"गोंडवाना संदेश" का मूल मकसद गोंडवाना भू-भाग (GONDWANA LAND) के मूलनिवासियों को उनके अपने ऐतिहासिक, पुरातात्विक, यथार्थवादी, प्राकृतिक, वैज्ञानिक, तथ्यपरख, बौद्धिक, मौलिक, सृष्टिविजयकर एवं पुरखों की महान विरासत से प्राप्त आदिम सामाजिक संस्कारों को धारण रखने की अवधारणा जगाए रखते हुए, आधुनिक परिवेश में भी प्रकृति की तरह अटल नैतिक एवं सैद्धांतिक विकासक्रम की आवश्यकता हेतु जनजागृति का संदेश देना है.
बुधवार, 2 मई 2012
मंगलवार, 1 मई 2012
किताबों की सिलेबस में उलझी है जिंदगी और जिंदगी का भविष्य
किताबों का वास्तविक ज्ञान भविष्य की जिंदगी का सुखद एवं सुद्रढ़ आईना है. इस आईने के रा-मटेरियल का निर्धारण/चयन अर्थात सिलेबस तथा इसे बनाए जाने का तरीका/निर्माण की तकनीकी कुंठित मानसिकता से गढ़ी गई हो तो उसमे भावी भविष्य की स्पष्ट छवि कैसे देखी जा सकती है ? पाठ्यक्रम की सिलेबस लिखने वालों ने अपने आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सांस्कृतिक एवं स्वयं की सामाजिक रूप से भविष्य की सुद्रढ़ता के अनुरूप सिलेबस लिखा. सिलेबस और पाठ्यक्रम लिखने वालों की हरकतों पर नजर रखने वालों की नजर भी उनकी रही. सिलेबस और पाठ्यक्रम का परीक्षण करने वाली समीति भी उनके ही लोगों की. छापने वाले लोग भी उन्ही के और पढाने वाले लोग भी. हम तो अब तक केवल आँख बंद करके विश्वास करने वाले, बिना मुह खोले हाथ उठाकर बोलने वाले, दूसरों की सुनाई बातों को सुनने वाले, दूसरों के बताए रास्ते पर चलने वाले बने रहे. यह सब सरल और सहज गुण सदियों से हम पर लदे रहे केवल "अशिक्षा, अज्ञानता और अनभिज्ञता" के कारण. आज हम शिक्षित तो हो रहे हैं, किन्तु समाज की पुरातन गौरव बिखेरने वाले स्वर, लिखने वाले कलम के पदचिन्ह, सतकों से चली आ रही अंधी सिलेबस की आंधी और तूफ़ान से धीरे-धीरे मिटता जा रहा है. वह पदचिन्ह आदिम समाज के गौरवमयी सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक रूप से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का है, जिसकी आने वाली पीढ़ी को महती आवश्यकता है. हमारे पुरखों ने कहा है- उन्ही का सामाजिक भविष्य सुद्रढ़ हो सकता है, जो समाज अपना इतिहास जानता हो. आज भी हमारा इतिहास तो है, किन्तु लिखने वालों ने अपने तरीके से लिखा और अपना आईना दिखाया. हमें अपना इतिहास लिखने की जरूरत है. अपना इतिहास कोई उधार का व्यक्ति नहीं लिख सकता. वह आदिम सामाजिक इतिहास के मार्ग को गुमराह ही करेगा, जैसा अब तक करते आया.
मै इस बात को समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि किताबों की सिलेबस से हटकर लोगों की पढ़ने की आदत क्यों नहीं रही तथा सिलेबस और पाठ्यक्रम लिखने वाले तथाकथित दूसरे लोग ही क्यों रहे हैं ? वे तथाकथित लोग जानते हैं कि देश के लोगो को जिस रास्ते पर ले जाना हो तो सबसे पहले अपनी योजना को पाठ्यक्रम को सिलेबस के अनुरूप तैयार करो और पीढ़ियों तक योजनापूर्ण अपनी भावनाओं/बातों को युवा पीढ़ी के मष्तिष्क में डालो. ताकि वो सिलेबस से हटकर अपने और अपने समाज के बारे से कुछ न समझ सके. अपनी सोची समझी नीति के तहत तथाकथित रचनाकार अपनी सोच को अंजाम देते रहे हैं. यदि हमें अपनी सोच को अंजाम देना है तो अपनी पुस्तक/ग्रंथ/इतिहास लिखनी होगी. यदि अपनी आदिम ग्रंथ (प्रकृति संस्कारित) लिखा जाये तो कागज रुपी धरती का स्थान शायद कम पड़ जाएगा और दुनिया के सभी आध्यात्मिक ग्रंथों से बड़ा तथा प्रकृति की संस्कृति स्वरुप में अमृत गुणकारी सिद्ध होगा. भावनाएं भी और निष्ठाएं भी सभी प्राणियों के लिए श्रेष्ठ होगा. ऐसे श्रेष्ठतम इतिहास के लिए पहले हमें सिल्लेबस लिखना होगा. फिर इतिहास की नीव डालनी होगी.
हमारा इतिहास शंकर-पार्वती, ब्रम्हा-विष्णु, इन्द्र से शुरू नहीं होता, बल्कि प्रकृति की उत्पत्ति से ही शुरू होता है. प्रकृति को ब्रम्हा ने नहीं बनाया, बल्कि प्रकृति में ब्रम्हा पैदा हुआ. इस धरती के राजा प्रथम शंभू, शंभू महादाव (८८ सम्भू महादेवों में से प्रथम) शंभू-मूला दाई से सांस्कारिक शुरुवात माना गया है, जो ईशा के जन्म के २०,०००-१०,००० वर्ष पूर्व का है. गोंडवाना ग्रंथों में इन ८८ शंभू महादेवों का कार्यकाल १०,००० वर्ष का बताया गया है. अब तक जितने भी आध्यात्मिस ग्रंथों में चर्चा, बखान हुई है वह आर्यों के आगमन के बाद का है. यह आगमन तिथि लगभग ईशा पूर्व ५०००-३००० वर्ष के अंत का है जिसका उल्लेख गोंडी पाटा (गोंडी गीतों), रेलों, रेना, सुआ, दादरा आदि गोंडी पाटाओं में मिलते हैं. गोंडवाना भू-भाग के अंतिम ८८वें राजा संभू पार्वती के अंतिम काल में ही (गोंडी ग्रंथों के अनुसार) आर्यों का गोंडवाना भू-भाग में आगमन हुआ. आगमन के समय उनके साथ स्त्रियाँ नहीं थी. स्त्रियाँ साथ में नहीं होने के कारण उनमें सामाजिक एवं सांस्कारिक भावना का अभाव था. वे गोंडवाना के माताओं से ही अपने वंश विस्तार किए. ग्रंथों की कथाओं में वर्णित ब्रम्हा, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओं का उल्लेख यहीं से शुरू होता है. जबकी गोंडवाना भू-भाग में इनकी उत्पत्ति के पहले ८७ शंभू महादेवों की लगभग १०००० वर्ष का कार्यकाल बीत चुका था. इसीलिए वर्तमान ग्रंथों का इतिहास अधूरा है, जो छूट गया है वह गोंडवाना का इतिहास है. प्रकृति और मानवता का इतिहास है. प्रकृति और प्राणियों में स्वछन्द प्रेम और भाईचारे का इतिहास है. आर्यों ने धीरे-धीरे गोंडवाना में अपना वंश विस्तार करते हुए अपने अस्तित्व दर्शाने के लिए गोंडवाना की संस्कृति, परम्पराओं के स्वरुप को अनेक तरह से विकृत करना आरंभ कर दिया, जैसा कि उनके व्यवहार में था, जिससे गोंडवाना वासियों के लिए बहुत बड़ा सामुदायिक/सामाजिक संकट उत्पन्न हो गया. दोनों ओर से अस्तित्व के संघर्ष का शंखनाद भी यही से हुआ. आगे चलकर यह संघर्ष रौद्र रूप धारण कर लिया.
कथाकारों द्वारा वर्णित देव और असुरों (आर्यों और गोंडवाना के मूलनिवासियों/आदिवासियों) के संग्राम को अपने आध्यात्मिक ग्रंथों में देवासुर संग्राम कहा गया है. आर्य स्वयं को देव तथा यहाँ के मूलनिवासियों/आदिवासियों को असुर के रूप में शब्दांकन शुरू किया. इस संबोधन के प्रति उनका मकसद क्या रहा होगा पता नहीं ? किन्तु यह प्रतीत होता है कि यह केवल बुराई या कटुता को ही प्रदर्शित करता रहा होगा. आगे चलकर यह उनके प्रत्येक आध्यात्मिक ग्रंथों में बुराई और कटुता का सबब ही बना. सिलेबस और शब्दांकन की यही है चतुराई. मै यह नहीं मानता की ग्रंथो में दिए सारे अवतरण गलत हैं किन्तु अतिसंयोक्ति एवं अति से भी अछूते नहीं हैं. इन आध्यात्म शास्त्रों के सिलेबस ने इन्सान के दिमाग को आस्था के रूप में मानसिक गुलाम और पंगु बना दिया है. जिसके कारण वीर आदिवासी समाज अपने वास्तविक इतिहास की अनभिज्ञता के कारण सोची समझी सिलेबस की आध्यात्मिकता के सामने घुटने टेक रहे हैं, वे केवल पढ़े लिखे शिक्षित लोग हैं. शायद वे सिलेबस में यह नहीं ढूँढ पाए कि प्राचीन आध्यात्मिक रचनाकार आर्यों के गोंडवाना भू-भाग में प्रवेश के पश्चात की आदिमजातियों और आर्यों के साथ हुए महासंग्रामों को अतिसंयोक्तिपूर्ण शब्दजाल, सिलेबस में बांधा गया है, जिसे वास्तविकता से परे, किन्तु रोचक और लोक-लुभावन कैसे बनाया गया.
रामायण, महाभारत, गीता, वेद, पुराण सभी आर्यों के आगमन के बाद ईशा पूर्व ५०००-३००० के बीच संभू-पार्वती के काल के ही चित्रण मिलते हैं. किन्तु ईशा पूर्व २००००-१०००० वर्ष के (८७ शम्भुओं) के गाथाओं के कथांकन, चित्रण कहाँ गए, जिन्होंने इस गोंडवाना भू-भाग अर्थात आधे से ज्यादा भू-भाग में मानव जीवन सांस्कारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक योग और गाथाओं का परचम लहराया ? वे भी कथाकारों की मानसिकता, सिलेबस, उच्चता और निम्नता के जाल में फंसा दिए गए. आर्यों ने स्वयं को इन ग्रंथों में उच्चता और वीरता के रूप में ही प्रदर्शित किया. आर्यों के आगमन के पूर्व का गोंडवाना का इतिहास कहाँ गया ? मेरा यह सबसे बड़ा प्रश्न है, कथाकारों, इतिहासकारों और बुद्धीजीवियों के लिए. यह इतिहास नहीं लिखा गया तो क्यों नहीं लिखा गया ? क्या प्राचीन कथाकारों को यह इतिहास लिखने के लिए परहेज था या सामर्थ्य नही था ? या आर्यों में उस समय कोई ऐसा कथाकार पैदा नहीं हुआ, जो उसे लिख सके या वे जानना या लिखना नहीं चाहते थे ? आज ऐसे कई दुर्लभ प्रश्न मेरे मन में पैदा होते है. क्योंकि मै सिलेबस से हटकर भी पढता हूँ. आध्यात्मिक सिलेबस में आदिम समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, जीवन गाथाओं पर अपना अस्तित्व तलाशने का प्रयास करता हूँ. इस जमीन पर अपने स्थायित्व, अस्तित्व, हक और अधिकार का उत्तर ढूँढता हूँ. यह मेरा अपना सिलेबस है. अपना सिलेबस खुद बनाना पडेगा, लिखना पडेगा. खुद के स्थायित्व और अस्तित्व को कोई बैरागी नहीं बता सकता और न ही प्रमाण दे सकता है. किन्तु देश का दुर्भाग्य है कि चलते फिरते करोडपति लुटेरे बाबाओं, आध्यात्मिको, राजनीतिज्ञों के चंगुल में लोगों की मानसिकता गुलाम हो चुकी है. अपने दिलो दिमाग में इतिहास के समाज को मानवता के रूप में समायोजन करने वाली भाषा ढूँढता हूँ, इतिहास के मिटते हुए पदचिन्हों में अपना ऐतिहासिक अस्तित्व ढूँढता हूँ, किन्तु केवल मिटी हुई निशां ही मिलती है. यही एक पुख्ता सुबूत है कि इसे किसी ने मिटाने का भरसक प्रयास है.
शायद आप लोगों को पता होगा कि छत्तीसगढ़ में बी.ए. प्रथम समाज शास्त्र की पुस्तक में गोंडी संस्कृति के बारे में अभद्र तरीके से टिप्पणी किया गया था कि - गोंड आदिवासी गोमांस खाते हैं तथा जानवरों की तरह पानी पीते हैं. इसी तरह और भी अभद्र टिप्पणी की गई थी. यह अभद्र टिप्पणी देश में उन लोगों के लिए की गई थी, जिनकी बदौलत देश सोने की चिड़िया कहलाती थी, देश के गोंड राजवंश में सोने के सिक्के चलते थे. कहाँ गई वह सोने की चिड़िया ? कहाँ गए वे सोने के सिक्के ? निश्चित ही देश के दलालों के घर में कैद होकर तड़प रही है. आदिवासी दूर दराज पहाड़ों पर बसने के कारण वह शिक्षा से वंचित होती रही किन्तु मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से निर्बल नहीं. वह आर्थिक रूप से कमजोर है किन्तु भूखा नहीं रहा और न ही वह भूख के कारण कभी आत्महत्या किया और न ही भीख मांगे. भूख के कारण मरने वाले इतने कमजोर दिल आदिवासी इतिहास में नहीं रहे. जंगल की आत्मनिर्भरता के कारण वह अपने आप को शांत, सुखी और संपन्न मानता रहा, किन्तु जंगल के खत्म होने के कारण अपनी पीढ़ी के भविष्य के लिए भयभीत और हतोत्साहित जरूर है.
अनादिकाल से आज तक आदिम जातियों के प्रति कुंठित मानसिकता भरी सिलेबस और किताबें लिखकर युवा पीढ़ी को भ्रमित किया जा रहा है. उनके चरित्र का आज भी अवास्तविक चित्रं किया जा रहा है और स्वयं के अवास्तविक को वास्तविक. वर्तमान आध्यात्मिक ग्रंथों (रामायण, महाभारत, वेद, पुराण आदि) में वर्णित चारित्रिक चित्रण क्या सही है ? इसका उत्तर मुझे अब तक नहीं मिल पाया. जब भी ज्ञान, आध्यात्म और संस्कारों की बात की जाती है, तब सभी इन्ही ग्रंथों के पात्रों के जीवन संस्कृति की ही चर्चा करते हैं. क्या ये ग्रंथ हमारे लिए उदाहरण के पात्र हैं ? क्या ये ग्रंथ उस समय लिखे गए, जब ये घटनाएं हो रही थी ? क्या उस समय संस्कृत और हिन्दी के इतने अच्छे ग्रंथकार पैदा हो चुके थे ? यदि आर्य ग्रंथकार पैदा हो चुके थे, तो क्या गोंडवाना भू-भाग जहां आर्यों के आगमन के हजारों वर्ष पहले से ही मानव सभ्यता और संस्कृति फल-फूल चुकी थी, वहाँ कोई आध्यात्निक/दार्शनिक पैदा नहीं हुआ ? ऐसा नहीं हो सकता. मात्र शब्दों के भावनात्मक ग्रंथ पिरो लेने से वास्तविकता नहीं बदलत सकती, बल्की अवास्तविकता को वास्तविकता में बदलने का प्रयास भर किया जा सकता है. काफी हद तक वे इसमें सफलता भी पाए हैं.
आज के अध्ययन और अध्यापन की जटिलता प्राचीन अध्ययन का खुलासा कर रहा है. इस खुलासे में आज प्राचीनतम कहे जाने वाले ग्रंथो की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं. समय के साथ साथ प्रत्येक संस्करणों के सब्दांकन में भी सुधार की प्रक्रिया देखी जाती रही है. उसे अपनी भावना के अनुरूप ढाला जाता रहा है. किसी भी ग्रंथ में गोंडवाना गणों की सभ्यता, आध्यात्मिकता, सांस्कारिकता, व्यावहारिकता का समरूप चित्रानकर, शब्दांकन और अर्थांकन कहीं भी नहीं मिलता चाहे वह कोई भी ग्रंथ हो. यदि उनमे बुराईयाँ भी हैं तो उसे ग्रंथ की पवित्रता समझकर आगे पूर्णविराम जगा देते हैं. मुझे इन ग्रांथों की धार्मिक पवित्रता और आदिम प्राकृतिक आध्यात्म की सत्यता के बीच में निश्चित ही संदेह उत्पन्न होता है. मै संदेह का उत्तर तलाशने में लगा हूँ, चाहे कोई तलाशे या न तलाशे.
प्राकृतिक आदिम सांस्कारिक जीवन का आध्यात्म, संस्कारों की शक्ति एवं सत्यता की खोज मेरा सिलेबस है. मेरे सपनों का ग्रंथ "सृष्टी और जीवन का सत्य" है.
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रविवार, 29 अप्रैल 2012
भारत अप्रवासियों का देश है.
भारत अप्रवासियों का देश हैं। यहाँ के मूलनिवासी उनके पूर्वज थे, जिन्हें हम आज आदिवासी कहते हैं। इस समय
आदिवासी भारत की आबादी के ८ प्रतिशत हैं। अर्थात ९२ प्रतिशत भारतवासी बाहर से आकर यहाँ बसे हैं। वे आज से लगभग १०,००० वर्ष पहले भारत के उत्तर
उश्चिम से आये थे। औद्योगिक क्रांति के पहले पूरी दुनिया में कृषि मुख्य व्यवसाय था। उस समय भारत कृषकों
का स्वर्ग था। यहाँ कृषि के लिए उपयुक्त वातावरण एवं संसाधन मौजूद थे। इसलिए चारो ओर से लोग भारत में बसने आये।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े साहित्यकारों की यह मान्यता है की आर्य
भारत के मूलनिवासी हैं और वे बाहर से नहीं आये हैं। अपने इस
दृष्टिकोण को सही साबित करने के लिए वे आदिवासियों को वनवासी कहते हैं। उन्हें
वनवासी कहकर वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि आर्य ही यहाँ के मूलनिवासी हैं और आज
के हिन्दू आर्यों की संतान हैं। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मत हैं कि आर्य
मध्य यूरोप से भारत में आकर बसे थे। लोकमान्य तिलक का तो यहाँ तक कहना था
कि आर्यों का मूलनिवास उत्तरी ध्रुव था। यह विवाद लम्बे समय से जारी है, परन्तु पहलीबार इस मुद्दे पर
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी राय प्रकट की है। बीती पाँच जनवरी, २०११ को सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से
कहा है कि आर्यों के आने के पूर्व जो लोग भारत में निवास करते थे आज के आदिवासी
उन्ही की संतान हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह राय महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के एक निर्णय को रद्द
करते हुए प्रकट की। इस मामले में यह भी जाहिर होता है कि हम आदिवासियों से किस तरह का
व्यहार करते हैं। इस मामले का सम्बन्ध एक भील महिला से है, जिसका नाम नन्दबाई है। इस महिला को नग्न किया गया, बुरी तरह पीटा गया और गांव में घुमाया गया। इस
महिला पर यह आरोप था कि उसके एक उच्च जाति के
पुरुष से अवैध सम्बन्ध थे, जिन लोगों ने उसके साथ यह व्यवहार किया था। उन्हें जिला एवं सत्र न्यायालय, अहमदनगर ने दोषी पाया और सजा सुनाई। सजा जिन धाराओं के अंतर्गत
सुनाई गई उनमे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार
निवारण) अधिनियम भी शामिल था। जब मामले कि अपील हाईकोर्ट में हुई तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति क़ानून के
अंतर्गत दी गयी सजा रद्द कर दी गयी। यद्यपि अन्य धाराओं के अंतर्गत सुनाई
गयी सजा यथावत रखी गई। उसके बाद यह मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में आया। सुनवाई के बाद सर्वोच्च
न्यायालय की खंडपीठ, जिसमे न्यायमूर्तिद्वय
मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा ने न सिर्फ हाईकोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कानून के
अंतर्गत दी गयी सजा को रद्द किया जाना गलत बताया, वरन इसके साथ ही भारत के मूलनिवासी
कौन थे, इस विषय पर भी अपना मत व्यक्त
किया। निर्णय में कहा गया कि आज के आदिवासी ही भारत के
मूलनिवासियों की संतान हैं। इस तथ्य के बावजूद उनके साथ सदियों से मानवोचित सुलूक यहीं किया जा
रहा है। खंडपीठ ने इतिहास के अनछुए पहलुओं का सहारा लेते हुए यह निर्णय किया है कि वास्तव में
हमारा देश अप्रवासियों का देश है। हमारे देश की ९२ प्रतिशत आबादी अप्रवासियों
की संतान हैं और मात्र ८ प्रतिशत भारतीय १०,००० वर्षों से अधिक समय से
भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे हैं। पिछले हजारों सालों में विश्व के अनेक हिस्सों
से लोग यहाँ आये और बस गए। इसी कारण हमारे देश में अनेक धर्मों के मानने वाले लोग
रह रहे हैं। भाषाओँ और अन्य प्रतीकों के आधार पर खंडपीठ ने माना कि बाहर से आये अप्रवासियों के आक्रमण
और अन्य कारणों से भारत के उक्त मूलनिवासी जंगलों और पहाड़ों पर
सिमटने पर मजबूर हो गए। भारत के ये मूलनिवासी अब मुख्यतः झारखण्ड, छत्तीगढ़,
उड़ीसा,
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के कुछ
हिस्सों में पाए जाते हैं। खंडपीठ ने अपने निर्णय में इस बात पर जोर दिया है कि
भारत की नस्लीय, जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विभिन्नताओं ने हम पर एक गंभीर उत्तरदायित्व
डाल दिया है। वह उत्तरदायित्व है विभिन्नताओं के बावजूद देश को एक बनाए रखने का।
इस कठिन चुनौती का सामना करने में हमारे संविधान निर्माता काफी सहायक बन पड़े हैं।
हमारा संविधान सभी धार्मिक समूहों, विभिन्न भाषा-भाषियों को सामान
अधिकार देता है और उनके अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है, परन्तु सिद्धांत में सभी को
बराबरी का दर्जा देना यथेष्ट नहीं है। उन समूहों को, जो पहले से ही अभावों का जीवन जी रहे हैं, विशेष संरक्षण और सहायता की जरूरत है
तभी वे गरीबी और असमान सामाजिक परिस्थितियों से ऊपर उठ सकेंगे। इसलिए संविधान में
इस तरह के समूहों को विशेष अधिकार दिए गए हैं। इनमे आदिवासी शामिल हैं, जो भारत के मूलनिवासियों की
संतान हैं। वे सदियों से गरीबी और अभाव की जिन्दगी जी रहे हैं। उनमे से अधिकांश आज भी
निरक्षर हैं और कुपोषण एवं अज्ञानता के चलते बीमारियों की गिरफ्त में आ
जाते हैं। अन्य लोगों की तुलना में उनकी मृत्यु दर भी ज्यादा है।
इसीलिए वे सब इस देश से मोहब्बत करते हैं और जो इसकी बेहतरी चाहते हैं, उनका कर्तव्य है कि वे आदिवासियों के उन्नयन में
सहयोग करें। सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि आदिवासी आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से
देश के अन्य नागरिकों के स्तर तक पहुँच सकें। हमें यह स्वीकार
करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि वे सदियों से शोषण और अन्य प्रकार की ज्यादतियों के शिकार रहे हैं।
उनके प्रति हमारे रवैये में परिवर्तन आना चाहिए। हमें उनका पूरा आदर और सम्मान
करना चाहिए, क्योंकि वे हमारे पूर्वज हैं।
हमने आदिवासियों के साथ जो अन्याय किया है, वह हमारे देश के इतिहास का सर्वाधिक सर्मनाक
अध्याय है। एक समय था, जब इन आदिवासियों को हम राक्षस
या असुर कहते थे। हमने इनकी हत्याएं की और जो बचे उन पर हर संभव अत्याचार किये।
हमने उनकी जमीनें छीनी और उन्हें जंगल में खदेड़ दिया, जहाँ वे अत्यधिक कठिन
परिस्थितियों में जीवन यापन करते हैं। अब हम औद्योगीकरण के नाम पर उनसे जंगल भी
छीन रहे हैं और उन्हें अभावों के गर्त में ढकेल रहे हैं।
निर्णय में आदिवासियों के साथ नारकीय व्यवहार के उदाहरण स्वरुप एकलव्य का
उल्लेख किया गया है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने
से इंकार कर दिया, परन्तु जब द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा
स्वरुप एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांगलिया, भोले भाले एकलव्य ने उन्हें
अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा के रूप में दे दिया। इस तरह द्रोणाचार्य ने एकलव्य को
अपंग बना दिया। द्रोणाचार्य ने अंगूठा इसलिए माँगा, क्योंकि उन्हें लगा कि एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया है।
निर्णय कहता है कि उस समय से लेकर आज तक हम इन लोगों के साथ ऐसी ही व्यवहार कर रहे हैं।
खंडपीठ द्रोणाचार्य के व्यवहार को शर्मनाक बताते हुए कहती है कि जब
द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिक्षा दी ही नहीं थी तो उन्हें एकलव्य से गुरु दक्षिणा
मांगने का क्या अधिकार था। माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इतनी ज्यादतियां सहने
के बावजूद आदिवासियों ने अपना उच्च नैतिक कायम रखा है। वे साधारणतः किसी को धोखा नहीं
देते, झूठ नहीं बोलते और ऐसे अनैतिक
कार्य नहीं करते जो गैर आदिवासियों में आम है, इसके बावजूद वे आज तक
ज्यादतियों के शिकार हैं। यह जिसमे सम्बंधित ने विरोधी रवैया अपनाया इसी तरह के व्यवहार का प्रतीक है। हमें यह रवैया बदलना होगा, यदि हम ऐसा करते हैं, तो यह देशहित में होगा.
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रविवार, 15 अप्रैल 2012
आदिवासी मतलब उपयोग करो और फेंको ?

दिनांक १९ मार्च, २०१२ को छत्तीसगढ़ की राजधानी, रायपुर में आदिवासियों पर जबरदस्त लाठी प्रहार किया गया, जिस पर प्रस्तुत अंक में विस्तार से लेख प्रकाशित है, जिसका मात्र अध्ययन, पठान-पाठन, तक सीमित न रहकर आज हमें इस प्रकार की घटनाओं का चिंतन मनन करते हुए मुखर होने की आवश्यकता है. आदिवासियों पर लाठी-डंडे बरसाने की यह पहली घटना नहीं है. अपनी समस्याओं के निराकरण या संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर आदिवासी प्रदर्शनों पर देश के विभिन्न राज्यों में अब तक अनगिनत बल प्रयोग किए गए. झारखण्ड के आदिवासियों का पूरा इतिहास ही संघर्ष, त्याग, तपस्या और बलिदान से ओत-प्रोत रहा है. आजादी के पहले और आजादी के बाद भी झारखंड का आदिवासी सिर्फ और सिर्फ संघर्षरत है. उनका यह संघर्ष आज भी जारी है जबकि वहाँ सत्ता शीर्ष पर राज्य निर्माण से ही मुख्यमंत्री की आसंदी में आदिवासी काबिज है. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि सामान्यतया समाज माँगता नहीं है.
आदिवासी मसीहा के रूप में विख्यात भारत के महान आदिवासी नेता इंजीनियर कार्तिक उराँव जी कहते थे, कि आदिवासियों में देने की परम्परा रही है, मांगने की नहीं. इसीलिए कभी सरकार से कुछ मांगना भी पड़ा तो सरकार को लगता है कि उनकी कोई गंभीर समस्या नहीं है. श्री उराँव का मानना था कि आदिवासियों को मांगना आता ही नहीं है, अतः उन्होंने भारतीय आदिवासियों को अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद संगठन बनाकर सर्वप्रथम संगठित व जागरूक बनाने का कार्य प्रारंभ किया. श्री उराँव ने ही आदिवासियों को संवैधानिक अधिकारों को मांगने व प्राप्त करने के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी. विगत तीन दशक का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि एतिहासिक अन्यायों से जूझते आदिवासी समाज ने न्याय मांगने सरकार के समक्ष जब कभी धरना, प्रदर्शन, जुलूस इत्यादि का आयोजन किया, सरकार ने उसे दबाने, डराने, धमकाने व मारने, पीटने का ही उपक्रम किया है.
राजधानी रायपुर में हुआ लाठी चार्ज आदिवासी समाज के लिए एक दुखद घटना है, परन्तु विधानसभा घेरने आये प्रदर्शनकारी आदिवासियों में नक्सलियों का समागम व पुलिस पर कातिलाना आक्रमण की बात कहकर राज्य शासन और पुलिस प्रशासन ने आदिवासी जख्मो में नमक छिड़क दिया है. यह वक्त मरहम लगाने का था, लेकिन पुलिस प्रशासन ने आदिवासी आंदोलन को नक्सल चेहरा बताने की भारी गलती की है. वैसे बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में निवासरत सभी आदिवासी पुलिस की निगाह में संदिग्ध माने जाते हैं. बस्तर में आज जितने नक्सली नहीं हैं, उससे कई गुना अधिक सुरक्षा बालों के जवान वहाँ तैनात किए गए हैं. आदिवासी अपने जंगल में जाने से आज डरता है. नाचने-गाने से डरता है. गीत-संगीत वह भूल गया. बस एक ही बात याद रहती है कि पुलिस वाला उसे नक्सलवादी घोषित कर मार न दे. जेल में डाल न दे. आदिवासी सत्ता के प्रतिनिध, प्रकाश चापा, उसूर ब्लाक का काम देखते हैं. यह विकासखंड चरम नक्सली गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है. कुछ माह पूर्व की बात है जब "आदिवासी सत्ता" की प्रतियां लेकर प्रकाश चापा कहीं जा रहे थे, सी.आर,पी.एफ. का गश्ती दल सर्चिंग से अपना कैंप वापस जा रहा था तब रास्ते में जवानों में उसे रोक किया. तलाशी में "आदिवासी सत्ता" मिली तो जवानों ने नक्शल साहित्य रखने का आरोप लगाकर उसे अपने साथ कैंप चलने बाध्य कर दिया. श्री चापा ने लाख समझाया, परन्तु वे नहीं माने, अंततः उनके साथ उन्हें जाना पड़ा. लगभग ३-४ कि.मी. चलने के बाद सी.आर.पी.एफ. टुकड़ी एक स्थान पर विश्राम करने रुक गई. टुकड़ी के प्रभारी अधिकारी ने जप्त पत्रिका को पढ़ना शुरू किया तो पढते ही रहे. एक घंटे "आदिवासी सत्ता" का अध्ययन करने के बाद उन्होंने प्रकाश चापा को छोड़ने को कहा. श्री चापा को पास बुलाकर खेद व्यक्त करते हुए दो पत्रिका मांग ली और जाने कहा. टुकड़ी का अधिकारी समझदार था, अतः प्रकाश चापा को कोई हानि नहीं हुई, अन्यथा वही होता जो बस्तर में अक्सर होते आ रहा है.
शासन व प्रशासन की निगाह में प्रत्येक आदिवासी संदिग्ध होते जा रहा है, क्योंकि अब वह अपने हक व अधिकार के लिए जागरूक होने लगा है. संवैधानिक अधिकारों को पहचानने व जानने लगा है. जब जान गया है, तो मांगेगा ही. आदिवासी किसी सरकार से खैरात तो मांग नहीं रहा है कि मर्जी होगी तो दोगे. १२ साल बाद जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिला, वह भी वह भी वर्ष २०१२ से. ११ साल लगा दिए, वह भी तब जब आदिवासी समाज हठ पर उतर आया. आदिवासी का यह संविधान सम्मत हठ भी सरकार को नागवार गुजरा, इसीलिए पूरे आंदोलन को नक्सलवाद से जोड़कर बदनाम करने का प्रयास हो रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष की भूमिका में छत्तीसगढ़ कांग्रेस बल्ले-बल्ले कर रही है. आदिवासियों के ऊपर हुए लाठीचार्ज से कांग्रेश पार्टी दुखी और उद्देलिए है. पूरी भाजपा सरकार को निगल जाने आतुर दिखाई पड़ती है. भाजपा शासनकाल में आदिवासियों को राजधानी की सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर मारने के विरोध में धरना प्रदर्शन कर हजारों कांग्रेसियों ने जेल भरो आंदोलन चलाया और मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह को पानी पी पीकर कोसा. प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी दहाड़ मार रहे हैं कि आदिवासियों को क्यों मारा ? जोगी मंत्रिमंडल में नंदकुमार पटेल गृहमंत्री हुआ करते थे, अब वे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं. श्री जोगी के कार्यकाल में आदिवासियों को सिर्फ दौड़ा-दौड़ा कर मारा पीटा ही नहीं गया बल्कि राजधानी आये सामाजिक प्रमुखों के मुह पर कालिख पोत उनका शानदार स्वागत भी किया था. गृहमंत्री की हैसियत से श्री पटेल ने विधान सभा में कहा था कि ऐसी कोई घटना राजधानी में हुई ही नहीं. आज कांग्रेस के नेताओं को आदिवासी अपमान देखा व सहा नहीं जा रहा है, क्योंकि उन्हें सत्ता चाहिए, वह भी आदिवासी वोटों से. चोली-दामन की तरह कांग्रेस से जुड़ा आदिवासी समाज कांग्रेस से दूर हुआ. क्यों हुआ ? सभी कांग्रेसी जानते हैं. ०४ नवंबर,२०११ को आदिवासियों ने मार भी खाई और कालिख भी पुतवाई. यह काम पुलिस ने नहीं किया. सत्ता में बैठी कांग्रेस और कांग्रेसियों ने भारी पुलिसबल के संरक्षण में किया. बड़े बेआबरू होकर कांग्रेस के कूचे से निकले थे आदिवासी, उस समय आज दहाड़ रहे कांग्रेसी नेताओं को रोना आया और न ही आँख का आँसू टपका.
छात्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी आदिवासी समाज के पास है, अतः हर कोई आदिवासी गम में घडियाली आँसू बहाकर आदिवासियों का हमदर्द बनना चाहता है. जबकि हकीकत यह है कि राजनीति में आदिवासी उपयोग कर फेंकने वाली वस्तु बनकर रह गया है. यह सिलसिला बहुत पुराना है और तब तक जारी रहेगा जब तक आदिवासी समाज जातिवाद और क्षेत्रवाद का शिकार होकर अशिक्षा, अज्ञानता, अजागरुकता और शराब जैसी महामारी से घिरा रहेगा. एक जानकारी के अनुसार हर दर्जे के असंगठित आदिवासियों को संगठित करने हेतु छत्तीसगढ़ में लगभग हजार से भी अधिक जाति/समाज संगठन पंजीकृत हैं. अपंजीकृत संस्थाएं भी अनगिनत हैं. अपने सामाजिक प्रेम को चमकाने और दमकाने के लिए और भी नए संगठन आदिवासी बाजार में आ जाय तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी. आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आदिवासी उस मृग की तरह है जो कस्तूरी को बाहर खोजता है, जबकी वह उसके भीतर मौजूद है. आदिवासी समाज को आदिवासी सत्ता से परिचित कराना ही "आदिवासी सत्ता" पत्रिका का मूल उद्देश्य है और यह उद्देश्य तब सफल होगा, जब हम "आदिवासी सत्ता" को जानेंगे व मानेंगे.
साभार आदिवासी सत्ता
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