शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

सिंन्धु सभ्यता का उदभव


सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता वर्तमान पकिस्तान में स्थित शहर से लगभग २०० कि.मी. दक्षिण पश्चिम में राबी एवं सतलज नदियों के बीच में है. सिंधु नदी के पाकिस्तान देश में अरब सागर में गिरने के लगभग ४५० कि.मी. पहले नदी के किनारे मोहन जोदड़ो नामक स्थान है, जिसकी खोज जान मार्शल के निर्देशन में श्री राखलदास बनर्जी ने सन १९२२ ई. में किया. पुरातत्विक खोजों की वरीयता क्रम में हडप्पा संस्कृति कहा जाता है, पर व्यवहार में यह सिंन्धु सभ्यता कहलाने लगी. अनेकों वर्षों तक यह शोध का विषय रहा कि सिंन्धु सभ्यता के जनक कौन थे, वे स्थानीय थे व बाहरी थे. स्थानीय अर्थात द्रविणों के पूर्व से रहने वाले या जो कि बाद में द्रविण कहलाये तथा बाहरी का आशय दजला फरात नदियों के मुहाने में स्थित मेसापोटामियां की सभ्यता या अफगानिस्तान व बलूचिस्तान के लोग जो कि हिब्रु भाषा बोलतें थे, जो द्रविण भाषा से मिलती जुलती थी.

डॉ. व्हीलर कहतें हैं कि सिंन्धु सभ्यता के लोग भवन निर्माण कार्य में कच्ची ईटों का प्रयोग करते थे तथा भवन निर्माण में लकड़ी के छतों से (नशेनी, मंचान) का उपयोग करते थे. इस कार्य में मेसोपोटामियां के भवन निर्माता सिद्धहस्त थे. डी.एच गार्डन कहते हैं- मेसापोटामिया से लोग सिंधु घाटी में जलमार्ग से आये अपने साथ कम से कम सामान लाये जिसे यहाँ जोड़-जोड़कर काम लायक बनाये ताकि हड़प्पा की कृषि भूमि पर कब्जा करके कृषि का विकास किया. सांकलिया कहते हैं- तंदूरी चूल्हों को कालीबंगा के उत्खनन स्थल पर मिलना  ईरान तथा दक्षिण एशिया के प्रभाव दर्शातें हैं. डॉ. व्हीलर महोदय तो सिंधु सभ्यता के चबूतरों और मेसापोटामियां जिगुरेत के टीलों को एक ही प्रकार के राजतंत्र की प्रेरणा से निर्मित होने की संभावना मानते हैं. सिंधु सभ्यता में नगर का नियोजन एवं सार्वजनिक स्वछता की व्यवस्था को मेसापोटामियां ही नहीं वरन विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में श्रेष्ठ पाया गया है. यदि मेसापोटामियां के लोग समुद्री मार्ग से आकर भवन निर्माण का कार्य करते तो काम चलाऊ ही बनाते, इसके अलावा महत्वपूर्ण यह कि मेसापोटामियां सभ्यता में चबूतरों पर मंदिर निर्माण के अवशेष मिलते हैं. जबकि सिंधु सभ्यता में मंदिर मिर्माण के एक भी अवशेष प्राप्त नहीं हैं. दोनों सभ्यताओं की विधि में अन्तर है. यदि व्हीलर महोदय मानतें हैं कि सिंधु सभ्यता के विकास में मेसापोटामियां सभ्यता का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. किन्तु अलकानंद घोस कहते हैं कि भरत के ही लोगों ने सिंधु सभ्यता का विकास किया. डॉ. सांकलिया का विचार है कि सिंधु घाटी सभ्यता के मूल तत्व की जानकारी हेतु सिंध प्रान्त पाकिस्तान के जकोबाबाद से २२ किलोंमीटर दूर जुड़ेईजोदड़ो की खुदाई एवं बलूचिस्तान के अबरकोट की खुदाई से रहस्य उजागर हो सकते है. बलूचिस्तान के मेहारगढ़ में खुदाई से सिंधु सभ्यता के मूल तत्व प्राप्त नहीं हुये तथा मेहारगढ़ से ७ कि.मी. दूर नौशादों में भी विकसित सिन्धु सभ्यता के चरण नहीं मिले. केश सलाईम खां पाकिस्तान से १० कि.मी. दूर गुमला एवं २३ किमी. दूर रहमान ढेरी में खुदाई से भी कुछ विशेष प्राप्ति नहीं हुई. फेयर सर्विस कहतें हैं कि सिन्धु के पूर्व की सभ्यता के अवशेष जो उपरोक्त स्थालों पर मिले उनमे मेसापोटामियां सभ्यता, ईरानी सभ्यता के स्वरूप देखने को मिले हैं. प्रो. एस. इंगनाथ राव के अनुसार राजस्थान के सीरी एवं लोथल में खुदाई से जो साक्ष्य मिले हैं उनके अनुसार स्थानीय संस्कृतियों व्दारा धीरे-धीरे क्रमशः सिन्धु सभ्यता को विकसित कर दिया गया. मार्क केन्योर के अनुसार सभ्यता का विकास चार कारणों के दीर्घकाल में हुआ. प्रथम काल में गेंहू का प्रचुर उत्पादन, द्वितीय काल में इन्हें सहेजकर रहने हेतु मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तन बनाये गये. तृतीय काल में मुद्रा बाँट एवं व्यपार की विकसित सभ्यता सामने आयी और अंत में सिंधु सभ्यता का विघटन काल आया. जिसे क्रमशः ६५०० ई.पू. से १६०० ई.पू. तक के काल में विभाजित किये हैं. विभिन्न स्थलों की खुदाई से हडप्पा सभ्यता के पूर्व की सभ्यता होना बताया है. जिनका क्रमिक विकास हुआ है, जिनमे नगर नियोजन, देश विमुख भवन, योजना आवास, सुरक्षा दिवार, गढ़ी, कच्ची पक्की ईट का प्रयोग, अन्नागार, मृदभाण्ड तथा मनकें आदि व्यपार-व्यसाय बढ़ने से बाँट का प्रयोग गिनती, लेखन कला, सामान के बंडलों पर मुद्रा लगाने के लिए मुदाओं का विकास, नगर नियोजन, विशालभवन, नारियों के लिये सुन्दर आभूषण आदि विकसित सिंधु सभ्यता की विशेषताएँ हैं. मार्क केन्योर का स्पष्ट मत है कि सिंधु सभ्यता उसी स्थल पर सदियों तक स्थित ग्रामो के विकसित रूप थे. भारत के मानचित्र को तथा उसके भागौलिक बनावट को ध्यान से देखने से ज्ञात होता है कि हडप्पा सभ्यता का उदभव एकाएक नहीं हुआ है. मानचित्र के अनुसार जो हडप्पा सभ्यता है वह वर्तमान मुबई से उत्तर की ओर लाहौर (पाकिस्तान) के मध्य भाग तथा समुद्री तट मुंबई से कंराची (पाकिस्तान) के मध्य विस्तृत नदी घाटियों के मैदानी प्रदेश में स्थित है. हडप्पा एवं मोहन जोदड़ो दो अलग-अलग स्थल है, जहाँ से सिंधु सभ्यता के मुहरें (सील) खुदाई में पाये गये हैं. हडप्पा नामक स्थान रावी नदी के दक्षिण किनारे पर रावी एवं सतलज नदी के मध्य स्थित है, जबकि मोहन जोदड़ो नामक स्थान सिंधु नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है. सिंधु नदी जब अरब सागर में गिरती वहाँ से मोहन जोदड़ो की दूरी ४५० कि.मी. और हडप्पा की दूरी लगभग ११५० कि.मी. है. हडप्पा और मोहन जोदड़ो में ७० कि.मी. दूरी है. सिंधु सभ्यता ई. पु. ६५०० से १५०० तक कुल ५००० ई.पू. वर्षों क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर बढते हुये गये हैं. मनुष्य शिकारी अवस्था से कृषक अवस्था की ओर क्रमशः बढता गया है. कंदराओं एवं गुफाओं से निकल शिकारी जीवन को छोड़ते हुये कृषि कार्य एवं पशुपालन कार्य हेतु नदी के मैदानी क्षेत्र में बढता गया है. उपरोक्त कथन का तात्पर्य यह है कि सिंधु सभ्यता के पूर्ण ५०० वर्ष ई.पू. ५००० वर्ष से पहले भी सभ्यता रही है. ये लोग गुफाओं एवं कंदराओं में रहते थे. गुफा मानव जंगलों में एवं पहाड़ों में शिकारी जीवन जीते थे. नर्मदा नदी तो अति प्राचीन है. नर्मदा एवं तापती नदियों का बहाव पश्चिम की ओर है. उन नदी घाटियों में आमूरकोट (अमरकंटक) को मानव का उत्पत्ति स्थल कहा जाता है. कोया संस्कृति में आमूरकोट नर्मदा नदी के उदगम स्थल में सर्वप्रथम नर व मादा का जन्म हुआ. नर-मादा से नदी का नाम नर्मदा प्रचलित हुआ है. इस प्रकार नर्मदा घाटी की जो आदिम सभ्यता थी, यहाँ से ही लोग उत्तर की ओर क्रमशः बढ़ते गये है. सिंधु नदी एवं इसकी सहायक नदियों के कछारी उपजाऊ प्रदेश में गेहूं अनाज, दलहन फसलों की उत्कृष्ट कृषि करने लगे. कृषि उत्पादन की मांग सुदूर उत्तर पश्चिम के प्रदेश में जो कि भौगोलिक दृष्टिकोण से पठारी एवं कम उपजाऊ थे, वहाँ से अनाज, पशु पक्षियों की मांग उठने लगी तब नदियों के नौकायन से व्यापार अन्य देश से किया जाता रहा. अनाजों के भरपूर उत्पादन, उनके भंडारण उनकी सुरक्षा की व्यवस्था आदि का क्रमिक विकास हुआ. वही हडप्पा सभ्यता कहलायी. हडप्पा सभ्यता में प्राप्त मुहरों (सीलों) का उद्वाचन गोंड़ी भाषा के रूप में किया जा चुका है. अत: हडप्पा सभ्यता के जनक कोयावंशी कोयतुर (गोंड) ही प्रमाणित होता है.

भूमि के निसर्पण (सरकने) के सिद्धांत के अनुसार भूमि का बहुत बड़ा टुकड़ा टूटकर अलग हुआ और उत्तर पूर्व की ओर सरकता गया. इस विसर्पण से टेथिस सागर का जल सागर तट को छोडकर मैदानी भाग में आता गया. इससे महाजल प्लावन (कलडूब) की विभीषिका उत्पन्न हुई. यह उत्तर पूर्व की ओर कोयामुरी व्दीप में सरकने से टेथिस सागर उथला होता गया. सागर में स्थित कीचड़ व दलदल वाला भाग दबाव से उपर उठाया गया, जो कि हिमालय पर्वत श्रंखला पश्चिम से पूर्व एवं दक्षिण से पूर्व की ओर बनता गया. थेटिस सागर समाप्त हो गया. वहाँ हिमालय श्रंखला बन गई. कालांतर में सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र एवं अन्य सहायक नदियों ने जन्म लिया. किन्तु नर्मदा एवं ताप्ती पर्वत बहती रही है. कोयामुरी भूखण्ड आफ्रिका के पूर्वी तट जंजीबार तट से जुड़ा था. वहाँ ये नदियाँ करोड़ो वर्ष पूर्व विक्टोरिया झील में समाहित होती थी तथा अमूरकोट से प्रथम नर-मादा की उत्पत्ति के प्रमाण स्वरूप सर्वाधिक प्राचीन मानव खोपड़ी झील के आसपास ही पाये गए हैं.

अत्यंत प्राचीन काल करोड़ो वर्ष पहले अमूरकोट स्थल से चलकर विश्व के चारो ओर फैले हैं, जो कि विश्व विभिन्न प्राचीन जातियों के डी.एन.ए. टेस्ट से प्रमाणित हुआ कि विश्व में मानव जातियों का विस्तार इसी अमूरकोट स्थल एवं आफ्रिका में विक्टोरिया झील प्रदेश स्थल से होना प्रमाणित है. अत: अमूरकोट कोइतुरों के दाई-दादा का जन्म स्थल है.

जब कोयामूरी व्दीप आफ्रिका जंजीबार तट से जुड़ा था तब नर्मदा ताप्ती नदी का प्रदेश भूमध्य रेखा के पास था. यहाँ भू-मध्य रेखीय जलवायु थी. करोड़ो वर्षों तक यहाँ अत्यधिक वर्षा होती थी. सघन एवं ऊचे-ऊचें वृक्ष थे. घनघोर जंगल थे. इन जंगलों में विशालकाय शाकाहारी डायनासोर निवास करते थे. करोड़ों वर्ष पूर्व भूमि का विसपर्ण (सरकाव) शुरू हुआ तथा कोयामुरी व्दीप का सरकाव शुरू हुआ और अब नर्मदा ताप्ती का प्रदेश २२/१.२ अंश उत्तर पूर्व की ओर सरक गया. तब आमूरकोट कर्करेखा पर स्थित हो गया. इसी अमूरकोट स्थल के जबलपुर शहर की पहाड़ियों में डायनासोर के अनेक अंडे भू-गर्भवेताओं व्दारा माँह जनवरी २००७ में खोज निकाले गये हैं. अंडों का जीवाश्म मिलना प्रमाणित हुआ कि अमूरकोट की सभ्यता कोयतुर सभ्यता है जो कालांतर में हडप्प सभ्यता बन गया.

सिंधु हड़प्पा सभ्यता का विस्तार

सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता में भवन निर्माण योजना, नालियों के निर्माण, स्नानागार का निर्माण ईटों, मिट्टी के बड़े-बड़े घड़े, आयुधों, आभूषणों, मुद्राओं एवं मापतौल के वस्तुओं में लगभग एकरूपता पाई जाती है. गुजरात में उपरोक्त वस्तुओं में समानता पाये जाते हुये भी कुछ नये सामग्रियाँ प्राप्त हुये हैं. १९२१ ई. तक मिश्र नदी, नील नदी की प्रभुता एवं दक्षता उपरोक्त नदियों की समानता से मेसापोमिया को विश्व की उत्कृष्ट नगरीय सभ्यता में गिना जाता था, किन्तु. १९२१ में हडप्पा की खोज राय बहादुर दयाराम साहनी ने एवं १९२२ में मोहन जोदड़ो का राखलदास बनर्जी ने खोज की. इससे तीसरी शताब्दी के महान सभ्यताओं की खोज हुई. सौराष्ट्र के रैगपुर में भी इसी सभ्यता की कड़ी पाई गयी तथा राजस्थान और बहावलपुर में भी नगरीय सभ्यता के उत्खनिज सामग्रियां प्राप्त हुई.

आजादी के बाद १९४७ में लोथल, रोपड़, कालीबंगा, वर्णावलीकक, धौलाकीटा में भी उत्खनन से नगरीय सभ्यताओं के अवशेष मिले. उधर पाकिस्तान में सिंध प्रांत में कोटदीजी, गामनवाला, गावेरीवाला में भी सिंधु सभ्यता के स्थलों की सामग्री मिली.

भारतीय प्रायव्दीप के सुदूर उत्तर में पंजाब प्रांत के रोपड़ को ही उत्तरीसीमा कहा जाता था. खोजों से गुमला सरायखोला नामक पाकिस्तान के स्थल उत्तरी सीमा मानी हैं. नर्मदा घाटी में मेधम, हरेलोद एवं गवभाव तथा तापती नदी के निचली घाटी में मालवण (जिला सूरत) समुद्र सीमा से लगा हुआ है. दक्षिण में महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के संगम पर दाइमाबाद इस सभ्यता की उत्तरी सीमा जम्मू में स्थित मांण्डा तथा जमुना नदी की सहायक नदी हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तरप्रदेश) इसकी पूर्वी सीमा है. यह सभ्यता पश्चिम में मकरान के समुद्री तट करांची से लगभग पचासी कि.मी. पश्चिम में स्थित सुत्कागेंडोर तक विस्तृत है.

पश्चिम में सुत्कागेंडोर से पूर्व में आलमगीर तक लगभग १८०० कि.मी. है और उत्तर में जम्मू में माण्डा से लेकर दक्षिण में दाइमाबाद तक लगभग १४०० कि.मि. है. इस विस्तृत भू-भाग में विशाल नगर (यथा हड़प्पा सभ्यता मोहन जोदड़ो) कुछ कहके यथा रोपण तथा कुछ ग्राम यथा आलमगीरपुर लोथल समुद्री व्यापार का केन्द्र रहा होगा जबकि मकरान के समुद्रतटवर्ती सुत्कागेंडोर, सोत्काकोह और बालकोट ने बंदरगाहों में पश्चिमी एशिया के साथ होने वाले व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी. हाल ही में तुर्कमेनिया क्षेत्र उत्खनन से स्पष्ट हो गया है कि सिंधु सभ्यता का मध्य एशिया के साथ भी सम्पर्क था. इस तरह सिंधु सभ्यता का विस्तार प्राचीन मेसापोटामिया, मिश्र तथा फारस के प्राचीन सभ्यताओं के क्षेत्र में कहीं अधिक था. यदि सभ्यता के विस्तार क्षेत्र को संस्कृति ही नहीं माने जाएँ तो रोमन साम्राज्य से पहले विश्व में शायद ही इतना विशाल राज्य कहीं रहा हो.

पुराविदों ने इस सभ्यता के कुछ नाम सुझायें हैं तथा सिंधु सभ्यता के कुछ नाम सुझायें हैं या सिंधु सभ्यता, भारतीय सभ्यता, वृहत्तर सिंधु सभ्यता, सरस्वती सभ्यता, सिंधु सरस्वती पुरातत्व की परम्परा के अनुसार सभ्यता का नामकरण उसके प्रथम ज्ञात स्थल के नाम पर किया जाना चाहिये. इसलिये इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी अभिहित किया जाता है.

नर्मदा ताप्ती एवं गोदावरी नदियों के कछार में चांवल की कृषि करते हुये, क्रमशः उत्तर की ओर गेहूं उत्पादन के लायक वातावरण वाले क्षेत्र तथा कपास उत्पादन वाले क्षेत्र एवं गुजरात सौराष्ट्र एवं पंजाब सिद्ध की ओर सभ्यता विकसित हुई. चूँकि गोदावरी घाटी के गोंडियन लोग चावल का उपयोग मुख्य भोजन के रूप में करते रहे. इसलिये वस्त्र के लिये सौराष्ट्र को चुना. गेहूँ सिंधु घाटी में उपजाने लगे और अधिक मात्रा में उत्पादन होने से इसका भण्डारण भी करते रहे. अब चूँकि मध्य एशिया के लोंगों का मुख्य भोजन गेहूं तथा अन्य वस्तुओं का लोथल, मकरान, बालाकोट बंदरगाहों से समुद्र मार्ग से व्यापार करने लगे. मध्य एशिया में कड़ाके की ठंड से अनाज उत्पादन नगण्य होने लगा. गेहूं की रोटी की खुसबू आर्यों को सिंधु घाटी की ओर बढ़ने के लिये एवं इसे प्राप्त करने के लिये मजबूर कर दिया. व्यापार एवं उन्नति, वैभवशाली नगर के सीधे लोग, मेहमानों की आवगमन की प्राचीन व्यवस्था ने सभ्यता को समूल नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त किया. किन्तु अब कुछ लुटाकर साहित्य, संस्कृति को स्वाहा होता देखकर अदम्य साहस का परिचय देते हुये हमारी माताओं ने हमे पुनः स्थापित किया. हमे अपने छाती का दूध पिलाया. यही दूध गोंडवाना संस्कृति का सबसे बड़ा गोंडवाना का कर्जा है. इसे ही चुकाने के लिये हम मामा-फुफूँ में शादी-ब्याह स्थापित करने, दूध का कर्ज उतारते हैं. माताओं ने जो हमारी पालन-पोषण, सेवा की है, इसलिये उनको इस सेवा की हम जय जयकार करते हैं. जय सेवा कहते हैं.

हड़प्पा सभ्यता के सुदूर दक्षिण में गोदावरी तट पर पूरा स्थल दाईमाबाद है, जो की वस्तुतः दाऊमाँबाद है. यह अपभ्रंश होकर प्रचलित है. दाऊ याने पिता, माँ याने माता, बाद याने स्थल अर्थात माँ-बाप का स्थल. हमारे पुरखा लोगों का स्थल. हमारे लिंगों जंगों का यही स्थान है. हम कोयावंशी हैं. कोयतुर हैं. माँ की कोख से उत्पन्न हुये हैं. हम अपने दाई के वीर हैं. दाईनोरवीर हैं. जो अब अपभ्रंश होकर द्रविड़ हो गया.

सुदूर उत्तर में जम्मू के पास माण्डा नामक स्थान है, जिसको गोंडी में आशय हिंसक पशुओं की गुफा होता है. मुमला का आशय नीलकंठपक्षी होता है तथा अवरकोट का आशय हल के निचे चीपा के रूप में लकड़ी का गढ़. इसका भावार्थ- गुफाओं में निवास करने वाले कोयावंशियों ने शिकारी व्यवस्था को छोड़कर कृषि कार्य किया और विपुल उत्पन्न प्राप्त किया, जो की नीलकंठ पक्षी की तरह बेजोड़ है. पूर्वी भाग में ‘आलमगीरपुर’ है, जो की हिन्डन नदी के पास है. इसका आशय- यहाँ पर पहाड़ी इलाके में आलू की खेती अच्छी होती है.  पश्चिम भाग में ‘मकरान’ नामक स्थान है. इसका आशय- यहाँ के उथले सागर तट एवं नदियों में छोटी एवं बड़ी मछलियाँ प्राप्त होती रही है.

क्या हड़प्पा संस्कृति गोंड़वाना संस्कृति है ?

संस्कृति का आशय सभाकृति अच्छे कार्य से हैं. वे कौन-कौन से अच्छे कार्य हैं अथवा कार्यकलाप है, जिनसे कोई सभ्यता उत्कृष्टता की सीढ़ी को प्राप्त करता है, ऐसे अनेक पहलुओं पर विश्लेषण आवश्यक है. इनसे यह प्रिपादित होगा कि क्या हड़प्पा संस्कृति या हड़प्पा सिंधु सभ्यता गोंडवाना संस्कृति के समान हैं ?

अब तक प्रचीन पुरातत्वविदों के अध्ययन से मोटे तौर पर जो सिंधु/हड़प्पा लिपियाँ प्राप्त हैं, उनसे सभी ने सही निष्कर्ष निकला है, कि यह दक्षिण पूर्व की लिपि है, किसी ने भी यह साहस नहीं दिखाया कि इस लिपि को गोंडी में उद्वाचित किया जाता है. इस दिशा में डॉ. मोतीरावण कंगाली की कृति-‘सैधवी लिपि की गोंडी में उद्वाचन’ एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है. अब हड़प्पा की लिपि को गोंडी में उद्वाचित कर पढ़ा जा सकता है. तब निःसंदेह द्रविण पूर्व की भाषा, गोंडी है, जो कि आज भी प्रचलन में है. अत: हड़प्पा संस्कृति गोंडी-संस्कृति ही कही जावेगी.

नगर विन्यास एवं स्थापत्य

हड़प्पा सभ्यता के नगर विश्व के प्राचीनतम सुनियोजित नगर हैं. अधिकांश नगर सुरक्षा दीवारों से चारों ओर घिरे हुये थे, ऊचें स्थान को जिसे गढ़ी कहते हैं, गोंडी में आज भी प्रचलित भाषा में टिकरापारा कहा जाता है तथा इसके निचले नगर को खाल्हेपारा से संबोधित किया जाता है.

नगर तथा नगर में घर/कमरे निर्माण में वायु प्रकाश, नाली, सड़क की सुविधा को ध्यान में रखा गया है. सडकें १० मीटर चौड़ी मिली है. नगर/घर में स्नानागार महत्वपूर्ण है. तदनुसार गंदे पानी की निकासी के लिये नालियां बनी हैं. मकान में अनाज रखने की कोठियां बनी है. गंदे पानी के नालियों से बहने की व्यवस्था सिंधु सभ्यता में अत्यंत सुन्दर ढंग से किया गया है. ऐसा उदाहरण विश्व में इस सभ्यता के बाद शताब्दियों तक नहीं मिलतें है. लोग साफ सफाई पसंद के थे. हड़प्पा में अन्न भंडारण की कोठियां तथा अनाज को कूटने एवं पीसने की व्यवस्था रही है. आज भी गोंड समुदाय के लोग सामूहिक रूप से अनाज लूटने के लिये घर में विषेश प्रकार “ढेंकी” का उपयोग करते हैं. पीसने के लिये “जाता” का उपयोग करते हैं “मुसल” एवं “बाहना” का उपयोग व्यक्तिगत/अकेले व्यक्ति के व्दारा अनाज कूटने के लिये अभी भी किया जाता है. किन्तु मशीन युग में अब यह प्रथा समाप्त हो रही है. मोहन जोदड़ो में सार्वजनिक विशाल स्नानागार जो कि लगभग ५५,३३,२३३ मीटर के माप के हैं. ऐसा जलाशय गोंडवाना में चन्द्रपुर, सिंगौरगढ़, देवगढ़, नामनगर (मोतीमहल) आदि में आज भी स्थित है. नौशेरों चहुदड़ों में ईंट पकाने की बड़ी-बड़ी भट्टियां मिली है. लोथल में बंदरगाह, अन्नागर, जहाजों में सामान लादने की गोदियां मिली हैं. धौलावीरा में अनेक कुएं एवं विशाल जलाशय बने हैं जैसा कि- रायपुर का बुढातालाब, भोपाल सागर और आधारताल. गोंडवाना में धार्मिक अनुष्ठान एवं पेयजल व्यवस्था हेतु कुएं तालाब बनाने की परंपरा थी. धौलावीरा, सुरकोटला एवं अलीबंगा में राजा, मुखिया, पुजारी, अधिकारी रहा करते थे, जैसा कि धौलावीरा के लेख जो कि दस शब्दों के उद्वाचन से प्रतीक होता है. इसके भवन सुरक्षित एवं संरक्षित बनाये गये हैं. वणावी में व्यपारी वर्ग के लिये विशेष मकान, व्यापार, व्यवसाय की व्यवस्था करने वाले अधिकारी के माकन भी बने है.

पाषाण मूर्तियाँ

मोहन जोदड़ो में जो पाषण मूर्तियाँ मिली है, उन्हें लेखकों ने पुरोहित/पुजारी कहा है. वस्तुतः वे कोइतुर राजा हैं, जिसके चेहरे चौड़े, होठ मोटे, नाम चपटा, आँखे, खुली हुयी भाषा है. दाहिने बांह में एवं माथे में सिक्का/सील बंधा है, जो कि अलंकरण सामाग्री नहीं हैं. इसके पद प्रतिष्ठा के अनुकूल यह पट्टी सिक्का नुमा बंधा हैं. गोलतीर पत्तियों वाली छाप की किनारी का शाल ओढ़े हैं, जो बाएं कंधे को ढंका हुआ है. चेहरे का भाव किसी प्रश्न के उत्तर देने की प्रत्याशा में गंभीरता से प्रश्न को सुन, समझ रहा है तथा किसी प्रश्न का उत्तर देने हेतु या आदेश निर्देश हेतु तत्पर सा है.

हड़प्पा में जो बिना सिर की मूर्ति प्राप्त हुई है वह उपर की गले से उपर पुरुष आकृति एवं गले से निचे स्त्री आकृति की है. संभावना व्यक्त की गई है कि यह शिव एवं शक्ति की सम्मीलित प्रतिमा है. गोंडवाना की जंगो-लिंगों या शंभुशेक की शिव-पार्वती की सम्मिलित अवस्था की मूर्ति है. शंभुशेक इतने शक्तिशाली थे कि वे अपने को अर्द्धनारीश्वर के रूप में नटराज नृत्य करते हुये प्रकट कर सकते थे. यह पितृशक्ति एवं मातृशक्ति का सम्मिलित रूप ही है.

कास्य मूर्तियाँ

मोहनजोदड़ो से कांस्य धातु से निर्मित नग्न स्त्री की आकृति प्राप्त हुई है. जिसका दाहिना हाथ कमर पर अवलंबित है तथा इसमें दो चूड़ी कलाई में एवं दो कोहनी के उपर भुजा पर अलंकृत है. बायां हाथ बाएं घुटने में टिका है. हाथ में कोई पात्र है. पात्र का उपयोग संभवतः नृत्य के उपरांत इनाम या भेटराशी प्राप्त करने हेतु किया जाता होगा. एक हाथ में कोहनी से ऊपर सम्पूर्ण भुजा में चूड़ीयां पहनी है. गले में तीन गुटियाँ वाला कंठहार है. केश पीछे कि ओर गोलाई में बांधकर रखा गया है. माथा चौड़ा, नाम चपटी, होट मोटे आँखे आधी खुली हुयी है. चेहरे पर मुस्कान भाव नहीं हैं. पुराविद मार्शल कहतें हैं- यह किसी आदिवासी युवती का चित्रांकन है.

मिट्टी की मूर्तियाँ

यहां प्राप्त मिट्टी की मूर्तियाँ अलंकृत हैं. घुटने से ऊपर तक पहनावा है. कमर में कमरबंध अलंकृत है. यह पहनावा सुदूर बस्तर के माडिया स्त्रियों की तरह का है. छोटे बच्चों की मूर्तियाँ भी अलगढ़ रूप में मिली है. यह दर्शाने का प्रयास किया है कि माटी कि कोख से बच्चों की उत्पत्ति हुयी है. उन्हें माता ही संरक्षक के रूप में पालती पोसती है, मातृदेवी है. इनके साथ पशु पक्षियों की आकृतियाँ भी प्राप्त हुई है.

मुद्रायें मुद्रा छापे

हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो से जो मुद्रायें एवं शील प्राप्त हुयी है और उनमे जो लिपि लिखी है साथ में चित्र भी दर्शाया गया है. उसके साथ ही गोंड़ी उद्वाचन से यह स्पष्ट हो गया है कि हड़प्पा संस्कृति गोंडवाना संस्कृति है. इसमें शांम शंभु, शंभुशेक, मातृदेवी, फिरकियाँ, पारी कुपार लिंगों की चित्रलिपि अत्यंत महत्वपूर्ण है.

मनकें

पत्थरों को काटकर तराशकर चाहुदड़ों में मनकें बनाये जातें थे. एवं व्यपार किया जाता था. आज भी आदिवासी बहुल ग्रामीण अंचलों में छोटे बच्चों को मनके पहनाये जाते हैं कहीं-कहीं माड़ीया महिलाएं भी मनकें पहनती हैं. अब यह समाप्त प्राय हो गया है.

मृदभांड़

अब तो हम स्टील धातू के बर्तनों का उपयोग करने लगे हैं, किन्तु आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने, पानी भरने में किया जाता था. उन्हें चित्रित भी किया जाता था. कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन हड़प्पा सभ्यता में प्राप्त हुये हैं.

औजार

उपयोग के लिये धातु, पत्थर के औजार एवं उपकरण, मिट्टी के उपकरण, हाथी दांत के उपकरण की यह अवस्था आज भी कोयतुर समाज में है.

 वर्तमान ग्रामीण क्षेत्रों में आज परंपरागत ढंग के औजार, कारीगरी, मिस्त्री, बढ़ई, सोनार, सुतार, सोनझरा, जनजातियों के उपकरण, शिकारी जनजाति के उपकरण, बंसोड कंडरा समाज के उपकरण, मछुवारे समाज के उपकरण पाये जाते हैं. हड़प्पा की यह व्यवस्था आज भी कोइतुर समाज में प्रचलन में है.

जाति निर्धारण

मोहन जोदड़ो से प्राप्त कंकालों के परीक्षण में चार प्रकार की जातियां निर्धारित की गई है-
१)                  आध आस्ट्रेलायड- नाटे कद, खोपड़ी सकरी व लंबी, नाक चौड़ी, चपटी ठुड्डी बाहर की ओर निकली हुई, रंग काला, बाल काले घुंघराले. उक्त सभी गुण जनजातियों में पाये जातें हैं, श्रीलंका, की बेड्डा जनजाति इसी वर्ग में आतें हैं.

२)                  भूमध्य सागरीय- खोपड़ियां कुछ लंबी, नाक छोटी व नुकीलीपूर्ण है.

३)                  मंगोलजाति – कोई बाहरी व्यक्ति सैनिक थे.

४)                  अल्पाइन जाति – इनमे से आधे आस्ट्रेलायड व हड़प्पा सभ्यता के जनक थे. दक्षिण भारत में इस प्रकार की जनजातियां आज भी निवासरत है. वर्गभेद में नगर के गढ़ी में शासक वर्ग तथा निचले सागर में सामान्य जन रहते थे.

राजनैतिक सत्ता

मोहन जोदड़ो, हड़प्पा एवं धौलावीरा सभ्यता के प्रमुख नगर एवं राजधानियाँ रही है धौलावीरा से प्राप्त दस अक्षरों के लेख से स्पष्ट होता है कि वो राजधानियों का शासक/राजा का यह नगर है. इतिहासकार कुषाण वंश का नामकरण क्योंकर किये हैं, छठवी शताब्दी के पूर्व सोलह जनपद का पाया जाना, कुषाणवंश की दो राजधानी पेशावर एवं मथुरा, मौर्यवंश के सम्पूर्ण भारत में प्रमुख सम्राट अशोक का बैल व शेर की आकृति वाले पत्थर की चिन्ह यह सभी बातें स्पष्ट करती है कि इतिहास विशेषकर प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में हड़प्पा संस्कृति को जोड़कर नहीं देखा गया है. बाहरी आक्रमण से हडप्पा के लोग भागकर कहाँ गये ? विश्व की एक मात्र नगरीय सभ्यता कहाँ विलुप्त हो गई ? इसी बात को इतिहासकार नहीं बता पाये है. जबकि कुषाण का पुत्र सांढ़, सोलह्त्र नौ, अठारह जनपद, अठारह भाइयों का गढ़ सम्राट अशोक चिन्ह का बैल, मौर्य का मुरा (पह्यों की धुरी) या पहिये की धुरी पर आश्रित सोलह नाग आरे, यह सभी शब्द हड़प्पा के पशुपति की ओर इशारा करते हैं, हड़प्पा संस्कृति है. इसे इतिहासकारों ने स्वेच्छा से जानबूझकर सत्तासीन लोगों के विरोध की वजह से बदल दिया गया है, परिवर्तित कर दिया गया है. यह क्यों बदला गया है ? यह शोध का विषय है.

धार्मिक विश्वास और अनुष्ठान

गोंडवाना संस्कृति में मंदिर नहीं होता है. हडप्पा संस्कृति में भी देवालय,  मंदिर नहीं पाये गये हैं.  सल्ले गागरां के पुजारी बड़ादेव, मातृदेव के उपासक हडप्पा सभ्यता के लोग संभवतः चैत्र नवरात्र एवं अक्षय तृतीय जैसे पावन पर्व पर सूर्योदय से पूर्व एक साथ सम्पूर्ण नगरवासी स्नान कर सकें, ऐसे स्नानाकर बनाये गये थे.

हडप्पा सभ्यता के लोग वृक्ष पूजा करते थे. पशु पूजा पशु बली देते थे गोंडवाना में साजा वृक्ष में बड़ादेव की स्थापना व पूजा की जाती है.

आर्थिक जीवन

हडप्पा सभ्यता के लोग कृषि कार्य करते थे. पशुपालन करते थे. मछली पालन बदख, मयूर का पालन करते थे. मुख्य रूप से अनाज कपास, कपड़े सूत का व्यापार करते थे. महिलाएं आभूषणों लगे में मनके की माला पहिनते थे, जैसे की आज भी बैगा जनजाति की महिलाएं पहनती है. आमोद-प्रमोद के साधन में पासे का खेल, गोलियों का खेल खेला जाता था. मनोरजन हेतु मांदर, ढोल, बजाकर नृत्य गायन किया जाता था. आज भी बस्तर के सुदूर अंचलों में मांदर एवं ढोल की थाप पर नृत्य किये जाते हैं. आज भी हम गौरा-पार्वती के विवाह को मनाते हैं. गौरा शिव की सवारी बैल एवं गौरी की सवारी कछुआ बनाकर गोंडवाना संस्कृति में धारण किये हुये हैं.

शव वित्सर्जन

मोहन जोदड़ो में शवों को जलाये जाने का बोध नहीं होता है. किन्तु हडप्पा में गोंडवाना के रीतिरिवाज अनुरूप शव का सिर उत्तर की ओर व पैर दक्षिण की ओर रखकर पीठ के बल लिटाया जाता था तथा सिर एक तरफ पूर्व की ओर मुड़ा हुआ होता था. इसके अतिरिक्त एक क्रम से शवों को क्रमशः दफनाया गया पाया गया. संभवतः यह किसी गोत्र विषेश के लोगों का कब्र हो. शवों के सिर के पास ही मिट्टी के पात्र पैर की तरफ दिया या दीपक रखे पाए गये हैं. बर्तनों के खाद्य सामग्री, मृतक के दैनिक उपयोग की वस्तुएं, चूड़ी, अंगूठी मनकेहार आभूषण मिले हैं. शवों को जलाने की प्रथा आर्य लोगों की मुख्यतः है, ऐसा लगता है. आर्य जन यहाँ आकर बस गये व्यपार आदि मोहनजोदड़ो से करने लगे.

सभ्यता का अंत: सभ्यता का संस्कृति के उदभव एवं पतन ठीक-ठीक कारण ज्ञात करना अत्यंत कठिन है. अनेक कारण हो सकतें हैं. यथा प्रकाशनिक शिथिलता, व्यापार की अवनति, नैतिक पतन, वनों की कटाई, जलवायु में परिवर्तन, नदियों का मार्ग बदलना, भीषण बाढ़, जलतल का ऊपर उठना, समुद्र तटीय भूमि का ऊपर उठना, बाहरी आक्रमण आदि. आर्य. लोग एशिया माइना के अजखेन नामक स्थान में निवास करते थे. ऋग्वेद की रचना व्दितीय शताब्दी के मध्य हुयी. वीलर के अनुसार- सिंधु सभ्यता के विनाश के लिये आर्ये को उत्तरदायी मानते हैं. पतन लम्बे समय तक क्रमशः और विनाशक था. हडप्पा की पहचान ऋग्वेद के हरियूपिया नगर के मान्य की जाती है.
अंत में वे प्रमुख कारण या सार जिससे हडप्पा संस्कृति को गोंडवाना संस्कृति कह सकतें हैं-

·       १. वे लोग देवी देवता की पूजा करते थे.

२. वे लोग माता शक्ति के पुजारी थे.

३. वे लोग शिवपशुपतिनाथ (बड़ादेव) के उपासक थे.

४. वे लोग सल्ले गागरां की पूजा करते थे, शिवलिंग पूजा करते थे.

५. वे लोग विषेश आसन लगाकर पूजाकार्य में बैठते थे. योगसन जानते थे.

६. वे लोग पूजा के पूर्व माता सेवा के लिये सामूहिक स्नान किया करते थे.

७. वे लोग विभिन्न देव, देवी शक्ति के लिये अलग-अलग ध्वज/झंडे का उपयोग करते थे.

८. वे लोग पृथ्वी के दायें से बायें घूमने एवं सिंधुलिपि दायें से बायें की प्रथा के प्रतीक हेतु “फिरकी चक्र” चिन्ह दाहिने से बायें ओर घूमता हुआ, उपयोग पूजा स्थल पर करतें थे.

९. वे लोग बिदरी प्रथा, ब्याह करने कि पूजा रात में, बिना वस्त्र धारण करते थे जैसा की बैगा समाज में आज भी प्रचलित है.

१०. वे लोग पशुओं का सम्मान करते थे. सांडिया सृश्य आदर करते थे.

११. वे लोग पूजा कार्य अनुष्ठान में पशुबलि एवं कहीं-कहीं, कभी-कभी युद्ध में नरबलि भी देते थे.

१२. वे लोग वृक्षों की पूजा करते थे. यथा साजा वृक्ष में बुढादेव की स्थापना, सेमर वृक्ष में पारी कुपार लिंगों की स्थापना.

१३. वे लोग ताबीज को रक्षा कवच के रूप में धारण करते थे.

१४. वे लोग शक्ति की पूजा करते थे. नवरात्रि आदि में अग्निकुण्ड बनाकर अस्कनी पूजा करते थे.

१५. वे लोग बाघों के पुजारी थे. तीन बाघों को एक-एक करके चित्रण किये. सारनाथ सम्राट ने अपना राज्य चिन्ह बनाया. अशोक चक्र का बाघ छैदैया “जगत” का पशुओं के रूप में इष्टदेव होता है. अत: नाम भी बाघदेव, बघधरा गोंडवाना में रखा जाता है.

१६. वे लोग अपने घर की छत को नुकीला बनाते थे तथा घर के बीच में आंगन और चारो तरफ, मकान बनाते थे. गोंडवाना की यही परंपरा है.

१७. वे लोग गढ़ी के चारो ओर ऊंची दीवारों से घेरकर बनाते थे. जैसा कि सिंग्रामपुर का      दलपतशाह के सिंगोरगढ़ का किला.

१८. वे लोग सामूहिक स्नानागार बनाते थे. जैसे चन्द्रपुर तथा गोंडवाना के राजधानी में बने स्नानागार.

१९ वे लोग परिवहन के लिये बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे.

२०. वे लोग हाथी पालते थे. रानी दुर्गावती की सफेद हाथी “सरवन” मुगल गोंडवाना युद्ध का का एक कारण बना था.

२१. वे लोग बांह पर चूड़ी पहनते थे. राजस्थान के मीना जनजातियों में प्रचलित है.

२२. वे लोग बच्चों को मनके, कौड़ी, आदि पहनाते थे. आज भी गोंडवाना में पहनाया जाता है.

२३. वहाँ की स्त्रियां घुटने तक का कपड़ा लपेटकर, साड़ी, कपड़ा पहनती थी. अधोभाग खुला होता था, आज भी बस्तर में प्रचलित है.

२४. वे लोग केश सज्जा हेतु ककई, ककवा (कंघी) का उपयोग करते थे. आज भी ककई, ककवा (कंघी) प्रचलित है.

२५. वे लोग घड़ों पर चित्रकारी करते, आज भी गौरा पूजा में कलस को चित्रकारी से सजाते हैं.

२६. वे लोग शवों को दफनाते थे. सिर उत्तर एवं पैर दक्षिण में. गोंडवाना रीतिरिवाज अनुसार सिर को थोड़ा सा पूर्व की ओर घुमाकर दफनाते हैं.

२७. वे लोग केश विन्यास में बालों का खोपा बनाते थे, जो कि आज भी बस्तर एवं उड़ीसा में प्रचलित है.
२८. वे लोग कमर में करधनी पहनते थे. आज भी करधनी का रिवाज है.
२९. वे लोग देव पुजारी को सिरमौर से सजाते थे. आज भी सुदूर बस्तर में नर्तक दल के नायक गौर के सींग से सिंगमौर बनाकर पहनते हैं.
३०. वे लोग नृत्य करते समय मांदर का उपयोग करते थे. यह वाद्य यंत्र आज भी झारखंड, मध्यप्रदेश, छ्त्तीसगढ़ के बस्तर आदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित है.
३१. वे लोग मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे. आज भी खाना बनाने, रोटी बनाने, झकने के बर्तन-तवा, तलई, परई, गघरी, गंगार, कुडेरा, हांड़ी प्रचलित है.
३२. वे लोग शवों को दफनाते समय उसके साथ हंडी में भरकर खाद सामग्री एवं जरूरत की चीजें रखते थे. आज भी रखते हैं.
३३. वे लोग अपने कान में छेद कराते थे. पुरष लुरकी या स्त्रियां खिनवा (कर्णफूल) पहनती थी.
३४. वे लोग सेमल से वृक्ष के देवता की पूजा करते थे. इस अवसर पर नृत्य भी करते थे सर्व सगा समाज मानते थे. उनके सभी अपने ध्वज होते थे, जिन्हें हम सप्तरंगी ध्वज कहते हैं.



साभार अभिनंदन ग्रन्थ

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

भारत के एतिहासिक बलिदानी महाराजा शंकरशाह एवं कूँवर रघुनाथशाह




भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आजादी के दीवानों व क्रांतिकारियों को अमानवीय सजा व फासी पर लटकाने के अनगिनत उदाहरण दर्ज हैं, किन्तु किसी क्रांतिकारी को तोप के मुहाने में जीवित बांधकर गोला बारूद से उड़ा देने की देश में यह पहली घटना थी. महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह सिर्फ विद्रोही ही नहीं बलिक एक समृद्धशाली राजवंश के शासक भी थे. मराठों और भोसलों राजघरानों ने मिलकर गोंड राजवंश को समाप्त करने का षड्यंत्र किया, जिससे गोंड साम्राज्य कमजोर हुआ परन्तु अदम्य साहस व वीरता के प्रतीक महाराजा शंकरशाह ने घुटने नहीं टेके और जबलपुर डिविजन में अंग्रेजों के खिलाफ अपने बल बूते पर सशस्त्र बगावत खड़ी कर दी. भारतीय राजघरानों को आपस में लड़वाकर अंग्रेजों ने भारत को अंततः पूरी तरह गुलाम बना डाला. गढ़ा मंडला के शक्तिशाली साम्राज्य के साथ मिलकर यदि मराठों और भोसले राजघरानों ने संयुक्त रूप से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा होता तो १८५७ में ही अंग्रेज भारत से भाग जाते. १८ सितंबर की तारीख स्वतंत्रता आंदोलन की एकलौती ऐतिहासिक घटना है, जिसमे गोंडवाना साम्राज्य के शूरवीर राजा व कुँवर दोनों को तोप के मुहाने पर बांधकर तोप चला दिया गया, जिससे गोंड वंश के सपूतों के चीथड़े उड़ गए. आदिवासियों की ऐतिहासिक शहादतों को शहीदे आजम भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसा राष्ट्रीय सम्मान क्यों नहीं मिला ? यह चिंतन हमें करना चाहिए.
जबलपुर में स्वतंत्रता संग्राम का बीजारोपण राजा शंकरशाह के द्वारा किया गया था. राजा शौर्य, निर्भीकता, साहस और संकल्प के प्रतिमूर्ति थे जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरूद्ध खड़े हुये थे. राजा के संघर्ष को जानने के लिए अतीत को देखना होगा. राजा शंकरशाह के पिता सुमेदशाह थे, जिन्हें पदच्युत करके नरहरीशाह दूसरी बार राजा बने थे. राजा नरहरीशाह (१७७६-१७८९) निःसंतान थे. बैशाख संवत १८३९ (अर्थात सन १७८२) को सुबह के वक्त जब राजा नरहरीशाह नहाने जा रहे थे तब राह में नर्मदा तट पर उन्हें लावारिस बालक मिला. रानी ने बालक को गोद में लिया और उनका नाम नर्मदा बक्श रखा. नर्मदा बक्श ने बाल्यकाल गढ़ा में बिताया और बालिग होते ही वह कहीं भाग गया. रानी ने खोज करवाया पर वह नहीं मिला तब उसने राजा शंकरशाह के पुत्र रघुनाथ शाह को गोद ले लिया. उस समय राजा शंकरशाह सागर में रहते थे. राजा नरहरीशाह की १७८९ ई. में मृत्यु होने पर राजा शंकरशाह गढ़ा की गद्दी के लिये प्रयास किया. उन्होंने १८०९ में मराठों के विरोधी आमीरखान पिण्डारी से सहायता ली और गढ़ा पर अधिकार कर लिया. सन १८१८ में गढ़ा की गद्दी पर बैठकर स्थानीय जमीदारों के सामने अपने को राजा घोषित किया. कुछ वर्ष बाद सन १८४१ को नर्मदा बक्श और और रघुनाथ के बीच जायदाद को लेकर विवाद शुरू हुआ और अंग्रेजों को दो विरोधियों के बीच घुसने का मौका मिल गया.
कैप्टन विलियन होड़ की अदालत में मुकदमा केस न. १०८ दि. १०.०८.१८४२ दर्ज हुआ मुकदमा चला और नर्मदा बक्श के पक्ष के फैसला दिया गया. रघुनाथशाह को पेंशन निश्चित कराने के लिए कमिश्नर के यहाँ अपील करने का निर्देश दिया गया. यह फैसला सोची समझी रणनीति के तहत था, जिसमे वास्तविक उतराधिकारी को बेदखल करना था तथा नर्मदा बख्श को फुसलाना था. यद्यपि दोनों पक्ष अंग्रेजी आँखों की किरकिरी थे तथा दोनों को मण्डला के किले से हटाना था. इस फैसले से एक पक्ष के राजा शंकरशाह और कुँवर रघुनाथशाह को उनके मण्डला के किले के उतराधिकार से वंचित कर दिया गया. राजा सुमेदशाह तिलकधारी राजा थे. जब भोसलों ने युक्तिपूर्वक नरहरीशाह को गद्दी के लिए उकसाया तब सुमेदशाह घर और बाहर शत्रुओं की फ़ौज देखकर नरहरीशाह को सत्ता सौपने राजी तो हुए, परन्तु इसके पहले अपने किशोर पुत्र शंकरशाह (१८ वर्ष) को युवराज के पद पर अभिषिक्त किया और कुलदेवी माला से आशीर्वाद दिलवाया था.
राजा शंकरशाह ने अंगेजों की वफादारी करके या थैली भेंट करके राजा का पद प्राप्त नहीं किया था. अत: विलियम होड़ की अदालत के फैसले से राजा शंकरशाह अप्रसन्न हुए. वे अंग्रेजों को सबक सिखाने की योजना बनाने लगे. कुछ ही दिनों बाद अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ बड़े नगरों में विद्रोह होने की सूचना मिलते ही उनके क्रोध को हवा मिलने लगी. जबलपुर और आस पास के इलाकों में सन १८५७ की जनवरी माह से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ विद्रोह की भूमिका बनाने के लिये अठवाइन (पूडियां) भेजी जाने लगी थी. चपातियों के साथ इस आशय की सूचना भी होती कि भविष्य में आकस्मिक और भयंकर घटना के लिये सजग रहे. सन १८५७ में जबलपुर संभाग के विद्रोहियों का नेत्रत्व राजा शंकरशाह ने स्वयं संभाला. उस वक्त जबलपुर की स्थिति झाँसी, कानपुर, अवध तथा मेरठ की तरह थी. जबलपुर की ५२वी पल्टन राजा शंकरशाह से मिल गई. इसी बीच अंग्रजों ने पल्टन के सिपाहियों को ऊँचा पद देने का प्रलोभन दिया साथ ही ईसाई धर्म स्वीकारने वाले को तत्काल हवलदार बनाने की पेशकश की गई. इस प्रस्ताव को सैनिकों ने नकार दिया.

असंतुष्ट सैनिकों एवं ठाकुर-जमीदारों की गुप्त बैठकें राजा शंकरशाह के नेत्रत्व में सम्पन्न होने लगी और विदेशी सत्ता को परास्त करने की योजनाएं यहाँ बना करती थी. राजा के सहयोगियों में ठाकुर कुन्दनसिंह (नारायनपुर, बघराजी), जैसिंहदेव, जगतसिंह (बरखेड़ा), मुनीर गौसिया (बरगी), भीमकसिंह (मगरमुहा), शिवनाथसिंह, उमरावसिंह, देवीसिंह, ठाकुर खुमानसिंह (मोकासी), रानी रामगढ़, बलभद्रसिंह, राजा दिलराज सिंह (इमलई), राजा शिवभानुसिंह (बिल्हरी), ठाकुर नरवरसिंह, बहादुरसिंह और कुछ मालगुजार तथा ५२वी पल्टन के ठाकुर पाण्डे और गजाधर तिवारी प्रमुख थे.
राजा शंकरशाह के पुरखों ने इसी जनता के भरोसे विशाल गोंडवाना साम्राज्य का संचालन किया था, वही जनता उनसे उम्मीद कर रही थी. उनकी गोंडी सेना मराठा काल में समाप्त कर दी गई थी. सैनिक और उनके सेनानायक भी गुजर गये थे, परन्तु उनके वारिसों के घरों में पुराने जंग लगे अस्त्र-शस्त्र अब भी मौजूद थे. सैनिकों की वारिसों को संकेत कर दिया गया था कि वे अपने पुरखों के कौशल को न भूले. वे सभी अवसर निकालकर राजा से मिल लेते थे. कुछ तो रानी फूलकुंवर देवी से धनुष-बाण, बंदूक, तलवार, गुफान और गुलेल का प्रशिक्षण भी प्रप्त कर रहे थे. रानी की सेना में गुरिल्ला टुकडियां भी थीं, जो कठिन जगहों में लड़ने में समक्ष थीं. साथ ही सागर, जबलपुर, मण्डला, नरसिंहपुर जिले के गोंड मालगुजारों, जमीदारों का राजा से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से संपर्क भी बना रहता था. यह सब देख अंग्रेज सरकार डर गई और विद्रोहियों के दमन के लिये फ़ौज दस्ता बुलवाई. जिसमे –
दस्ता न. एक- ०४ थी पल्टन मद्रास केलेवरी (घुड़सवार)– कप्तान टाटेनमोह.
दस्ता न. दो- ३३ वी पल्टन नेटिव इन्फेंट्री (पैदल सेना) फ़ौज– कप्तान कर्नल मिलर.
दस्ता न. तीन– वेटरी आफ फिल्ड आर्टिलरी (तोपखना दस्ता)– कप्तान जोंस.
दस्ता न. चार– नागपुर इरेग्यियुलर फ़ौज– कप्तान पेरीरा. 
१८५७ में समूचे देश में क्रांति की लहर फ़ैल चुकी थी. राजा शंकरशाह के महल में जमीदारों, मालगुजारों, बुद्धिजीवियों व ५२वी पल्टन के सिपाहियों की बैठकें होने लगीं, जिसकी सुचना ११ जुलाई १८५७ को जबलपुर इंचार्ज अंग्रेज को मिली. उन्होंने यह सूचना डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट क्लार्क व कमिश्नर मेजर एर्स्किन को दी. सितम्बर १८५७ के प्रारम्भ में केप्टन मोक्सन को ५२वी पलटन के एक पंडित और एक सिपाही के माध्यम से सूचना मिली कि उनकी टुकड़ी के कुछ सिपाही राजा शंकरशाह से मिलकर षड्यंत्र रच रहे हैं, कि सारे अंग्रेजों को मार डाला जाय. इस खबर की जानकरी ली गई तो पता चला कि पलटन के ८-१० सिपाही और कुछ जमीदार लोग राजा व उनके लडके रघुनाथशाह से मिलकर गुप्त मंत्रणा करते रहे. खुशालचन्द नामक गद्दार, राजमहल की सभी जानकरी अंग्रेजो को देता रहता था.    
१८५७ में विद्रोह के निर्णायक क्षणों में सेठ खुशालचन्द ने मेजर एर्सकाईन को घुड़सवार सेना खड़ी करने के लिये बड़ी रकम अग्रिम दी. इतना ही नहीं, अपितु १८५७ के वर्षाकाल में उसने पूरी अंग्रेज सेना को खाद्यान्न की आपूर्ति की. यह स्थानीय स्तर पर मदद रही. कानपूर और लखनऊ पर आक्रमण करने इलहाबाद से जाने वाली अंग्रेज सेना को परिवहन के साधन हेतु खुशालचन्द ने बहुत बड़ी रकम दी. खुशालचन्द के गाँव वालों ने विद्रोहियों को पकड़ने में और मारने में मदद की. खुशालचन्द इस सेवा के लिये उसे गव्हर्नर जनरल द्वारा शाल की खिलत, सोने का तमगा और परवाना दिया गया. उसके दो पुत्र हुये सेठ गोकुलदास और सेठ गोपालदास. चाटुकारों से सूचना मिलने पर पुख्ता जानकारी के लिए लेफ्टिनेंट क्लार्क ने अपना वफादार चपरासी भद्दूसिंह को नकली फकीर बनाकर राजमहल भेजा. उस समय मऊ, मेरठ, दमदम, बैरकपुर व छावनियों में क्रांतिकारी साधू, फकीर विभिन्न प्रकार के वेश और रूपधारण करके क्रांति का कार्य करते थे. राजा शंकरशाह इसी धोखे में रहे और अपना उद्देश्य बता बैठे. उस नकली फकीर ने राजा से भेद लिया और आकर जानकारी दी कि क्रांतिकारी अंग्रेज साहबान को जान से मारने व खजाना लूटने का मन बना चुके हैं.
सशंकित अंग्रेज अफसरों ने गुप्त मीटिंग की और योजना बनाकर क्लार्क के नेत्रत्व में घुडसवारों तथा पैदल सैनिक दस्ते भेजकर राजमहल घेर लिया और १४ सितम्बर १८५७ ई. को राजा शंकरशाह युवराज रघुनाथशाह व १३ अन्य क्रांतिकारीयों को बंदी बनाकर केन्टोनमेंट के मिल्टरी जेल में डाल दिया. रानी फूलकुंवर देवी अंग्रजों की आखों में धूल झोंककर महल से निकलकर क्रांतिकारीयों का नेत्रत्व करने लगी. राजा शंकरशाह और उनके साथियों के पकड़े जाने की यह घटना इतनी तीव्र गति से घटी जिसे क्रांतिकारी समझ नहीं पाये. कुँवर रघुनाथशाह अपने पिता की तरह देशभक्त और मात्रभूमि के लिये जान निछावर करने वाले युवक थे. राजा शंकरशाह अंग्रेजों के आशय को जानते थे, भविष्यफल के जानकर राजा ने अपने बेटे से कहा– बेटा रघुनाथ अपने पीछे ऐसा नाम छोड जाओ कि आने वाली अनंत पीढियां तुम्हारे स्मरण में अपने को शुद्ध करती रहें. राजा शंकरशाह की गिरफ्तारी पश्चात राजमहल की तलाशी की गई तो राजमहल से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के ढेरों दस्तावेज मिले, जिसमे राजा की लिखी हुई एक कविता भी थी जो इस प्रकार है :–

मूंद मुख दंडिन को, चुंगलों को बचाई खाई,
खूंद डार दुष्टन को, शत्रु संघारिका |
मार अंग्रेज रंज, कर देई मात चण्डी,
बचै नहीं बैरी, -बाल बच्चे संहारिका ||
संकर की रच्छा कर, दास प्रतिपाल कर,
दीन की पुकार सुन, जाय मात हालिका |
खायले मलेच्छन को, झैल नहीं करो मात,
भच्छन कर तच्छन, दौर माता कलिका ||
कविता के द्वारा आराध्य देवियों की स्तुति जिसमे अंग्रेजी हुकुमत को नष्टकर सत्ताहीन होने की अर्चना की गई थी. इसी को आधार मानकर जबलपुर के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में राजा व युवराज पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और सजा ए मौत सुना दिया गया. दिनाँक १८ सितंम्बर १८५७ को क्वांर माह की अमावश के दिन ठीक ११ बजे सूर्य ग्रहण का समय था. पिता व पुत्र को तोप के मुहाने पर बाँध कर तोप चला दिया गया और उसी दिन उनकी सम्पत्ति राजसात कर ली गई. राजा के हथियार जिनमे तलवार, ढाल, फरसा, कुल्हाड़ी, दोधारी तलवार, नेजा, किरचें, जाली बख्तर, (लोहे के जालीदार कवच), सिरस्त्राण (सिरटोप), बंदूक, तोप आदि सब जब्त कर लिये गये.
जनमानस में तोप के संबंध में अभी भी एक किवंदती ताजी है. कहतें हैं, जब अंग्रेजी तोप नहीं चली वह फुस्स हो गई तब राजा ने मात्रभूमि की रक्षा के लिये प्राण देना निश्चय किया और स्वयं अपनी पुश्तैनी तोप लाने को कहा जो ३० इंच व्यास की नली वाली थी तथा चोखे लोहे की ढाली गई थी.
रानी फूलकुंवर देवी के लिये यह असहनीय पल था. पति और पुत्र को खोने के बाद भी वह क्षत्राणी वेष बदलकर अपने साथियों के साथ शहीद स्थल पर आई और यत्र-तत्र बीखरे देहावषेशों को एकत्रित कर रानी ने दोनों (पिता-पुत्र) का अंतिम संस्कार किया और मण्डला की ओर चली गई.
ईधर मृत्यु दण्ड की खबर सुनते ही जन सैलाब शहीद स्थल पर उमड़ पड़ा. वर्तमान उच्च न्यायालय और वन विभाग के कार्यालय के बीच का स्थल महान देशभक्त पिता-पुत्र का शहीद स्थल है, वहाँ स्थित पेड़ जिसे लोग तीर्थ बनाकर श्रद्धा सुमन अर्पित करने लगे, और अपने राजा को याद करने के लिये रोज सैकड़ों श्रद्धालु आने लगे तब अंग्रेजों ने उस पेड़ को कटवा दिया. जैसे-जैसे उनकी भयावाह मृत्यु दण्ड की खबर गांवों में फैलती गई लोगों का रेला पहुंचने लगा. बरगी, बरेला, पनागर, सीहोर, नारायणपुर, (बघराजी), कैमोरी, कटंगी, पाटन, कोंनी, मण्डला, घुघरी, दमोह, नरसिंहपुर आदि के साथ-साथ सम्पूर्ण नर्मदा-सोन घाटी पर क्रान्ति की आग सुलग गई. हिरन का कछार रक्त रंजित हो गया. उधर कुंडल के जंगलों में क्रांतिकारी फ़ैल गये और सरकारी दफ्तरों में लूट-पाट मचाने लगे, उन्हें पकड़ने पुलिस जाती तो वे देवगढ़ की गुफाओं में छुप जाते थे. इसके अतिरिक्त छतरपुर, सोनपुर, इन्द्राना के जंगल इनके अड्डे थे.

\शहर में क्रांतिकारीयों के लिये दोहा बना दिया गया जिसमे हथियार कहाँ मिलेंगें और गोला कहाँ गिरेंगें और उन्हें क्या करना है. वह दोहा इस प्रकार है-

लकड़गंज लाठी बिकें, गोरखपुर तलवार |
बीच सदर गोला गिरें, लूटो सकल बाजार ||
५२वी पल्टन के सिपाही हथियार लूटकर बैरक छोड़ पाटन पहुँच गये और वहाँ पदस्थ मेकग्रेगर को अपने कब्जे में ले लिया, बाद में कटंगी के पास उनकी हत्या कर अपने क्रोध को कुछ शांत किया. अंग्रेजी हुकुमत सतर्क हुई, प्रत्येक बड़े कस्बे में छावनी स्थापित कर दी गई. गोंडकालीन पड़ाव सोनपुर, इमलई, पनागर, बरगी, कटंगी पाटन, सीहोरा आदि ग्रामो में फ़ौजी दस्ते नियुक्त किये गये.

०७ नवम्बर १८५७ को कप्तान टाटेनहोम और लेफ्टिनेन्ट सी.एम. स्टीवार्ट पनागर में थे तभी उन्हें जानकारी मिली कि गोसलपुर को नीमखेड़ा के विद्रोहियों द्वारा लूटा जा रहा है. अंग्रेजी सेना वहाँ तक पहुंचती तब तक विद्रोही भाग चुके थे. उन्हें जानकारी मिली कि करीब एक हजार विद्रोही कटरा रमखिरिया की तरफ गये हैं, सेना वहाँ पंहुची लेकिन वहाँ भी कोई विद्रोही नहीं मिले. एक घर में विद्रोहियों के छुपने की संभावना को देखते टाटेनहोम ने दरवाजा तोड़ा तो उन पर गोलियों की बौछार होने लगी. गोलीबारी में टाटेनहोम घायल हो गये और दूसरे दिन उनकी मौत हो गई. मुडभेड में ०८ लोग मरे गये और १८ बंदी बनाये गये, बाद में उन्हें फांसी दे दी गई. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आजादी के दीवाओं व क्रांतिकारियों को अमानवीय सजा व फासी पर लटकाने के अनगिनत उदाहरण दर्ज हैं, किन्तु किसी क्रांतिकारी को तोप के मुहाने में जीवित बांधकर गोला बारूद से उड़ा देने की देश में यह पहली घटना थी. महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह सिर्फ विद्रोही ही नहीं बलिक एक समृद्धशाली राजवंश के शासक भी थे. मराठों और भोसलों राजघरानों ने मिलकर गोंड राजवंश को समाप्त करने का षड्यंत्र किया, जिससे गोंड साम्राज्य कमजोर हुआ परन्तु अदम्य साहस व वीरता के प्रतीक महाराजा शंकरशाह ने घुटने नहीं टेके और जबलपुर डिविजन में अंग्रेजों के खिलाफ अपने बल बूते पर सशस्त्र बगावत खड़ी कर दी. भारतीय राजघरानों को आपस में लड़वाकर अंग्रेजों ने भारत को अंततः पूरी तरह गुलाम बना डाला. गढ़ा मंडला के शक्तिशाली साम्राज्य के साथ मिलकर यदि मराठों और भोसले राजघरानों ने संयुक्त रूप से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा होता तो १८५७ में ही अंग्रेज भारत से भाग जाते. १८ सितंबर की तारीख स्वतंत्रता आंदोलन की एकलौती ऐतिहासिक घटना है, जिसमे गोंडवाना साम्राज्य के शूरवीर राजा व कुँवर दोनों को तोप के मुहाने पर बांधकर तोप चला दिया गया, जिससे गोंड वंश के सपूतों के चीथड़े उड़ गए. आदिवासियों की ऐतिहासिक शहादतों को शहीदे आजम भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसा राष्ट्रीय सम्मान क्यों नहीं मिला ? यह चिंतन हमें करना चाहिए.

साभार आदिवासी सत्ता 

रविवार, 16 सितंबर 2012

जनजातीय समाज को जरूरत है सांस्कृतिक आन्दोलन की


        भारत वर्ष में जहां-जहां जनजातीय समाज के लोग रहते हैं, विशेषकर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड, विदर्भ (महाराष्ट्र), आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, गुजरात में जनजातियों के बहुत से नेता और बुद्धीजीवी जनजातियों की विशिष्ठ पहचान (आइडेंटिटी) को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन इन राज्यों के बहुत से जनजाति के लोगों नें अपनी पहचान को त्याग दिया है और त्याग रहे हैं. बहुत से जनजातीय लोग अपनी बोली भाषा छोड़ते जा रहे हैं. अपना धर्म और रीति रिवाज छोड़ते जा रहे हैं. अपनी संस्कृति और सामाजिक, राजनीतिक संस्थाएं छोड़ते जा रहे हैं.

        कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा ईसाईयत के प्रभाव से हुआ है. यह बात पूरी तरह से सही नहीं है. यह सच है कि ईसाई बने जनजाति के लोगों ने अपनी संस्कृति की कई बातों को छोड़ दिया है, लेकिन ईसाई जनजातियों की संख्या बहुत कम है. अधिकतर जनजाति गैर ईसाई हैं. वे अपनी पहचान क्यों छोड़ रहे हैं ?

         इन राज्यों के अधिकांश क्षेत्रों के जनजातियों ने बहुत से हिन्दू रीति रिवाजों को अपना लिए हैं. ब्राम्हणों को अपना पुरोहित बनाया है और हिन्दू पर्व, त्यौहार मनाते हैं तथा हिन्दू देवी देवताओं की पूजा करते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इन सब के पीछे आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव हैं. बाहरी ताकतों और शक्तिशाली पराये जातीय समूहों से घिरे होने के कारण उनके दबाव से जनजातीय समाज अपनी पहचान, धर्म, संस्कृति, बोली भाषा आदि छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं.

       यह बात सही है, लेकिन जनजातियों के द्वारा इनके प्रतिरोध का कोई विशेष प्रयास नहीं दिखता. उनमे इन घटनाओं के प्रति विक्षोभ की मानसिकता नही दिखती. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले जनजातीय युवक युवतियों में अपनी जातीय पहचान के प्रति कोई लगाव नहीं दिखता. शिक्षित जनजातीय युवक युवतियां अपने जनजातीय होने पर शर्म महसूस करते हैं. जिन कॉलेजों में जनजातीय भाषा साहित्य के विभाग खुले हैं, उनमे जनजातीय युवक युवतियों ने अपनी मातृभाषा और उनके साहित्य को पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखलाई. एक वाक्य में कहें तो “शिक्षित जनजातीय युवक युवतियों में अपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना मिलती है.”

       ऐसी स्थिति में कुछ जागरूक जनजातीय समाज के बुद्धीजीवीयों द्वारा जनजातीय पहचान को प्रतिष्ठित करने का आन्दोलन कैसे सफल हो सकता है ? अगर लोग अपनी पहचान बताने में शर्माते हों तो आप उनकी पहचान को कैसे प्रतिष्ठित कर सकते हैं ? सवाल यह है कि जनजातीय समाज अपनी पहचान क्यों छोड़ते जा रहे हैं ? शिक्षित जनजातीय समाज के युवक युवतियां अपनी जातीय पहचान से क्यों शर्माते हैं ? अपनी बोली भाषा, संस्कृति, समाज के प्रति उनमे हीनता की भावना क्यों है ?

        इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि बाहरी लोग जो शक्तिशाली हैं और अधिक/कृत्रिम सुसंस्कृत और सभ्य समझे जाते हैं तथा जनजातीय समाज को नीची नजर से देखते हैं. बाहरी लोगों की नजर में जनजातीय समाज असभ्य और असंस्कृत है. उनकी नजर में जनजातियों का धर्म, रीति रिवाज, सामाजिक संस्थाएं, पर्व त्यौहार और बोली भाषा, साहित्य सब पिछड़ा हुआ है, निम्न कोटि का है, असभ्य अवस्था में है ? वे अपनी बातचीत से और अपने वर्ताव से जनजातीय समाज के प्रति घृणा प्रकट करते हैं और अपने समाज की हर चीज कुटिलता से श्रेष्ठ घोषित करते हैं, जबकि वैसा नहीं है, सारी बुराईयाँ उनकी हैं.

          दूसरों के कहे अनुसार शिक्षित जनजातीय समाज यह महसूस करता है कि उनके समाज में हर चीज घृणित है, उनका धर्म, रीति रिवाज, संस्कृति और बोली भाषा सब पिछड़ी हुई है. असभ्य अवस्था में है तो वे अपने समाज पर गर्व कैसे करे ?

         वे अपने आँखों के सामने देखते हैं कि समाज में और देश में हर जगह हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं का सम्मान है. इनके माध्यम से हर काम होता है, लेकिन जनजातीय भाषाओं के माध्यम से नहीं ? वे देखते हैं कि जो लोग अधिक सभ्य और सुसंस्कृत हैं, अधिक संपन्न और प्रतिष्ठित हैं. वे अपनी जनजातीय भाषाएँ नहीं बोलते है. वे हिंदी, अंग्रेजी आदि बोलते हैं. वे देखते हैं कि जो शासन करते हैं, जो देश और समाज को चलाते हैं, जो हर जगह बड़े पदों पर प्रतिष्ठित हैं, वे जनजाति समाज के नहीं, गैर जनजातीय समाज के हैं. समय समय पर वे इन प्रतिष्ठित सम्मानित तथा संपन्न लोगों के मुह से अपनी जनजातीय बोली भाषा, संस्कृति की निंदा भी सुनते हैं. सुनने से भी अधिक यह चीज वे उनके व्यवहार से पाते हैं. बाहरी लोग आपस में वैसा व्यवहार करते हैं. उससे घटिया दर्जे का व्यवहार वे आदिवासियों से करते हैं. रे इधर जाओ, उठो उधर जाओ और तुम ताम कहकर वे आदिवासियों को संबोधित करते हैं. शहरों में, बसों में, ट्रेन में, सार्वजनिक स्थानों में, मालिक के साथ मजदूर के रूप में और सबसे अधिक गाँव देहातों में जनजाति समाज हर जगह अपने लिए ऐसा ही घटिया व्यवहार सहते हैं.

        गाँव देहातों में पहने जाने वाले पहनावा, उनकी रीति, रिवाज, संस्कृति, बोली भाषा में कभी भी कहीं भी दरिद्रता नहीं झलकती, किन्तु शहरी और समृद्ध लोगों के द्वारा ये सब देखकर यह मानसिकता बना चुके हैं कि देहातियों में समझ नहीं होती तथा वे सभ्य नहीं होते. उन्हें हिंदी अंग्रेजी नहीं आती, किन्तु वे धन्य हैं जिन्हें अपनी मातृभाषा आती है. शिक्षितों की अपेक्षा वे भाषाई भिन्नता और शिक्षित नही होने से समझ में कमजोर पाए जाते रहे हैं. यदि वे भी शिक्षित हो जाएँ तो उनमे भी हर तरह की समझ आ जाती है. केवल शिक्षित न होकर उनकी नासमझी को देखकर उन्हें सभ्य लोग कई तरह से प्रताड़ित करते हैं, उन्हें असभ्य समझते हैं. इन सबको बचपन से देखते देखते समाज के युवक युवतियों के मन में स्वाभाविक रूप से यह विचार बन जाता है कि उनकी समुदाय और समाज ऐसे ही है. उनकी हर चीज घटिया और निम्न हैं और उसमे सभ्य और श्रेष्ठ कुछ भी नहीं हैं. इसलिए शिक्षित युवक युवतियों को अपनी भाषा, संस्कृति और रीति रिवाज पर गर्व नहीं होता. उन्हें अपने जनजातीय होने पर शर्म आता है. उनमे अपनी सामुदाईक पहचान के प्रति हीनता की भावना पनपती है. वे चाहते हैं कि वे जनजाति न रहकर कुछ और हो जाएँ. कुछ ऐसा हो जाएँ जिससे बाहरी लोगों के मन में उनके प्रति सम्मान बढ़े. चूंकि बाहरी लोग सिर्फ अपनी ही संस्कृति, अपनी ही रीति रिवाजों को और सिर्फ अपने ही धर्म और सामाजिक मूल्यों को सम्माननीय मानते हैं, इसलिए उनके नजरों में सम्माननीय बनने के लिए जनजातीय समाज के लोग अपनी संस्कृति, रीति रिवाज, बोली भाषा, धर्म और अपनी सामाजिक मूल्य छोड़कर बाहरी लोगों की संस्कृति, रीति रिवाज, बोली भाषा, धर्म और मूल्य अपनाते जा रहे हैं
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        वास्तव में यह घटना जनजातीय जीवन मूल्यों का पराजय है, कहा जा सकता है. यह सही है कि अपेक्षाकृत जनजातीय समुदाय में गरीबी है. उनकी अर्थ व्यवस्था पिछड़ी हुई है. उनकी उत्पादकता कम है, क्योंकि उनकी जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है. उनके पास सिंचाई के साधन तथा उत्पादन के आधुनिक साधनों का अभाव है. यह सही है कि जनजातीय समाज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं सरल, स्थानीय तथा समजोर हैं. लेकिन यह सही नहीं है कि उनकी संस्कृति विकृत व घटिया है. यह सही नहीं है कि उनके रीति रिवाज, बोली भाषाएँ, धर्म तथा जीवन मूल्य निम्न कोटि के हैं. सच बात तो यह है कि जनजातीय समुदायों की संस्कृति, उनके जीवन मूल्य तथा बहुत सी सामाजिक परम्पराएं कथित सभ्य बाहरी लोगों की सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक परम्पराओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ, प्राकृतिक और मानवीय है. सच बात तो यह है कि जनजातियों की संस्कृति और सामाजिक जीवनमूल्य मानव जाति की कल्पना के आदर्श मानव समाज से अधिक मेल खाते हैं. जबकि जनजातियों को असभ्य और असंस्कृत कहने वाले भारत के हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों का समाज जिसमे निवेशिक सभ्यता के कृत्रिमता तथा मध्ययुगीन सामंती संस्कृति व पशुत्व संस्कृति के घृणात्मक मूल्यों के नीचे दबकर मनुष्यता और व्यक्ति की गरिमा कराह रही है.

         उदाहरण के लिए देश और दुनिया का सभ्य हिंदू समाज दहेज़ जैसी दानवीय समस्या से पीड़ित है और दहेज़ के लिए पत्नियों और दूसरों की बहन बेटियों को ज़िंदा जलाने और उनकी ह्त्या कर देने की घटनाएं आम हो चुकी है. जबकि जनजातीय समाज में दहेज़ जैसी विकराल समस्या नहीं है और दहेज़ के लिए किसी को जलाने या जान से मार देने की तो जनजातीय लोग कल्पना भी नहीं करते. शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले हिंदू समाज में आज की परिस्थितियों में देखा जाए तो विकृति के अलावा और कुछ नजर नहीं आता. जितने शिक्षित और सभ्य है उतनी ही सामाजिक जीवन की गंदगी उनमे पनप रहा है. महिला पुरुष की आनुपातिक कमियाँ भी सभ्य और शिक्षित हिन्दू समाज की देन है. वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था तथा उंच नीच की बर्बर मानव विरोधी व्यवस्था पर खड़ा है. जाति और वर्ण के आधार पर मनुष्य के प्रति घृणा भाव रखना, हिंदू समाज व्यवस्था और धर्म का अंग है. जबकि जनजातीय समाज अपने समाज के सदाचार, आदरणीय, समानता की भावना पर आधारित है. हिंदू नैतिकता के मूल्य अस्वस्थ और अस्वाभाविक हैं.

       हिन्दू समाज तरह तरह की यौन विकृतियों जैसे बलात्कार, समलैंगिकता आदि से ग्रस्त है. जबकि जनजातीय समाज में बलात्कार जैसी घटना शायद ही कभी सुनने को मिलती है. जनजातियों में विवाह और तलाक की व्यवस्था सरल और व्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान तथा भौतिक आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप है. इसलिए उसमे नारी की स्वतंत्रता और पुरुष से उसकी समानता तुलनात्मक रूप से अधिक है. जबकि हिंदू समाज में विवाह धार्मिक और जाति वर्ण की रूढ़ियों से ग्रस्त है और तलाक का धार्मिक आधार पर विरोध है, जो नारी की स्वतंत्रता और सम्मान को असंभव बना देता है. पति के निधन होने पर विधवा को तिरस्कार कर जीवन के हासिये पर डाल देते हैं. बाल, विधवा या युवति मथुरा, वृन्दावन, काशी और मंदिरों में भेज देते हैं, जहां वे युवा नारियां देवदासी के नाम से जिन्दगी भर शारीरिक शोषण सहते रहते हैं. फादर पी.पोनेट ने मुंडा नायक, अपने लेख में लिखा है-  “आदिवासियों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि उनके समाज में अनाथ बच्चे नहीं होते. गाँव में जिन बच्चों को देखने वाला कोई नहीं होता, आदिवासी बहुत प्यार से उन बच्चों को अपने भर में रख लेते हैं और उन्हें अपने बच्चों जैसा ही प्यार देते हैं. यह आदिवासी समाज की एक महान विशेषता है.”

जनजातियों की संस्कृति और मूल्यों की ये सारी विशेषताएं ऐसी है, जो भविष्य के समाजवादी समाज की संस्कृति की बाहरी लोगों द्वारा की गयी व्यख्या को स्वीकार कर रखा है और बाहरी लोगों के द्रष्टिकोण और विचारधारा के आगे सिर झुका दिया है. यही जनजातियों की संस्कृति पराजय है. गैर जनजातीय लोग इस भू-भाग में चोर, उच्चके, भिखमंगा, अपराधी बनकर यहाँ पर अपना आशियाना बनाए हैं. जर-जोरू और जनजातियों के जल, जमीन को येन-केन प्रकारेण लूटपाट कर दबंगता से कबजा किए या नहीं के बराबर दारू पिलाकर लूटे हैं. सहकारी बैंकों के कर्ज में दो-तीन हजार के कर्ज को उनकी पचास साठ हजार की जमीन या घर द्वार कुड़की कराए. ये ही परदेशी लोग.

इस देश में सिर्फ जनजातियों ने ही सांस्कृतिक रूप में पराजित नहीं हुए हैं. भारत वर्ष का हिन्दू समाज भी इसी प्रकार विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप में पराजित हुआ था. यह बात तब की है. जब अंग्रेज इस देश में आये थे. और यहाँ आकर उन्होंने भारतियों के ऊपर अपना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाना शुरू किया था. यूरोपीय लोग जाकर हिन्दू समाज की संस्कृति, धर्म तथा रीति रिवाजों की निंदा कर रहे थे और उन्हें निम्न कोटि का साबित कर रहे थे. वास्तव में हर विजित जाति यह साबित करने की कोशिश करती है कि उसकी संस्कृति, भाषा, साहित्य, धर्म तथा सामाजिक मूल्य अधिक श्रेष्ठ हैं. हर विजेता जाति ने विजित जाति को बर्बर कहा है, असभ्य कहा है, राक्षस कहा है. बंगाल में यूरोपियों ने कई स्कूल और कालेज खोले थे, यहाँ भारतीय युवक यूरोपीय शिक्षा प्राप्त करते थे. इन शिक्षा संस्थानो में तथा ऐसे ही अन्य बौधिक संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौद्धिक केन्द्रों में हिन्दू युवकों के सामने हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति तथा रीति रिवाजों के पिछड़ेपन तथा घटियापन को साबित किया जाता था और बताया जाता था कि हिन्दू समाज एक बर्बर और असभ्य समाज है, जिसके पास कोई गर्व करने योग्य चीज नहीं है. इसका प्रभाव पड़ा था शिक्षित हिन्दू युवकों के मन में. अपने समाज के प्रति हीनता की भावना भर उठी थी. शिक्षित युवक पिछड़ा मानकर शर्माने लगे थे. बहुत तेजी से बंगाल में ईसाई धर्म फ़ैल रहा था. ये बहुत गरीब लोग नहीं थे, जो आर्थिक सुविधाओं के लोभ में ईसाईयत को अपना रहे थे. ये शिक्षित अभिजात्य और सम्पन्न घरों के लोग थे जो ईसाई धर्म को अपना रहे थे. उनके मन में अपनी जातीय पहचान के प्रति अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीनता की भावना आ गयी थी और वे यूरोपियों के नजरों से सम्मनित बनना चाहते थे.

उन्होंने यूरोपियों द्वारा अपने समाज संस्कृति की व्याख्या के आगे सिर झुका दिया था. इस तरह से शिक्षित हिन्दू भी विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप से पराजित हो रहे थे. लेकिन यूरोपीय लोग हिंदुओं को सांस्कृतिक रूप से पूर्णरूप से पराजित नहीं कर सके. हालांकि की यूरोपियों की आर्थिक, राजनितिक व्यवस्था तथा सभ्यता संस्कृति का भारतवासियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और यह स्वाभाविक भी था. फिर भी यूरोपीय भारतीय संस्कृति, धर्म और मूल्यों तथा रीति रिवाजों को पराजित नहीं कर सके, क्योंकि हिंदुओं ने अपनी हो रही सांसकृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष किया और उस पराजय को उलट डाला.

बंगाल में राजाराम मोहन राय पहले व्यक्ति थे. जिन्होंने यूरोपीय धर्म, संस्कृति और मूल्यों के विरूद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया और यह साबित कर दिखाया कि यद्यपि हिन्दू समाज, संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों में बहुत सी त्रुटियाँ हैं, फिर भी यह घटिया नहीं है. वह यूरोपीय संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है. राजाराम मोहनराय ने अख़बारों में तथा सभा समितियों में यूरोपीय विद्वानों से बहस किये, वाद- विवाद किए हिन्दू संस्कृति और समाज पर उनके प्रहारों का खण्डन कर दिखाया और हिन्दू लोगों में अपनी मैलिक पहचान के प्रति, अपने समाज और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना भरी.

जब बंगाल में राजाराम मोहनराय विदेशियों की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर हिन्दूओं को मन में अपने समाज संस्कृति और धर्म के प्रति श्रेष्ठता और गौरव की भावना भर रहे थे. उसी समय पंजाब, गुजरात और उत्तरप्रदेश में स्वामी दयानंद सरस्वती तथा महारास्ट्र में रानाडे भी यूरोपीय संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ विचाधारात्मक संघर्ष चलाकर किसी तरह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की प्रतिष्ठा कर रहे थे. पूरे भारतवर्ष में यूरोपियों द्वारा भारतियों की संस्कृति, धर्म और मूल्यों को नीचा दिखाने के खिलाफ, सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ एक महान सांस्कृतिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसका उद्देश्य था भारतियों को अपना महान संस्कृति, महान मूल्यों और परंपराओं का बोध करना. उनके मन में अपनी संस्कृति पहचान के प्रति गौरव और गर्व की भावना भरना १९वी शताब्दी के इस महान सांस्कृतिक अन्दोलन को भारतीय समाज के पुनर्जागरण का आंदोलन भी कहा जाता है.

इस सांस्कृतिक आंदोलन को हिन्दू समाज के बौद्धिक नेताओं ने दो तरीकों से किया था- एक ओर तो उन्होंने यूरोपीय लोगों द्वारा हिन्दू समाज, धर्म और संस्कृति के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों और निंदा का जमकर मुकाबला किया और बहस करके, विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर उनकी आलोचना का खण्डन किया तथा हिंदू समाज और संस्कृति के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित किया, लेकिन साथ ही साथ दूसरी ओर उन्होंने हिंदू समाज में रूढ़िवाद और गलत धार्मिक, सामजिक प्रथाओं तथा अंधविश्वासों के खिलाफ संघर्ष चलाया और हिंदू समाज में सुधार का आंदोलन भी खड़ा किया, ऐसा करना जरूरी था. क्योंकि हिन्दू समाज के इन्हीं कमजोर पक्षों को आधार बनाकर यूरोपीय लोग हिंदू समाज पर अपने हमले करते थे. इन कमजोर पक्षों को खत्म किये बिना यूरोपियों की आलोचना के आधार को खत्म करना मुश्किल था.

हिंदू समाज के कमजोर पक्षों को खत्म करने और समाज का सुधार करने के लिये इन सुधारकों ने प्राचीन परंपराओं, शास्त्रों, धर्म तथा रीति रिवाजों का गहरा अध्ययन किया. बहुत सी पुरानी चीजों की नये युग के अनुसार नई व्याख्या की और कुछ चीजों के लिये नये विधान बनाये. बाल विवाह, बहु विवाह प्रथा तथा सती प्रथा इसी तरह खत्म किया गया तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को उचित ठराया गाया. वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा के अन्यायपूर्ण तत्वों का विरोध करके मनुष्य मात्र के लिए समानता के आदर्श को सामने रखा गया.

 १९वी सदी के बिल्कुल अंत में स्वामी विवेकानंद ने ६० वर्षों से चल रहे इस महान सांस्कृतिक आंदोलन को इसके उत्कर्ष तक पहुंचा दिया. विवेकानंद ने न सिर्फ भारत वर्ष के अन्दर, बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी जाकर विचारधारात्मक संघर्ष के जरिये भारतीय संस्कृति और मूल्यों की श्रेष्ठता को साबित कर दिखाया. इस तरह सांस्कृतिक आंदोलन ने एक हद तक अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया. भारतीयों के मन से अपनी संस्कृति और आपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना खत्म हो गयी और उसकी जगह भारतीय स्वाभिमान और गौरव की भावना ने ले लिया.

यह बदली हुयी मानसिकता अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनी है. सांस्कृतिक आंदोलन जिस जातीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भारतीय युवकों के हृदय में जगाया, उसी से प्रेरित होकर लाखों लाख युवक अपने देश को अंग्रेजों के गुलामी से मुक्त करने के लिये राजनीतिक संघर्ष में कुद पड़े. अगर १९वी सदी में यूरोप के सांस्कृतिक प्रमुख के खिलाफ भारतियों का महान सांस्कृतिक आंदोलन न होता तो १९वी सदी में अंग्रेजों के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी नहीं होता.

अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना के बिना पहचान को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता. अगर लाखों लोग अपनी पहचान पर शर्माते हैं,  शिक्षित समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाज और धर्म को हीन दृष्टि से देखतें हैं और अपने ऊपर शासन करने वाले अपने शोषकों को अपना आदर्श समझतें हैं तो वे अपनी पह्चान के लिये, अपने अलग व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिये संघर्ष कैसे कर सकतें है ?

जनजातियों की समस्या यह है कि उनमे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो उनकी सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष को संघठित करे. जनजातियों में राजाराममोहन राय तो हुआ लेकिन कोई विवेकानंद नहीं हुआ. कहने का मतलब यह है कि बिरसामुण्डा ही एक मात्र ऐसे आदिवासी नेता थे. जिन्होंने जनजातियों की स्वाभिमान और आत्म गौरव को जगाने का प्रयास किया था. लेकिन उनका कार्य अधूरा ही रह गया. उनके बाद ऐसा कोई व्यक्ति या संगठन नहीं हुआ जो बिरसा के अधूरे कार्य को उसके उत्कर्ष तक ले जाता.

इसके उलटे जनजातीय समाज शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही बहुत तेजी से बाहरी लोगों के सामने अपनी सांस्कृतिक पराजय को स्वीकार करते जा रहे हैं. यही कारण है कि जनजातियों की राजनीतिक मुक्ती के आंदोलन सांस्कृतिक मुक्ति के आंदोलन के आधार ही कमजोर हैं. क्योंकि उनकी आवश्यक पृष्ठभूमि तथा समुदाय का स्वाभिमान और आत्म गौरव की भावना जो एक महान सांस्कृतिक आंदोलन से ही पैदा हो सकती है, नहीं बन पायी है.

आज भारतवर्ष के जनजातियों को जरूरत है एक सांस्कृतिक आंदोलन की. एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन जो एक ओर बाहरी लोगों द्वारा जनजातीय समाज, उनकी संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और रीति रिवाजों के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों का मुहतोड़ जवाब दे और विचाधारात्मक संघर्ष चलाकर जनजातीय समाज की संस्कृति, धर्म, मूल्य और रीति रिवाजों के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित करके जनजातियों के मन में सामुदायिक स्वाभीमान और आत्म गौरव की भावना को जगाये. दूसरी ओर जनजातीय समाज के रूढ़िवादी, अंधविश्वासों तथा गलत परंपराओं के खिलाफ संघर्ष करके, समाज सुधार का आंदोलन खड़ा करके समाज को स्वस्थ और सबल बनाये ताकि लोग प्रगति कर सकें कि हम कौन हैं ? हमारी संस्कृति और समाज की महान परंपराएं क्या है ? हमारी बुनियादी मूल्य क्या हैं ? हमारे समाज और संस्कृति में अच्छा क्या है और बुरा क्यों है ?  हमारी संस्कृति और समाज के बुनियादी मूल्यों को बनाकर रखने का औचित्य और जरूरत क्यों ? हमारी संस्कृति और समाज कैसे हिन्दूओं से श्रेष्ठ है ? ऐसे सारे प्रश्न आदिवासियों को उठाने होगें और उनका समुचित उत्तर देना होगा. बहस, तर्क और उदाहरणों से अपनी मान्यताओं को स्थापित करना होगा. निःसंदेह ऐसे सांस्कृतिक आंदोलन में भाषा का प्रश्न महत्वपूर्ण होगा. क्योकि भाषा के प्रति प्रेम और गर्व के बिना किसी प्रकार का सांस्कृतिक आंदोलन नहीं हो सकता. समाज और संस्कृति के प्रति हीन भावना को दूर करके जो जनजातियों ने अपनी श्रेष्ठता, सामुदायिक स्वाभिमान और अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना भर दे. ऐसे महान सांस्कृतिक आंदोलन की रुपरेखा और कार्यक्रम क्या हो, इस पर अलग से विस्तार पूर्वक विचार करने की जरूरत है. लेकिन एक बात तय है कि एक व्यापक सांस्कृतिक अंदोलन के बिना, आज तेजी से टूटते और बिखरते जा रहे जनजातीय समाज को टिकाकर रखने और राजनीतीक रूप से उसकी अलग सत्ता को प्रतिष्ठित करने का अंदोलन सफल नहीं हो सकता.


भारत सिंह (IPS)

शनिवार, 15 सितंबर 2012

नक्सलवाद और आदिवासियों के विकास पर सुलगते सवाल


(१) बस्तर में पाँचवी अनुसूची लागू है, तो इसके लागू रहते वहाँ फ़ोर्स की तैनाती कैसे हुई ?

(२) यदि फ़ोर्स की तैनाती वहाँ जनता की सुरक्षा और नक्सलवाद के खात्मे के लिये हुई भी तो फ़ोर्स और नक्सलवादियों के मुठभेड़ में आदिवासी ही क्यों मर रहे है ?

(३) बस्तर में सभी जाति वर्ग की जनता निवास करती है किन्तु उनके हताहत होने और नक्सलियों द्वारा मारे जाने या उन्हें फ़ोर्स द्वारा परेशान किये जाने का समाचार किंचित मात्र भी नहीं है. यदि गैर आदिवासी और आदिवासी एक ही छेत्र में रहते हुये भी गैर आदिवासी नक्सलवाद से ज़रा भी प्रभावित न होकर दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं तथा इसके विपरीत आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर घर से बेघर किया जाकर उनके जीवन को प्रभावित किया जा रहा है. इसके मायने क्या है ?

(४) क्या फ़ोर्स नक्सलवाद के नाम पर बस्तर में केवल आदिवासियों के खात्मे के लिये भेजी गई है ?

(५) नक्सलवादी कहकर बेगुनाह, बेक़सूर आदिवासियों और उनके बच्चों को बस्तर में तैनात फ़ोर्स के द्वारा फर्जी मुठभेड़ के रूप में मारने का उनका औचित्य क्या है ?

(६) बस्तर में समाज सेवियों को नक्सलवादियों से ख़तरा बताकर घुसने नहीं दिया जाता किन्तु यहाँ जमीन का सौदा करने और उद्योग लगाने के लिये आने वाले उद्योगपतियों को सर आँखों पर बिठाकर उन्हें फ़ोर्स द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है. सामंजस्य बिठाने वाले समाज सेवकों को डर दिखाकर वहाँ से खदेड देना और दूसरी और वहाँ घुसने वाले, जमीनों, जंगलों और खनिज संपदा की दलाली करने वाले उद्योगपतियों को सुरक्षा प्रदान कर अति संवेदनशील और दुर्लभ क्षेत्रों का कोना-कोना घुमाए जाने से उन्हें कोई ख़तरा नहीं होना किस तरह की सुरक्षा व्यवथा का प्रतिफल है ?

(७) समाज सेवकों को नक्सलियों का ख़तरा बताना और दूसरी और उद्योगपतियों को सुरक्षा प्रदान करना किस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की रणनीति है तथा ऐसा करने से किन लोगों का हित है ?

(८) पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों को ही नक्सलवाद प्रतिरोपित करना और उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार देने का क्या औचित्य है ? पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों के साथ ऐसा व्यवहार करने का क्या कारण है ?

(९) सुरक्षा में नाम पर पुलिस फ़ोर्स द्वारा आदिवासियों को उनके घर और जमीन जायदाद से उठाकर शिविरों में जबरदस्ती रखना किस तरह की सुरक्षा है ? ऐसा करने से क्या और किसको लाभ है ?

(१०) बस्तर के अनेक क्षेत्रों में विदेशी मूल- तिब्बती, बँगलादेशी लोगों को शरण दिया गया है. वे खूब तरक्की कर रहे हैं तथा सरकार उन्हें उनके ही सरण स्थल पर हर तरीके की सुविधा मुहैया करा रही है, किन्तु आदिवासियों को उनके घरों से निकाल कर शिविरों में रहने के लिये क्यों बाध्य कर रही है ?

(११) अनुसूचित क्षेत्रों के आदिवासियों के कृषि जमीनों को सरकार द्वारा जबरदस्ती अधिग्रहण कर उस पर उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिये अनुमति क्यों दे रही है ? क्या ऐसा करना आदिवासियों के साथ संवैधानिक एवं नीतिगत न्याय है ?

(१२) अधिसूचित एवं आदिवासी क्षेत्रों में अति आवश्यक होने पर ही सरकारी स्थानापन्न के लिये पड़त एवं निजी जमीन ग्राम सभा और किसानो की सहमति एवं सम्पूर्ण मुवावजा देकर अधिग्रहण किये जाने का नीतिगत व संवैधानिक नियम है, किन्तु ऐसा न कर, बन्दूक की नोक पर आदिवासियों के जमीनों का अधिग्रहण करना, क्या उनका शोषण और अत्याचार नहीं है ?

(१३) किसानों के निजी जमीन पर लगने वाले उद्योगों में उनका शेयर प्रदान करने का संवैधानिक नियम है तथा एम.ओ.यू. (उद्योगों के स्थापना सम्बन्धी शर्त/सरकारी अनुबंध) में इनका उल्लेख होता है, किन्तु बस्तर में उद्योगों के स्थानापन्न के इतिहास में उनको अब तक किसी उद्योग में भागीदार नही बनाया गया. क्या यह संविधान नियम विरुद्ध नहीं है ?

(१४) एक तरफ सरकारें आदिवासियों के विकास के लिये तरह तरह की योजनाएं संचालित कर उनका स्तर उठाने के लिये सरकारी योजनाओं के कागजाती पुलिंदा तैयार कर रही है, किन्तु दूसरी ओर उनके जीवन संरक्षण के मूल साधन जल, जंगल, जमीन को छीनकर जानबूझकर बेदखल कर रही है. १७०(ख) के हजारों मामले न्यायालयों में लंबित है. कई मामलों में आदिवासियों के पक्ष में निर्णय हो चुके हैं किन्तु उन्हें अब तक जमीन का कब्जा दिलाने में उदासीन हैं. आदिवासियों के प्रति सच्ची न्याय में उदासीनता के क्या कारण है ?

(१५) वर्तमान आदिवासियों और उनके पूर्वजों का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है. ईश्वी पूर्व और देवत्वकाल का इतिहास भी गौरवपूर्ण, संस्कृतिपूर्ण, देशप्रेमी, समृद्धशाली तथा विकसित रहा है. देश में आर्यों के आगमनकाल के इतिहास में भी आदिवासियों की गौरवपूर्ण इतिहास का उल्लेख मिलता है. दुश्मनों के साथ शक्तिपूर्ण संघर्ष और अन्याय पर विजयगाथा के श्रोत मिलते है. बताया जाता है कि इतिहास में अनार्यों (गोंडवाना/भारत के आदिवासी, मूलनिवासी लोग) और आर्यों (योरोपियन मूल के भारत में आये हुये विदेशी लोग) के बीच सदियों से स्वदेशी और विदेशी भावनाओं, शक्ति-सम्पन्नता, जाति-विजाति,  उंच-नीच, धर्म-अधर्म के भेद-भावपूर्ण अनेक संघर्ष होते रहे. किसी भी तरीके से मूलनिवासियों से विजय पाने के लिये वे अपने छल-बल और कुटिल नीति का उपयोग करते रहे और आगे बढते रहे, किन्तु मूलनिवासियों की सहज जीवन नीति पर विजय नही पा सके. आज भी उन आदिवासी पूर्वजों की संतानों के सरल, सहज नीति पर अनेक तरह से लाखों कुठाराघात के बावजूद भी विदेशी आर्य लोगों की संताने विजय नही पा सकी. उनकी कुटिल प्रहार आज भी उसी तरह है, जिस तरह इतिहास में रहा. इसीलिए कहीं ऐसा तो नहीं कि आर्य विदेशियों के सर्व सम्पन वंशज अब भी मूलनिवासियों के वंशजों को चतुराईपूर्ण छल-बल तरीके से किन्तु मीठी जुबान की कटार से समूल मिटाने के प्रयास में हों ?


बी.पी.एस.नेताम

शनिवार, 8 सितंबर 2012

यह मेरा स्वतंत्रता दिवस कैसे हो सकता है ?


          यह तुम्हारा स्वतंत्रता दिवस है, मेरा नहीं. कैसे हो सकता है ? आज मेरे २००० आदिवासी भाई-बहन छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद हैं. ऐसे ही लगभग एक लाख शरणार्थियों से भी बुरी हालत में आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में खदेड़ दिए गए हैं. कैम्पों और गावों में रह रहे आदिवासियों पर जो अत्याचार सरकारी कारिंदों और सुरक्षाकर्मियों द्वारा किये जा रहे हैं सो अलग. १५ अगस्त १९४७ को स्वछंद आदिवासियों को इतिहास में पहली बार केन्द्रीय सत्ता के अधीन लाया गया और यह स्वीकारते हुए कि वह अन्य वर्गों की तुलना में जटिल कानूनों का पालन करने की स्थिति में नही है. संविधान में कई विशेष सुविधाएं प्रस्तावित की गईं. आजादी के ६५ साल बाद भी किसी सरकार ने संविधान में किये गए वह वादे नहीं निभाए.

          सांस्कृतिक और भू-स्वामित्व सुरक्षा, पांचवी अनुसूची का मूल विचार है और सरकारों ने लगातार शीर्ष और जमीनी स्तर पर अपनी कार्रवाईयों से इस वादे को तोड़ा है. 'मुख्य धारा' में खींच लाने की जिद और आधुनिक जीवनशैली के अबाध प्रचार का नतीजा यह हुआ है की एक ओर से आदिवासी अपनी संस्कृति से कटते गए और दूसरी ओर बाहरी लोगों के अंधाधुंध आगमन से वह अनुसूचित क्षेत्रों में भी तेजी से अपनी बहुसंख्यता गंवाते रहे. विदेशी शरणार्थियों को योजनाबद्ध तरीके से सरगुजा और बस्तर में बसाकर सरकारों द्वारा स्वयं संविधान की पांचवी अनुसूची का खुला उल्लंघन किया गया है. इससे क्रूर मजाक और क्या होगा कि भारत के वृहततम एकल आदिवासी क्षेत्र बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर का विधायक आज एक मारवाड़ी व्यक्ति है.

          २००७ में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ की "मूलनिवासियों के अधिकारों की घोषणा" पर हस्ताक्षर किये. इसके तहत आदिवासियों को स्वनिर्णय, सांस्कृतिक सुरक्षा के अतिरिक्त यह अधिकार दिया गया है कि उनके क्षेत्र में कोई भी सैन्य गतिविधि उनकी इच्छा और मांग के बिना नही की जायेगी. तब भी छत्तीसगढ़ सरकार ने सैंकड़ो एकड़ भूमि (पांचवी अनुसूची और पैसा अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध) स्थानीय मुखिया के विरोध के बावजूद भारतीय सेना को कैम्प बनाने के लिये दे दी है. उच्चतम न्यायालय द्वारा सलवा जुडूम मामले में जुलाई २००७ में स्पष्ट तौर पर आंतरिक अशान्ति के गहरे कारणों पर ध्यान देने के निर्देशों के बावजूद भी सरकार कोई दूरगामी, संवेदनशील रणनीति बनाने के बजाय केवल बल प्रयोग करने पर तुली हुई हैं. सरकारों के पास सारे भौतिक-बौद्धिक संसाधन जुटाने की सहूलियत है, लेकिन धन और सत्ता के लालच ने उन्हें आदिवासियों के प्रति इतना संवेदनहीन बना दिया है कि वह शान्ति प्रक्रिया के कोई इमानदार प्रयास नही करना चाहती. किसी भी कीमत पर त्वरित खनिज दोहन, हमारी अघोषित राष्ट्रीय नीति बन गई है और इसकी सबसे बड़ी कीमत हमारे आदिवासी भाईयों को चुकानी पड़ रही है.

          विशेष तौर पर पिछले २ सालों में मैंने स्थानीय शासन प्रशासन और स्वयं सेवी संगठनों के साथ मिलकर आदिवासी स्थिति की जटिलताओं को समझने और व्यापक समाज को समझाने की बहुत कोशिश की है. कलेक्टर, सचिव, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव तक को स्पष्ट तार्किक पत्रों द्वारा स्थिति से अवगत कराते हुए कार्रवाई का अनुरोध किया है. सवा साल के गहन शोध के बाद मैंने पांचवी अनुसूची की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की और जून २०१२ में बिलासपुर उच्च न्यायालय से जनहित याचिका के माध्यम से इस विषय पर हस्तक्षेप का अनुरोध किया है. कई विश्वविद्यालयों में इस पर चर्चा के दौरान माना गया कि संविधान की पांचवी अनुसूची का यह एक सार्थक विवेचन है और ६२ सालों में पहली बार इसे लागू कराने का प्रभावी प्रयास हो सकता है.

          इतना सब करने के बाद आज मुझे लगता है कि सभी शांत तरीके से बुद्धिजीवी प्रयासों द्वारा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की दयनीय स्थिति की ठीक प्रस्तुति नहीं की जा सकती. जेनेवा, न्यूयार्क, नई दिल्ली और सबसे बढ़कर रायपुर के नागरिकों को आदिवासी स्थिति के प्रति जागरूक बनाना जरूरी है. यहाँ आदिवासी स्थिति को लेकर व्यापक समझ बहुत सतही है और प्रत्यक्ष जाकर देखना तो दूर आदिवासियों के बारे में नृशास्त्रीय (एंथ्रोपोलोजिकल), आर्थिक, राजनैतिक, भौगोलिक, विधिक और संवैधानिक जानकारी के लिए प्रमाणिक पुस्तकें पढने का भी श्रम नही किया जाता. मेरा मानना है कि आदिवासियों पर यह लगातार अत्याचार सिर्फ स्थानीय युवाओं,  बुद्धिजीवियों की संवेदनहीनता के कारण चल पा रहा है. इसलिए प्रेस क्लब और राजभवन के बीच सड़क पर निर्वस्त्र रेंग घिसट कर उस तकलीफ और पीड़ा को सही प्रत्यक्ष उपमा से दिखाना चाहता हूँ. यदि सौ पचास युवाओं में भी इससे कुछ चेतना आती है तो मुझे मूर्ख और राष्ट्रदोही होने का आरोप  स्वीकार है.

बी.के.मनीष.