सोमवार, 10 मार्च 2014

सत्यमेव जयते के उद्घोष की आड़ में खोखली जागरूकता फैलाने का कारोबार

                                                                                    अनिल सिंह गोंड 

हमारे देश में बच्चों को फिल्मों, पाठ्य पुस्तकों, धार्मिक उपदेशों और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों के जरिये यह बताया जाता है कि झूठ बोलना, चोरी करना,  भ्रष्ट कार्य करना, दहेज लेना आदि बुरी बातें हैं और ये सब पाप है, जिनसे हमें दूर रहना चाहिए. जब बच्चा कुछ बड़ा होता है, जवानी की दहलीज पर कदम रखता है और इन आदर्शों को गंभीरता से लेने लगता है तो उसको दुनियादार बनने का पाठ पढ़ाया जाता है और उसको  बताया जाता है कि ये आदर्श किताबों और फिल्मों में तो ठीक है लेकिन इनको गूंथकर दो वक्त की रोटी नहीं बनाई जा सकती और इसलिए युवाओं को अपने केरियर पर ध्यान देना चाहिए, उन्हें अपने बारे में सोचना चाहिए, अपने परिवार के बारे में सोचना चाहिए.


शासक वर्ग के विभिन्न हिस्सों के बीच अपने अपने मीडिया और प्रचारतंत्र के जरिये युवाओं में यह जागरूकता पैदा करने की होड़ लगी रहती है कि उन्हें राजनीति और सामाजिक पचड़ों में पड़ने की बजाय अपने घर, अपनी गाड़ी, अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए तथा अपने सुखी (लड़के की शिक्षा और लड़की की शादी के लिए) रिटायरमेंट के लिए संपत्ति बनाने में जुट जाना चाहिए. इस प्रकार उम्र के इस निर्णायक मोड़ पर उनको सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से काटकर एक सुनियोजित तरीके के उनका अराजनीतिकरण कर दिया जाता है.


दूसरे शब्दों में उनको कूपमंडूक बना दिया जाता है और उनको यह यकीन दिला दिया जाता है कि जिंदगी की चूहा दौड़ में पशुवत उछल कूद कर दूसरों को पछाड़ना ही जिंदगी की दौड़ का अवश्यंभावी सामाजिक और मकसद है, लेकिन जब जिंदगी की इस चूहा दौड़ में आर्थिक समस्याओं और संकटों के रूप में सामने आता है तो शासक वर्ग को यह डर सताने लगता है कि कहीं युवा पीढ़ी में यह जागरूकता न पैदा हो जाए कि दरअसल इन समस्याओं और संकटों की जड़ घोर असमानता और मुनाफे की अंधी हवस पर टिकी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था है और कहीं उसकी चेतना इस सच्चाई तक न पहुँच जाए कि तमाम समस्याओं और संकटों से निजात पाने के लिए इस व्यवस्था को बदलकर एक मानव केंद्रित व्यवस्था का निर्माण करना न सिर्फ जरूरी है बल्कि संभव भी है. इसलिए शासक वर्ग एक नया पैतरा अपनाता है. अपने उसी प्रचारतंत्र के माध्यम से युवा वर्ग में ऐसी खोखली जागरूकता पैदा करने का आडम्बर रचता है, जिससे लोगों को समस्याओं का जड़ पता ही न चले और उनमे यह भ्रांति फ़ैल जाए कि समस्याएं दरअसल व्यवस्थागत नहीं बल्कि चंद बुरे लोगों की वजह से है और लोगों में जागरूकता की कमी की वजह से है.


एक बार लोग जागरूक होकर इन बुरे लोगों को हिकारत भरी निगाह से देखने लगेंगे तो सारी समस्याएं छूमंतर हो जायेंगी. इस प्रकार मौजूदा व्यवस्था पर कोई आंच भी नही आयेगी और लोगों में यह भ्रम भी बना रहेगा कि धीरे धीरे करके लोगों में जागरूकता पैदा होगी और समस्याओं का समाधान हो जाएगा. यही नही, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के युग में पिछले दो दशकों से इस प्रकार की नापुशंक जागरूकता पैदा करने को न सिर्फ व्यवस्था विरोधी आग पर ठन्डे पानी के छींटे फेंकने के काम के लिए बढ़ावा दिया गया है, बल्की इसलिए भी कि यह बेहिसाब मुनाफ़ा पीटने का विश्वव्यापी कारोबार भी है.


दुनिया भर में लाखो एनजीओ खोखली जागरूकता पैदा करने के लिए इस घृणित कारोबार में लिप्त हैं और उनको फंड करती हैं, दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनसे संबद्ध फंडिंग एजेंसियां और इस पूरे गोरख धंधे की ब्रांडिंग के लिए नाम दिया जाता है- कारपोरेट सोशल रिस्पोंसिब्लीटी या ठेठ भाषा में कहें तो धंधेबाजों की सामाजिक जिम्मेदारी. इसी धूर्तता भरे धंधे को अंजाम देने के लिए लोगों की जिंदगी, बीमारी और तकलीफों से सौदेबाजी करने वाली बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियां अपने अकूत मुनाफे का छोटा सा टुकड़ा स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता पैदा करने वाले एनजीओ को देती है. पर्यावरण को बेइंतहा तबाही पहुचाने वाली तेल, गैस और आटोमोबाईल कंपनियां पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के अभियानों को फंड करती हैं तथा आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे कारपोरेट घराने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का पुरजोर समर्थन करते हैं.


यूँ तो भारत में खोखली जागरूकता फैलाने का यह गोरख धंधा पिछले कई वर्षों से जारी है, लेकिन पिछले दिनों जबरदस्त कारोबारी उछाल देखने में आया. कारण है- सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाने का नया रिएलिटी शो "सत्यमेव जयते." लोगों में जागरूकता का वहां कुछ इस कदर पैदा करने के लिए कि शोषक व्यवस्था को खरोंच तक न पहुचे, एक ऐसे अभनेता की दरकार थी जो इस पाखंडपूर्ण कार्य को बखूबी अंजाम दे सके, और इसके लिए 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' आमीर खान से बेहतर और कोई अभिनेता हो ही नहीं सकता था जिन्होंने सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाले चिंतनशील अभिनेता के रूप में सुनियोजित ढंग से खुद की 'ब्रांड बिल्डिंग' की है. युवा वर्ग के अच्छे खासे हिस्से में इस 'ब्रांड बिल्डिंग' का असर इतना ज्यादा है कि यदि आप सत्यमेव जयते की आड़ में चल रहे गोरख धंधे के बारे में कोई आलोचनात्मक टिप्पणी करने की जुर्रत कर बैठते हैं तो आमीर खान के उत्साही प्रशंसक तपाक से बोल पड़ते हैं कि तो क्या हुआ कि वह पैसे कमा रहा है, पैसे तो सभी कमाते हैं. वो हमें सत्यमेव जयते के सकारात्मक पक्ष को देखने की राय देते हैं कि किस प्रकार आमीर खान इसके माध्यम से लोगों में जागरूकता फैला रहा है. इस राय को गंभीरता से लेते हुए और अपनी इस जिज्ञासा को पूरा करने के लिए कि आखिर वो कौन सी जागरूकता है जो करोड़ो रूपये के एवज में सत्यमेव जयते के माध्यम से फैलाई जा रही है, हाल ही में मैंने यूट्यूब पर इस कार्यक्रम के कुछ एपिसोड देखे.


निचोड़ के रूप में सत्यमेव जयते के अब तक प्रसारित चार एपिसोड में आमीर खान ने करोड़ो रूपये की एवज में जागरूकता फैलाई है कि हमारे देश में बड़े पैमाने पर लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है, हमारे देश में बाल यौन शोषण बहुत बड़े पौमाने पर होता है, हमारे समाज में दहेज नामक प्रथा प्रचलित है जिसमे शादी में लड़की वालों को लड़के वालों की फरमाईश पूरी करनी होती है और ऐसा न करने पर लड़की को भीषण यातनाएं सहनी पड़ती है तथा हमारे यहाँ स्वास्थ्य सेवाओं में जबरदस्त भ्रष्टाचार है, जिसकी वजह से ग़रीबों को समुचित स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पाती हैं. यदि इस किस्म के सामान्य ज्ञान को जानकर कोई विदेशी व्यक्ति अपने आपको भारत की समस्याओं के बारे में जागरूक होने को दावा करता तो बात समझी जा सकती थी, लेकिन जब कोई भारतीय ऐसा दावा करता है तो उससे बस यही कहा जा सकता है कि यह आमीर खान की अभिनय क्षमता से ज्यादा उस व्यक्ति के भारतीय समाज से कटाव और उसकी कूपमंडूकता को दर्शाता है.


कार्यक्रम में कुछ भावुक दृश्यों को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत कर दर्शकों की आँखों में गुस्से की जगह आंसू लाने के बाद आमीर खान अंत में इन आंसुओं को पोछने के लिए कुछ नुस्खे भी बताते हैं. जब वो दर्शकों से अपील करते हैं कि एक दिए गए नंबर पर एसएमएस करें और कुछ चुनिन्दा एनजीओ को आर्थिक सहयोग करें. और इसके बाद वो इस सत्यमेव जयते के जनकल्याण सहयोगी में बारे में दर्शकों को बताते हैं. जी हाँ, इस सहयोगी के नाम का अनुमान लगाने पर कोई पुरस्कार नहीं है, ये है "रिलायंस फाउन्डेशन". आजाद भारत में लूट खसोट, शोषण, भ्रष्टाचार और अत्याचार का प्रतीक और सभी पार्टियों के नेताओं और तमाम वरिष्ठ नौकरशाहों को अपनी जेब में रखने के लिए मशहूर रिलायंस समूह अब सत्य की विजय की नैसर्गिक चाहत को भी अपनी मुट्ठी में कर रहा है. इसी से सत्यमेव जयते और आमीर खान के पाखण्ड की कलाई खुल जाती है. इतिहास गवाह है कि अब तक किसी भी देश में सामाजिक कुरीतियों और बुराईयों का खात्मा शासक वर्गों द्वारा प्रायोजित खोखले जागरूकता अभियानों से नहीं बल्कि जनता की व्यापक भागीदारी वाले जन आन्दोलनों द्वारा ही संभव हुआ है.


निश्चित रूप से लोगों को तमाम समस्याओं के विभिन्न पहलुओं के बारे में उनके सामाजिक और आर्थिक संरचना से जुड़ाव के बारे में जागरूक करना जन आन्दोलनों में यकीन रखने वाले लोगों का एक बेहद जरूरी कार्यभार है. लेकिन उतना ही जरूरी कार्य यह भी है कि लोगों में खोखली जागरूकता फैला कर गुमराह करने की प्रायोजित मुहिमों का पर्दाफ़ाश किया जाए.

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रविवार, 9 मार्च 2014

लक्ष्मी, पूजा से कभी नहीं मिलती

हम भारत के लोग प्रतिवर्ष दीप पर्व को बड़े ही धूम-धाम व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. दुनिया के मानचित्र में भारत भारत गरीब आबादी वाला सबसे बड़ा देश माना जाता है. विश्व में हम इकलौते ऐसे देश के निवासी हैं, जहां माँ लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए ब्रम्हांड का सबसे बड़ा जश्न मनाया जाता है, और मनाएं भी क्यों ना ! दुनिया के सबसे गरीब जो ठहरे !! अपनी भूख-प्यास, दरिद्रता और बदहाल जिन्दगी से निजात पाने के लिए न जाने कितने सालों से  हम धन की देवी लक्ष्मी की कृपा व दया की चाह से तरस तरस कर, तड़प तड़प कर पूजा पाठ, वृत उपवास में लीं और तल्लीन हैं, इसका हिसाब न तो हमारे पुरखों ने रखा, न ही हम रख पा रहे हैं.

मैंने अति निकटता से देखा है कि माँ लक्ष्मी को प्राप्त करने भारत के लाखो करोड़ो लोग, जिन्हें सरकार ने अल्प आय वर्ग, निराश्रित, गरीबी रेखा से निचे, गरीबी रेखा के बीच और कमजोर वर्ग आदि इत्यादि प्रमाणपत्रों में विभाजित कर रखा है, दीपावली मनाने के लिए माँ लक्ष्मी को प्रसन्न रखने के लिए "उत्सव कर्ज" लेते हैं. यह कड़वा सच है कि भारत के करोड़ो लोगों की दीपावली कर्जों व ब्याजों से ली गई राशि पर मनाई जाती है. दीपावली प्रत्येक वर्ष आती है, अतः इस कर्ज को लौटाने में ही आदमी की आधी उम्र गुरार जाती है तो शेष बची आयु शिक्षा, स्वास्थ्य और वैवाहिक कर्जों की अदायगी में निकल जाती है. भारत के लोगों को सदियों से एक ही पाठ पढ़ाया गया है कि कर्म से धर्म बड़ा होता है. धर्म के सामने देश, राष्ट्र, संविधान, नियम, क़ानून सब तुच्छ हैं. "धर्म के लिए जियो और धर्म के लिए मरो" यही एक मात्र मूल मन्त्र जन्म से मृत्यु तक सिखाया गया है. भारत के वेदांता (वेदज्ञानी) ब्रम्हज्ञानी व मनीषियों द्वारा देश की भूखी, नंगी, अनपढ़, जाहिल और गंवार, अशिक्षित जनता को जो धर्म का ज्ञान परोसा गया, आज उसी परम्परा का पूरी निष्ठा व लगन से, मन, वचन व कर्म से ईमानदार पालन कर रहे हैं.

भारत की महिलायें जिस शुद्धता व पवित्रता से प्रतिमाह वृत, उपवास व जाप ताप करती हैं, दुनिया में संभवतया शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां की महिलायें भारतीय नारियों का इस क्षेत्र में मुकाबला कर सके. दुनिया के किसी भी कोने में ईश्वर के प्रति धन की देवी माँ लक्ष्मी के प्रति इतनी श्रृद्धा, त्याग और तपस्या देखि जाती है और न ही सुनी जाती है, फिर भी भारत विश्व मानचित्र में सबसे गरीब, भूखा, नंगा और कमजोर है.
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शनिवार, 8 मार्च 2014

अल्पसंख्यक शासक और बहुसंख्यक गुलाम

भारतीय जातिगत रणनीति की अपनी विशेषताएं अनेक हैं, फिर भी जो जाति सामाजिक स्तर पर संख्या में कम है वह पूरे भारतीय समाज कों अनैतिक रूप से गुमराह कर उस पर राज करती चली आ रही है. नई नई समस्याओं में अन्य समाजों कों उलझाकर वह स्वयं ही इस देश का हुक्मरान होता चला आ रहा है.


इसके विपरीत जो सामाजिक स्तर पर संख्या में अधिक हैं, वे आज देश के गुलाम हैं. आजादी के पहले इन मूलनिवासियों का आंदोलन का अपना एक मजबूत असर हुआ करता था. आजादी के बाद अब मूलनिवासियों के आंदोलन क्यों असरदार नहीं होते ? यह एक विचार करने वाली बात है.


आजाद भारत में गुलाम मूलनिवासियों की ऐसी स्थिति का जिम्मेदार कौन है ? जो भारत का असली मूलनिवासी समाज है वही बद से बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर है. क्योंकि दुश्मन बड़ा होसियार है, वह मैदानी लड़ाई में विश्वास नहीं रखता, वह तो केवल अपनी छल बुद्धि का इस्तेमाल करता है. मैदानी जंग में उतरने की तो हमारा दुश्मन भूलकर भी यह भूल नही कर सकता, क्योंकि उसे मालूम है कि उसका समाज संख्या में कम है. मैदानी जंग में उतरने पर उसकी समाज की संख्या और कम हो जायेगी. हमारा दुश्मन हमसे ज्यादा होशियार है. उसमे वृहद मूलनिवासी समाज कों विभिन्न जाति/ जनजाति में बाटकर आपस में मिलने नहीं दिया है. अर्थात हममें एकता नहीं बनने दिया है.


इसका नतीजा यह हुआ कि हम अपने वृहद स्वरुप से हटकर छोटे-छोटे समुदायों में बटकर बिखरते चले गए. हम मूलनिवासी ऐसे बिखरे कि हमें एक दूसरों से कोई मतलब नहीं रहा और इसका फायदा हमारा दुश्मन बड़े मजे से उठाता चला आ रहा है. मूलनिवासियों कों आजाद भारत में पुनः अपनी आजादी के लिए आंदोलन करना होगा, लेकिन इस आंदोलन का स्वरुप वृहद मूलनिवासी समाज का होना आवश्यक है. छोटे-छोटे बिखरे समुदाय का एक एक कर संघर्ष करना मूलनिवासियों के उज्जवल भविष्य के हक में नहीं है.


अतः समस्त मूलनिवासियों का एक होना जरूरी है. इतिहास गवाह है कि दुनिया के आंदोलन से इतिहास में आज तक कोई जाति/समुदाय पूरी तरह एक नहीं हुई है न ही कोई आंदोलन पूर्णतः शत प्रतिशत सफल होता है. इसलिए निर्धारित लक्ष्य कों रखकर मूलनिवासियों कों एक होना होगा. पूर्णतः न सही ३५%-४०% में ही दुश्मन चारों खाने चित्त नजर आएगा.
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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

दलाईलामा द्वारा दिनांक १४ जनवरी २०१४ को सिरपुर, छत्तीसगढ़ प्रवास पर चांदा दाई गुफा में साधना करने पर विरोध

बौद्ध धर्म गुरु दलाईलामा 
आदिवासी गोंड समाज की न्यायपूर्ण मांग को महासमुंद जिला प्रशासन एवं छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा अनदेखी कर आदिवासी गोंड समाज के धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुंचाई जा रही है. हम प्रशासन के अड़ियल रवैये से निरास होकर जनता के अदालत में अपनी बात पहुंचाने हेतु प्रेस जगत से निवेदन करते हैं कि :-

१-     जैसा कि पूर्व में भी हमारे द्वारा प्रेस को अवगत कराया गया था कि महासमुंद जिला प्रशासन द्वारा आदिवासी गोंड समाज के श्रृद्धास्थल माता कली कंकाली माँ (चांदा दाई) की पूजा स्थली चांदा दाई गुफा को "नागार्जुन" का साधना स्थल बताकर जनता को गुमराह किया जा रहा है. शासन के इस कथन से आदिवासी गोंड समाज की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची है.

२-     राज्य के पर्यटन एवं धर्मस्व विभाग द्वारा बौद्ध धर्म के धर्म गुरु दलाईलामा की आस्था एवं विश्वास से खिलवाड़ कर उक्त गुफा को नागार्जुन गुफा बताकर वहाँ दलाई लामा को ले जाने की घोषणा की गई है, जो कि छत्तीसगढ़ राज्य के पूरातत्व एवं धार्मिक न्यास विभाग के अधिकारियों की घोर गैर जिम्मेदाराना हरकत है.

३-     दलाईलामा की यात्रा को लेकर कलेक्टर, महासमुंद द्वारा समाज के पदाधिकारियों के साथ बैठक की गई. बैठक में आदिवासी गोंड समाज द्वारा चांदा दाई गुफा के इतिहास का विस्तार से उनके समक्ष में वर्णन किया गया तथा बताया गया कि रतनपुर के गोंड राजा हीरासाय (हीरा सिंह) द्वारा महासमुंद स्थित कौडिया क्षेत्र सिंघा धुर्वा को प्रदान किया गया था, जिन्होंने सिंघनगढ़ सहित कई गढ़ बनाए थे. सिंघानगढ़ की चांदा दाई गुफा में राजा सिंघा धुर्वा द्वारा पूजा पाठ की जाती थी. आज भी सिंघानगढ़ में उनके द्वारा बनाए गए गढ़, ताल-तलैया के अवशेष मौजूद हैं. परम्परागत और रीति नीति के अनुसार आदिवासी गोंड समाज सिंघा धुर्वा के चांदा दाई गुफा में अपनी आराध्य देवी महाकाली कली कंकाली की श्रृद्धापूर्वक पूजा करता है तथा नवरात्री में जंवारा बोकर ज्योतिकलश जलाई जाती है. साथ ही कुंवार नवरात्री में सामूहिक नवा खाई संपन्न कराई जाती है.

४-     बैठक में कलेक्टर द्वारा उक्त गुफा में दलाई लामा को ले जाने एवं वहाँ उनका ध्यान करवाने की जिद पर अडी रही तथा आदिवासी गोंड समाज को संकीर्ण मानसिकता वाला बताकर अपमानित किया गया तथा दैनिक समाचार पत्रों में पत्रकार लोग लोंग, इलायची, मशाला लगाकर झूठा जानकारी छापते हैं.

५-     महासमुंद कलेक्टर सुश्री संगीता द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के पुरातत्व सलाहकार श्री अरुण कुमार शर्मा का हवाला देकर उनके द्वारा चांदा दाई गुफा को "नागार्जुन" की साधना स्थली कहा गया. श्री अरुण शर्मा द्वारा अपने निष्कर्ष का आधार चीनी यात्री व्हेनसांग की पुस्तक को मानते हैं.

        परन्तु दूसरी ओर भारतीय पुरातत्व विभाग के रायपुर मंडल के अधीक्षक डॉ.अरुण राज द्वारा बताया गया कि शाकीय रिकार्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है, जिस आधार पर कहा जा सके कि सिरपुर के पास कभी "नागार्जुन" ने निवास किया था एवं चांदा दाई गुफा में आराधना की थी.

        रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर श्री निगम द्वारा भी कहा गया कि व्हेनसांग पुस्तक में कहीं सिरपुर का उल्लेख नहीं है. केवल दक्षिण कौशल की राजधानी  और वहाँ से १७ ली (१ ली = ४० मील) दूरी स्थित "पोलो मोलो किली" पहाड़ी पर नागार्जुन का निवास करना बताया गया है.  उक्त पुस्तक के अनुसार भी उक्त पहाड़ी दक्षिण कौशल की राजधानी से दक्षिण में ६८० किलोमीटर दूर रही है. जबकी चांदा दाई वाली पहाड़ी सिरपुर से अन्य दिशा में १७ किलोमीटर उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है.

         इस प्रकार श्री अरुण सरमा का "नागार्जुन" गुफा का दावा बगैर आधार का मनगढंत है. छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शासन के अन्य पुरातत्व विद्वानों से चर्चा नहीं करना यह भी एक विचारणीय प्रश्न है !

६-     आदिवासी गोंड समाज द्वारा अपनी पीड़ा का महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर अवगत कराया गया है. साथ ही दलाईलामा के भारत स्थित कार्यालय धर्मशाला में भी फैक्स द्वारा जानकारी भेजकर फर्जी "नागार्जुन" गुफा के बारे में उन्हें अवगत कराया गया है. साथ ही यह भी अवगत कराया गया कि आदिवासी समाज की देव स्थली में केवल आदिवासी समाज अपनी रीति नीति और परम्परा के अनुसार देवी की पूजा करती है. देवी स्थल के अंदर किसी अन्य धर्म से सम्बंधित विधान से पूजा नहीं हो सकती. अगर ऐसा किया गया तो यह आदिवासी गोंड समाज की धार्मिक भावनाओं से सीधा खिलवाड़ होगा.

७-     शासन द्वारा दलाईलामा जो भारत सरकार के विशिष्ट अतिथि हैं, उनकी  सुरक्षा के अनदेखी कर चांदा गुफा में उनका प्रवास कराया जा रहा है. क्योंकि चांदा दाई गुफा स्थली, जहरीली साँपों, बिच्छुओं का निवास स्थल है. साथ ही जंगली मधुमक्खियाँ भी है, जो छेड़ दिए जाने पर हमला कर देती है, जो प्राणघातक भी हो सकता है.

८-     आदिवासी गोंड समाज की नीति सदा से सहअस्तित्व के साथ जीने की रही है. आदिवासी गोंड समाज मनुष्यों के साथ-साथ अन्य जीव जंतु तथा पेड़, नदी पहाड़ के साथ भी हिलमिल कर रहने पर विश्वास करता है. जिस कारण दक्षिण कौशल में हजारों हजारों वर्षों से शुख शान्ति रही है. परन्तु आदिवासी समाज की धर्म स्थली में किसी भी छेड़-छाड़ को समाज कभी  भी बर्दास्त नहीं करता रहा है, न अब करेगा. यदि शासन द्वारा दलाईलामा को जोर जबरदस्ती कर चांदा दाई गुफा को "नागार्जुन" गुफा बताकर वहाँ उनसे ध्यान पूजा पाठ कराया जाता है, तो आदिवासी समाज इसका कड़ा विरोध करेगा. ऐसी स्थिति में दलाईलामा के सम्मान में कोई ठेस पहुँचती है तो राज्य शासन स्वयं इसके लिए जिम्मेदार होगा. आवश्यकता पड़ने पर आदिवासी गोंड समाज दलाई लामा से भेंट कर उन्हें दिए जा रहे धोखे से उन्हें अवगत कराएगा.

      अतः प्रेस वार्ता के माध्यम से आम जनता को आदिवासी समाज वास्तविकता से अवगत कराना चाहता है तथा आम जनता से अपील भी करता है कि संघर्ष की स्थिति में आदिवासी गोंड समाज की भावनाओं को समझे तथा समर्थन करें. साथ ही छत्तीसगढ़ शासन भी इस प्रेस वार्ता के कथनों को आदिवासी समाज की ओर से अंतिम चेतावनी समझे.

मंगतू जगत,
अध्यक्ष,
जय सिंघा धुर्वा सेवा समिति,
सिंघंनगढ़, जिला महासमुंद,
छत्तीसगढ़.
पंजीयन क्रमांक-१९८७८ 
मो. 9907788961, 9303048494