रविवार, 16 सितंबर 2012

जनजातीय समाज को जरूरत है सांस्कृतिक आन्दोलन की


        भारत वर्ष में जहां-जहां जनजातीय समाज के लोग रहते हैं, विशेषकर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड, विदर्भ (महाराष्ट्र), आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, गुजरात में जनजातियों के बहुत से नेता और बुद्धीजीवी जनजातियों की विशिष्ठ पहचान (आइडेंटिटी) को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन इन राज्यों के बहुत से जनजाति के लोगों नें अपनी पहचान को त्याग दिया है और त्याग रहे हैं. बहुत से जनजातीय लोग अपनी बोली भाषा छोड़ते जा रहे हैं. अपना धर्म और रीति रिवाज छोड़ते जा रहे हैं. अपनी संस्कृति और सामाजिक, राजनीतिक संस्थाएं छोड़ते जा रहे हैं.

        कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा ईसाईयत के प्रभाव से हुआ है. यह बात पूरी तरह से सही नहीं है. यह सच है कि ईसाई बने जनजाति के लोगों ने अपनी संस्कृति की कई बातों को छोड़ दिया है, लेकिन ईसाई जनजातियों की संख्या बहुत कम है. अधिकतर जनजाति गैर ईसाई हैं. वे अपनी पहचान क्यों छोड़ रहे हैं ?

         इन राज्यों के अधिकांश क्षेत्रों के जनजातियों ने बहुत से हिन्दू रीति रिवाजों को अपना लिए हैं. ब्राम्हणों को अपना पुरोहित बनाया है और हिन्दू पर्व, त्यौहार मनाते हैं तथा हिन्दू देवी देवताओं की पूजा करते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इन सब के पीछे आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव हैं. बाहरी ताकतों और शक्तिशाली पराये जातीय समूहों से घिरे होने के कारण उनके दबाव से जनजातीय समाज अपनी पहचान, धर्म, संस्कृति, बोली भाषा आदि छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं.

       यह बात सही है, लेकिन जनजातियों के द्वारा इनके प्रतिरोध का कोई विशेष प्रयास नहीं दिखता. उनमे इन घटनाओं के प्रति विक्षोभ की मानसिकता नही दिखती. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले जनजातीय युवक युवतियों में अपनी जातीय पहचान के प्रति कोई लगाव नहीं दिखता. शिक्षित जनजातीय युवक युवतियां अपने जनजातीय होने पर शर्म महसूस करते हैं. जिन कॉलेजों में जनजातीय भाषा साहित्य के विभाग खुले हैं, उनमे जनजातीय युवक युवतियों ने अपनी मातृभाषा और उनके साहित्य को पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखलाई. एक वाक्य में कहें तो शिक्षित जनजातीय युवक युवतियों में अपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना मिलती है.

       ऐसी स्थिति में कुछ जागरूक जनजातीय समाज के बुद्धीजीवीयों द्वारा जनजातीय पहचान को प्रतिष्ठित करने का आन्दोलन कैसे सफल हो सकता है ? अगर लोग अपनी पहचान बताने में शर्माते हों तो आप उनकी पहचान को कैसे प्रतिष्ठित कर सकते हैं ? सवाल यह है कि जनजातीय समाज अपनी पहचान क्यों छोड़ते जा रहे हैं ? शिक्षित जनजातीय समाज के युवक युवतियां अपनी जातीय पहचान से क्यों शर्माते हैं ? अपनी बोली भाषा, संस्कृति, समाज के प्रति उनमे हीनता की भावना क्यों है ?

        इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि बाहरी लोग जो शक्तिशाली हैं और अधिक/कृत्रिम सुसंस्कृत और सभ्य समझे जाते हैं तथा जनजातीय समाज को नीची नजर से देखते हैं. बाहरी लोगों की नजर में जनजातीय समाज असभ्य और असंस्कृत है. उनकी नजर में जनजातियों का धर्म, रीति रिवाज, सामाजिक संस्थाएं, पर्व त्यौहार और बोली भाषा, साहित्य सब पिछड़ा हुआ है, निम्न कोटि का है, असभ्य अवस्था में है ? वे अपनी बातचीत से और अपने वर्ताव से जनजातीय समाज के प्रति घृणा प्रकट करते हैं और अपने समाज की हर चीज कुटिलता से श्रेष्ठ घोषित करते हैं, जबकि वैसा नहीं है, सारी बुराईयाँ उनकी हैं.

          दूसरों के कहे अनुसार शिक्षित जनजातीय समाज यह महसूस करता है कि उनके समाज में हर चीज घृणित है, उनका धर्म, रीति रिवाज, संस्कृति और बोली भाषा सब पिछड़ी हुई है. असभ्य अवस्था में है तो वे अपने समाज पर गर्व कैसे करे ?

         वे अपने आँखों के सामने देखते हैं कि समाज में और देश में हर जगह हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं का सम्मान है. इनके माध्यम से हर काम होता है, लेकिन जनजातीय भाषाओं के माध्यम से नहीं ? वे देखते हैं कि जो लोग अधिक सभ्य और सुसंस्कृत हैं, अधिक संपन्न और प्रतिष्ठित हैं. वे अपनी जनजातीय भाषाएँ नहीं बोलते है. वे हिंदी, अंग्रेजी आदि बोलते हैं. वे देखते हैं कि जो शासन करते हैं, जो देश और समाज को चलाते हैं, जो हर जगह बड़े पदों पर प्रतिष्ठित हैं, वे जनजाति समाज के नहीं, गैर जनजातीय समाज के हैं. समय समय पर वे इन प्रतिष्ठित सम्मानित तथा संपन्न लोगों के मुह से अपनी जनजातीय बोली भाषा, संस्कृति की निंदा भी सुनते हैं. सुनने से भी अधिक यह चीज वे उनके व्यवहार से पाते हैं. बाहरी लोग आपस में वैसा व्यवहार करते हैं. उससे घटिया दर्जे का व्यवहार वे आदिवासियों से करते हैं. रे इधर जाओ, उठो उधर जाओ और तुम ताम कहकर वे आदिवासियों को संबोधित करते हैं. शहरों में, बसों में, ट्रेन में, सार्वजनिक स्थानों में, मालिक के साथ मजदूर के रूप में और सबसे अधिक गाँव देहातों में जनजाति समाज हर जगह अपने लिए ऐसा ही घटिया व्यवहार सहते हैं.

        गाँव देहातों में पहने जाने वाले पहनावा, उनकी रीति, रिवाज, संस्कृति, बोली भाषा में कभी भी कहीं भी दरिद्रता नहीं झलकती, किन्तु शहरी और समृद्ध लोगों के द्वारा ये सब देखकर यह मानसिकता बना चुके हैं कि देहातियों में समझ नहीं होती तथा वे सभ्य नहीं होते. उन्हें हिंदी अंग्रेजी नहीं आती, किन्तु वे धन्य हैं जिन्हें अपनी मातृभाषा आती है. शिक्षितों की अपेक्षा वे भाषाई भिन्नता और शिक्षित नही होने से समझ में कमजोर पाए जाते रहे हैं. यदि वे भी शिक्षित हो जाएँ तो उनमे भी हर तरह की समझ आ जाती है. केवल शिक्षित न होकर उनकी नासमझी को देखकर उन्हें सभ्य लोग कई तरह से प्रताड़ित करते हैं, उन्हें असभ्य समझते हैं. इन सबको बचपन से देखते देखते समाज के युवक युवतियों के मन में स्वाभाविक रूप से यह विचार बन जाता है कि उनकी समुदाय और समाज ऐसे ही है. उनकी हर चीज घटिया और निम्न हैं और उसमे सभ्य और श्रेष्ठ कुछ भी नहीं हैं. इसलिए शिक्षित युवक युवतियों को अपनी भाषा, संस्कृति और रीति रिवाज पर गर्व नहीं होता. उन्हें अपने जनजातीय होने पर शर्म आता है. उनमे अपनी सामुदाईक पहचान के प्रति हीनता की भावना पनपती है. वे चाहते हैं कि वे जनजाति न रहकर कुछ और हो जाएँ. कुछ ऐसा हो जाएँ जिससे बाहरी लोगों के मन में उनके प्रति सम्मान बढ़े. चूंकि बाहरी लोग सिर्फ अपनी ही संस्कृति, अपनी ही रीति रिवाजों को और सिर्फ अपने ही धर्म और सामाजिक मूल्यों को सम्माननीय मानते हैं, इसलिए उनके नजरों में सम्माननीय बनने के लिए जनजातीय समाज के लोग अपनी संस्कृति, रीति रिवाज, बोली भाषा, धर्म और अपनी सामाजिक मूल्य छोड़कर बाहरी लोगों की संस्कृति, रीति रिवाज, बोली भाषा, धर्म और मूल्य अपनाते जा रहे हैं
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        वास्तव में यह घटना जनजातीय जीवन मूल्यों का पराजय है, कहा जा सकता है. यह सही है कि अपेक्षाकृत जनजातीय समुदाय में गरीबी है. उनकी अर्थ व्यवस्था पिछड़ी हुई है. उनकी उत्पादकता कम है, क्योंकि उनकी जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है. उनके पास सिंचाई के साधन तथा उत्पादन के आधुनिक साधनों का अभाव है. यह सही है कि जनजातीय समाज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं सरल, स्थानीय तथा समजोर हैं. लेकिन यह सही नहीं है कि उनकी संस्कृति विकृत व घटिया है. यह सही नहीं है कि उनके रीति रिवाज, बोली भाषाएँ, धर्म तथा जीवन मूल्य निम्न कोटि के हैं. सच बात तो यह है कि जनजातीय समुदायों की संस्कृति, उनके जीवन मूल्य तथा बहुत सी सामाजिक परम्पराएं कथित सभ्य बाहरी लोगों की सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक परम्पराओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ, प्राकृतिक और मानवीय है. सच बात तो यह है कि जनजातियों की संस्कृति और सामाजिक जीवनमूल्य मानव जाति की कल्पना के आदर्श मानव समाज से अधिक मेल खाते हैं. जबकि जनजातियों को असभ्य और असंस्कृत कहने वाले भारत के हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों का समाज जिसमे निवेशिक सभ्यता के कृत्रिमता तथा मध्ययुगीन सामंती संस्कृति व पशुत्व संस्कृति के घृणात्मक मूल्यों के नीचे दबकर मनुष्यता और व्यक्ति की गरिमा कराह रही है.

         उदाहरण के लिए देश और दुनिया का सभ्य हिंदू समाज दहेज़ जैसी दानवीय समस्या से पीड़ित है और दहेज़ के लिए पत्नियों और दूसरों की बहन बेटियों को ज़िंदा जलाने और उनकी ह्त्या कर देने की घटनाएं आम हो चुकी है. जबकि जनजातीय समाज में दहेज़ जैसी विकराल समस्या नहीं है और दहेज़ के लिए किसी को जलाने या जान से मार देने की तो जनजातीय लोग कल्पना भी नहीं करते. शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले हिंदू समाज में आज की परिस्थितियों में देखा जाए तो विकृति के अलावा और कुछ नजर नहीं आता. जितने शिक्षित और सभ्य है उतनी ही सामाजिक जीवन की गंदगी उनमे पनप रहा है. महिला पुरुष की आनुपातिक कमियाँ भी सभ्य और शिक्षित हिन्दू समाज की देन है. वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था तथा उंच नीच की बर्बर मानव विरोधी व्यवस्था पर खड़ा है. जाति और वर्ण के आधार पर मनुष्य के प्रति घृणा भाव रखना, हिंदू समाज व्यवस्था और धर्म का अंग है. जबकि जनजातीय समाज अपने समाज के सदाचार, आदरणीय, समानता की भावना पर आधारित है. हिंदू नैतिकता के मूल्य अस्वस्थ और अस्वाभाविक हैं.

       हिन्दू समाज तरह तरह की यौन विकृतियों जैसे बलात्कार, समलैंगिकता आदि से ग्रस्त है. जबकि जनजातीय समाज में बलात्कार जैसी घटना शायद ही कभी सुनने को मिलती है. जनजातियों में विवाह और तलाक की व्यवस्था सरल और व्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान तथा भौतिक आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप है. इसलिए उसमे नारी की स्वतंत्रता और पुरुष से उसकी समानता तुलनात्मक रूप से अधिक है. जबकि हिंदू समाज में विवाह धार्मिक और जाति वर्ण की रूढ़ियों से ग्रस्त है और तलाक का धार्मिक आधार पर विरोध है, जो नारी की स्वतंत्रता और सम्मान को असंभव बना देता है. पति के निधन होने पर विधवा को तिरस्कार कर जीवन के हासिये पर डाल देते हैं. बाल, विधवा या युवति मथुरा, वृन्दावन, काशी और मंदिरों में भेज देते हैं, जहां वे युवा नारियां देवदासी के नाम से जिन्दगी भर शारीरिक शोषण सहते रहते हैं. फादर पी.पोनेट ने मुंडा नायक, अपने लेख में लिखा है-  आदिवासियों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि उनके समाज में अनाथ बच्चे नहीं होते. गाँव में जिन बच्चों को देखने वाला कोई नहीं होता, आदिवासी बहुत प्यार से उन बच्चों को अपने भर में रख लेते हैं और उन्हें अपने बच्चों जैसा ही प्यार देते हैं. यह आदिवासी समाज की एक महान विशेषता है.

जनजातियों की संस्कृति और मूल्यों की ये सारी विशेषताएं ऐसी है, जो भविष्य के समाजवादी समाज की संस्कृति की बाहरी लोगों द्वारा की गयी व्यख्या को स्वीकार कर रखा है और बाहरी लोगों के द्रष्टिकोण और विचारधारा के आगे सिर झुका दिया है. यही जनजातियों की संस्कृति पराजय है. गैर जनजातीय लोग इस भू-भाग में चोर, उच्चके, भिखमंगा, अपराधी बनकर यहाँ पर अपना आशियाना बनाए हैं. जर-जोरू और जनजातियों के जल, जमीन को येन-केन प्रकारेण लूटपाट कर दबंगता से कबजा किए या नहीं के बराबर दारू पिलाकर लूटे हैं. सहकारी बैंकों के कर्ज में दो-तीन हजार के कर्ज को उनकी पचास साठ हजार की जमीन या घर द्वार कुड़की कराए. ये ही परदेशी लोग.

इस देश में सिर्फ जनजातियों ने ही सांस्कृतिक रूप में पराजित नहीं हुए हैं. भारत वर्ष का हिन्दू समाज भी इसी प्रकार विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप में पराजित हुआ था. यह बात तब की है. जब अंग्रेज इस देश में आये थे. और यहाँ आकर उन्होंने भारतियों के ऊपर अपना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाना शुरू किया था. यूरोपीय लोग जाकर हिन्दू समाज की संस्कृति, धर्म तथा रीति रिवाजों की निंदा कर रहे थे और उन्हें निम्न कोटि का साबित कर रहे थे. वास्तव में हर विजित जाति यह साबित करने की कोशिश करती है कि उसकी संस्कृति, भाषा, साहित्य, धर्म तथा सामाजिक मूल्य अधिक श्रेष्ठ हैं. हर विजेता जाति ने विजित जाति को बर्बर कहा है, असभ्य कहा है, राक्षस कहा है. बंगाल में यूरोपियों ने कई स्कूल और कालेज खोले थे, यहाँ भारतीय युवक यूरोपीय शिक्षा प्राप्त करते थे. इन शिक्षा संस्थानो में तथा ऐसे ही अन्य बौधिक संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौद्धिक केन्द्रों में हिन्दू युवकों के सामने हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति तथा रीति रिवाजों के पिछड़ेपन तथा घटियापन को साबित किया जाता था और बताया जाता था कि हिन्दू समाज एक बर्बर और असभ्य समाज है, जिसके पास कोई गर्व करने योग्य चीज नहीं है. इसका प्रभाव पड़ा था शिक्षित हिन्दू युवकों के मन में. अपने समाज के प्रति हीनता की भावना भर उठी थी. शिक्षित युवक पिछड़ा मानकर शर्माने लगे थे. बहुत तेजी से बंगाल में ईसाई धर्म फ़ैल रहा था. ये बहुत गरीब लोग नहीं थे, जो आर्थिक सुविधाओं के लोभ में ईसाईयत को अपना रहे थे. ये शिक्षित अभिजात्य और सम्पन्न घरों के लोग थे जो ईसाई धर्म को अपना रहे थे. उनके मन में अपनी जातीय पहचान के प्रति अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीनता की भावना आ गयी थी और वे यूरोपियों के नजरों से सम्मनित बनना चाहते थे.

उन्होंने यूरोपियों द्वारा अपने समाज संस्कृति की व्याख्या के आगे सिर झुका दिया था. इस तरह से शिक्षित हिन्दू भी विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप से पराजित हो रहे थे. लेकिन यूरोपीय लोग हिंदुओं को सांस्कृतिक रूप से पूर्णरूप से पराजित नहीं कर सके. हालांकि की यूरोपियों की आर्थिक, राजनितिक व्यवस्था तथा सभ्यता संस्कृति का भारतवासियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और यह स्वाभाविक भी था. फिर भी यूरोपीय भारतीय संस्कृति, धर्म और मूल्यों तथा रीति रिवाजों को पराजित नहीं कर सके, क्योंकि हिंदुओं ने अपनी हो रही सांसकृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष किया और उस पराजय को उलट डाला.

बंगाल में राजाराम मोहन राय पहले व्यक्ति थे. जिन्होंने यूरोपीय धर्म, संस्कृति और मूल्यों के विरूद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया और यह साबित कर दिखाया कि यद्यपि हिन्दू समाज, संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों में बहुत सी त्रुटियाँ हैं, फिर भी यह घटिया नहीं है. वह यूरोपीय संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है. राजाराम मोहनराय ने अख़बारों में तथा सभा समितियों में यूरोपीय विद्वानों से बहस किये, वाद- विवाद किए हिन्दू संस्कृति और समाज पर उनके प्रहारों का खण्डन कर दिखाया और हिन्दू लोगों में अपनी मैलिक पहचान के प्रति, अपने समाज और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना भरी.

जब बंगाल में राजाराम मोहनराय विदेशियों की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर हिन्दूओं को मन में अपने समाज संस्कृति और धर्म के प्रति श्रेष्ठता और गौरव की भावना भर रहे थे. उसी समय पंजाब, गुजरात और उत्तरप्रदेश में स्वामी दयानंद सरस्वती तथा महारास्ट्र में रानाडे भी यूरोपीय संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ विचाधारात्मक संघर्ष चलाकर किसी तरह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की प्रतिष्ठा कर रहे थे. पूरे भारतवर्ष में यूरोपियों द्वारा भारतियों की संस्कृति, धर्म और मूल्यों को नीचा दिखाने के खिलाफ, सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ एक महान सांस्कृतिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसका उद्देश्य था भारतियों को अपना महान संस्कृति, महान मूल्यों और परंपराओं का बोध करना. उनके मन में अपनी संस्कृति पहचान के प्रति गौरव और गर्व की भावना भरना १९वी शताब्दी के इस महान सांस्कृतिक अन्दोलन को भारतीय समाज के पुनर्जागरण का आंदोलन भी कहा जाता है.

इस सांस्कृतिक आंदोलन को हिन्दू समाज के बौद्धिक नेताओं ने दो तरीकों से किया था- एक ओर तो उन्होंने यूरोपीय लोगों द्वारा हिन्दू समाज, धर्म और संस्कृति के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों और निंदा का जमकर मुकाबला किया और बहस करके, विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर उनकी आलोचना का खण्डन किया तथा हिंदू समाज और संस्कृति के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित किया, लेकिन साथ ही साथ दूसरी ओर उन्होंने हिंदू समाज में रूढ़िवाद और गलत धार्मिक, सामजिक प्रथाओं तथा अंधविश्वासों के खिलाफ संघर्ष चलाया और हिंदू समाज में सुधार का आंदोलन भी खड़ा किया, ऐसा करना जरूरी था. क्योंकि हिन्दू समाज के इन्हीं कमजोर पक्षों को आधार बनाकर यूरोपीय लोग हिंदू समाज पर अपने हमले करते थे. इन कमजोर पक्षों को खत्म किये बिना यूरोपियों की आलोचना के आधार को खत्म करना मुश्किल था.

हिंदू समाज के कमजोर पक्षों को खत्म करने और समाज का सुधार करने के लिये इन सुधारकों ने प्राचीन परंपराओं, शास्त्रों, धर्म तथा रीति रिवाजों का गहरा अध्ययन किया. बहुत सी पुरानी चीजों की नये युग के अनुसार नई व्याख्या की और कुछ चीजों के लिये नये विधान बनाये. बाल विवाह, बहु विवाह प्रथा तथा सती प्रथा इसी तरह खत्म किया गया तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को उचित ठराया गाया. वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा के अन्यायपूर्ण तत्वों का विरोध करके मनुष्य मात्र के लिए समानता के आदर्श को सामने रखा गया.

 १९वी सदी के बिल्कुल अंत में स्वामी विवेकानंद ने ६० वर्षों से चल रहे इस महान सांस्कृतिक आंदोलन को इसके उत्कर्ष तक पहुंचा दिया. विवेकानंद ने न सिर्फ भारत वर्ष के अन्दर, बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी जाकर विचारधारात्मक संघर्ष के जरिये भारतीय संस्कृति और मूल्यों की श्रेष्ठता को साबित कर दिखाया. इस तरह सांस्कृतिक आंदोलन ने एक हद तक अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया. भारतीयों के मन से अपनी संस्कृति और आपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना खत्म हो गयी और उसकी जगह भारतीय स्वाभिमान और गौरव की भावना ने ले लिया.

यह बदली हुयी मानसिकता अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनी है. सांस्कृतिक आंदोलन जिस जातीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भारतीय युवकों के हृदय में जगाया, उसी से प्रेरित होकर लाखों लाख युवक अपने देश को अंग्रेजों के गुलामी से मुक्त करने के लिये राजनीतिक संघर्ष में कुद पड़े. अगर १९वी सदी में यूरोप के सांस्कृतिक प्रमुख के खिलाफ भारतियों का महान सांस्कृतिक आंदोलन न होता तो १९वी सदी में अंग्रेजों के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी नहीं होता.

अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना के बिना पहचान को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता. अगर लाखों लोग अपनी पहचान पर शर्माते हैंशिक्षित समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाज और धर्म को हीन दृष्टि से देखतें हैं और अपने ऊपर शासन करने वाले अपने शोषकों को अपना आदर्श समझतें हैं तो वे अपनी पह्चान के लिये, अपने अलग व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिये संघर्ष कैसे कर सकतें है ?

जनजातियों की समस्या यह है कि उनमे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो उनकी सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष को संघठित करे. जनजातियों में राजाराममोहन राय तो हुआ लेकिन कोई विवेकानंद नहीं हुआ. कहने का मतलब यह है कि बिरसामुण्डा ही एक मात्र ऐसे आदिवासी नेता थे. जिन्होंने जनजातियों की स्वाभिमान और आत्म गौरव को जगाने का प्रयास किया था. लेकिन उनका कार्य अधूरा ही रह गया. उनके बाद ऐसा कोई व्यक्ति या संगठन नहीं हुआ जो बिरसा के अधूरे कार्य को उसके उत्कर्ष तक ले जाता.

इसके उलटे जनजातीय समाज शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही बहुत तेजी से बाहरी लोगों के सामने अपनी सांस्कृतिक पराजय को स्वीकार करते जा रहे हैं. यही कारण है कि जनजातियों की राजनीतिक मुक्ती के आंदोलन सांस्कृतिक मुक्ति के आंदोलन के आधार ही कमजोर हैं. क्योंकि उनकी आवश्यक पृष्ठभूमि तथा समुदाय का स्वाभिमान और आत्म गौरव की भावना जो एक महान सांस्कृतिक आंदोलन से ही पैदा हो सकती है, नहीं बन पायी है.

आज भारतवर्ष के जनजातियों को जरूरत है एक सांस्कृतिक आंदोलन की. एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन जो एक ओर बाहरी लोगों द्वारा जनजातीय समाज, उनकी संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और रीति रिवाजों के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों का मुहतोड़ जवाब दे और विचाधारात्मक संघर्ष चलाकर जनजातीय समाज की संस्कृति, धर्म, मूल्य और रीति रिवाजों के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित करके जनजातियों के मन में सामुदायिक स्वाभीमान और आत्म गौरव की भावना को जगाये. दूसरी ओर जनजातीय समाज के रूढ़िवादी, अंधविश्वासों तथा गलत परंपराओं के खिलाफ संघर्ष करके, समाज सुधार का आंदोलन खड़ा करके समाज को स्वस्थ और सबल बनाये ताकि लोग प्रगति कर सकें कि हम कौन हैं ? हमारी संस्कृति और समाज की महान परंपराएं क्या है ? हमारी बुनियादी मूल्य क्या हैं ? हमारे समाज और संस्कृति में अच्छा क्या है और बुरा क्यों है ?  हमारी संस्कृति और समाज के बुनियादी मूल्यों को बनाकर रखने का औचित्य और जरूरत क्यों ? हमारी संस्कृति और समाज कैसे हिन्दूओं से श्रेष्ठ है ? ऐसे सारे प्रश्न आदिवासियों को उठाने होगें और उनका समुचित उत्तर देना होगा. बहस, तर्क और उदाहरणों से अपनी मान्यताओं को स्थापित करना होगा. निःसंदेह ऐसे सांस्कृतिक आंदोलन में भाषा का प्रश्न महत्वपूर्ण होगा. क्योकि भाषा के प्रति प्रेम और गर्व के बिना किसी प्रकार का सांस्कृतिक आंदोलन नहीं हो सकता. समाज और संस्कृति के प्रति हीन भावना को दूर करके जो जनजातियों ने अपनी श्रेष्ठता, सामुदायिक स्वाभिमान और अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना भर दे. ऐसे महान सांस्कृतिक आंदोलन की रुपरेखा और कार्यक्रम क्या हो, इस पर अलग से विस्तार पूर्वक विचार करने की जरूरत है. लेकिन एक बात तय है कि एक व्यापक सांस्कृतिक अंदोलन के बिना, आज तेजी से टूटते और बिखरते जा रहे जनजातीय समाज को टिकाकर रखने और राजनीतीक रूप से उसकी अलग सत्ता को प्रतिष्ठित करने का अंदोलन सफल नहीं हो सकता.


भारत सिंह (IPS)

शनिवार, 15 सितंबर 2012

नक्सलवाद और आदिवासियों के विकास पर सुलगते सवाल


(१) बस्तर में पाँचवी अनुसूची लागू है, तो इसके लागू रहते वहाँ फ़ोर्स की तैनाती कैसे हुई ?

(२) यदि फ़ोर्स की तैनाती वहाँ जनता की सुरक्षा और नक्सलवाद के खात्मे के लिये हुई भी तो फ़ोर्स और नक्सलवादियों के मुठभेड़ में आदिवासी ही क्यों मर रहे है ?

(३) बस्तर में सभी जाति वर्ग की जनता निवास करती है किन्तु उनके हताहत होने और नक्सलियों द्वारा मारे जाने या उन्हें फ़ोर्स द्वारा परेशान किये जाने का समाचार किंचित मात्र भी नहीं है. यदि गैर आदिवासी और आदिवासी एक ही छेत्र में रहते हुये भी गैर आदिवासी नक्सलवाद से ज़रा भी प्रभावित न होकर दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं तथा इसके विपरीत आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर घर से बेघर किया जाकर उनके जीवन को प्रभावित किया जा रहा है. इसके मायने क्या है ?

(४) क्या फ़ोर्स नक्सलवाद के नाम पर बस्तर में केवल आदिवासियों के खात्मे के लिये भेजी गई है ?

(५) नक्सलवादी कहकर बेगुनाह, बेक़सूर आदिवासियों और उनके बच्चों को बस्तर में तैनात फ़ोर्स के द्वारा फर्जी मुठभेड़ के रूप में मारने का उनका औचित्य क्या है ?

(६) बस्तर में समाज सेवियों को नक्सलवादियों से ख़तरा बताकर घुसने नहीं दिया जाता किन्तु यहाँ जमीन का सौदा करने और उद्योग लगाने के लिये आने वाले उद्योगपतियों को सर आँखों पर बिठाकर उन्हें फ़ोर्स द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है. सामंजस्य बिठाने वाले समाज सेवकों को डर दिखाकर वहाँ से खदेड देना और दूसरी और वहाँ घुसने वाले, जमीनों, जंगलों और खनिज संपदा की दलाली करने वाले उद्योगपतियों को सुरक्षा प्रदान कर अति संवेदनशील और दुर्लभ क्षेत्रों का कोना-कोना घुमाए जाने से उन्हें कोई ख़तरा नहीं होना किस तरह की सुरक्षा व्यवथा का प्रतिफल है ?

(७) समाज सेवकों को नक्सलियों का ख़तरा बताना और दूसरी और उद्योगपतियों को सुरक्षा प्रदान करना किस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की रणनीति है तथा ऐसा करने से किन लोगों का हित है ?

(८) पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों को ही नक्सलवाद प्रतिरोपित करना और उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार देने का क्या औचित्य है ? पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों के साथ ऐसा व्यवहार करने का क्या कारण है ?

(९) सुरक्षा में नाम पर पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों को उनके घर और जमीन जायदाद से उठाकर शिविरों में जबरदस्ती रखना किस तरह की सुरक्षा है ? ऐसा करने से क्या और किसको लाभ है ?

(१०) बस्तर के अनेक क्षेत्रों में विदेशी मूल- तिब्बती, बँगलादेशी लोगों को शरण दिया गया है. वे खूब तरक्की कर रहे हैं तथा सरकार उन्हें उनके ही सरण स्थल पर हर तरीके की सुविधा मुहैया करा रही है, किन्तु आदिवासियों को उनके घरों से निकाल कर शिविरों में रहने के लिये क्यों बाध्य कर रही है ?

(११) अनुसूचित क्षेत्रों के आदिवासियों के कृषि जमीनों को सरकार द्वारा जबरदस्ती अधिग्रहण कर उस पर उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिये अनुमति क्यों दे रही है ? क्या ऐसा करना आदिवासियों के साथ संवैधानिक एवं नीतिगत न्याय है ?

(१२) अधिसूचित एवं आदिवासी क्षेत्रों में अति आवश्यक होने पर ही सरकारी स्थानापन्न के लिये पड़त एवं निजी जमीन ग्राम सभा और किसानो की सहमति एवं सम्पूर्ण मुवावजा देकर अधिग्रहण किये जाने का नीतिगत व संवैधानिक नियम है, किन्तु ऐसा न कर, बन्दूक की नोक पर आदिवासियों के जमीनों का अधिग्रहण करना, क्या उनका शोषण और अत्याचार नहीं है ?

(१३) किसानों के निजी जमीन पर लगने वाले उद्योगों में उनका शेयर प्रदान करने का संवैधानिक नियम है तथा एम.ओ.यू. (उद्योगों के स्थापना सम्बन्धी शर्त/सरकारी अनुबंध) में इनका उल्लेख होता है, किन्तु बस्तर में उद्योगों के स्थानापन्न के इतिहास में उनको अब तक किसी उद्योग में भागीदार नही बनाया गया. क्या यह संविधान नियम विरुद्ध नहीं है ?

(१४) एक तरफ सरकारें आदिवासियों के विकास के लिये तरह तरह की योजनाएं संचालित कर उनका स्तर उठाने के लिये सरकारी योजनाओं के कागजाती पुलिंदा तैयार कर रही है, किन्तु दूसरी ओर उनके जीवन संरक्षण के मूल साधन जल, जंगल, जमीन को छीनकर जानबूझकर बेदखल कर रही है. १७०(ख) के हजारों मामले न्यायालयों में लंबित है. कई मामलों में आदिवासियों के पक्ष में निर्णय हो चुके हैं किन्तु उन्हें अब तक जमीन का कब्जा दिलाने में उदासीन हैं. आदिवासियों के प्रति सच्ची न्याय में उदासीनता के क्या कारण है ?

(१५) वर्तमान आदिवासियों और उनके पूर्वजों का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है. ईश्वी पूर्व और देवत्वकाल का इतिहास भी गौरवपूर्ण, संस्कृतिपूर्ण, देशप्रेमी, समृद्धशाली तथा विकसित रहा है. देश में आर्यों के आगमनकाल के इतिहास में भी आदिवासियों की गौरवपूर्ण इतिहास का उल्लेख मिलता है. दुश्मनों के साथ शक्तिपूर्ण संघर्ष और अन्याय पर विजयगाथा के श्रोत मिलते है. बताया जाता है कि इतिहास में अनार्यों (गोंडवाना/भारत के आदिवासी, मूलनिवासी लोग) और आर्यों (योरोपियन मूल के भारत में आये हुये विदेशी लोग) के बीच सदियों से स्वदेशी और विदेशी भावनाओं, शक्ति-सम्पन्नता, जाति-विजातिउंच-नीच, धर्म-अधर्म के भेद-भावपूर्ण अनेक संघर्ष होते रहे. किसी भी तरीके से मूलनिवासियों से विजय पाने के लिये वे अपने छल-बल और कुटिल नीति का उपयोग करते रहे और आगे बढते रहे, किन्तु मूलनिवासियों की सहज जीवन नीति पर विजय नही पा सके. आज भी उन आदिवासी पूर्वजों की संतानों के सरल, सहज नीति पर अनेक तरह से लाखों कुठाराघात के बावजूद भी विदेशी आर्य लोगों की संताने विजय नही पा सकी. उनकी कुटिल प्रहार आज भी उसी तरह है, जिस तरह इतिहास में रहा. इसीलिए कहीं ऐसा तो नहीं कि आर्य विदेशियों के सर्व सम्पन वंशज अब भी मूलनिवासियों के वंशजों को चतुराईपूर्ण छल-बल तरीके से किन्तु मीठी जुबान की कटार से समूल मिटाने के प्रयास में हों ?


बी.पी.एस.नेताम

शनिवार, 8 सितंबर 2012

यह मेरा स्वतंत्रता दिवस कैसे हो सकता है ?


          यह तुम्हारा स्वतंत्रता दिवस है, मेरा नहीं. कैसे हो सकता है ? आज मेरे २००० आदिवासी भाई-बहन छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद हैं. ऐसे ही लगभग एक लाख शरणार्थियों से भी बुरी हालत में आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में खदेड़ दिए गए हैं. कैम्पों और गावों में रह रहे आदिवासियों पर जो अत्याचार सरकारी कारिंदों और सुरक्षाकर्मियों द्वारा किये जा रहे हैं सो अलग. १५ अगस्त १९४७ को स्वछंद आदिवासियों को इतिहास में पहली बार केन्द्रीय सत्ता के अधीन लाया गया और यह स्वीकारते हुए कि वह अन्य वर्गों की तुलना में जटिल कानूनों का पालन करने की स्थिति में नही है. संविधान में कई विशेष सुविधाएं प्रस्तावित की गईं. आजादी के ६५ साल बाद भी किसी सरकार ने संविधान में किये गए वह वादे नहीं निभाए.

          सांस्कृतिक और भू-स्वामित्व सुरक्षा, पांचवी अनुसूची का मूल विचार है और सरकारों ने लगातार शीर्ष और जमीनी स्तर पर अपनी कार्रवाईयों से इस वादे को तोड़ा है. 'मुख्य धारा' में खींच लाने की जिद और आधुनिक जीवनशैली के अबाध प्रचार का नतीजा यह हुआ है की एक ओर से आदिवासी अपनी संस्कृति से कटते गए और दूसरी ओर बाहरी लोगों के अंधाधुंध आगमन से वह अनुसूचित क्षेत्रों में भी तेजी से अपनी बहुसंख्यता गंवाते रहे. विदेशी शरणार्थियों को योजनाबद्ध तरीके से सरगुजा और बस्तर में बसाकर सरकारों द्वारा स्वयं संविधान की पांचवी अनुसूची का खुला उल्लंघन किया गया है. इससे क्रूर मजाक और क्या होगा कि भारत के वृहततम एकल आदिवासी क्षेत्र बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर का विधायक आज एक मारवाड़ी व्यक्ति है.

          २००७ में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ की "मूलनिवासियों के अधिकारों की घोषणा" पर हस्ताक्षर किये. इसके तहत आदिवासियों को स्वनिर्णय, सांस्कृतिक सुरक्षा के अतिरिक्त यह अधिकार दिया गया है कि उनके क्षेत्र में कोई भी सैन्य गतिविधि उनकी इच्छा और मांग के बिना नही की जायेगी. तब भी छत्तीसगढ़ सरकार ने सैंकड़ो एकड़ भूमि (पांचवी अनुसूची और पैसा अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध) स्थानीय मुखिया के विरोध के बावजूद भारतीय सेना को कैम्प बनाने के लिये दे दी है. उच्चतम न्यायालय द्वारा सलवा जुडूम मामले में जुलाई २००७ में स्पष्ट तौर पर आंतरिक अशान्ति के गहरे कारणों पर ध्यान देने के निर्देशों के बावजूद भी सरकार कोई दूरगामी, संवेदनशील रणनीति बनाने के बजाय केवल बल प्रयोग करने पर तुली हुई हैं. सरकारों के पास सारे भौतिक-बौद्धिक संसाधन जुटाने की सहूलियत है, लेकिन धन और सत्ता के लालच ने उन्हें आदिवासियों के प्रति इतना संवेदनहीन बना दिया है कि वह शान्ति प्रक्रिया के कोई इमानदार प्रयास नही करना चाहती. किसी भी कीमत पर त्वरित खनिज दोहन, हमारी अघोषित राष्ट्रीय नीति बन गई है और इसकी सबसे बड़ी कीमत हमारे आदिवासी भाईयों को चुकानी पड़ रही है.

          विशेष तौर पर पिछले २ सालों में मैंने स्थानीय शासन प्रशासन और स्वयं सेवी संगठनों के साथ मिलकर आदिवासी स्थिति की जटिलताओं को समझने और व्यापक समाज को समझाने की बहुत कोशिश की है. कलेक्टर, सचिव, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव तक को स्पष्ट तार्किक पत्रों द्वारा स्थिति से अवगत कराते हुए कार्रवाई का अनुरोध किया है. सवा साल के गहन शोध के बाद मैंने पांचवी अनुसूची की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की और जून २०१२ में बिलासपुर उच्च न्यायालय से जनहित याचिका के माध्यम से इस विषय पर हस्तक्षेप का अनुरोध किया है. कई विश्वविद्यालयों में इस पर चर्चा के दौरान माना गया कि संविधान की पांचवी अनुसूची का यह एक सार्थक विवेचन है और ६२ सालों में पहली बार इसे लागू कराने का प्रभावी प्रयास हो सकता है.

          इतना सब करने के बाद आज मुझे लगता है कि सभी शांत तरीके से बुद्धिजीवी प्रयासों द्वारा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की दयनीय स्थिति की ठीक प्रस्तुति नहीं की जा सकती. जेनेवा, न्यूयार्क, नई दिल्ली और सबसे बढ़कर रायपुर के नागरिकों को आदिवासी स्थिति के प्रति जागरूक बनाना जरूरी है. यहाँ आदिवासी स्थिति को लेकर व्यापक समझ बहुत सतही है और प्रत्यक्ष जाकर देखना तो दूर आदिवासियों के बारे में नृशास्त्रीय (एंथ्रोपोलोजिकल), आर्थिक, राजनैतिक, भौगोलिक, विधिक और संवैधानिक जानकारी के लिए प्रमाणिक पुस्तकें पढने का भी श्रम नही किया जाता. मेरा मानना है कि आदिवासियों पर यह लगातार अत्याचार सिर्फ स्थानीय युवाओं,  बुद्धिजीवियों की संवेदनहीनता के कारण चल पा रहा है. इसलिए प्रेस क्लब और राजभवन के बीच सड़क पर निर्वस्त्र रेंग घिसट कर उस तकलीफ और पीड़ा को सही प्रत्यक्ष उपमा से दिखाना चाहता हूँ. यदि सौ पचास युवाओं में भी इससे कुछ चेतना आती है तो मुझे मूर्ख और राष्ट्रदोही होने का आरोप  स्वीकार है.

बी.के.मनीष.

बुधवार, 1 अगस्त 2012

पंडितो से डरते हैं- भगवान !!

जो लोग ऊंची जाति के लोगों के सामने खड़े होने से भी घबराते थे और उनकी जूठन से अपना और अपने बाल बच्चों का पालन करते थे, वे आज साहब की कुर्सी पर बैठे दिखाई देते हैं. एक वर्ग के लिए इस स्थिति को पचा सकना बहुत मुश्किल काम है. यही कारण है कि, दलितों पर कथित सवर्ण वर्ग का आक्रोश किसी न किसी बहाने प्रकट होता रहता है.

          वर्ष २००७ के जाते जाते यह समाचार आ गया था कि, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर पहली बार एक दलित की नियुक्ति हुई है. सर्वोच्च न्यायालय के विरिष्ठ न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की नियुक्ति को तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने अपनी स्वीकृति दे दी थी. कैसा विचित्र है हमारा समाज ? यहाँ एक दलित (डॉ.आंबेडकर) को भारत के संविधान का निर्माता होने का गौरव मिल सकता है, एक दलित (जगजीवन राम) उप प्रधान मंत्री हो सकता है, एक दलित (के.आर.नारायणन) राष्ट्रपति बन सकता है, किन्तु दलित वर्ग का दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर अपनी बरात नही निकाल सकता. ऐसा करने के लिए उसे पुलिस संरक्षण की जरूरत पड़ती है. देश के अनेक भागों में दलित वर्ग की महिला लाल किनारी की धोती नही पहन सकती. कुछ भाग ऐसे भी हैं, जहां दलितों को शमशान भूमि में अपनी मृतक देहों के अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं है.

          भारत सरकार का संविधान किसी भी प्रकार के ऊंच-नीच, भेद-भाव, असमानता भरे व्यवहार को दंडनीय अपराध मानता है, किन्तु अब तक पुलिस का संरक्षण न हो अथवा न्यायालय का आदेश न हो, तब तक दलित, देवी-देवता की पूजा अर्चना करने के लिए बहुत से मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. उड़ीसा के केंद्रपाड़ा के केरड़ागढ़ के ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश पर राज्य के उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद कथित सवर्णों ने बहुत आपत्ति की थी. यहाँ तक की दलितों के प्रवेश से "अशुद्ध" हो गए देवता को शुद्ध करने के लिए कुछ समय तक मंदिर के द्वार भी बंद कर दिए गए थे. कितने कमजोर हैं इन बड़े-बड़े मंदिरों में स्थित देवता ! ऐसा लगता है कि, सदियों से भारत का भगवान, पंडितों-पुरोहितों से डरता आ रहा है. पुरोहित उसे डराता आ रहा है. पुरोहित उसे डराते रहते हैं कि, यदि तुम्हें किसी छोटी जाति वाले ने छू लिया तो तुम अपवित्र हो जाओगे. लंदन में हुए पहले गोलमेज सम्मलेन के बाद ब्रिटानी प्रधानमंत्री रेम्से मैक्डोनाल्ड ने भारत की धार्मिक और जातीय समस्या को सुलझाने के लिए कम्युनल अवार्ड घोषित किया था,  जिसमे मुसलामानों, ईसाइयों, सिक्खों के साथ दलितों को भी अल्पसंख्यक मानकर पृथक निर्वाचन प्रणाली के अंतर्गत लाया गया. दलितों को हिन्दू समाज से पृथक समुदाय मानने के विरोध में गांधी जी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन रख लिया.

          डॉ.राजगोपालाचारी, पंडित मदनमोहन मालवीय, डॉ.जयकर, तेजबहादुर जैसे नताओं ने हस्तक्षेप से गांधी जी का अनशन तुड़वाया और डॉ.आंबेडकर ने दलितों के पृथक निर्वाचन की मांग छोड़ दी. फिर सभी की हस्ताक्षरों से एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता कहा जाता है. इस समझौते में यह निश्चित हुआ था कि, दलितों को हिंदुओं के कोटे में से १५ प्रतिशत का आरक्षण मिलेगा. उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नही किया जाएगा. उन्हें कुओं, तालाबों से पानी भरने का पूरा अधिकार होगा. सभी मंदिरों के द्वार उनके लिए खोल दिए जायेंगे और आपस में खान-पान में भी कोई भेद भाव नही होगा, किन्तु गांधी जी और मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं के प्रयासों के बावजूद, सवर्ण मानसिकता में विशेष परिवर्तन नही आया. गांवों में उनके साथ पूर्ववत भेदभाव जारी रहा. अधिसंख्य मंदिरों के दरवाजे दलितों के लिए बंद रहे. आखिर कितना बदला है हिंदू समाज ? दलितों पर होने वाले अत्याचार पहले से अधिक बढ़े हैं. आरक्षण नीति के कारण दलित समाज के बहुत से लोग ऊंचे पदों पर पहुँच गए. सवर्ण समाज के बहुत से लोगों को उनके अधीनस्थ होकर काम करना पड़ता है. इसने भयंकर ईर्ष्या और द्वेष को बढ़ावा दिया है.

          गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली संस्था नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो की २००५ की रिपोर्ट में कहा गया है कि, हर २० मिनट में दलित समुदाय के किसी व्यक्ति के प्रति अन्याय होता है. इस रिकार्ड के अनुसार २००५ में दलितों पर २६,००० से अधिक उत्पीडन के मामले दर्ज किए गए थे, २००७ में १,२०० दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुई, ६६९ दलितों की ह्त्या हुई, २५८ लोगों का अपहरण किया गया, लगभग ४,००० दलितों को बुरी तरह घायल किया गया और ८,००० से अधिक अन्याय और अत्याचार के मामले दर्ज हुए. एन.सी.आर.बी. की रिपोर्ट यह भी कही कि, ९४ प्रतिशत मामलों के संबंध में पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की, किन्तु सजा केवल ३० प्रतिशत लोगों को मिली. दलितों को उत्पीड़ित करने के आरोप में कुल मिलाकर ५८,००० व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, ४७,००० को चार्जशीट किया गया, किन्तु १३,००० से कम व्यक्तियों पर मुक़दमे चले. इस प्रकार देखें तो आज भी भारत में जातिप्रथा देश के विकास में बाधक बनी हुई है.


आदिवासी सत्ता
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सोमवार, 30 जुलाई 2012

भूख से बड़ा भगवान ?

राजा इंद्र ने अनेक भीषण दुष्कर्म किए, लेकिन जगत के पालनहार कहे जाने वाले विष्णु ने इंद्र को दण्डित नही किया. फिर भला राजा बली, महाराजा बाली और लंकापति रावण को दण्डित करने का औचित्य क्या था ? मारे गए सभी महाबली शिव के भक्त थे तथा इनमे से कोई भी दुष्ट या बलात्कारी नही था. इंद्र को जीवित रखकर शिव भक्तों को छल कपट से मारना कहाँ का न्याय है ?

          तीनों लोकों में निवास करने वाले तैंतीस करोड़ देवी देवताओं वाला भारत, अपनी आध्यात्मिक, धार्मिक व सांस्कृतिक विशेषताओं के लिए सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है. दुनिया के किसी भी देश और वहाँ रहने वाली मानव जातियों के पास, इतने भगवान व उनके इतने अवतार नही हैं. पृथ्वी में जितनी भी मानव सभ्यताएं तथा देश, विश्व मानचित्र में विद्दमान हैं, उन पर भगवान की इतनी कृपा और दया कभी नही हुई, जितनी भारत भूमि पर हुई. भारतीय पौराणिक गाथाओं के अनुसार सृष्टि में अत्यधिक पाप कर्म से मानव जाति को मुक्त कराने एवं मानव कल्याण हेतु जगत के पालनहार कहे जाने वाले भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते रहे हैं. दुनिया की किसी भी कोने में निरंतर ईश्वरीय अवतार होने का कोई लिखित-अलिखित दस्तावेज, ग्रन्थ या धार्मिक प्रमाण आज मौजूद नहीं हैं, भारत को छोड़कर. दुनिया के सबसे बड़े धर्म ईसाईयत (ईसाई) में, प्रभू ईसामसीह को परमेश्वर का पुत्र माना गया. यहूदियों में संभवतया ईसा मसीह, परमेश्वर के पहले दूत या पुत्र कहे जा सकते हैं. दुनिया के दूसरे बड़े धर्म इस्लाम में, हजरत महोम्मद साहब को अल्लाह या खुदा का दूत-पैगम्बर स्वीकारा गया है. दोनों ने अपने महान उपदेशों व कार्यों से तत्कालीन मानव जाति को अधर्म से धर्म का मार्ग दिखाकर एक नए पंथ को जन्म दिया.


          कालान्तर में दोनों अनुयायी ईसाई और मुसलमान कहलाए. ईसा मसीह और महोम्मद पैगम्बर को पृथ्वी में आये दो हजार बारह वर्ष पूरे हो चुके हैं. इनका धरती में पुनरागमन अभी तक नही हुआ. वैसे बाइबिल और कुरान में यह स्पस्ट चेतावनी दी गई है कि, मनुष्य अपने आचार-विचार व व्यवहार को उनके बताए गए सिद्धांतों के अनुरूप रखे, अन्यथा परम पिता परमेश्वर/खुदा अपने नेक बन्दों को बचाने के लिए, पृथ्वी में पुनः अपना दूत भेजेगा. मनुष्य को जिस प्रकार हवा, पानी, प्रकाश और भोजन की अनिवार्य आवश्यकता है, ठीक उसी तरह मानव जाति को अनेकानेक कारणों से, धर्म की भी आवश्यकता है. फिर चाहे कोई भी हो. काल परिस्थितियों के अनुरूप मनुष्य द्वारा स्वेच्छापूर्वक स्वीकार किया जाता है.


          वर्तमान विश्व के मानचित्र में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जहां ईश्वर को दूत भेजने की अपेक्षा स्वयं आना पड़ा है. वह भी एक बार से काम नही चला. भारत में भगवान को ५२ बार आना पड़ा. इससे एक बात स्पस्ट होती है कि, दुनिया के सभी मानवों में भारत के लोग सबसे बड़े अधर्मी और पापी थे. या फिर यहाँ पर मानव अपने तपोबल या योगबल से महामानव बने तथा अपने योगबल और तपोबल से प्राप्त शक्तियों का दुरूपयोग करने के कारण, उस महामानव को दण्डित करने के लिए भगवान अवतरित हुए. ऐसा ५२ बार हुआ, अतः भारत में भगवान को बार-बार आना पड़ा. भारत की पौराणिक कथाओं में जिन राक्षसों या असुरों का वध करने के लिए, भगवान विष्णु को बार-बार धरती में आने का कष्ट उठाना पड़ा, वे सभी राक्षस, भगवान शिव के उपासक और शिवशक्ति से संपन्न थे. अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से इंद्रियों को पराजित कर, शिव उपासकों नें महाबल प्राप्त किया था, लेकिन उन्हें दुष्ट, अज्ञानी, अहंकारी और धर्म विरोधी करार देकर, छल-कपट से मार दिया गया. यह पौराणिक कथाएं कई सौ हजार साल पुरानी बताई जाती है.


          अंग्रेज जब भारत आये, उस समय देश में ९०% लोग अनपढ़ और अज्ञानी थे. शिक्षा और ज्ञान अर्जन का अधिकार १०% विशेष वर्गों तक सीमित था. पढ़े-लिखे, विद्वान धर्माचार्यों ने जो भी बताया, देश की अशिक्षित जनता उसे आँख मूंदकर स्वीकार्य करती रही. देश में पहली बार ९०% पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को शिक्षित बनाने का कार्य अंग्रेजों ने प्रारंभ किया. गुलाम भारतियों के लिए स्कूल खोले गए. अंग्रेजों ने शिक्षा के साथ-साथ, हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों व धार्मिक पाखंडों को समाप्त करने के लिए उपाय किए. सती प्रथा और बाल विवाह समाप्त कर विधवा विवाह को कानूनी संरक्षण दिया. भारत में स्त्री शिक्षा निषेध थी. अंग्रेजों ने महिलाओं की शिक्षा के द्वार खोल, ९०% भारतीयों को शिक्षित बनाने का महानतम कार्य प्रारंभ किया. आजादी के आते तक बड़ी सख्या में लोग पढ़ने-लिखने लगे तथा आजादी के बाद देश में संविधान द्वारा स्थापित, जनता का जनता द्वारा शासन स्थापित हो गया. ६५ वर्ष की आजाद उम्र तक एस.टी., एस.सी., और ओ.बी.सी. वर्ग ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सांशिक ही सही, लेकिन उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की. वैसे आज भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा अशिक्षित देश है.


          अब बुद्धी और ज्ञान से प्रकाशित यह मानव मस्तिष्क पौराणिक कथाओं के अनुसार अपने पूर्वजों के नरसंहार की गाथाओं को सुनकर उद्द्वेलित हो रहा है. जब तक वह अनपढ़ था, तब तक वह ठीक था. क्योंकि बिना ज्ञान के मनुष्य पशुतुल्य होता है. ज्ञान आने से विवेक जागृत होता है. पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के ज्ञानचक्षु खुलने से अत्यंत गंभीर प्रश्न आकार ले रहे हैं कि, राजा इंद्र ने अनेकानेक भीषण दुष्कर्म किए, लेकिन जगत के पालनहार कहे जाने वाले श्री विष्णु ने इंद्र देव को दण्डित नही किया. फिर भला राजा बली, महाराजा बाली और लंकापति रावण को दण्डित करने का औचित्य क्या था ? मारे गए सभी महाबली भगवान शिव के भक्त थे तथा इनमे से कोई भी दुष्ट या बलात्कारी नही थे. अतः इंद्र को जीवित रखकर शिवभक्तों को छल-कपट से मारना इन कहाँ का न्याय है ?


          मुगलों और अंग्रेजों की १००० साल गुलामी के बाद, भारत का राजपाट, संविधान के अनुसार स्थापित होने तथा वर्ण, जाति और धर्म में सभी को समानता व स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त होने के उपरान्त, जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों को, केन्द्र तथा राज्यों में सत्ता संचालन का अधिकार मिला. भारत के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में सुमार छत्तीसगढ़ियों को भी १२ साल पहले, छतीसगढ़ के रूप में नया राज्य मिल गया. राज्य बनने के पहले तक छतीसगढ़, अपनी सादगी, ईमानदारिता, दरिद्रता और अशिक्षा के लिए देश के टॉप टेन में शामिल था और है. आदिवासी बाहुल्यता व आदिम संस्कृति से रचा बसा छत्तीसगढ़, राज्य बनने के बाद गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, शोषण और अत्याचार के टॉप टेन से बाहर तो नही निकल पाया, किन्तु नक्सलवाद, नकलवाद और सलवाजुडूम की आग में भी, नंबर वन अवश्य हो गया.


          श्री विष्णु के हाथों मारे गए महाबलियों को, आदिम व असभ्य बताया गया. अर्थात वर्तमान आदिम जन जातियां उन्ही की वंशज मानी जायेंगी. छत्तीसगढ़ की सारी फ़िजां में आदिम जातियों की गंध राजनांदगाँव से दंतेवाड़ा होते हुए जशपुर तक प्रयक्ष रूप से महसूस की जा सकती है. आदिम जातियों की महक पहले भी स्वीकार नही की गई तथा आज भी बर्दास्त करने लोग तैयार नही हैं. आक्रांत आर्यों के छल-कपट से परास्त आदिम जातियां, अपने स्वाभिमान के साथ जंगलों, पहाड़ों और कंदराओं में छुप गईं और सैकड़ों साल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते-करते, पुनः ज्ञानार्जन के माध्यम से अपने लूटे हुए, कुचले हुए, मान-सम्मान और अधिकारों को प्राप्त करना चाहती है, तो सत्ता में बैठे लोग, उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखने के लिए, नित नए-नए उपक्रमों द्वारा उसका विकासपथ अवरुद्ध कर देने के लिए जी-जान से लगे हुए हैं.


          राज्य निर्माण के १२ वर्ष पूर्ण होने के उपरान्त भी, आदिवासी विकास की कोई मौलिक अधोसंरचना परिलक्षित नही हो रही है. अज्ञानता, अजागारुक्ता, कुपोषण, भूख, अंधविश्वासों, कुरीतियों और सबसे बड़ा वाद नक्सलवाद से जकड़ा आदिवासी समाज, आज भी शासकीय संरक्षण का मोहताज है. सरकारी नक्सलवाद के खिलाफ, चारु मजुमदार का नक्सलवाद, आदिवासी क्षेत्रों में स्थापित हो गया. सलवाजुडूम का सुरर्शन तीन प्रकार से आदिवासियों का ही गर्दन काटता रहा है. एक नक्सलियों की, दूसरी पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों की तथा तीसरी सलवा जुडूम में भाग लेने वाले और न लेने वाले लोगों की. इस सुदर्शन से काटने वाली तीनों गर्दन आदिवासियों की ही हैं. जिस राज्य में क़ानून का राज्य स्थापित करने हेतु, सशस्त्र संघर्ष चल रहा हो, प्रतिदिन बम ब्लास्ट, विस्फोट, गोलीबारी, हत्याएं, बलात्कार, अपहरण, आगजनी और पलायन हो रहा हो, प्रतिमाह करोड़ो रूपये, शान्ति व्यवस्था बहाल करने पर व्यय किए जा रहें हों, उस राज्य में प्रतिदिन साधु-संतों, महात्माओं व प्रवचनकर्ताओं की बेमौसम बाढ़, यज्ञ, हवन और अनुष्ठान से, किस समस्या का निवारण किया जा रहा है ? छतीसगढ़ की धरती से अचानक देश के इन महात्माओं का तीव्र प्रेम और अनुराग, २ करोड़ छत्तीसगढ़ियों की कौन सी भूख का ईलाज किया गया ? शारीरिक भूख और आध्यात्मिक भूख में बड़ा अंतर होता है. पुरोहितों, पंडितों व धर्मशास्त्रों का कार्य मनुष्य की आध्यात्मिक भूख को तृप्त करना होता है. आध्यात्मिक शान्ति के ठेकेदारों का शारीरिक भूख से कभी आमना सामना नही हुआ. अतः वे भूख से ऐंठती आंतों की चीख सुन नहीं पाते और न ही महसूस कर पाते हैं. धरती की किसी भी कोने में भक्ति से भूख पर विजय पाप्त नही हुई और हो भी नही सकती. विश्व की सबसे बड़ी क्रांतियां भूखजनित हुईं. भूख आधारित क्रांतियों ने राजा के ईश्वरीय अवतार को परास्त कर, सर्वप्रथम शारीरिक भूख से निजात पाई. पेट की आंतों की तृप्ति के बिना, ज्ञान का प्रकाश कभी विकसित हुआ है और न कभी हो सकता है.

          छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बाहुल्य राज्य है. इस राज्य में सबसे अधिक भूखा और नंगा कोई व्यक्ति है तो वह केवल आदिवासी ही है. राज्य में सबसे अधिक भयभीत और प्रताड़ित भी सिर्फ आदिवासी है. राज्य का सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति भी आदिवासी है. जिस राज्य की बहुत बड़ी संख्या, शासन के सहयोग से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हो, उस राज्य में अधिक धार्मिक उत्सवों, मेलों, कुम्भों, प्रवचनों और उपदेशों की क्या आवश्यकता है ? शहीद वीर नारायाण सिंह जिसे राज्य का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी घोषित किया गया है, उनके मजार में पिछले कई वर्षों से दिया जलाने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पास समय नही है, लेकिन राजिम स्नान कर पूरा मंत्रीमंडल छत्तीसगढ़ के समस्त मागरिकों के कष्टों का निवारण कर रहा है ! नक्सलवाद से मरने वालों में छत्तीसगढ़, देश में नंबर एक पर है. आदिवासियों के ऊपर होने वाले शारीरिक उत्पीडन में राज्य का तीसरा स्थान है. कृषि भूमि पर उद्द्योग स्थापित करने, एम.ओ.यूं. हस्ताक्षर करने में राज्य सर्वप्रथम स्थान पर है. राजिम कुम्भ में करोड़ो रुपयों से भी अधिक का प्रतिवर्ष स्नान हो रहा है. संत कबीर कहते थे- "भूखे भजन न होए गोपाला". छत्तीसगढ़ भूखे, गरीब और अशिक्षित लोगों का प्रदेश है. इस राज्य को मंदिरों, मठों की नहीं, विद्यालयों की आवशयकता है. अंग्रेजी माध्यमों की पब्लिक स्कूलों से, गांवों के विकलांग सरकारी स्कूलों की शिक्षा से पल्लवित  छत्तीसगढ़ियों के बच्चे क्या प्रतियोगिता करेंगे ? छत और शिक्षक विहीन पाठशालाएं, जिसे हम शिक्षा का मंदिर कहते हैं, इनके जीर्णोद्धार में राज्य का सर्वाधिक धन क्यों खर्च नही होता ? छत्तीसगढ़ को साधू बाबाओं की नही, शिक्षकों की जरूरत है. राज्य को कथाकारों की नही, व्याख्याताओं की जरूरत है. छत्तीसगढ़ के लोग वैसे भी देश में पुण्यात्मा के लिए विख्यात हैं, अतः महात्माओं की सत्संग की आवश्यकता उन राज्यों को ज्यादा है, जहां दुष्टात्मा बहुसंख्यक में हैं.



कमल आजाद


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