रविवार, 28 जुलाई 2019

सोनभद्र : गोंड आदिवासियों का नरसंहार- भूमाफिया और प्रशासनिक अफसरों के गठजोड़ का नतीजा

उम्भा गाँव का घटना स्थल 
दिनांक 17 जुलाई 2019 को सोनभद्र जिले के घोरावल थाना क्षेत्र के मूर्तियां ग्राम पंचायत के अंतर्गत उम्भा गांव के 10 गोंड आदिवासियों का भू-माफियाओं द्वारा एक नृशंस कत्लेआम की घटना को अंजाम दिया गया, जिसमें की 9 लोग घटनास्थल पर ही हलाक हो गये और एक व्यक्ति अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ा। अभी एक औरत जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है। जिसमें जिंदगी अनिश्चित लगती है।

इस घटना के पीछे की पृष्ठभूमि भू-माफियाओं और प्रशासनिक अधिकारियों के गठजोड़ की कहानी कहती है। ग्रामीणों के अनुसार घटना की इस पृष्ठभूमि में मिर्जापुर के तत्कालीन डी.एम., प्रभात कुमार मिश्र ने अपने ससुर (माहेश्वरी प्रसाद सिन्हा) को लगभग 600 एकड़ जमीन जालसाजी से दिलाई थी। यह वही जमीन थी जिस पर इलाके के आदिवासी अपनी पुश्तैनी खेती-बाड़ी कर गुजर-बसर कर रहे थे।

बताया जाता है कि इस जमीन पर ग्राम प्रधान (यज्ञदत्त भूर्तिया) को कब्जा दिलाने के लिए बिहार से करीब 150 लोग आए थे। इनमें ज्यादातर अपराधी किस्म के लोग थे, जो असलहे से लैस थे। अपने पावर का दुरुपयोग करते हुए मिर्जापुर के तत्कालीन डी.एम. रहे प्रभात कुमार मिश्र ने यह सारी भूमि हथियाने का खेल किया है। हैरत की बात यह है कि बिहार के पूर्व आई.ए.एस. प्रभात कुमार मिश्र ने इस जमीन को अवैध तरीके से पहले "आदर्श कोआपरेटिव सोसायटी" के नाम कराया और बाद में अपनी पत्नी आशा मिश्रा और पुत्री विनीता शर्मा के नाम करा लिया था। प्रभात कुमार उस समय मिर्जापुर के डी.एम. थे और यह इलाका उनके कार्यक्षेत्र में ही आता था।

हालांकि सोसायटी का पंजीकरण साल 1978 में ही सब खत्म हो गया था। इसके बावजूद सोसायटी की तथाकथित प्रबंधक उनकी बेटी और पत्नी हो गई। सोसायटी के जमीन के अभिलेख मिर्जापुर और सोनभद्र प्रशासन के पास नहीं हैलेकिन दबंगों और भूमि माफियाओं का दावा है कि उस जमीन का उन्होंने बैनामा कराया है। इतना ही नहीं पटना के एक शख्स जिसका नाम धीरज है, वह हर साल भोले भाले आदिवासियों से प्रति बीघा ढाई हजार रुपये लगान वसूलने आता था। इस मामले में कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे रामराज गोंड ने बताया कि आदिवासी समाज के लोग इस जमीन पर कई पुस्तों से जुताई-बुवाई करते आ रहे हैं। लेकिन सोसायटी की तथाकथित प्रबंधक आशा मिश्रा और विनीता शर्मा ने राजस्व विभाग के अधिकारियों पर बेजा दबाव बनाकर फर्जी सोसायटी की जमीन को अवैध तरीके से अपने नाम करा लिया। इसमें आशा मिश्रा के आई.ए.एस. पति प्रभात कुमार मिश्रा एवं बिहार कैडर के आई.ए.एस. भानु प्रताप शर्मा ने अहम भूमिका निभाई। विवाद भले ही 200 बीघे जमीन पर था लेकिन इस फर्जी सोसायटी ने ग्राम समाज की लगभग 600 बीघे जमीन हड़प रखी है। इसी पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा ने अवैध तरीके से सोसायटी के जमीन 200 बीघा से अधिक जमीन गुपचुप तरीके से प्रधान यज्ञदत्त भूर्तियाउसके भतीजे और रिश्तेदारों के नाम बेंच दिया। बाद में इसी आई.ए.एस. अधिकारी ने प्रधान यज्ञदत्त के साथ मिलकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव डाला। पुलिस व प्रशासनिक अफसरों की हरी झंडी मिलते ही प्रधान सैकड़ों लोगों को लेकर जमीन कब्जाने पहुंच गया। जो भी ग्रामीण मुखर होकर उनके सामने आए उन पर बेरहमी से गोलियां बरसा दी गई। 
      
राजा बड़हर ने दी थी वनवासियों को जमीन- जिस भूखंड के लिए यह नरसंहार किया गया वह जमीन राजा बड़हर आनंद ब्रह्म शाह की थी। राजा ने वनवासियों को यह जमीन खेती करने के लिए दी थी। उम्भा गांव के बुद्धूराम लालमोहनमुन्नीलाल समेत दो दर्जन से अधिक वनवासियों ने "आदर्श को-ऑपरेटिव सोसाइटी" को फर्जी करार देते हुए न्यायालय में वाद दाखिल कर रखा है। यह मुकदमा करीब 65 साल पहले दाखिल किया गया था। मुकदमें में यह साफ-साफ कहा गया था कि विवादित भूमि को राजा बड़हर ने मूल खातेदार बुद्धू को दिया था। इनके पूर्वज गंभीराभीमाबैजनाथआदि लोग खेती करते थे। तब से लेकर अब तक पुस्तों से बनवासी ही इस भूमि पर आबाद हैं। विवादित भूखंड पर कभी भी "आदर्श कोआपरेटिव सोसायटी" का कब्जा नहीं रहा। कागजात माल में सिर्फ नाम के लिए सोसायटी का ब्यौरा अंकित है। इस सोसायटी के अध्यक्ष महेश्वर प्रसाद नारायण सिन्हा रहेजो पटना बिहार के रहने वाले बड़े जमीदार थे। हैरत की बात यह है कि विभिन्न प्रकार से सरकारी और गैर सरकारी जमीन पर फर्जी ढंग से अपना नाम चढ़ाकर बड़े भूमाफिया हो गए थे। इसी क्रम में उन्होंने अपने दामाद आई..एस. प्रभात कुमार मिश्र का सहयोग लिया और फर्जी सोसायटी बना कर उक्त भूखंडों को सोसायटी के नाम दर्ज करा दिया। वनवासी अशिक्षित थे इसका लाभ भूमाफिया ने भरपूर उठाया। करीब 3 माह पूर्व प्रधान वनवासियों के बीच पहुंचे और कहा कि "आदर्श कोऑपरेटिव सोसायटी" की जमीन को उन्होंने खरीद लिया है और उस पर अब कोई खेती नहीं करेगा। इसे लेकर कोर्ट में मुकदमा चल रहा है।

सोनभद्र नरसंहार कांड दबंग भूमाफिया और भ्रष्ट आई.ए.एस. अफसरों के गठजोड़ का नतीजा है। आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए साजिश पर साजिशें होती रही पर किसी ने नहीं सुनी। पुलिस प्रशासन की कौन कहे, सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने भी इनके दर्द पर कानून और न्याय का मरहम लगाने की जरूरत नहीं समझी। पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने आदिवासियों पर इतने जुल्म ढाए की अब उनके सामने बंदूक उठाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था। दबंग पुलिस माफिया से मिली पुलिस खुद भी चाहती थी कि वे नक्सली बन जाएं और उन्हें आसानी से शूटआउट कर सकें। कामयाबी नहीं मिली तो आई.ए.एस. अफसरों के साथ मिलकर भूमाफिया ने खुद आदिवासियों को मिटाने की तैयारी की और नतीजा निकला सामूहिक नरसंहार।

इस मामले की पटकथा भी कुछ उसी तरह लिखी जा रही थी जिस तरह नौगढ़ का लाल व्रत कोल, अपनी जमीन के लिए हार्डकोर नक्सली बनने के लिए विवश हो गया था। सोनभद्र का आदिवासी नरसंहार कांड जिस जमीन के लिए रचा गया उसके पक्ष में बिहार के 2 आई.ए.एस. अफसर और इलाके के दबंग भूमाफिया थे। इनके सिर पर पुलिस और प्रशासनिक अफसरों का हाथ था। यह बात आईने की तरह साफ दिखती है कि गोंड जाति के आदिवासी जमीदारी विनाश अधिनियम लागू होने के पहले से ही उम्भा गांव में ग्राम समाज की जमीन पर झोपड़ी डालकर खेती कर रहे थे। यह अधिकार किसी और ने नहीं खुद तत्कालीन राजा बड़हर आनंद शाह ने दिया था। जंगल की जमीन को किसी और ने नहीं नरसंहार में मारे गए आदिवासियों के पूर्वजों ने ही बनाया था। अशिक्षित आदिवासी कागजात में हेरफेर और फर्जीवाड़े से अनजान रहे। जिस जमीन को लेकर यह बड़ी वारदात हुई, वह तीन तरफ नाले से घिरी है। मूर्तियां बंधा बन जाने के बाद वह जमीन सोना उगलने लगी तो उस पर दबंग भूमाफिया यज्ञदत्त भुर्तिया की नजर गड़ गई। उसने आदिवासियों को कीमती जमीन से बेदखल करने के लिए ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया। इसके चलते इस जमीन पर तीखी नजर बिहार के दबंग भूमाफिया माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिंहा की पड़ी। उन्होंने एक फर्जी सोसायटी बनाई और नाम रखा "आदर्श को- ऑपरेटिव सोसाइटी"। महेश्वरी प्रसाद ने 17 दिसंबर 1955 को अपने चहेते रावट्सगंज के तहसीलदार को प्रभाव में लेकर आदिवासियों की जमीन धोखाधड़ी से सोसायटी के नाम करा लिया। सोसाइटी में उम्भा गांव का कोई नहीं थेथे तो केवल इस भू-माफिया के परिजन और रिश्तेदार।

इस मामले की पटकथा भी कुछ उसी तरह लिखी जा रही थी जिस तरह नौगढ़ का लाल व्रत कोल, अपनी जमीन के लिए हार्डकोर नक्सली बनने के लिए विवश हो गया था। सोनभद्र का आदिवासी नरसंहार कांड जिस जमीन के लिए रचा गया उसके पक्ष में बिहार के 2 आई.ए.एस. अफसर और इलाके के दबंग भूमाफिया थे। इनके सिर पर पुलिस और प्रशासनिक अफसरों का हाथ था। यह बात आईने की तरह साफ दिखती है कि गोंड जाति के आदिवासी जमीदारी विनाश अधिनियम लागू होने के पहले से ही उम्भा गांव में ग्राम समाज की जमीन पर झोपड़ी डालकर खेती कर रहे थे। यह अधिकार किसी और ने नहीं खुद तत्कालीन राजा बड़हर आनंद शाह ने दिया था। जंगल की जमीन को किसी और ने नहीं नरसंहार में मारे गए आदिवासियों के पूर्वजों ने ही बनाया था। अशिक्षित आदिवासी कागजात में हेरफेर और फर्जीवाड़े से अनजान रहे। जिस जमीन को लेकर यह बड़ी वारदात हुई, वह तीन तरफ नाले से घिरी है। मूर्तियां बंधा बन जाने के बाद वह जमीन सोना उगलने लगी तो उस पर दबंग भूमाफिया यज्ञदत्त भुर्तिया की नजर गड़ गई। उसने आदिवासियों को कीमती जमीन से बेदखल करने के लिए ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया। इसके चलते इस जमीन पर तीखी नजर बिहार के दबंग भूमाफिया माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिंहा की पड़ी। उन्होंने एक फर्जी सोसायटी बनाई और नाम रखा "आदर्श को- ऑपरेटिव सोसाइटी"। महेश्वरी प्रसाद ने 17 दिसंबर 1955 को अपने चहेते रावट्सगंज के तहसीलदार को प्रभाव में लेकर आदिवासियों की जमीन धोखाधड़ी से सोसायटी के नाम करा लिया। सोसाइटी में उम्भा गांव का कोई नहीं थेथे तो केवल इस भू-माफिया के परिजन और रिश्तेदार। 

इस जमीन का रकबा 637 बीघा है। यह जमीन उस समय सोसायटी के नाम की गई जब नामांतरण करने का अधिकार तत्कालीन तहसीलदार को था ही नहीं। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 1150 बी/ आई ए-1300-58 के आदेश के तहत 31 जुलाई 1959 को तहसीलदार को नामांतरण का पावर दिया था। बिहार के भूमाफिया महेश्वरी प्रसाद सिंहा के दमाद मिर्जापुर के डी.एम. रहे प्रभात कुमार मिश्र ने रावट्सगंज के तहसीलदार को मिलाकर फर्जी ढंग से जमीन हड़पने के खेल को अंजाम दे दिया। अभिलेख बताते हैं कि आदिवासियों के पूर्वज गांव में ग्राम समाज की जमीन पर खेती बाड़ी करते रहे। लेकिन भ्रष्ट नौकरशाही ने आई.ए.एस. अफसरों के दबाव में कभी सर्वे नहीं होने दिया। भूमाफिया महेश्वरी प्रसाद सिन्हा के निधन के बाद लगभग 200 बीघे जमीन उनकी पुत्री आशा मिश्रा पत्नी आईएस प्रभात कुमार मिश्रा मिर्जापुर के तत्कालीन डी.एम. की पुत्री विनीता शर्मा पत्नी भानु प्रताप शर्मा के नाम कर दी। विनीता शर्मा के पति भानु प्रताप शर्मा बिहार कैडर के आई.ए.एस. अफसर है। जमीन के दस्तावेजों में लगातार हेरा फेरी की जाती रही। क्योंकि 33/39 एल.आर अधिनियम के लिपिकीय त्रुटि को दूर की जाती है, जिसमें उल्लेख है कि स्वत्व का निर्माण निर्धारण नहीं किया जा सकता। जबकि इस विवाद में आई.ए.एस. अफसर भानु प्रताप शर्मा ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके फर्जी तरीके से फर्जी सोसायटी की करीब 200 बीघा जमीन को अपनी पत्नी विनीता शर्मा और उनकी मां आशा मिश्रा के नाम करवा दिया।

अवैध तरीके से यह नामांतरण 6 सितंबर 1989 को कराया गया। जबकि साल 1947 के पूर्व से ही इस जमीन पर आदिवासी काबिज थे। हैरत की बात यह है कि भूमाफिया ने पहले ग्राम समाज की जमीन को अपने नाम करा लिया और फर्जी तरीके से एक जाली मुख्तार -ए- खास दिल्ली में बनवाकर घोरावल रजिस्ट्रार के यहां एक साथ 144 बीघा जमीन दो करोड़ में बेच दी इस जमीन का सौदा भी उसी दबंग भूमाफिया यज्ञ दत्त भूर्तियां और उसके रिश्तेदारों के साथ किया गया, जिनकी नजर पहले से ही सोना उगलने वाली इस जमीन पर गड़ी थी। रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 28 के तहत जहां जमीन का पंजीकरण होना है उसे वहीं का मुख्तार-ए-खास कर सकता है। इस कानून को पुलिस और प्रशासन ने पूरी तरह से अनदेखी कर दी। सत्तारूढ़ दल का शायद ही कोई बड़ा नेता होगा जिनके पास आदिवासियों की अर्जी ना पहुंची हो। चाहे भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह हो या फिर सीएम योगी नाथ, बैनामा निरस्त करने के लिए शायद ही कोई तहसील दिवस नहीं रहा होगा जब आदिवासियों ने गुहार ना लगाई हो। कलेक्टर की देहरी पर इन आदिवासियों ने तो अनगिनत बार मत्था टेका पर उनका दिल भी नहीं पसीजा। इसी बीच सहायक अभिलेख अधिकारी ने उनकी बात सुने बगैर ही एक भूमाफिया के परिवार की धोखाधड़ी से हड़पी गई जमीन दूसरे भू-माफिया के नाम कर दी। यह जमीन ग्राम सभा की थी, लेकिन भ्रष्ट आई.ए.एस. अफसरों, माफिया के गठजोड़ ने आदिवासियों पर जुल्म ज्यादती का पहाड़ तोड़ना शुरू कर दिया। अर्जुन की कहानी उस खत में भी पढ़ी जा सकती है जो उन्होंने 12 दिसंबर 2019 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को रजिस्टर्ड डाक से भेजी थी। इस पर सौ से अधिक आदिवासियों के अंगूठे के निशान पुलिसिया तांडव और अफसरों की कहानी कहते हैं। आदिवासियों को भले ही श्री अमित शाह ने नहीं पढ़ा, लेकिन उन्होंने खत मेन जो बातें लिखी थी वह सच साबित हुई। खत में लिखा गया है कि भानु प्रताप शर्मा और उनके ससुर सेवानिवृत्त के दबाव में आकर इलाकाई पुलिस ने आदिवासियों को नक्सली बनाने के लिए 60 लोगों पर फर्जी मुकदमे दर्ज किए। यह तीनों मुकदमा अपराध संख्या 112/ 18, 166/18 और 167/18 के तहत पिछले साल दर्ज किए गए। इस बीच पुलिस और पीएसी आदिवासियों के घरों में घुसकर तांडव करती रही। उनकी बहू- बेटियों का शारीरिक शोषण भी  करती रही। नामजद लोगों में से 12 पर गुंडा एक्ट भी लगा दिया गया। बाद में जिलाधिकारी ने निर्दोष ग्रामीणों को जिला बदर भी कर दिया। लाचारी में लोगों को जंगलों में छिपकर रहना पड़ रहा था। आदिवासियों ने पहले ही आशंका जाहिर कर दी थी कि आई.ए.एस. अफसरों के इशारे पर पुलिस उनका दमन और उत्पीड़न कर रही है। इनके दबाव का नतीजा रहा कि कलेक्टर ने उनकी बात नहीं सुनी और उनकी अपील खारिज कर दी।

आदिवासियों की इज्जत और उनके साथ हो रहे जुल्म-ज्यादती को सुनने- देखने की किसी अफसर ने जहमत नहीं उठाई। आदिवासी रामराज सिंह कहते हैं कि पुलिस और प्रशासनिक अफसर उन्हें नक्सली बनाकर मुठभेड़ में मरवाना चाहते थे। आई.ए.एस. अफसरों ने बिहार से भू-माफिया प्रधान की जमीन कब्जाने के लिए बिहार से हथियारबंद लोगों को ट्रैक्टर के साथ भेजा था। साजिश में शामिल आई.ए.एस. अफसरों का ऐसा दबाव था कि घटना के समय पुलिस के आला अफसरों के फोन अचानक स्विच ऑफ हो गए। रामराज ने कहा कि सोनभद्र के डी.एम. भी बिहार के रहने वाले हैं और इस प्रकरण में उनकी भूमिका बेहद रहस्यमय और संदिग्ध है। नरसंहार में शामिल आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ कार्रवाई तभी संभव है जब मामले की सीबीआई जांच हो।  


इस भीषण नरसंहार में वर्तमान में 10 लोग हालाक हो गए और 22 लोग घायलों के रूप में विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। वर्तमान में बी.एच.यू के ट्रामा सेंटर में 6 लोग एडमिट हैं और 2 लोग स्वास्थ्य लाभ कर डिस्चार्ज कर दिए गए हैं। इन 6 लोगों में केरवा देवी पत्नी रामप्रसाद की स्थिति नाजुक बनी हुई है। वह आई.सी.यू. में है और उन्हें अभी तक होश नहीं आया। मृतकों में रामचंदर पुत्र लाल शाहराजेश गोंड पुत्र गोविंदअशोक पुत्र नन्हकूरामधारी पुत्र हीरा शाहराम सुंदर पुत्र तेजा सिंहजवाहिर पुत्र जयकरनअशोक गोंड पुत्र हरिवंशबासमती पत्नी नंदलालदुर्गावती पत्नी रंगीला लाल और सुखवन्ती पत्नी राजनाथ। घायलों की सूची में नागेंद्र पुत्र श्री रामजय प्रकाश पुत्र संतलालनिधि दत्त पुत्री श्याम बिहारीअशर्फीलाल पुत्र शारदा प्रसाददिनेश कुमार पुत्र राम प्यारेदेवदत्त पुत्र श्याम बिहारीप्रमोद पुत्र शिव मूरतराकेश सिंह पुत्र सुमंगल लालमहेंद्र पुत्र गुलाबरामरक्षा पुत्र श्री रामसुखवन्ती पत्नी संतलालइंद्र कुमार पुत्र मुन्नीलालसीता पत्नी तेज सिंहछोटेलाल पुत्र चिरकुटचंद्रशेखर पुत्र बलीकरणकेरवा देवी पत्नी राम प्रसादरामदीन पुत्र तेजा सिंहरामलालभगवान दासराजेंद्ररामनाथऔर कमलावती सम्मिलित है।  

दिनांक 21 जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ ने घटनास्थल का दौरा किया और घायलों को 2.5 लाख तथा मृतक आश्रितों को 18.5 लाख की धनराशि की सहायताराशनकार्डआयुष्मान भारत कार्डप्रधानमंत्री आवासउम्भा गांव में पुलिस चौकीअग्नी-शमन दल की स्थापना करने का आश्वासन दिया है। कांग्रेस के महासचिव एंव उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी ने 10-10 लाख रुपए की सहायता की घोषणा मृतक आश्रित परिवारों को देने के लिए किया है। उत्तर प्रदेश शासन ने क्षेत्र में धारा 144 लगा रखा है और ग्राउंड जीरो पर जाने से लोगों को वंचित कर रखा है।

राजनीतिक पार्टियां हैं तो वे राजनीति करेंगे ही और राजनीति में शासन पक्ष की बुराइयां और कमियों को ही बताया जाता है। लेकिन वास्तव में यह सारी चीजें सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर करती है। भारत में जातीयता और उसके आधार पर अर्थ का निर्धारण सत्य है। कालांतर में बेशक कानूनन जमीदारी प्रथा को समाप्त किया गयालेकिन हकीकत में शासक वर्गों के अंदर सामंती मानसिकता भरपूर है। इसी मानसिकता के तहत ब्राह्मण-भूमिहारों काब्राह्मण-बनियों और प्रशासनिक अफसरों का सीधे सादे लोगों को ठगने, लूटने वाला भू-माफिया तंत्र काम कर रहा है, जिसे यहां भू माफिया और प्रशासनिक अफसरों का गठजोड़ कहा गया है।

इस पूरी कहानी का आधार भाजपा के पूर्व सांसद छोटे लाल खरवारजनसंदेश टाइम्सराष्ट्रीय सहारा के खबरों के आधार पर तथा घायलों के परिवार के सदस्य अजय कुमार गोंडरामप्यारे गोंड आदि के बयान के आधार पर लिखी गई है।

उमेश चंद्र गोंड
उत्तर प्रदेश
                                         
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रविवार, 5 मई 2019

ईसाई धर्मांतरण : एक विश्लेषण

ईसाई समाज शिक्षित समाज रहा है इसलिए वह कोई भी कार्य रणनीति के बिना नहीं करता बड़ी सोच एवं अनुभव के आधार पर ईसाईयों ने अपनी प्रचार नीति अपनाई है ईसाईयों के धर्मांतरण करने की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है-

प्रथम चरण- संस्कृतिकरण (Inculturation)
द्वितीय चरण- विस्तार (Expansion)
तृतीय चरण- प्रभुत्व (Domination)

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है- Inculturation अर्थात संस्कृतिकरण इस शब्द का प्रयोग ईसाई समाज में अनेक शताब्दियों से होता आया है। सदियों पहले ईसाई पादरियों ने ईसाईयत को बढ़ावा देने के लिए 'संस्कृतिकरण' रूपी योजना का प्रयोग करना आरम्भ किया था इसे हम साधारण भाषा में आगे समझने का प्रयास करते हैं-

1.  प्रथम चरण में एक बाग़ में पहले एक बरगद का छोटा पौधा लगाया जाता है। वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता हुआ किसी प्रकार से अपना पोषण और रक्षा कर वृद्धि करने का प्रयास करता है उस समय वह छोटा होने के कारण अन्य पौधों के मध्य अलग सलग सा नहीं दिखता

2.  अगले चरण में वह पौधा एक छोटा वृक्ष बन जाता है अब वह न केवल अन्य पौधों से अधिक मजबूत दिखता है, अपितु अपने हक से अपना स्थान घेरने की क्षमता भी अर्जित कर लेता है वह अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक खाद, सूर्य का प्रकाश, पानी ग्रहण करते हुए वर्ष-प्रतिवर्ष उसके पेड़ व जड़ स्थान घेरने की प्रतियोगिता में भाग लेकर विजय पाने की चेष्टा करता हुआ प्रतीत होता है

3.  अंतिम चरण में वह एक विशाल वृक्ष बन जाता है उसकी शाखाओं के छाँव के नीचे आने वाले सभी पौधे धूप, पानी, खाद जैसे संसाधनों की कमी के चलते या तो उबर नही पाते अथवा मर जाते हैं उसका वहाँ एक क्षत्र राज कायम हो जाता है अब वह उस बाग़ का बेताज बादशाह होता है

ईसाई समाज में भी धर्मांतरण इन्ही तीन चरणों में होता है एक गैर ईसाई समाज, देश में इसका बीजारोपण संस्कृतिकरण से ही शुरू किया जाता है।ईसाई मत की मान्यताएं, प्रतीक, सिद्धांत, पूजाविधि आदि को छुपाकर उसके स्थान पर स्थानीय धर्म की मान्यताओं को ग्रहण करने जैसा स्वरुप धारण किया जाता है इस देश में दिखे उदाहरणों से इसे समझने का प्रयास करते हैं-

1.  वेशभूषा परिवर्तन- ईसाई पादरी पंजाब क्षेत्र में सिक्ख वेशभूषा में पगड़ी बांधकर, गले में क्रोस लटका कर प्रचार करते हैं हिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दू साधू का रूप धारण कर, गले में रूद्राक्ष माला में क्रोस डालकर प्रचार करते हैं दक्षिण भाषी क्षेत्र में दक्षिण भारत जैसे परिधान पहनकर प्रचार करते हैं

2.  प्रार्थना के स्वरुप में परिवर्तन-  पहले ॐ क्रिस्ताय नमः, ॐ माता मरियमाय नमः जैसे मनगढ़ंत मन्त्रों का अविष्कार किया जाता है फिर प्रार्थनागीत आदि लिखे जाते हैं, जिनमे संस्कृत, हिंदी, अथवा स्थानीय भाषा का उपयोग कर ईसामसीह की स्तुति की जाती है जिसे गाने पर एक धार्मिक विधि लगे

3.  त्यौहार विधि में परिवर्तन- स्थानीय त्यौहार के सामान ईसाई त्योहारों जैसे- गुड फ्राइडे, क्रिसमस आदि का स्वरुप बदल दिया जाता है जिससे वह स्थानीय त्योहारों के सामान दिखे कोई गैर ईसाई इन त्योहारों में शामिल हो तो उन्हें अपनापन न लगे

4.  चर्च की संरचना में परिवर्तन- पंजाब में अगर चर्च बनाया जाता है तो गुरुद्वारा जैसा दिखे, हिंदी भाषी क्षेत्र में किसी  हिन्दू मंदिर के समान दिखे, दक्षिण भारत में किसी दक्षिण भारतीय शैली में दिखे चर्च के बाहरी रूप को देखकर हर कोई यह समझे कि यह कोई स्थानीय मंदिर है, ऐसा प्रयास किया जाता है

5.  साहित्य निर्माण- क्रिस्चियन योग, ईसाई ध्यान पद्धति, ईसाई पूजा विधि, ईसाई संस्कार आदि साहित्य के शीर्षकों को प्रथम चरण में प्रकाशित करता है यह स्थानीय मान्यताओं के साथ अपने आपको मिलाने का प्रयास करता है अगले चरण ने चर्च स्थानीय भाषा में दया, करुणा, एकता, समानता, ईसा मसीह के चमत्कार, प्रार्थना का फल, दीन दुखियों की सेवा करने वाला साहित्य प्रकाशित करता है इस चरण का प्रयास अपनी मान्यताओं को पिछले दरवाजे से स्वीकृत करवाने की चेष्टा करता है। यीशु मसीह को किसी हिन्दू देवता एवं मरियम को किसी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित करना चर्च के लिए आम बात है भोले भाले लोगों को भ्रमित करने की यह कला चर्च के संचालकों से अच्छा कोई नहीं जानता

इस चरण में गैर ईसाई क्षेत्रों में बाकायदा मासिक वेतन के आधार पर पादरियों की नियुक्ति की जाती है उनका काम दीन दुखियों की सेवा करना, बीमारों के लिए प्रार्थना करना, चंगाई सभा करना, रविवार को प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों को प्रेरित करना होता है इस समय बेहद मीठी भाषा में ईसा मसीह के लिए भेड़ों को एकत्र करना एकमात्र लक्ष्य होता है यह कार्य स्थानीय लोगों के माध्यम से घुलमिलकर किया जाता है, जिससे आपको उनके ऊपर शक न हो जितने अधिक धर्म परिवर्तन का लक्ष्य पूर्ण होता है, उतना अधिक अनुदान ऊपर से मिलता है। यह कार्य शांतिपूर्वक, चुपचाप बिना शोर मचाए किया जाता है इस प्रकार से प्रथम चरण में स्थानीय संस्कृति के समान अपने को ढालना होता है। इसलिए इसे संस्कृतिकरण कहते हैं हमारे देश में दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, जम्मू कश्मीर, बंगाल आदि राज्य इस चरण के अंतर्गत आते हैं जहां पर चर्च बिना शोर मचाए विशेष रूप से गरीब बस्तियों में विशेष रूप से  आदिवासियों, दलितों को आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्रलोभन आदि देकर उनका धर्म परिवर्तन करने में लगा हुआ है।

द्वितीय चरण में विस्तार होता है छोटा चर्च अब बड़ा स्वरुप लेने लगता हैउसका विस्तार हो जाता है अब वह छुप छुप कर नही अपितु आत्मविश्वास से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है

1.  स्थानीय सभा के स्वरुप में परिवर्तन- अब वह हर रविवार को आम सभा में लाउडस्पीकर लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है अनेक लोग सालाना ईसाई बनने लगते हैं अब उसके पादरी ईसाई मत क्यों श्रेष्ठ है और स्थानीय देवी देवता क्यों श्रेष्ठ नहीं हैं, यह बताई जाती है. ऐसी बातें चर्च के दीवारों के भीतर खुलेआम बिना रुकावट के बोलने लगते हैं। ऐसे स्थिति में न केवल पादरी बल्कि उनके अनुयायियों में भी आत्मविश्वास बढ़ जाता है। अपितु वे धीरे धीरे आक्रामक भी होने लगते हैं कुछ अंतराल में बड़ी बड़ी चंगाई सभाओं का आयोजन चर्च करता है पूरे शहर में पोस्टर लगाए जाते हैं स्थानीय टेलीविजन पर उसका विज्ञापन भी दिया जाता है दूर दूर से ईसाईयों को बुलाया जाता है विदेशी मिशनरी भी अनेक बार अपनी गोरी चमड़ी का प्रभाव दिखाने के लिए आते हैं।

2.  चर्च के साथ मिशनरी स्कूल/कालेज का खुलना- अब चर्च के साथ ईसाई मिशनरी स्कूल खुल जाता है उस स्कूल में आदिवासियों, दलितों, हिन्दुओं के बच्चे मोटी मोटी फीस देकर अंग्रेज बनने आते हैं उन बच्चों को रोज अंग्रेजी में बाइबिल की प्रार्थना करवाई जाती है ईसा मसीह के चमत्कार की कहानियाँ सुनाई जाती है देश में ईसाई समाज की गतिविधियों के लिए दान कहकर धन एकत्र किया जाता है जो आदिवासी, दलित, हिन्दू बच्चे सबसे अधिक धन अपने माँ बाप से खोस कर लाते हैं, उन्हें और अधिक प्रेरित किया जाता है जो नहीं लाता उसे नजरअंदाज अथवा तिरस्कृत किया जाता है कुल मिलाकर अब इन ईसाई कान्वेंट स्कूल से निकले बच्चे या तो नास्तिक अथवा ईसाई अथवा हिन्दू अथवा आदिवासी, सरना धर्म की मान्यताओं से घृणा करने वाले अवश्य बन जाते हैं इसे 'आपका जूता आप ही के सर' बोलें तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी

3.  बिजनेस मॉडल- चर्च अब धर्म परिवर्तित आदिवासियों, दलितों, हिन्दुओं को अपने यहाँ रोजगार देने लगता है चर्च शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालय, वृद्धाश्रम, एन.जी.ओ. आदि के माध्यम से समाज सेवा के नाम पर विभिन्न उपक्रम आरम्भ करता है चपरासी, वाहन चालक से लेकर अध्यापक नर्स, अस्पताल कर्मचारी, डॉक्टर, पादरी, प्रचारक की नौकरियों में उनकी नियुक्ति होती है कुल मिलाकर यहाँ एक बिजनेस मॉडल के जैसा खेल होता है धर्म परिवर्तित व्यक्ति को यहाँ इस प्रकार से चर्च पर निर्भर कर दिया जाता है कि अब वह न चाहते हुए भी उसे चर्च की नौकरी करनी पड़ती है चर्च की नौकरी नहीं करेगा तो वह भूखे मरेगा, जिससे परिवर्तित धर्म से वापस जाने के लिए सोच भी न सके यह मॉडल विश्व में अनेक स्थानों पर आजमाया जा चुका है

4.  बाइबिल कॉलेज- चर्च अपने यहाँ पर धर्म परिवर्तित ईसाईयों के बच्चों को चर्च द्वारा स्थापित धार्मिक शिक्षा (Theology) देने वाले विद्यालयों में भर्ती करवाने के लिए प्रेरित करता है यह उद्देश्य दूसरी पीढ़ी को उनके पूर्वजों की जड़ों से पूरी तरह से अलग करना होता है इन विद्यालयों में वे बच्चे पढ़ने जाते हैं, जिनके माता पिता में सरना धर्म के संस्कार होते हैं उनके बच्चे एक सच्चे ईसाई के समान सोचें और बरतें सरना देवी देवताओं और मान्यताओं पर कठोर प्रहार करे और ईसाई मत का सदा गुणगान करे ऐसे उनकी मानसिक अवस्था को तैयार किया जाता है इन Theology कॉलेजों से निकले बच्चे ईसाईयत का प्रचार प्रसार रात दिन करते हैं

5.  पारिवारिक कलह-  ईसाई चर्च इस कला में माहिर हैं कि जिस परिवार का कोई सदस्य ईसाई बन जाता है तथा अन्य सदस्य सरना आदिवासी बने रहते हैं, वह घर झगड़ों का घर बन जाता है शुरू में वह ईसाई सदस्य अन्य सभी सदस्यों को ईसाई बनने का दबाव बनाता है घर के कार्यों में सहयोग करने से मना करना, सरना परम्परा के त्योहारों का विरोध करना, पैतृक पूजा में शामिल न होना, पत्नी और बच्चों को ईसाई न बनने पर संसाधनों से वंचित करना और यहाँ तक कि अपने माता पिता को ईसाई न बनने के विरोध में सुख सुविधा जैसे- भोजन, कपडे, चिकित्सा सुविधा दिलवाना बंद करना आदि के कई उदाहरण हैं

एक मित्र का अनुभव सांझा कर रहा हूँ, जो वर्ष 2003 का है मैं (मित्र) कोयंबटूर, तमिलनाडू में एम.बी.बी.एस. का छात्र था मेरे समक्ष एक परिवार जो ईसाईयों के पेंटाकोस्टल सम्प्रदाय से था, जो मरीज का इलाज करवाने लाया था इस ईसाई सम्प्रदाय में दवा के स्थान पर रोगी का ईसा मसीह की प्रार्थना से चंगा होने को अधिक मान्यता दी जाती है उस परिवार का मुखिया अन्य सदस्यों के न चाहते हुए भी अस्पताल से एक गंभीर रोगी की छुट्टी करवाकर चंगाई प्रार्थना करवाने के लिए चर्च ले गया रोगी का क्या हुआ होगा, सभी समझ सकते हैं जो ईसाई यह लेख पढ़ रहे हैं, वे कृपया आत्मचिंतन करें क्या परिवारों को उजाड़ना यीशु मसीह का कार्य है ?

इस दूसरे चरण में तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पंजाब आदि राज्य आते हैं इन राज्यों में सरकारें चर्च के गतिविधियों की अनदेखी करती हैं, क्योंकि वे चर्च के कार्यों में फ़ालतू हस्तक्षेप करने से बचती हैं सरकार के नाक के नीचे यह सब होता है मगर वह कुंभकरणी नींद में सोती रहती है

तीसरे चरण में चर्च एक विशाल बरगद बन जाता है इस चरण को "प्रभुत्व" का चरण कह सकते हैं। इस चरण में ईसाई मत का गैर ईसाईयों के प्रति वास्तविक सोच के दर्शन होते हैं चर्च के इस चरण में जायज और नाजायज के कोई अंतर नही रहता वह उसका साम दाम दंड भेद से अपने उद्देश्य को लागू कराने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है-

1.  हिंसा का प्रयोग- हिंसा पूर्व में उड़ीसा में ईसाई धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले स्वामी लक्षमणानन्द जी की हत्या करना भी इसी नीति के अंदर आता है उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा में रियांग जनजाति बस्ती थी उस जनजाति ने ईसाई बनने से इंकार कर दिया। उनके गांवों पर आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया उन्हें हर प्रकार से आतंकित किया गया, ताकि वे ईसाई बन जाएं। मगर रियांग स्वाभिमानी थे वे अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर आसाम में आकर अप्रवासी के समान रहने लगे, मगर धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया। खेद है कि कोई भी मानवाधिकार संगठन ईसाईयों के इस अत्याचार की सार्वजनिक मंच से कभी निंदा नहीं की

2.  सरकार पर दबाव- अपनी संख्या बढ़ने पर ईसाई समाज एकमुश्त वोटबैंक बन जाता है चुनाव के दौर में राजनीतिक पार्टियों के नेता ईसाई बिशप के चक्कर लगाते हैं बहुत कम लोग यह जानते हैं कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो मिजोरम में भारतीय संविधान के स्थान पर बाइबिल के अनुसार राज्य चलाने की सहमति प्रदान की थी पंजाब जैसे राज्य में सरकार द्वारा धर्म परिवर्तित ईसाईयों के एक प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। मदर टेरेसा दलित दलित ईसाईयों के आरक्षण के समर्थन में दिल्ली में धरने पर बैठ चुकी है फिर भी कमाल है धर्म परिवर्तन करने के पश्चात भी दलित दलित ही रहते हैं ! केरल और उत्तर पूर्व में राजनीतिक पार्टियों के टिकट वितरण में ईसाई बाहूल्य इलाकों में चर्च की भूमिका सार्वजनिक है गोवा जैसे राज्य में कैथोलिक चर्च के समक्ष बीजेपी जैसी पार्टियां भी बीफ जैसे मुद्दों पर चुप्पी धारण कर लेती है

तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा पहले धर्म परिवर्तन के विरोध में कानून बनाने, फिर ईसाई चर्च के दबाव में हटाने की कहानी अभी ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है। नियोगी कमेटी द्वारा प्रलोभन देकर जनजातियों/आदिवासियों को इसाई बनाने के विरोध में सरकार को जागरूक करने का कार्य किया गया था। उस रिपोर्ट पर सभी सरकारें बिना किसी कार्यवाही के चुप रहना अधिक श्रेयस्कर समझती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देशाई के कार्यकाल में धर्म परिवर्तन के विरोध में एक विधेयक पेश होना था। उस विधेयक के विरोध में मदर टेरेसा ने हमारे देश के प्रधानमंत्री को यह धमकी दी थी कि अगर इसाई संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, तो वे अपने सभी सेवा कार्य स्थगित कर देंगे। इस पर देसाई जी ने प्रतिउत्तर दिया कि इसका अर्थ तो यह हुआ कि ईसाई समाज सेवा की आड़ में धर्मांतरण करने का अधिक इच्छुक है। सेवा तो केवल बहाना मात्र है। खेद है कि मोरारजी देसाई की सरकार जल्दी ही गिर गई और यह विधेयक पास नहीं हुआ। इस प्रकार से ईसाई चर्च अनेक प्रकार से सरकार पर दबाव बनाते हैं। 


3. गैर इसाईयों के घरों में प्र्भुत्व के लिए संघर्ष- ईसाई समाज से संबन्धित नौजवान लड़के-लड़कियों को ईसाईयत के प्रति समर्पण भाव बचपन से सिखाया जाता है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने के कारण उनका आपस में वार्तालाप चर्च के परिसर में, यूथ प्रोग्राम में, बाइबिल के कक्षाओं में, गर्मियों के कैंप में, गिटार/संगीत सिखाने की कक्षाओं में आरंभ हो जाता है। इस कारण से अनेक युवक युवती बहुधा आपस मे विवाह भी कर लेते हैं। इस अंतर धार्मिक विवाह को कुछ लोग सेक्युलर समाज का अभिनव प्रयोग चाहे कहना चाहे, मगर इस संबंध का एक अन्य पहलु भी है। वह है प्र्भुत्व। इसाई युवती अगर आदिवासी युवक से विवाह करती है तो इसाई रीति-रिवाजों, चर्च जाने, बाइबिल आदि पढ़ने का त्याग कभी नहीं करती। उस विवाह से उत्पन्न हुई संतान को भी यही संस्कार देने का पूरा प्रयत्न करती है। वहीं अगर ईसाई युवक किसी आदिवासी लड़की से विवाह करता है, तो वह अपनी धार्मिक मान्यताओं को उस पर लागू करने के लिए पूरा जोर लगाता है। जबकि गैर ईसाई युवक-युवतियाँ अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर न प्रबल होते और न ही कट्टर होते हैं। इस प्रभुत्व की लड़ाई में गैर ईसाई सदस्य बहुधा आत्मसमर्पण कर देते हैं। अन्यथा उनका घर कुरुछेत्र न बन जाये। धीरे-धीरे वे खुद इसाई बनने की ओर चल पड़ते हैं। ईसाई समाज के लड़के-लड़कियां आदिवासी समाज के प्रबुद्ध वर्ग जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, बहुराष्ट्रीय कंपनी मे कार्यरत युवक-युवतियों से ऐसा संबंध अधिकतर बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम पर बहुत कम लोगों की दृष्टि जाती है। कम शब्दो में कहें तो आदिवासी समाज की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे उसी के विरूद्ध कार्य करने लगती है। पाठक स्वयं विचार करे। यह कितना चिंतनीय विषय है। 


4. व्यापार नीति- बहुत कम लोग जानते हैं कि संसार के प्रमुख ईसाई देशों के चर्च व्यापार मे भारी भरकम धन का निवेश करते हैं। चर्च आफ़ इंग्लैंड ने बहुत बड़ी धनराशि इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय कंपनीयों में लगाई हुई है। यह विशुद्ध व्यापार है। यह एक प्रकार का चर्च और व्यापारियों का गठजोड़ है। इन कंपीनियों से हुए लाभ को चर्च/ईसाई धर्मनांतरण के कार्यों में व्यय करता है। जबकि व्यापारी वर्ग के लिए चर्च धर्मांतरित नए उपभोक्ता  तैयार करता है। एक उदाहरण लीजिए- चर्च के प्रभाव से एक आदिवासी, दलित, हिन्दू धोती-कुर्ता छोड़कर पैंट-शर्ट-कोट-टाई पहनने लगता है। व्यापारी कंपनी यह सब उत्पाद बनाती है। चर्च नए उपभोक्ता तैयार करता है। उसे बेचकर मिले लाभ को दोनों मिलकर प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग अनेक शताब्दियों से संसार के अनेक देशों में होता आया है। प्रभुत्व के इस चरण में अनेक छोटे देशों की आर्थिक व्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और परोक्ष रूप से चर्च के हाथों में आ चुकी हैं। यह प्रक्रिया हमारे देश में भी शुरू हो चुकी है। इसका एकमात्र समाधान स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक प्रयोग है। 


5. सांस्कृतिक अतिक्रमण- विस्तार चरण में चर्च सांस्कृतिक अतिक्रमण करने से भी पीछे नहीं हटता। वह उस देश की सभी प्राचीन संस्कृतियों को समूल से नष्ट करने का संकल्प लेकर यह कार्य करता है। आपको कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं- झारखंड, उड़ीसा, बिहार, बंगाल में करम महोत्सव में करम डाल के साथ या करम डाल के जगह पर "क्रॉस" लगाकर करम पूजा करना, यीसु से संबन्धित गीत भी होता है। केरल मे कथकली नृत्य के माध्यम से रामायण के प्रसंगों का नाटक रूपी नृत्य किया जाता था। ईसाई चर्च ने कथकली को अपना लिया, मगर रामायण के स्थान पर ईसा मसीह के जीवन को प्रदर्शित किया जाने लगा। तमिलनाडू में भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से नटराज/शिव की पूजा करने का प्रचलन है। चर्च ने भरतनाट्यम के मध्यम से माता मरियम को सम्मान देना आरंभ कर दिया। हिन्दू त्योहारों जैसे- होली, दीपावली को प्रदूषण बताया और 14 फरवरी जैसे फूहड़ दिन को प्रेम का प्रतीक बताकर मानसिक प्रदूषण फैलाया। हर ईसाई स्कूल में 25 दिसंबर को सांता के लाल कपड़े पहन कर केक काटा जाने लगा। देखा देखी सभी हिन्दुओं द्वारा संचालित विद्यालय भी ऐसा ही करने लगे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वे लोग किसका अंधानुसरण कर रहे हैं। इसे ही तो सांस्कृतिक अतिक्रमण कहते हैं। 

तृतीय चरण मे हमारे देश के केरल, उत्तर पूर्वी राज्य नागालैंड, गोवा आदि आते हैं, जहाँ की सरकार तक ईसाई चर्च की कृपा के बिना नहीं चल सकती। असली आदिवासी तो यहाँ खत्म ही हो चुके हैं। समीप जाकर देखेने से ही आपको पूरी तरह मालूम चल जायगा। अगर तीसरा प्रभुत्व का चरण भारत के अन्य राज्यों में भी आरंभ हो गया तो भविष्य मे क्या होगा? यह यक्ष प्रश्न पाठकों के लिए है। आदिवासी समाज को अपनी रक्षा एवं बिछुड़ चुके अपने भाइयों को वापिस लाने के लिए दूरगामी वृहद नीति बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। अन्यथा बहुत देर न हो जाये !!


दीपक हंसदा (झारखंड)
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