पंचायतों के कुल 50 प्रतिशत से अधिक पंच/जनपद सदस्य/जिला पंचायत सदस्य के लिए आरक्षित हैं. इसी प्रकार अनुसूचित क्षेत्रों में लागू अन्य क़ानून जैसे- कृषि उपज मंडी/को-आपरेटिव एक्ट, जल उपभोक्ता संस्था एक्ट, वन प्रबंधन समिति एक्ट, स्थानीय स्वशासन (नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद/नगरपालिक निगम एक्ट) में भी आरक्षण लागू होना चाहिए.

(६) अनुच्छेद 14 में समता के अधिकार के तहत जनजातीय समाज को न्याय दिलाने के लिए विशेष प्रावधान हैं जैसे- अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में शोषण के विरुद्ध संरक्षण के विशेष प्रावधान हैं.

(७) अनुच्छेद 14(4) में - अनुसूचित जनजातियों के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करने का प्रावधान हैं तथा इनके उन्नति के लिए विशेष उपबंध (आरक्षण) बनाने का प्रावधान हैं.

(८) अनुच्छेद 16(4) में - अनुसूचित जनजातियों के लिए शासकीय नौकरियों एवं पदों में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का प्रावधान है.

(९) अनुच्छेद 23 में - मानव का व्यापार, जबरन काम कराना इत्यादि शोषण के विरुद्ध रक्षा का प्रावधान है.

(१०) अनुच्छेद 275 में - अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के विकास के लिए भारत की संचित निधि से राज्य सरकार को अनुदान राशि देने का प्रावधान है.

(११) अनुच्छेद 330 में - विधान सभा एवं 332 में - लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है.

(१२) छत्तीगढ़ भू-राजस्व संहिता 165 एवं 170(ख) के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजातियों की भूमि को गैर आदिवासी द्वारा अंतरण नहीं किया जा सकता. अर्थात छलपूर्वक खरीदी-बिक्री या भू-अर्जन नहीं किया जा सकता.

(१३) छत्तीसगढ़ को-आपरेटिव सोसायटी एक्ट 1960 की धारा-48(ख) के कंडिका 2(क) अनुसार "किसी सोसायटी में जहां सदस्यों कि कुल संख्या के कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जनजातियों के हैं, वहाँ ऐसा प्रतिनिधि केवल जनजातियों के सदस्यों में से होगा."

(१४) आदिवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा जुलाई 2006 में "राष्ट्रीय जनजातीय नीति" बनाई गई है.

भारत एवं छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा भारतीय संविधान के पालन की स्थिति

१- भारत सहकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा प्रकाशित "राष्ट्रीय जनजातीय नीति 2006" की विषय सूची 01-23 में स्वीकार किया गया है कि जनजातियों की उपेक्षा हो रही है एवं जनजातियों के उत्थान के लिए संविधान में किए गए उपबंधों का पालन नहीं हो रहा है. उक्त नीति के कंडिका 18 में किए गए उल्लेख में पाँचवी अनुसूची के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र के अनुशासन पर राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे जाने वाले वार्षिक प्रतिवेदन को रूटीन दस्तावेज कहा गया है. यह भी स्वीकारोक्ति है कि अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातियों की हो रही उपेक्षा, उत्पीड़न के कारण ये क्षेत्र उपद्रवी तत्वों का क्रीड़ा स्थल बन गया है.

२- छत्तीगढ़ शासन द्वारा आदिम जाति मंत्रणा परिषद की बैठकों में लिए गए निर्णयों पर क्रियान्वयन नहीं किया जाता है. उदाहरण-

(१) मंत्रणा परिषद की बैठक दिनांक 28-7-2009 की कार्यवाही विवरण कंडिका 5 में दिए गए सुझाव- विस्थापित परिवारों को मुआवजा के अतिरिक्त सम्बंधित उद्योगों में "शेयर होल्डर" भी बनाया जाए. - इस पर क्या कार्यवाही हुई , अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है ?

(२) इसी प्रकार उक्त कार्यवाही की कंडिका 4.9 में अनुसूचित क्षेत्रों में गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की जमीन खरीद-फरोख्त में कलेक्टर द्वारा दी गई अनुमति में किए गए धोखाधड़ी के सम्बन्ध में क्या कार्यवाही हुई, अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है ?

(३) संविधान के अनुच्छेद 16 का पालन नहीं करते हुए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आदिवासियों को जनसँख्या के अनुपात में शासकीय सेवाओं एवं शैक्षणिक संस्थाओं में 32 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है.

(४) संविधान के अनुच्छेद 243(ZC) नगर पालिकाएं में स्पष्ट प्रावधान है कि - "इस भाग की कोई बात अनुच्छेद 244(1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और इसके खंड (2) में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों को लागु नहीं होगी." इसके बाद भी छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित नगर पालिक निगम/नगरपालिका परिषद/नगर पंचायतों के क्रमशः 3, 7 एवं 26 पद अध्यक्ष के एवं 265 वार्ड मेंबर के पद को आदिवासियों से छीनकर गैर आदिवासियों को दे दिया गया है.

(५) भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) में दिए गए प्रावधान अनुसार गैर आदिवासियों द्वारा खरीदे गए जमीन को, आदिवासियों के पक्ष में निर्णय आने के बाद भी इन्हें वास्तविक कब्जा नहीं मिल पा रहा है.

(६) भू-राजस्व संहिता की धारा 165 का उल्लंघन करते हुए अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों की जमीन की खरीदी-बिक्री के साथ-साथ उद्योगों के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है. बस्तर में - टाटा, एस्सार, रायगढ़-जशपुर में - जिंदल, कोरबा-जांजगीर-चांपा में - वेदांता, वीडियोकान, सरगुजा में - नालको एवं हिंडाल्को इत्यादि कंपनियों द्वारा आदिवासियों की जमीन को छीनकर बेघर-द्वार किया जा रहा है.

(७) छत्तीसगढ़ को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट 1960 की धारा 48(ख) की उप धारा 2(क) का उल्लंघन कर अपेक्स बैंक, मार्केटिंग फेडरेशन इत्यादि में अनुसूचित क्षेत्रों में गैर आदिवासियों का चुनाव कर प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है.

(८) अनुसूचित क्षेत्रों में नक्सली समस्या से अब तक 1,000 आदिवासी नागरिक एवं सुरक्षाबल मारे गए हैं.

(९) छत्तीसगढ़ निर्माण पश्चात आदिवासियों के लिए आरक्षित 5 विधान सभा सीट को समाप्त कर दिया गया.

(१०) छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक व्यवस्था एवं न्यायपालिकाओं में आदिवासियों की स्थिति/दुर्गति- 15/7/2011 की स्थिति में -

१- उच्च न्यालय बिलासपुर में आदिवासी जजों कि संख्या - 00 (कोई नहीं).

२- जिले में कलेक्टर - 18 जिलों में केवल- 02 (केवल डेढ़-डेढ़ वर्ष के लिए).

३- जिले में एस.पी. - 18 जिलों में केवल- 01 (केवल डेढ़ वर्ष के लिए).

४- जिला एवं सत्र न्यायाधीश - 18 जिलों में केवल - 01 (एक).

५- महाधिवक्ता कार्यालय में आदिवासी वर्ग के शासकीय वकील - 00 (कोई नहीं).

६- संभागीय स्तर पर पुलिस महानिरीक्षक (आई.जी.) - चारों संभागों में- 00 (कोई नहीं).

७- जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी - 18 जिलों में केवल - 02 (दो).

8- जिला शिक्षा अधिकारी - 20 शिक्षा जिलों में केवल - 03 (तीन).

९- वन मंडलाधिकारी - 27 वन जिलों में से केवल - 03 (तीन).

१०- महाविद्यालयों में आदिवासी वर्ग के प्राचार्य छ.ग. में कुल - 164 में केवल - 03 प्राचार्य.

११- सहायक आयुक्त (जिला स्तरीय पद) आदिम जाति विभाग - 18 जिलों में केवल - 02 (दो).

१२- उप संचालक, कृषि - 18 जिलों में केवल - 05 (पांच).

१३- मुख्यमंत्री सचिवालय (प्रशासनिक) में पदस्थ आदिवासी अधिकारी/कर्मचारी - 00 (कोई नहीं).

१४- राज भवन ([प्रशासनिक) में पदस्थ आदिवासी अधिकारी/कर्मचारी - 00 (कोई नहीं).

१५- छत्तीसगढ़ शासन, मंत्रालय में आदिवासी वर्ग के प्रमुख सचिव - केवल - 01 (एक).

१६- छत्तीसगढ़ शासन, मंत्रालय में आदिवासी वर्ग के सचिव - केवल - 01 (एक).

१७- छत्तीसगढ़ शासन के 31 आयोग/निगम/मंडल में आदिवासी अध्यक्ष/सचिव - 00 (कोई नहीं).
(अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को छोड़कर)

१८- छत्तीसगढ़ के आदिवासी वर्ग के जजों को समय पूर्व (2011) में दिए गए अनिवार्य सेवानिवृति की संख्या - 16.

          अतः सर्व आदिवासी समाज से अपील है कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वरा घोषित "विश्व आदिवासी दिवस" 9 अगस्त 2011 को त्यौहार के रूप में मानते हुए अपने-अपने घरों में दीपक अवश्य जलाएं तथा इंडोर स्टेडियम, बूढा तालाब के पास, रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर अपनी जागरूकता का प्रदर्शन करें.

विनीत
(१) अखिल भारतीय गोंड महासभा (२) अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद (३) अखिल भारतीय कुडुख उराँव समाज (४) अखिल भारतीय हल्बा समाज (५) छ.ग.कँवर समाज (६) छ.ग.सरना उराँव आदिवासी समाज (७) छ.ग.संवरा समाज (८) छ.ग.कमार समाज (९) छ.ग.कंडरा समाज (१०) छ.ग.बैगा आदिवासी समाज (११) छ.ग. बिंझवार समाज (१२) छ.ग.भतरा आदिवासी समाज (१३) छ.ग. भुंजिया आदिवासी समाज (१४) छ.ग.बिरहोर समाज (१५) छ.ग.कोरवा समाज (१६) छ.ग.माडिया-मुरिया समाज एवं छ.ग.के समस्त आदिवासी विद्यार्थी संगठन.
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